मरियम नवाज़ भी अपने पिता और चाचा की तरह बन पाएंगी पाकिस्तान की पीएम?

    • Author, शुमाइला जाफ़री
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद

पाकिस्तान में इस साल चुनाव होने की उम्मीद है. देश के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान अप्रैल 2022 में सत्ता से बाहर होने के बाद से ही जनता का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं. उस समय से हुए कई उपचुनावों और जनमत सर्वेक्षणों की मानें तो पाकिस्तान के नेताओं में फ़िलहाल वे सबसे अधिक लोकप्रिय हैं.

वहीं कई जानकारों की राय में एक दर्जन से ज़्यादा दलों के विपक्षी गठबंधन के पास करिश्माई नेतृत्व की कमी है.

दूसरी तरफ़ राजनी​तिक मोर्चे पर कई हार झेलने के बाद अब ऐसा लगता है कि सत्तारूढ़ पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज़ (पीएमएल-एन) अपना 'तुरुप का पत्ता' चलने जा रही है.

पीएमएल-एन अपने प्रमुख नवाज़ शरीफ़ की बेटी मरियम नवाज़ को पार्टी के चीफ़ ऑर्गनाइज़र के तौर पर उतार रही है.

साथ ही उन्हें इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ चुनावी मुहिम का नेतृत्व करने का ज़िम्मा भी सौंपा गया है. लंदन में अपने पिता के साथ कई महीने​ बिताने के बाद मरियम नवाज़ 28 जनवरी को पाकिस्तान पहुंच रही हैं. वे एक फ़रवरी से रैलियों को संबोधित करना शुरू कर देंगी.

पीएमएल-एन, मरियम नवाज़ को अपनी पार्टी का भावी चेहरा और उनके पिता नवाज़ शरीफ़ की राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर पेश करती है. इमरान ख़ान और उनके समर्थकों के लिए, वे यथास्थिति और भ्रष्ट वंशवादी राजनीति की निरंतरता और विशेषाधिकार का प्रतीक हैं.

उनके बारे में राय बंटी हुई है, लेकिन विश्लेषक इस बात पर बहुत हद तक सहमत हैं कि इमरान ख़ान की लोकप्रियता से लड़ने में वे सत्तारूढ़ गठबंधन (पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) का सबसे अच्छा दांव साबित हो सकती हैं.

पार्टी के चीफ़ ऑर्गनाइज़र के रूप में मरियम नवाज़ की नियुक्ति की घोषणा करते हुए पीएमएल-एन के अध्यक्ष और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने कहा है कि उनके पास पार्टी का नेतृत्व करने का माद्दा, दृढ़ संकल्प और अनुभव है.

शहबाज़ शरीफ़ ने ट्वीट किया, ''मैंने मरियम नवाज़ को पीएमएल-एन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया है. उनके पास पार्टी के संगठनात्मक कामों का नेतृत्व करने का माद्दा, दृढ़ संकल्प और अनुभव है. मुझे कोई संदेह नहीं है कि वे हमारे प्रमुख नवाज़ शरीफ़ के विज़न के साथ हमारी पार्टी के कार्यकर्ताओं को बहुत प्रभावी ढंग से प्रेरित करेंगी.''

अपनी नियुक्ति के बाद मरियम नवाज़ ने ट्विटर पर भरोसा दिया कि वे पार्टी को फिर से संगठित करने के लिए काफ़ी मेहनत करेंगी.

उन्होंने लिखा, ''मैं ख़ुद पर भरोसा जताने के लिए पार्टी सुप्रीमो नवाज़ शरीफ़ और पीएमएल-एन के अध्यक्ष शहबाज़ शरीफ़ की आभारी हूं. मैं नवाज़ शरीफ़ के नज़रिए के अनुसार और प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के सक्षम मार्गदर्शन के तहत पीएमएल-एन को संगठित और मज़बूत करने के लिए अपने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ काम करने को उत्सुक हूं.''

दूसरे ट्वीट में उन्होंने कहा, ''मैं इस कठिन काम को अच्छे से पूरा करने के लिए पूरे देश का दौरा करके पार्टी अधिकारियों और कार्यकर्ताओं से मिलूंगी. हम आधुनिक तकनीक अपनाएंगे और ये तय करेंगे कि हमारी पार्टी लोगों की अच्छी सेवा करने के लिए बेहतर रूप से तैयार हो सके. इंशा अल्लाह!''

