'कब तक एग्ज़ाम पर एग्ज़ाम देते रहें'- रद्द होती परीक्षाओं से सामने आई छात्रों की पीड़ा

नीट और यूजीसी नेट को लेकर दिल्ली में शास्त्री भवन के सामने छात्र संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया.

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इमेज कैप्शन, नीट और यूजीसी नेट को लेकर 20 जून को दिल्ली में शास्त्री भवन के सामने छात्र संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया.

नीट यूजी (NEET UG) परीक्षा 2024 पर छिड़ा विवाद अभी थमा नहीं था कि 18 जून को हुई यूजीसी नेट परीक्षा रद्द कर दी गई.

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि इसमें गड़बड़ियों की ख़बर मिली थी. अब सीबीआई से इसकी जांच के आदेश दे दिए गए हैं.

देश भर के क़रीब नौ लाख छात्र इसमें बैठे थे.

गृहमंत्रालय के तहत आने वाले इंडियन साइबर क्राइम कॉर्डिनेश सेंटर ने यूजीसी को इनपुट दिया था जिससे साफ़ हो गया था कि नेट की परीक्षा में कुछ गड़बड़ी हुई है.

नेट मतलब नेशनल एलिजिबिलीटी टेस्ट यानी भारत के कॉलेजों और विश्वविद्दालयों में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बनने के लिए नेट क्लियर करना लाज़िमी होता है.

इस एग्ज़ाम के रद्द होने के बाद दिल्ली और लखनऊ समेत कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुआ. छात्रों के अलावा यूथ कॉंग्रेस और वाम दलों के कार्यकर्ताओं ने शिक्षा मंत्री के आवास और दफ़्तर के पास विरोध प्रदर्शन किया और उनके इस्तीफ़े की मांग की.

कांग्रेस पार्टी और इसके नेता राहुल गांधी ने पेपर लीक न रोक पाने पर मोदी सरकार को घेरा और शुक्रवार को देशव्यापी प्रदर्शन की कॉल दी. उन्होंने कहा है कि विपक्ष संसद में पेपर लीक का मुद्दा उठायेगा.

नीट परीक्षा में पहले गड़बड़ियों से इनकार करते रहने वाले केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने गुरुवार शाम एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाकर 'पारदर्शिता से कोई समझौता न करने का' आश्वासन दिया.

उन्होंने कहा, "नीट परीक्षा के संबंध में पटना से कुछ जानकारी आई है. हम बिहार सरकार से लगातार संपर्क में हैं. पटना पुलिस इस घटना की तह तक जा रही है. इसकी डिटेल्ड रिपोर्ट जल्द ही भारत सरकार को भेजी जाएगी."

उन्होंने कहा कि प्राथमिक जानकारी के अनुसार, कुछ एरर स्पेसेफ़िक रीजन में सीमित है.

उन्होंने कहा, "पुख्ता जानकारी आने पर दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी. एनटीए हो या कोई भी बड़ा व्यक्ति हो, जो दोषी पाया जाएगा उसके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जाएगी."

शिक्षा मंत्री ने कहा, "सरकार एक हाई लेवल कमेटी गठन करने जा रही है. ये समिति एनटीए के स्ट्रक्चर, उसकी फ़ंक्शनिंग, परीक्षा की प्रक्रिया, पारदर्शिता आदि के संबंध में सुझाव देगी. उन्होंने कहा कि इस संवेदनशील इशू पर किसी तरह की अफवाह न फैलाई जाए."

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छात्रों ने कहा- हम एग्ज़ाम पर एग्ज़ाम देते रहें...

पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में बीएचयू के सामने छात्रों का प्रदर्शन

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नीट और नेट परीक्षा कराने वाली केंद्रीय एंजेंसी एनटीए (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) को रद्द करने की मांग भी हो रही है.

एग़्जाम देने वाले छात्रों में परीक्षाओं के रद्द होने के सिलसिले से व्यापक रोष है. कुछ छात्रों ने इन हालात में गहरी निराशा ज़ाहिर की है.

