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पाकिस्तान में सेना प्रमुख कैसे बदलते रहे हैं रंग
- Author, शुमायला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ को जल्द ही देश का नया सेना प्रमुख चुनना है. मौजूदा सेना प्रमुख जनरल जावेद क़मर बाजवा 29 नवंबर को पद छोड़ सकते हैं.
शहबाज़ शरीफ़ लंदन में रह रहे अपने भाई और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से मिलकर वापस देश लौटे हैं. कयास लगाए जा रहे हैं कि वो नवाज़ शरीफ़ से नया सेना प्रमुख चुनने के बारे में सलाह लेने गए थे.
इस पर टिप्पणी करते हुए पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा है कि देश का नया सेना प्रमुख चुनने का फ़ैसला लंदन में लिया जाएगा.
पाकिस्तान के संविधान के तहत राष्ट्रपति नए सेना प्रमुख की नियुक्ति करते हैं लेकिन ये औपचारिक शक्ति अधिक है क्योंकि राष्ट्रपति इस निर्णय को प्रधानमंत्री की सलाह पर ही लेने के लिए बाध्य हैं.
इसका मतलब ये है कि सेनाओं का प्रमुख चुनने का अधिकार वास्तविकता में प्रधानमंत्री के पास ही है.
वर्तमान सेना प्रमुख के रिटायर होने से कुछ दिन पहले नए सेना प्रमुख के चुनाव के लिए सेना के सबसे शीर्ष जनरलों के नाम और उनका संक्षिप्त परिचय रक्षा मंत्रालय से होते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचता है.
प्रधानमंत्री कार्यालय फिर इन नामों की समीक्षा करता है और इन नामों को ख़ारिज करके वो और अधिक नाम भी मांग सकता है.
एक बार प्रधानमंत्री नाम तय कर लेते हैं तो उसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाता है ताकि वो औपचारिक रूप से अनुमति दे सकें.
पाकिस्तान में सेना के राजनीति में सीधे और परोक्ष दख़ल देने के इतिहास को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि पाकिस्तान में सेना प्रमुख का चयन सिर्फ़ मेरिट के आधार पर नहीं होता है बल्कि ये राजनीतिक चयन अधिक होता है, जिसमें वरिष्ठता की बहुत अधिक, या कोई भूमिका नहीं होती है.
कई बार ऐसा हुआ है जब वरिष्ठता के नियम को नज़रअंदाज़ करके जूनियर जनरल को सेना प्रमुख बनाया गया हो. लेकिन ऐसे उदाहरण भी हैं जब राजनीतिक वजहों को ध्यान में रखकर की गईं नियुक्तियां भी भारी पड़ी हैं.
जनरल ज़िया उल हक़
1 मार्च 1976 को तत्कालीन प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टों ने सात लेफ़्टिनेंट जनरलों पर तरजीह देते हुए जनरल ज़िया उल हक़ को सेना प्रमुख बनाया था.
एक साल बाद जनरल ज़िया उल हक़ ने ही अहिंसक तख़्तापलट में ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो की लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को गिराकर देश में मार्शल लॉ लागू कर दिया था.
ज़िया उल हक़ सेना प्रमुख बने रहे. पहले उन्होंने चीफ़ मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर की हैसियत से और बाद में देश के राष्ट्रपति के रूप में 1988 में एक विमान हादसे में मौत होने तक शासन किया.
साल 1979 में ज़िया के शासनकाल में ही ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को फांसी पर चढ़ा दिया गया था.
जनरल परवेज़ मुशर्रफ़
1998 में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को सेना प्रमुख बनाकर अपनी ताक़त बढ़ाने के लिए जुआ खेला था.
ये वो दौर था जब परमाणु परीक्षण करने की वजह से पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहा था, देश में आर्थिक संकट गहरा रहा था और शरीफ़ की लोकप्रियता गिर रही थी.
नवाज़ शरीफ़ ने भी वरिष्ठता के सिद्धांत को नकार कर जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को सेना प्रमुख बनाया था. उन्होंने कई वरिष्ठ जनरलों को नज़रअंदाज़ किया था.
