पाकिस्तान: शहबाज़ शरीफ़ फिर चुने गए पीएम, दूसरे कार्यकाल में क्या होंगी चुनौतियां

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- Author, उमरदराज़ नांगियाना
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता
शहबाज़ शरीफ़ का पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के तौर पर पहला कार्यकाल सिर्फ़ सोलह महीनों का था. अविश्वास प्रस्ताव के जरिए इमरान ख़ान को प्रधानमंत्री की कुर्सी से हटाकर जब वह पहली बार पीएम बने तो उनके बड़े भाई नवाज़ शरीफ़ देश में मौजूद नहीं थे.
तीन बार प्रधानमंत्री रहे नवाज़ शरीफ़ लंदन में थे और उस समय उनकी हैसियत एक सज़ायाफ़्ता मुजरिम की थी जो चुनाव में हिस्सा लेने या कोई सरकारी पद पाने के योग्य नहीं थे.
लेकिन रविवार के दिन राष्ट्रीय असेंबली में प्रधानमंत्री के लिए होने वाली वोटिंग के दौरान जब शहबाज़ शरीफ़ प्रधानमंत्री के उम्मीदवार की हैसियत से बैठे थे तो नवाज़ शरीफ़ उनके पास ही सदन में मौजूद थे.
नवाज़ शरीफ़ राष्ट्रीय असेंबली के महज़ एक सदस्य के तौर पर अपने छोटे भाई शहबाज़ शरीफ़ को दूसरी बार पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनते देख रहे थे. उनकी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) के इतिहास में ऐसा मंज़र पहली बार देखने में आ रहा था.
सन 1997 के बाद जब भी नवाज़ लीग सत्ता में आई तो ऐसा कभी नहीं हुआ कि नवाज़ शरीफ़ देश में हों, पद पाने के योग्य भी हों, चुनाव भी जीत जाएं मगर फिर भी प्रधानमंत्री न बनें. वह हर बार प्रधानमंत्री बने और शहबाज़ शरीफ़ पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री बने.
पंजाब में उन्होंने लगभग तेरह वर्षों तक मुख्यमंत्री के तौर पर शासन किया. सन 2008 से 2018 उनके शासन के दौरान उनके बारे में ‘सख़्त एडमिनिस्ट्रेटर’ की छवि बनी.
इस दौरान उन्होंने कई बड़े प्रोजेक्ट पूरे किए और कुछ शुरू किए. उनमें से ऑरेंज लाइन जैसी कई परियोजनाओं के लिए उन्हें आलोचना भी झेलनी पड़ी लेकिन उनके बारे में यह राय भी बनी कि वह विकास परियोजनाओं को कम समय में पूरी करवाते हैं.
शहबाज़ सन 2022 में पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने शासनकाल में अपने बारे ‘सख़्त एडमिनिस्ट्रेटर’ या ‘शहबाज़ स्पीड’ जैसी कोई छवि नहीं बना सके. विशेषज्ञों के अनुसार वह ‘देश की अर्थव्यवस्था को संभालने’ की उस बात पर भी खरे नहीं उतरे जिसका वादा कर उन्होंने सत्ता संभाली थी.
लेकिन अगस्त 2023 में पीडीएम सरकार की अवधि पूरी होने पर शहबाज़ शरीफ़ का दावा था कि उन्होंने देश को डिफ़ॉल्ट होने से बचा लिया. उनके अनुसार जिन परिस्थितियों में उनको देश की अर्थव्यवस्था मिली वह सत्रह महीनों में जितनी बेहतर की जा सकती थी उन्होंने की.
शहबाज़ शरीफ़ कैसे राज्य की सत्ता से देश की सत्ता के मालिक बने और फिर नवाज़ लीग के प्रमुख नवाज़ शरीफ़ की मौजूदगी में दूसरी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे, आइये उनके राजनीतिक सफ़र पर एक नज़र डालते हैं.
व्यापार से सियासत का सफ़र

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पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के छोटे भाई शहबाज़ शरीफ़ ने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद परिवार का कारोबार संभाला. पत्रकार सलमान ग़नी लंबे समय से शरीफ़ परिवार और उनकी पार्टी की गतिविधियों पर रिपोर्ट करते रहे हैं.