इस साल यूजीसी नेट परीक्षा देने वाले अखिलेश यादव ने कहा, "मुझे लग रहा था कि मेरा नेट निकल जाएगा. मैंने काफ़ी मेहनत की थी, लेकिन अब यह रद्द हो गया है. किसी ने इस पर कुछ कहा नहीं लेकिन खुद एनटीए ने माना कि इसमें गड़बड़ी हुई है."

उन्होंने कहा कि 'बार बार पेपर लीक और परीक्षाएं रद्द होने की समस्याएं आ रही हैं फिर कोई ठोस कदम न उठाना कहीं न कहीं संस्थानों की ग़ैरज़िम्मेदारी वाले रवैये को दिखाता है.'

एक अन्य छात्रा प्राची पांडे ने कहा, "जब देखा जा रहा है कि नीट जेईई जैसे एग्ज़ाम में घपलेबाज़ी हो रही है उसके बाद भी नेट का एग्ज़ाम करवाया गया. बच्चों के साथ ये बहुत ही ग़लत हुआ है. अभी पुलिस भर्ती का पेपर लीक हुआ और अब नेट का."

उन्होंने कहा, "लड़कियों पर पैरेंट्स का अधिक दबाव रहता है कि वो जल्द से अपनी पढ़ाई पूरी करें नहीं तो उनकी शादी कर दी जाए."

18 जून को नेट का एक्ज़ाम देने वाली श्रुति मिश्रा ने कहा, "सबसे पहली बात तो हमारा समय नष्ट हो रहा है. छात्र बड़ी मेहनत करते हैं और जब परीक्षा रद्द हो जाती है तो उसकी मेहनत पर पानी फिर जाता है और मोटिवेशन पर भी क्योंकि फिर हम क्यों एग्ज़ाम की तैयारी करें, ईमानदारी से पढ़ाई करें, जब कोई शिक्षा माफ़िया पेपर लीक करा देंगे, कुछ लोग पैसे देकर पास हो जाएंगे और हमसे आगे निकल जाएंगे."

वो कहती हैं, "ऐसा होता रहेगा और हम यहां मेहनत करेंगे और एग्ज़ाम पर एग्ज़ाम देते रहेंगे."

नीट परीक्षा में कथित धोखाधड़ी के आरोप

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने परीक्षाओं में 'पारदर्शिता से कोई समझौता न करने का' आश्वासन दिया.

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एनटीए का गठन 2018 में हुआ था. पहले अलग-अलग एग्ज़ाम अलग-अलग एजेंसियां कराती थीं.

अब नीट की परीक्षा की ज़िम्मेदारी एनटीए के पास है और इसमें कथित धोखाधड़ी को लेकर पूरे भारत में घमासान मचा हुआ है.

देशभर के मेडिकल कॉलेज में दाख़िले के लिए नीट की परीक्षा होती है. इस बार चार जून को इसका रिज़ल्ट आया और तभी से इसको लेकर बवाल शुरू हो गया.

क़रीब 24 लाख छात्रों ने इसकी परीक्षा दी थी. यह एग्ज़ाम कुल 720 नंबर का होता है और 67 छात्रों को 720 में से 720 नंबर आ गए. कुछ को 719 और 718 नंबर आए.

एनटीए ने अपनी सफ़ाई देते हुए कहा कि 1563 छात्रों को ग्रेस मार्क्स दिए गए थे.

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. वहां एनटीए ने कहा कि वो ग्रेस मार्क्स ख़त्म कर रही है. और इन छात्रों के लिए 23 जून को फिर से टेस्ट देना होगा.

और अगर कोई छात्र इसमें नहीं बैठना चाहता है तो उनके ओरिजिनल मार्क्स के आधार पर रिज़ल्ट निकाल दिया जाएगा.

नीट की परीक्षा के पेपर लीक मामले में बिहार में कुछ लोगों को गिरफ़्तार किया गया है, जिनमें कुछ छात्र भी हैं.

बिहार पुलिस की जांच में सामने आया है कि कुछ अभ्यर्थियों को परीक्षा से पहले ही पेपर के सवाल मिल गए थे.