एक साल बाद जब करगिल में घुसपैठ हुई तो नवाज़ शरीफ़ ने अपनी इस नियुक्ति का पहला स्वाद चखा. ये माना जाता है कि करगिल के लिए जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ही ज़िम्मेदार थे. पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने दावा किया था कि उन्हें इस अभियान की जानकारी नहीं थी. करगिल को लेकर शुरू हुआ मतभेद अक्तूबर 1988 में जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के तख़्तापलट करके नवाज़ शरीफ़ को हटाने के अंजाम तक पहुंचा.
नवाज़ शरीफ़ को पद से हटा दिया गया था और उन्हें अपने परिवार के साथ सऊदी अरब जाकर शरण लेनी पड़ी थी. इसके सात साल बाद नवाज़ शरीफ़ देश वापस लौट सके थे.
जनरल राहील शरीफ़
नवाज़ शरीफ़ फिर से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनें और साल 2013 में उन्हें एक बार फिर नया सेना प्रमुख नियुक्त करने का मौक़ा मिला. मुशर्रफ़ के साथ अनुभव के चलते इस बार नवाज़ शरीफ़ कुछ ज़्यादा ही सचेत थे. एक बार फिर उन्होंने सेना प्रमुख बनने की दौड़ में सबसे आगे चल रहे और सबसे वरिष्ठ जनरल हारून असलम को नज़रअंदाज़ किया और राहील शरीफ़ को सेना प्रमुख बना दिया. वरिष्ठता की सूची में जनरल राहील शरीफ़ तीसरे नंबर पर थे.
विश्लेषक मानते हैं कि जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की असफलता की वजह से पाकिस्तान की सेना को ये अहसास हुआ कि अगर देश की सत्ता पर तख़्तापलट करके क़ब्ज़ा किया गया तो ना सिर्फ़ देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी वह बहुत अलोकप्रिय हो जाएगी.
राजनीतिक विश्लेषक तर्क देते हैं कि जनरल राहील शरीफ़ के नेतृत्व में सेना ने अपनी रणनीति बदल ली.
मार्शल लॉ लगाकर देश की सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के बजाए जनरल शरीफ़ ने धीरे-धीरे देश के पूर्व क़बिलाई इलाक़ों और सबसे बड़े शहर कराची में कामयाब सैन्य अभियान चलाकर अपनी ताक़त को मज़बूत किया.
इन इलाक़ों में मिलिशिया की प्रभाव था और अपराध का बोलबाला था. जनरल शरीफ़ के नेतृत्व में सेना के अभियानों की वजह से हमलों की संख्या और आपराधिक वारदातों में तेज़ी से गिरावट आई, इससे सेना की मान्यता बढ़ी.
जनरल राहील शरीफ़ ने सेना के खोई हुई लोकप्रियता को लौटाया, सेना के दबदबे को मज़बूत किया और क़ानून लागू करने में सेना की भूमिका को बढ़ाया.
जनरल राहील शरीफ़ के कार्यकाल में सेना की मीडिया शाखा, आईएसपीआर काफ़ी आगे बढ़ी और सूचना के क्षेत्र में सेना को धार दी. आईएसपीआर ने जनरल की छवि को गढ़ने के लिए आक्रामक अभियान चलाया और उन्हें देश के रक्षक के रूप में पेश किया.
इस दौरान आईएसपीआर में भी कई बदलाव हुए, इसके काम को बढ़ा दिया गया और मीडिया के प्रबंधन में इसकी भूमिका और म मज़बूत की गई. इसका नतीजा ये हुआ कि मीडिया में सेना की आलोचना की जगह कम हो गई. राहील शरीफ़ के काम करने के इस तरीक़े को ‘सॉफ्ट कू’ यानी ‘नरम तख़्तापलट’ कहा गया जिसमें उन्होंने सरकार पर तो क़ब्ज़ा नहीं किया लेकिन देश को चलाने में सेना की भूमिका को मज़बूत किया. जनरल के राजनीतिक पद संभाले बिना ही देश के मामलों और नीतियों पर सेना का असर रहा.
जनरल क़मर जावेद बाजवा
साल 2016 में जनरल राहील शरीफ़ के रिटायर होने के बाद एक बार फिर जब नवाज़ शरीफ़ को नया सेना प्रमुख चुनना था तब उनके और सेना के रिश्तों में तनाव आ गया था.