बीबीसी को उन्होंने बताया कि सन 1985 में शहबाज़ शरीफ़ लाहौर चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के अध्यक्ष बने थे.
“मुझे याद है कि उस दौर में उनके पास एक शेराड गाड़ी हुआ करती थी और वह ख़ुद उसमें सामान रखकर अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं तक पहुंचाया करते थे.”
सलमान ग़नी की राय में मियां नवाज़ शरीफ़ और उनकी पार्टी की राजनीति को बढ़ावा देने में शहबाज़ शरीफ़ की केंद्रीय भूमिका रही है.
“वह बहुत मेहनत करते थे. परिवार में भी शुरू ही से उनके बारे में यह राय थी कि वह मेहनती और बेहद अच्छे संगठनकर्ता हैं.”
कारोबार को बढ़ावा देने के बाद उन्होंने राजनीति में आने का फ़ैसला किया. शहबाज़ शरीफ़ सन 1988 के चुनाव में पंजाब असेंबली के सदस्य बने. सन 1990 में राष्ट्रीय असेंबली के लिए चुने गए और सन 1993 में दोबारा पंजाब असेंबली के सदस्य बने. इस साल वह राज्य असेंबली में विपक्ष के नेता भी बने.
सन 1997 के चुनाव में पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) ने सफलता प्राप्त की तो शहबाज़ शरीफ़ पहली बार पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री चुने गए. पत्रकार और वरिष्ठ विश्लेषक मुजीबुर्रहमान शामी उस दौर की राजनीति पर गहरी नज़र रखते हैं.
मुजीबुर्रहमान शामी ने बीबीसी को बताया, “शहबाज़ शरीफ़ मेहनत करने वाले शख़्स थे और उन्हें अपने निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने का एक जुनून होता था. अच्छा संगठनकर्ता होने की वजह से उन्होंने पंजाब में एक अच्छी टीम बनाई.”
शहबाज़ शरीफ़ ने पंजाब में कई प्रोजेक्ट शुरू किए लेकिन उनकी सरकार समय से पहले तब ख़त्म हो गई जब उस वक़्त के आर्मी चीफ़ जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने सन 1999 में मार्शल लॉ लागू कर दिया और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के साथ-साथ शहबाज़ शरीफ़ को भी गिरफ़्तार कर लिया गया.
पत्रकार मुजीबुर्रहमान शामी कहते हैं कि उस समय जो भी स्थिति बनी उनमें शहबाज़ शरीफ़ की कोई भूमिका साबित नहीं हुई थी.
“वह मूलतः टकराव लेने के पक्ष में नहीं थे. उनका हमेशा यह स्टैंड होता था कि फ़ौजी इस्टैब्लिशमेंट समेत सबके साथ मिलकर काम करना चाहिए.”
मुजीबुर्रहमान शामी बताते हैं कि एक बार पर परवेज़ मुशर्रफ़ ने भी कहा था कि अगर वह (शहबाज़ शरीफ़) प्रधानमंत्री होते तो बेहतर होता. लेकिन शरीफ़ परिवार के दोनों भाइयों के ख़िलाफ़ प्लेन हाईजैकिंग और ग़द्दारी के मुक़दमे किए गए थे.
मुशर्रफ़ से डील और निर्वासन

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सन 2000 में शरीफ़ परिवार की फ़ौजी तानाशाह जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के साथ एक कथित डील हुई जिसके बाद वह निर्वासित होकर सऊदी अरब चले गए.
पत्रकार मुजीबुर्रहमान शामी के अनुसार उस समय भी नवाज़ शरीफ़ और दूसरे नेताओं के ख़िलाफ़ जो मुक़दमे किए गए थे, उनमें शहबाज़ शरीफ़ के ख़िलाफ़ कोई आरोप साबित नहीं हो पाया था.
“वह देश से निर्वासित नहीं होना चाहते थे और उन्होंने बहुत कोशिश भी कि उन्हें बाहर नहीं भेजा जाए.”