पीएमएल-एन के सीनियर नेता अयाज़ सादिक़ ने उम्मीद जताई है कि ऐसे वक़्त में जब पार्टी सुप्रीमो नवाज़ शरीफ़ देश के बाहर रहने को मजबूर हैं और उनके भाई शहबाज़ शरीफ़ सरकार चलाने में व्यस्त हैं, तब चीफ़ ऑर्गनाइज़र के रूप में मरियम नवाज़ की नियुक्ति होने से पार्टी के रोज़मर्रा के कामों में सुधार होगा.

वहीं कुछ मीडिया संगठनों ने बिना किसी का नाम लिए बताया है कि उनकी नियुक्ति को लेकर पार्टी के सीनियर नेताओं में नाराज़गी है. रिपोर्टों के अनुसार, सीनियर नेता इस बात को लेकर निराश हैं कि शरीफ़ परिवार सरकार और पार्टी के अहम पद अपने पास ही रख रहा है. पार्टी के कई दिग्गजों ने ऐसे तरीक़ों पर अपनी आपत्ति जताई है.

हालांकि, इस बात पर पार्टी नेता और राजनीतिक टिप्पणीकार सहमत हैं कि ऐसे नाज़ुक वक़्त में, जब पार्टी कई चुनौतियों से जूझ रही हो और कुछ ही महीने बाद देश में आम चुनाव होने की संभावना है, तब मरियम नवाज़ ही सबसे बढ़िया विकल्प हैं.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मरियम नवाज़ पार्टी को मौजूदा संकटों से उबार लेंगी?

कौन हैं मरियम नवाज़?

वे पूर्व पीएम नवाज़ शरीफ़ की पहली संतान हैं. वे लाहौर में पली-बढ़ी हैं और उनकी शादी सेना के अधिकारी रह चुके एक शख़्स से हुई, जो 90 के दशक में उनके पिता के प्रधानमंत्री रहते उनके (नवाज़ शरीफ़) एडीसी हुआ करते थे. शरीफ़ परिवार पारंपरिक और रूढ़िवादी स्वभाव का है. ऐसे में उनसे राजनीति में भाग लेने की अपेक्षा नहीं की गई और न ही इसके लिए उन्हें तैयार किया गया था.

मरियम के पिता नवाज़ शरीफ़ का पूर्व सेनाध्यक्ष परवेज़ मुशर्रफ़ ने अक्टूबर 1999 में जब तख़्तापलट करके उन्हें क़ैद में डाला, तब तक वे लो प्रोफ़ाइल रहकर अपने दो बच्चों की परवरिश कर रही थीं. उस वक़्त उनके परिवार के बाक़ी मर्द भी नज़रबंद कर दिए गए थे.

वैसे हालात में मरियम अपनी मां के साथ पहली बार सार्वजनिक तौर पर सामने आईं. लोगों के सामने आकर उन्होंने जनरल मुशर्रफ़ को खुली चुनौती दी और अपने पिता का समर्थन किया. कुछ महीने बाद सऊदी अरब के किंग की मदद से मरियम और उनकी मां ने जनरल मुशर्रफ़ के साथ एक डील की. इस डील के तहत नवाज़ शरीफ़ जेल से रिहा हुए और दिसंबर 2000 में सपरिवार सऊदी अरब निर्वासित हो गए.

उसके बाद 2007 में नवाज़ शरीफ़ अपने देश लौटे. परिवार के क़रीबी सूत्रों का कहना है कि निर्वासन के दौरान मरियम ने राजनीति में उतरने के लिए ख़ुद को तैयार करना शुरू किया. लेकिन राजनीति में वे 2011 में आईं जब उन्होंने अपने चाचा शहबाज़ शरीफ़ के वास्ते समर्थन जुटाने के लिए महिला शिक्षण संस्थानों का दौरा किया. शहबाज़ तब पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री हुआ करते थे.

2013 में उन्होंने सोशल मीडिया का महत्व समझा और युवा मतदाताओं पर ध्यान केंद्रित करने की इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) की मुहिम के जवाब में पीएमएल-एन के सोशल मीडिया सेल की शुरुआत की. उनकी इस पहल ने उनकी पार्टी को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी. नतीजा ये हुआ कि उनके पिता एक बार फिर सत्ता में लौटे और तीसरी बार प्रधानमंत्री बन पाए.