लेकिन गुरुवार को बुलाई प्रेस कांफ्रेंस में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि, “बिहार सरकार और भारत सरकार के बीच समन्वय था, कुछ विसंगतियां हमारे ध्यान में आई हैं, सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद जो भी ज़िम्मेदार होगा, उसे छोड़ा नहीं जाएगा. बिहार पुलिस इस मामले में जांच को और आगे बढ़ा रही है, उसे पूरा हो जाने दिया जाए.”

हालांकि, उन्होंने नीट परीक्षा दोबारा आयोजित किए जाने से जुड़े सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं दिया.

जबकि पहले शिक्षा मंत्री ने कहा था, "नीट परीक्षा में किसी प्रकार की धांधली, भ्रष्टाचार या पेपर लीक की कोई भी पुख़्ता सबूत अभी तक सामने नहीं आया है. इससे संबंधित सारे तथ्य सुप्रीम कोर्ट के सामने हैं और विचाराधीन हैं."

परीक्षाओं को रद्द होने से कैसे रोका जा सकता है?

यूजीसी नेट की परीक्षा 18 जून को हुई थी.

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बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद से यूजीसी के पूर्व चेयरमैन प्रोफ़ेसर एसके थोराट ने कहा, "परीक्षाएं ऐन वक़्त पर रद्द नहीं होनी चाहिए, इसके कारण छात्रों में भरोसे की भावना कम हो जाती है उससे उनके करियर पर प्रभाव पड़ता है."

"मंत्रालयों को एहतियात बरतनी चाहिए कि कोई सूचना लीक न हो और छात्रों को सही तरह से परीक्षा देने का मौक़ा मिले. सरकार को कोशिश करनी चाहिए कि इसको फ़ुल प्रूफ़ बनाया जाए."

एनटीए को सभी परीक्षाओं की ज़िम्मेदारी दिए जाने पर थोराट कहते हैं, "ये लग रहा है कि एक स्वतंत्र एजेंसी को ज़िम्मेदारी देने के बाद उनमें जवाबदेही कम हो जाती है, आउटसोर्सिंग में कुछ कमियां होती हैं, नेट जैसी परीक्षाओं की ज़िम्मेदारी यूजीसी से जुड़े कर्मचारियों को देनी चाहिए क्योंकि अगर कोई ग़लती हो तो उन्हें लगे कि उनकी नौकरी ख़तरे में है."

बीजेपी-आरएसएस के लोगों के संस्थानों पर काबिज़ होने के कांग्रेस नेता के आरोपों पर थोराट कहते हैं, "ये बात सही है कि बहुत सारे केंद्रीय संस्थानों में एक विचारधारा के लोगों को दाख़िल करने की कोशिश चल रही है, अब उसका कनेक्शन किसी से है या उस पर किसी का क़ब्ज़ा है तो ये साफ़ साफ़ नहीं कहा जा सकता है."

प्रोफ़ेसर थोराट कहते हैं, "पिछली सरकारों में था कि आपके पॉलिटिकल कनेक्शन से आपको किसी पोज़िशन को पाने में मदद मिल जाती थी लेकिन आज की तरह किसी ख़ास संगठन से जुड़ाव को नहीं देखा जाता था."

"इसकी वजह से हो सकती है कि जो सक्षम लोग आपको मिलने चाहिए वो नहीं मिल पा रहे हैं. एजेंसी को लेकर सरकार की मॉनिटरिंग बहुत ज़रूरी है किसी को पूरी तरह स्वतंत्रता नहीं देनी चाहिए."

एनटीए को लेकर क्या कहते हैं शिक्षाविद्

छात्रों का प्रदर्शन

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नीट परीक्षा विवाद को लेकर शिक्षाविदों की अलग राय है. उनका कहना है कि इस वक़्त इस मुद्दे पर जो बहस हो रही है वो ग़लत दिशा में है और असल मुद्दा कुछ और है.

मशहूर शिक्षाविद अनिल सदगोपाल ने बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद से कहा,"तीन मुद्दे हैं. पहला, नीट के कारण हर एक राज्य में जो पब्लिक हेल्थ सर्विसेज़ थी उनकी सर्विस गिरी है. दूसरा, नीट देश के बहुजन युवाओं को डॉक्टर बनने से रोक रहा है, बहुजन में आदिवासी, दलित, ओबीसी, ट्रांसजेंडर्स और घुमंतू जातियां हैं. ये कुल मिलाकर देश के 85 फ़ीसदी युवा हैं. इन युवाओं को डॉक्टर बनने का अधिकार नहीं है और नीट के कारण इनका अधिकार छीना जा चुका है."