पत्रकार और विश्लेषक सलमान ग़नी बताते हैं कि शहबाज़ शरीफ़ ने जेल के अंदर से भी अपने बड़े भाई नवाज़ शरीफ़ को कई पत्र लिखे.
“उन पत्रों में वह नवाज़ शरीफ़ को यही राय देते रहे कि हमें इस्टैब्लिशमेंट के साथ टकराव नहीं लेना चाहिए.”
सलमान ग़नी कहते हैं कि शहबाज़ शरीफ़ के कुछ ऐसे पत्र उनकी नज़र से भी गुज़रे हैं.
उसके बाद पंजाब के पूर्व गवर्नर चौधरी सरवर की कोशिशों से नवाज़ शरीफ़ और शहबाज़ शरीफ़ सऊदी अरब से लंदन चले गए.
मुख्यमंत्री की कुर्सी का खेल

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शरीफ़ परिवार सन 2007 में पाकिस्तान वापस आया तो अगले ही साल देश में आम चुनाव हुए. शहबाज़ शरीफ़ उस चुनाव में हिस्सा न ले सके. उनके ख़िलाफ़ सन 1998 में लाहौर में हत्या के एक मामले में एफ़आईआर दर्ज की गई थी.
उस एफ़आईआर में उन पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर उस ‘पुलिस मुठभेड़’ का आदेश दिया था जिसमें कुछ लोग पुलिस के हाथों कथित तौर पर मारे गए थे.
शहबाज़ शरीफ़ की अनुपस्थिति में सन 2003 में आतंकवाद निरोधी अदालत ने उनको नोटिस जारी किया था. सन 2004 में शहबाज़ शरीफ़ ने उस मुक़दमे में अदालत में पेश होने के लिए पाकिस्तान वापस आने की कोशिश की थी लेकिन उन्हें एयरपोर्ट ही से वापस भेज दिया गया था.
उस साल अदालत में पेश न होने के कारण अदालत ने उनकी गिरफ़्तारी के वारंट जारी कर दिए थे. सन 2007 में शहबाज़ शरीफ़ पाकिस्तान वापस आए तो उस मुक़दमे में अदालत से ज़मानत लेनी पड़ी थी लेकिन आम चुनाव तक वह उस मुक़दमे से बरी न हो सके.
इसलिए उन्होंने उपचुनाव में भाग लिया. वह भक्कर से चुनाव जीत कर एक बार फिर पंजाब के मुख्यमंत्री बने लेकिन अगले ही साल सुप्रीम कोर्ट ने उनको अयोग्य घोषित कर दिया.
'चीनी उनको पसंद करते हैं और वह चीनियों को'

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सन 2013 के चुनाव में कामयाबी के बाद शहबाज़ शरीफ़ लगातार दूसरी बार और कुल मिलाकर तीसरी बार पंजाब के मुख्यमंत्री चुने गए. उन्हीं दस वर्षों में उनके बारे में ‘सख़्त एडमिनिस्ट्रेटर’ होने की राय सामने आई थी.
पत्रकार सलमान ग़नी ने बीबीसी को बताया कि उन्हें याद है कि जिन दिनों लाहौर में डेंगू के ख़िलाफ़ ऑपरेशन चल रहा था, वह सुबह छह बजे डॉक्टरों और दूसरी टीमों को बुला लेते थे. “किसी की मजाल नहीं थी कि कोई लेट हो या अनुपस्थित रहे.”
पत्रकार मुजीबुर्रहमान शामी के अनुसार शहबाज़ शरीफ़ ने पहले पांच वर्षों में अपने लिए लक्ष्य बनाया था कि उन्हें देश में बिजली की कमी को पूरा करना है. उसके बाद उन्होंने चीन की मदद से पावर प्लांट लगाने का काम शुरू किया जिसे रिकॉर्ड समय में पूरा किया गया.
“उस ज़माने में इसी वजह से ‘पंजाब स्पीड’ की शब्दावली भी मशहूर हुई थी.”
मुजीबुर्रहमान शामी के अनुसार, “ख़ास तौर पर चीनी उनसे बहुत ख़ुश थे कि वह समय से पहले प्रोजेक्ट पूरा कर लेते थे.”