2013 में हालांकि ख़ुद उन्होंने किसी सीट से चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन बाद में उनके पिता ने उन्हें यूथ डेवेलपमेंट प्रोग्राम का अध्यक्ष नियुक्त किया.

उनकी नियुक्ति को अदालत में चुनौती दी गई, जिसके बाद उन्हें वो पद छोड़ना पड़ा. लेकिन वे पीएम हाउस से 'स्ट्रैटेजिक मीडिया कम्युनिकेशन सेल' चलाती रहीं. 2013 से 2017 के बीच नवाज़ शरीफ़ की सरकार पर उनके असर को लेकर मरियम नवाज़ की आलोचना होती रही. उन्हें देश का असली प्रधानमंत्री भी कहा जाता रहा.

2016 में लीक हुए पनामा पेपर्स में मरियम और उनके भाई-बहनों के नाम सामने आए. उसमें इन सब पर ऑफ़शोर (विदेशी) कंपनियों से अघोषित संबंध रखने का आरोप लगाया गया. दावा किया गया कि इन लोगों की ब्रिटेन में संपत्ति है. हालांकि इस आरोप का शरीफ़ परिवार ने ज़ोरदार तरीक़े से खंडन किया.

इमरान ख़ान इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गए और नवाज़ शरीफ़ को 2017 में सत्ता से हटा दिया गया. मरियम और उनके पिता को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया. मरियम नवाज़ को जेल भी भेजा गया, बाद में उन्हें ज़मानत मिल गई. लेकिन उसी दौरान मरियम नवाज़ ख़ुद को पाकिस्तान की एक प्रमुख नेता के तौर पर स्थापित करने में सफल हो गईं.

ज़मानत पर रिहा होने के बाद उन्होंने एक ज़ोरदार अभियान चलाते हुए इमरान ख़ान और सेना पर अपने परिवार के ख़िलाफ़ ज़बरदस्ती और सांठगांठ करने के आरोप लगाए. उन्होंने पीएमएल-एन के समर्थकों को एकजुट किया और 'वोट को इज़्ज़त दो' जैसा लोकप्रिय नारा दिया.

मरियम सांसद का चुनाव तो नहीं लड़ीं, लेकिन उनके आक्रामक चुनाव प्रचार के बूते पीएमएल-एन 2018 के आम चुनावों में देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर ज़रूर उभरी. उन्होंने अपने सज़ायाफ़्ता पिता को मेडिकल ग्राउंड पर जेल से रिहा करने का सफलतापूर्वक अभियान भी चलाया. अदालत ने नवाज़ शरीफ़ को ब्रिटेन जाने की अनुमति दी. नवाज़ शरीफ़ स्व-निर्वासन के तौर पर अभी भी वहीं हैं. उन्हें भय है कि पाकिस्तान जाने पर कहीं वे गिरफ़्तार न हो जाएं.

मरियम नवाज़, इमरान ख़ान की सबसे कठोर आलोचक रही हैं. अब उन्हें उनकी पार्टी के नए चेहरे के रूप में पेश किया गया है.

वंशवाद और भ्रम

राजनीतिक विश्लेषक और लेखक ज़ाहिद हुसैन इस एलान से असहमत हैं. उनका मानना है कि पीएमएल-एन के अपने स्टैंडर्ड के अनुसार भी चीफ़ ऑर्गनाइज़र के तौर पर मरियम नवाज़ की नियुक्ति 'भाई-भतीजावाद का सबसे ख़राब उदाहरण' है.

उन्होंने कहा, ''इस फ़ैसले से पीएमएल-एन ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह ज़मीनी हक़ीक़त से बिल्कुल दूर है. पाकिस्तान और वहां की राजनीति अब बदल गई है. इमरान ख़ान जो कुछ भी कर रहे हैं, उससे लोग असहमत हो सकते हैं, लेकिन एक बात तो साफ़ है कि उन्होंने भ्रष्टाचार और वंशवादी राजनीति के ख़िलाफ़ एक प्रभावी नैरेटिव तैयार किया है. युवाओं के बीच यह नैरेटिव ख़ासा लोकप्रिय है. लेकिन ऐसा लगता है कि पीएमएल-एन अभी भी माहौल को नहीं समझ सकी है.''