पूर्व सैन्य शासक जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ राष्ट्रद्रोह का मुक़दमा चलाए जाने से सैन्य कमांडर शरीफ़ सरकार से खफ़ा थे. इस बार नवाज़ शरीफ़ ने बहुत सावधानी से जनरल जावेद क़मर बाजवा का चुनाव किया जो सबसे वरिष्ठ जनरल नहीं थे बल्कि दौड़ में उनके जीतने के बारे में किसी ने सोचा भी नहीं होगा.
क़मर बाजवा को सेना प्रमुख बनाने का फ़ैसला करने के एक साल के भीतर ही नवाज़ शरीफ़ को सुप्रीम कोर्ट के उन्हें पद के लिए अयोग्य करार देने के बाद इस्तीफ़ा देना पड़ा.बहुत से लोग ये मानते हैं कि भ्रष्टाचार के नाम पर कार्रवाई करना वास्तव में सेना का नागरिक सरकार पर अपनी पकड़ और मज़बूत करने का मुखौटा था.
भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सेना के समर्थन से बनाए गए माहौल में ऐसी परिस्थितियां बनीं की नवाज़ शरीफ़ और उनकी बेटी मरियम नवाज़ शरीफ़ के लिए राजनीति के रास्ते बंद हो गए.
बाद में साल 2018 में चुनावों में जब इमरान ख़ान की तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी की जीत हुई तो पीएमएल (नवाज़) ने सेना पर बाजवा के नेतृत्व में इमरान ख़ान का समर्थन करने के आरोप लगाए. सेना और इमरान ख़ान दोनों ने ही इन आरोपों को ख़ारिज किया.
प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले सालों के दौरान इमरान ख़ान को सेना का पूरा समर्थन प्राप्त हुआ, जो पाकिस्तान के लिए एक दुर्लभ बात थी. यहां सत्ता सेना और राजनेताओं के बीच झूलती रही है. इमरान ख़ान और जनरल बाजवा के बीच अच्छे रिश्तों का नतीजा ये हुआ कि इमरान ख़ान ने साल 2019 में तीन और साल के लिए बाजवा का कार्यकाल बढ़ा दिया.
लेकिन ये अच्छे रिश्ते लंबे नहीं टिक सके. नवंबर 2021 में आईएसआई के नए प्रमुक के चयन को लेकर इमरान और बाजवा के रिश्तों में दरार आनी शुरू हो गई. बहुत से लोग ये मानते हैं कि अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए इमरान ख़ान को सत्ता से हटाए जाने के पीछे भी बाजवा के साथ उनके रिश्तों में आया तनाव ही था.
इमरान ख़ान के आलोचक कहते हैं कि वो विश्वास प्रस्ताव नहीं जीत सके क्योंकि उनकी सबसे बड़ी समर्थक, पाकिस्तान की सेना ने, उनके सिर से हाथ खींच लिया था. इसी वजह से उनकी पार्टी और गठबंधन के कुछ सांसदों को पाला बदलने के लिए हौसला मिला.
विश्लेषक इमतियाज़ गुल ने जनरल बाजवा के साथ अपनी मुलाक़ात के बारे में बताया है.
“जनरल बाजवा ने एक बार मुझे बताया था कि जब वो सेना प्रमुख बने तो बहुत से लोगों को लगता था कि वो नवाज़ शरीफ़ के समर्थक हैं.”
इमतियाज़ याद करते हैं और बताते हैं कि जनरल बाजवा ने अपने दफ़्तर की कुर्सी के बाज़ू को पकड़ते हुए कहा, “जब कोई सैनिक इस कुर्सी पर बैठता है तो वो सिर्फ़ अपने देश और इस इंस्टीट्यूशन (सेना) के बारे में सोचता है.”
रक्षा विश्लेषक ब्रिगेडियर रिटायर जनरल मुश्ताक़ अहमद इससे सहमत होते हुए कहते हैं, “हर नया सेना प्रमुख नियुक्त होने वाला या एक्सटेंशन लेने वाला हमेशा वर्दी पहने ऐसा व्यक्ति साबित हुआ है जो सेना के अपने झुकाव, नियमों और मूल्यों से संचालित रहा है.”
“फिर भी, अपनी पसंद का सेना प्रमुख चुनने की लालसा अभी भी बेरोकटोक बरकारर है. कुछ मामलों को छोड़कर, हर ऐसी नियुक्ति ने पाला बदला है उनकी उम्मीदों पर पानी फेरा है.”
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