पत्रकार सलमान ग़नी बताते हैं कि शहबाज़ शरीफ़ चीन के लोगों के काम के तरीक़े से बहुत प्रभावित थे. “इसीलिए वह कई बार चीन के दौरे कर चुके थे. चीनी उनको पसंद करते थे और वह चीनियों को. चीनी उनके काम करने की रफ़्तार से बहुत प्रभावित थे और उसकी प्रशंसा करते थे.”
मेट्रो बस और ऑरेंज लाइन ट्रेन

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शहबाज़ शरीफ़ ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में भी कई प्रोजेक्ट पूरे किए लेकिन उनके दौर के दो बड़े प्रोजेक्ट शुरुआत में बहुत आलोचना के शिकार बने.
उन्होंने लाहौर में ट्रैफ़िक के दबाव को कम करने के लिए शहर में मेट्रो बस चलाने की परियोजना लाई. उस समय इमरान ख़ान विपक्ष में थे और उन्होंने इसको ‘जंगला बस’ का नाम देकर इसकी आलोचना की थी.
पत्रकार सलमान ग़नी के अनुसार शहबाज़ शरीफ़ ने सभी आलोचनाओं और विरोध के बावजूद मेट्रो बस की परियोजना पूरी की और वह कामयाब भी हुई. “उसके बाद यही प्रोजेक्ट रावलपिंडी और इस्लामाबाद के अलावा मुल्तान में भी शुरू किया गया.”
ख़ुद इमरान ख़ान की सरकार ने ख़ैबर पख़्तूनख़्वा राज्य में भी ऐसे ही प्रोजेक्ट पर काम किया. लाहौर में ऑरेंज लाइन ट्रेन चलाने की परियोजना पर भी शहबाज़ शरीफ़ को विपक्ष की ओर से आलोचना का सामना करना पड़ा था.
इसके बारे में विपक्ष का कहना था कि वह प्रोजेक्ट इतना महंगा था कि सरकार के लिए इसको सब्सिडी पर चलाना ‘एक बहुत बड़ा बोझ’ था. लेकिन बाद में वह प्रोजेक्ट पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ की सरकार में चलना शुरू हुआ और अभी तक चल रहा है.
मॉडल टाउन की घटना

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सन 2014 में पंजाब में शहबाज़ शरीफ़ के मुख्यमंत्री रहने के दौरान लाहौर शहर के मॉडल टाउन स्थित मिन्हाजुल क़ुरान के दफ़्तर और इस संगठन के प्रमुख ताहिरुल क़ादरी के घर के बाहर पुलिस और संगठन के कार्यकर्ताओं में झड़प हुई थी.
उस झड़प के दौरान पुलिस ने मिन्हाजुल क़ुरान के कार्यकर्ताओं पर आंसू गैस के गोले दाग़े थे और उसके बाद पुलिस की ओर से उन पर फ़ायरिंग भी की गई थी. पुलिस की फ़ायरिंग में मिन्हाजुल क़ुरान के चौदह कार्यकर्ताओं की मौत हुई और सौ से अधिक घायल हुए थे.
इस घटना को स्थानीय टीवी चैनलों पर लाइव दिखाया जाता रहा और इसकी गंभीर प्रतिक्रिया सामने आई. सरकार ने इस घटना की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग बनाया जिसने अपनी रिपोर्ट में पंजाब सरकार को इस घटना के लिए ज़िम्मेदार होने का इशारा किया.
अदालत के आदेश पर नवाज़ शरीफ़, शहबाज़ शरीफ़, राना सनाउल्लाह और दूसरे लोगों के ख़िलाफ़ सन 2014 में फ़ैसल टाउन थाने में एक एफ़आईआर भी दर्ज की गई. लेकिन बाद में पुलिस ने ‘आरोपियों का घटना से से कोई संबंध न होने’ के आधार पर वह एफ़आईआर ख़त्म कर दी.
मॉडल टाउन घटना में उच्च पुलिस अधिकारियों समेत एक सौ से अधिक जिन लोगों पर आरोप गठित हुए उनमें अधिकतर मुक़दमे से बरी हो चुके हैं.