फ़िलहाल सरकार और पार्टी के सभी शीर्ष पदों पर शरीफ़ परिवार का क़ब्ज़ा है. क़ानूनी तौर पर नवाज़ शरीफ़ को चुनाव लड़ने और पार्टी का नेतृत्व करने से रोक दिया गया है, लेकिन वे अब भी पीएमएल-एन के असली बॉस हैं. मरियम के चाचा शहबाज़ शरीफ़ पार्टी अध्यक्ष होने के साथ देश के प्रधानमंत्री भी हैं. इमरान ख़ान के गठबंधन द्वारा हटाए जाने से पहले उनके चचेरे भाई हमज़ा शरीफ़ पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री थे. उनके पति कैप्टन सफ़दर (रिटायर्ड) पार्टी के यूथ विंग के अध्यक्ष हैं. उनके एक क़रीबी रिश्तेदार देश के वित्त मंत्री हैं और अब उन्हें पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और मुख्य आयोजक का पद दिया गया है.

ज़ाहिद हुसैन कहते हैं कि मरियम अब व्यावहारिक तौर पर अपने पिता के बाद पार्टी की दूसरी सबसे ताक़तवर शख़्स बन गई हैं. वे ये भी कहते हैं कि यदि ऐसा इमरान ख़ान से मुक़ाबला करने के लिए पीएमएल-एन को फिर से मज़बूत करने के लिए किया गया है, तो यह विफल हो जाएगा.

वे कहते हैं, "पीएमएल-एन को यह समझ में नहीं आ रहा है कि बात अब चेहरे का नहीं है. यदि वे इमरान ख़ान का मुक़ाबला करना चाहते हैं, तो उन्हें एक ठोस नैरेटिव की ज़रूरत है, परिवार को ही आगे बढ़ाने का तरीक़ा और अधिक नुक़सान ही पहुंचा सकता है.''

उनका मानना है कि मरियम नवाज़ एक अच्छी वक्ता हैं, वे भीड़ को भी खींचती हैं, लेकिन मौजूदा हालात में मतदाता जब एक सार्थक बदलाव देखना चाहते हैं, तो केवल बोलने की कला और निजी आकर्षण से काम नहीं बनने वाला.

ज़ाहिद हुसैन कहते हैं, "पार्टी के लोगों का मानना है कि बेहतर क्षमता वाले कई नेताओं को कभी चेहरा बनने और नेतृत्व करने का मौक़ा नहीं दिया गया. उन्हें अपने पिता की लाडली के रूप में देखा जाता है. पार्टी के कई ऐसे सीनियर नेता हैं, जिनका संघर्ष कहीं अधिक उथल-पुथल वाला रहा, लेकिन नेतृत्व के लिए उन पर भरोसा नहीं किया जाता. दशकों पुरानी इस शैली की राजनीति के लिए आज पाकिस्तान में कोई जगह नहीं है.

पीएमएल-एन को फिर से गढ़ना

दैनिक डॉन अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार ज़ुल्क़रनैन ताहिर ने अपने एक हालिया लेख में लिखा है कि पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत पंजाब के उपचुनाव में 'अपमानजनक हार' झेलने के बाद पीएमएल-एन अब इमरान ख़ान से निपटने के लिए एक नैरेटिव ढूंढ रही है.

राजनीतिक विश्लेषक मुनिज़े जहांगीर का कहना है कि इस साल की शुरुआत से ही पीएमएल-एन जिस तरह का राजनीतिक विकल्प चुन रहा है, उसने उसे एक गड्ढे में डाल दिया है और वह उसमें और गहरे में डूबता ही जा रहा है.

मुनिज़े जहांगीर कहती हैं, ''मैं यक़ीन के साथ नहीं कह सकती कि इमरान ख़ान की बढ़ती लोकप्रियता का मुक़ाबला करने के लिए मरियम नवाज़ अपनी पार्टी को नई दिशा दे पाएंगी या नहीं.''

दूसरी ओर, ज़ुल्क़रनैन ताहिर ने अपने लेख में कैबिनेट के एक वरिष्ठ सदस्य के हवाले से दावा किया है कि नवाज़ शरीफ़ ने अपनी पार्टी के नेताओं से इमरान ख़ान और उनके मददगारों पर एक 'चार्जशीट' तैयार करने के लिए कहा है.