"तीसरा, जब एनटीए बना और शिक्षा नीति की घोषणा की गई तो ये दावा किया गया कि नीट इसलिए शुरू किया जा रहा है ताकि पूरे देश में एमबीबीएस के एडमिशन में सबको बराबर का मौक़ा मिले."

वो कहते हैं, "ये तीनों बातें पीछें चली गई हैं और जो देश में और सुप्रीम कोर्ट में डिबेट चल रही है वो असली मुद्दा ही नहीं है. देश के हर किसी एंट्रेस एग्ज़ाम में हमेशा ऐसी ग़लतियां होती रहती हैं."

अनिल सदगोपाल के अनुसार, "आज़ादी से लेकर और नीट लागू होने तक क्या देश के मेडिकल कॉलेज में एडमिशन नहीं होते थे. देश के हर राज्य में मेडिकल कॉलेज थे जो राज्य सरकारों के ख़र्चों से बनवाए गए थे. नीट 2018 में जब लागू हुआ तब सबसे पहले तमिलनाडु की 18 साल की लड़की अनीता का मामला सामने आया."

"अनीता तमिलनाडु स्टेट बोर्ड परीक्षा में 12वीं कक्षा में 98 फ़ीसदी से ज़्यादा मार्क्स लेकर पास हुई थी, वो ग़रीब घर की लड़की थी जिसके पिता सब्ज़ी मंडी में ढुलाई का काम करते थे. उसकी तमन्ना डॉक्टर बनकर गांव में डिस्पेंसरी खोलने की थी लेकिन तभी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद नीट लागू हुआ तो अनीता को लगा कि सबकुछ अंग्रेज़ी में होगा जबकि वो तमिल भाषा में पढ़ी लिखी थी."

"इसके बाद अनीता ने जवाब दिया था कि कौन नहीं जानता भारत की स्कूल व्यवस्था ग़ैर बराबरी की बुनियाद पर खड़ी है, जिस देश में स्कूल स्तर पर भेदभाव होता है वहां समतामूलक धरातल हो नहीं सकता है. अनीता ने उसी दिन आत्महत्या कर ली, उसकी बात इतनी सच्ची है जिसे कोई चुनौती नहीं दे सकता."

नीट की संवैधानिकता पर सदगोपाल कहते हैं, "संविधान की सातवीं अनुसूची कहती है कि सारी शिक्षा व्यवस्था राज्य सरकारों के हाथ में रहेगी, शिक्षा के कुछ पहलू केंद्र सरकार के हाथ में हो सकते हैं. राज्य और केंद्र सरकार के अधिकार संविधान में बांटे गए हैं तो इसको न तो प्रधानमंत्री, संसद और न सुप्रीम कोर्ट बदल सकता है. सातवीं अनुसूची भारत के संविधान की आत्मा है तो बिना राज्य सरकारों की अनुमति के बिना नीट क्यों लागू किया गया?"

वो कहते हैं, "इसलिए तमिलनाडु सरकार ने स्टैंड लिया और उसने इसे ख़ारिज कर दिया. इससे पहले राज्य सरकारों के मेडिकल कॉलेज में अपनी राज्य की भाषा में एडमिशन होता था. ये संविधान का पूरी तरह उल्लंघन है. मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस एके राजन की अध्यक्षता में एक कमिटी का गठन हुआ जिसने पाया कि जब से नीट की परीक्षा हुई तब से तमिलनाडु की ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा बर्बाद हो गई जबकि नीट से पहले वो देश में टॉप पर थी."

नीट परीक्षा को लेकर हो रहे विवाद का आख़िर समाधान क्या है?

इस सवाल पर अनिल सदगोपाल कहते हैं कि मेडिकल कॉलेज में दाख़िले की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों को सौंपी जानी चाहिए, भारत के संविधान का पालन किया जाना चाहिए क्योंकि ये राज्य की सूची में है.

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