राज्य से केंद्र की यात्रा

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शहबाज़ शरीफ अपने बड़े भाई नवाज़ शरीफ़ के सामने राजनीति में हमेशा सहायक भूमिका निभाते रहे. जब भी नवाज़ शरीफ़ प्रधानमंत्री बने तो शहबाज़ शरीफ़ पंजाब के मुख्यमंत्री बने.
पत्रकार मुज़ीबुर्रहमान शामी का कहना है कि शहबाज़ शरीफ़ जन नेता नहीं हैं, वह अच्छे संगठनकर्ता ज़रूर हैं. “वह ग़ैर ज़रूरी झगड़ों में पड़ने के पक्ष में नहीं और रक्षा संस्थाओं के साथ भी मिलकर चलना चाहते हैं.”
सन 2017 में हालात उस समय बदले जब नवाज़ शरीफ़ को सुप्रीम कोर्ट ने पनामा केस में आजीवन अयोग्य घोषित कर दिया. पार्टी की अध्यक्षता तो शहबाज़ शरीफ़ के पास आ गई लेकिन मुख्यमंत्री का पद शाहिद ख़ाक़ान अब्बासी के पास गया.
इधर अदालत से सज़ा मिलने के बाद कुछ समय जेल में रहने के बाद नवाज़ शरीफ़ इलाज की अनुमति लेकर लंदन चले गए और वापस नहीं आए.
सन 2018 के चुनाव में शहबाज़ शरीफ़ ने पंजाब छोड़कर केंद्र में आने का फ़ैसला किया. वह राष्ट्रीय असेंबली के सदस्य चुने गए और दूसरी बड़ी पार्टी के लीडर होने की वजह से नेता प्रतिपक्ष भी चुने गए.
उनके ख़िलाफ़ भी कथित भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के मुक़दमे हुए लेकिन किसी मुक़दमे में उन्हें सज़ा नहीं हुई.
पहली बार प्रधानमंत्री
सन 2022 में शहबाज़ शरीफ़ ने बाक़ी विपक्षी दलों को साथ मिलाकर पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ आंदोलन चलाया. इसके बाद इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय असेंबली में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया.
अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग के बाद इमरान ख़ान की सरकार चली गई. उनकी जगह पीडीएम यानी पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट की पार्टियों ने शहबाज़ शरीफ़ को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया. सहयोगी दलों और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टियों को साथ मिलाकर वह पहली बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए.
उस समय उनके सामने यह प्रस्ताव भी था कि वह प्रधानमंत्री का पद स्वीकार न करें और उन्हें सलाह दी गई कि चुनाव के लिए जाना बेहतर होगा. पत्रकार सलमान ग़नी के अनुसार, “शहबाज़ शरीफ़ ने प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करने का फ़ैसला किया क्योंकि वह समझते थे कि उस समय देश को स्थिरता की बहुत अधिक ज़रूरत थी.”
क्या सोलह महीने पीडीएम की सरकार चलाने के बाद उनका यह फ़ैसला सही साबित हुआ? सलमान ग़नी समझते हैं कि वह फ़ैसला सही साबित नहीं हुआ.
आर्थिक संकट और समझौते की राजनीति

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शहबाज़ शरीफ़ को अपनी पीडीएम सरकार के 16-17 महीने के दौरान लगातार आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा. इस दौरान न तो वह डॉलर की ऊंची उड़ान रोक पाए और न ही बढ़ती हुई महंगाई पर क़ाबू पा सके. राजनीतिक तौर पर उनकी पार्टी को इसका नुक़सान हुआ.
पत्रकार और विश्लेषक माजिद निज़ामी समझते हैं कि इसी की वजह से उपचुनाव में उनकी पार्टी पंजाब में बुरी तरह हारी और उसका असर हाल के चुनाव में भी जनता की प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया.