ज़ुल्क़रनैन ने अपने सूत्रों के हवाले से बताया है कि उन मददगारों में सेना के पूर्व प्रमुख, आईएसआई के दो पूर्व डीजी और एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश शामिल हैं. इस नए नैरेटिव के तहत, नवाज़ शरीफ़ अब सभी ग़लत कामों का ज़िम्मेदार इमरान ख़ान और इन चार लोगों के गुट को ठहरा रहे हैं.

उनके विचार में अब माना जा रहा है कि इमरान ख़ान और सेना के उनके समर्थकों के ख़िलाफ़ मरियम नवाज़ का पुराना नारा 'वोट को इज़्ज़त दो' प्रासंगिक नहीं रह गया है.

वे कहते हैं, "पीएमएल-एन को अब नए नैरेटिव की ज़रूरत है, क्योंकि तोशाख़ाना या ऑडियो लीक के ज़रिए पीटीआई चेयरमैन को बदनाम करने के प्रयासों का अब तक कोई नतीजा नहीं निकल सका है."

हालांकि, दूसरे विश्लेषकों की तरह ज़ुल्क़रनैन ताहिर का भी मानना है कि पीएमएल-एन नेतृत्व के संकट का सामना कर रहा है. इस पार्टी को लंदन से कंट्रोल किया जा रहा है, जबकि पार्टी के स्थानीय नेता चाहते हैं कि नवाज़ शरीफ़ ही चुनावी अभियान का नेतृत्व करें.

उन्होंने लिखा, "पीएमएल-एन के नेता मरियम नवाज़ के नेतृत्व में पार्टी के हालिया ख़राब प्रदर्शन से चिंतित हैं. इसलिए उनकी ख़्वाहिश है कि चुनावों में सफलता की संभावनाएं मज़बूत करने के लिए नवाज़ शरीफ़ पाकिस्तान लौट आएं."

विश्लेषक ज़ाहिद हुसैन मरियम नवाज़ को पार्टी का चेहरा बनाने को लेकर आशंकित हैं. उनके अनुसार इमरान ख़ान विरोधी पुरानी नैरेटिव को नई पैकेजिंग के साथ पेश करने का उनका तरीक़ा उन्हें उल्टा पड़ेगा.

वरिष्ठ पत्रकार मुबश्शिर बुख़ारी ने दैनिक 'द न्यूज़' में प्रकाशित अपने एक लेख में कहा है कि पार्टी के कुछ नेता मरियम नवाज़ के आंख और कान बने हुए हैं. उनके विचार में ऐसे लोग उनसे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और उनके राजनीतिक अनुभव को दूर रखे हुए हैं.

वहीं मुनिज़े जहांगीर के विचार में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का यह प्रतिरोध मरियम नवाज़ के महिला होने के कारण है. यदि वे नवाज़ शरीफ़ की पुत्र होतीं, तो पार्टी के लिए कहीं अधिक स्वीकार्य होतीं.

वे कहती हैं, "वे बहादुर हैं. दो बार जेल जाने के दौरान उन्होंने जिस तरह से ख़ुद को संभाला, वह काफ़ी प्रभावशाली है."

बेनज़ीर भुट्टो से तुलना

पीएमएल-एन के कई समर्थक अब मरियम नवाज़ की तुलना देश की पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो से कर रहे हैं. भुट्टो को सिर्फ़ पाकिस्तान में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में साहस के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. वे मुस्लिम देशों की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं.

उनके पिता ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को सत्ता से हटाने के बाद उनके परिवार को काफ़ी अत्याचारों का सामना करना पड़ा था. उसके बाद तब के तानाशाह शासक जनरल ज़िया-उल हक़ ने उन्हें फांसी दे दी थी. इसलिए बेनज़ीर भुट्टो के घोर आलोचक भी उनके निजी और राजनीतिक संघर्ष का सम्मान करते हैं.

मरियम नवाज़ ख़ुद कई मौक़ों पर बेनज़ीर भुट्टो को अपनी श्रद्धांजलि दे चुकी हैं. 2021 में उनकी पुण्यतिथि पर उनके गृहनगर लड़काना में एक सभा में मरियम ने कहा था कि कई मायनों में उनका संघर्ष मोहतरमा बेनज़ीर भुट्टो जैसा ही है.

उन्होंने उस समय कहा था, "कई मायनों में मुझे लगता है कि बेनज़ीर भुट्टो के साथ मेरी राजनीतिक समरूपता है. वे न केवल देश की सभी महिलाओं का गौरव थीं, बल्कि उनकी कहानी पिता और बेटी के बीच गहरे संबंध और प्यार की अविस्मरणीय गाथा भी थी. मरते दम तक वे अपने पिता का केस लड़ती रहीं. यदि ज़रूरत पड़ी तो पाकिस्तान को जोड़ने और उसका विकास करने की अपने पिता की सोच के लिए मैं अपनी जान देने से भी पीछे नहीं हटूंगी.''

हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि प्रेरणा और समरूपता होने के बाद भी उनका रास्ता बेनज़ीर भुट्टो से अलग है. मुनिज़े जहांगीर इस बात से सहमत हैं.

उनका मानना है कि कई मामलों में मरियम को बेनज़ीर भुट्टो की तरह चुनौतियां भले झेलनी पड़ी हों, लेकिन कई मायनों में वे भुट्टो से बेहतर दशा में भी हैं. मरियम के पिता, उनके भाई और उनका परिवार उनके पीछे खड़े हैं, लेकिन बेनज़ीर के मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं था.

मुनिज़े का ये भी कहना है कि 70 के दशक में जब ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को सत्ता से बेदख़ल कर दिया गया, तब अमेरिका ने खुलकर तानाशाह शासक जनरल ज़िया उल हक़ का पक्ष लिया था.

उस समय मानवाधिकार समूहों की जागरूकता और आपसी संपर्क भी आज की तरह का नहीं था. आज सोशल मीडिया का ज़माना है, जहां मरियम नवाज़ अपनी आवाज़ उठाती रहती हैं. हालांकि बेनज़ीर के पास ऐसी कोई सुविधा नहीं थी.

इस बारे में राजनीतिक समीक्षक ज़ाहिद हुसैन, बेनज़ीर भुट्टो को बहुत ऊँचा मानते हैं. उनका तर्क है कि बेनज़ीर भुट्टो और मरियम नवाज़ के बीच न तो कोई तुलना है और न ही हो सकती है.

पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली के लिए ज़िया उल हक़ के शासनकाल में उन्हें जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, बतौर राजनेता उनकी क्षमता और उनकी मानसिकता का मरियम नवाज़ से कोई मुक़ाबला ही नहीं है.

ज़ाहिद हुसैन के अनुसार, "मरियम नवाज़ को विशेषाधिकार और ख़ास परिवार के होने का लाभ मिला है. बेनज़ीर भुट्टो की राजनीति में शामिल होने की कोई योजना नहीं थी. वे मुश्किल से अपनी पढ़ाई ही कर पाईं थी कि उनके पिता की मौत हो गई. उनके भाई भी उत्पीड़न के डर से देश छोड़ने के लिए मजबूर हो गए थे."

दूसरी महिला प्रधानमंत्री?

मरियम नवाज़ के आलोचकों का मानना है कि किसी भी सार्वजनिक पद पर बैठने से पहले ही पनामा पेपर्स में उनका नाम आने से उनकी छवि धूमिल हो गई है. वे पहले से पाकिस्तान में या बाहर, कोई भी संपत्ति की मालकिन होने से इनकार करती रही हैं, लेकिन पनामा पेपर्स में उनका ये दावा झूठा साबित हुआ.

इमरान ख़ान ने पनामा पेपर्स का इस्तेमाल शरीफ़ परिवार की और तीखी आलोचना करने के लिए किया. इसके आधार पर उनका भ्रष्टाचार विरोधी नैरेटिव काफ़ी लोकप्रिय हुआ.

मुनिज़े जहांगीर की नज़र में पीएमएल-एन के लिए फ़िलहाल मरियम नवाज़ ही सबसे अच्छा चेहरा हो सकती हैं. लेकिन यदि ऐसा हो भी, तो भी बिना किसी ठोस नैरेटिव के किसी एक शख़्स पर पूरे चुनावी अभियान को टिका देना एक ख़तरनाक रणनीति हो सकती है. हालांकि उन्होंने अपने पत्ते यदि सही ढंग से खेले और राजनीतिक ज्वार को मोड़ने में सक्षम हुईं, तो वे पाकिस्तान की दूसरी महिला प्रधानमंत्री बन सकती हैं.

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