माजिद निज़ामी के अनुसार शहबाज़ शरीफ़ के लिए सरकार बचाने के लिए सहयोगियों के हितों को देखना भी ज़रूरी था. “इसलिए वह उस तरह काम नहीं कर पाए जिस तरह वह करना चाहते होंगे और इस तरह उनके बारे में ‘अच्छे एडमिनिस्ट्रेटर’ की राय को भी नुक़सान पहुंचा.”
वह कहते हैं कि शहबाज़ शरीफ़ ने हमेशा ‘समझौते की राजनीति’ को प्राथमिकता दी है. “वह हमेशा इस बात के पक्ष में रहे हैं कि उन्हें पाकिस्तान की शक्तिशाली इस्टैब्लिशमेंट के साथ लड़ाई नहीं करनी चाहिए और उनके साथ मिलकर काम करना चाहिए.”
पत्रकार माजिद निज़ामी के अनुसार, “शहबाज़ शरीफ़ 2017 में पैदा होने वाली स्थिति के बाद अपने भाई नवाज़ शरीफ़, उनकी बेटी मरियम नवाज़ और अपनी पार्टी के लिए इस्टैब्लिशमेंट के साथ समझौता करके गुंजाइश निकालने में कामयाब हो गए.”
इसी समझौते की नीति के तहत “उन्होंने सन 2022 में सरकार बनाना क़बूल किया जिसका उनकी पार्टी को राजनीतिक नुक़सान उठाना पड़ा.”
दूसरा कार्यकाल और सेना से संबंध
हाल के चुनाव में नवाज़ लीग अपनी उम्मीदों के उलट राष्ट्रीय असेंबली में स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर पाई. पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ समर्थित आज़ाद उम्मीदवार नब्बे से अधिक सीट लेकर सबसे बड़े समूह बनकर उभरे.
नवाज़ लीग दूसरे नंबर पर रही और कुछ आज़ाद उम्मीदवारों को साथ मिलाकर उनकी सीटें लगभग अस्सी सीटें हुईं. कुछ शुरुआती ऊहापोह और हिचकिचाहट के बाद उनकी पार्टी और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने केंद्र में सरकार बनाने का फ़ैसला किया.
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने नवाज़ लीग के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार शहबाज़ शरीफ़ को समर्थन देने का विश्वास दिलाया और बदले में उन्होंने राष्ट्रपति समेत कुछ संवैधानिक पद मांगे. अभी तक यह साफ़ नहीं कि वह शहबाज़ शरीफ़ की कैबिनेट का हिस्सा बनेगी या नहीं.
पत्रकार और विश्लेषक माजिद निज़ामी कहते हैं कि पहले से अलग इस बार शहबाज़ शरीफ़ के लिए अच्छी बात यह है कि वह पांच साल के लिए प्रधानमंत्री चुने गए हैं लेकिन उनके पास बहुमत न होने की वजह से उनकी सरकार बहुत मज़बूत नहीं होगी.
वह कहते हैं कि पहले की तरह इस बात की संभावना बहुत कम है कि किसी समय आगे चलकर शहबाज़ शरीफ़ के भी नवाज़ शरीफ़ और इमरान ख़ान की तरह इस्टैब्लिशमेंट के साथ संबंध बिगड़ जाएं.
“शहबाज़ शरीफ़ के अंदर एक विद्रोही राजनीतिक कार्यकर्ता कभी भी नहीं रहा. उनकी इस्टैब्लिशमेंट के साथ कोई लड़ाई नहीं है. वह वैचारिक तौर पर इस्टैब्लिशमेंट के समर्थक हैं. उनके लिए अहम की भी कोई समस्या नहीं है.”
पत्रकार और विश्लेषक सलमान ग़नी भी इस राय का समर्थन करते हैं. वह कहते हैं कि शहबाज़ शरीफ़ की राजनीति शुरुआत से ही समझौते की रही है. “वह और चौधरी निसार हमेशा ही से इस्टैब्लिशमेंट के साथ अच्छे संबंधों के समर्थक रहे और उनकी पार्टी के स्तर पर यह सुनिश्चित होता था.”
वह समझते हैं कि यह पहले से ही तय था कि इस बार नवाज़ शरीफ़ प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे और यह पद शहबाज़ शरीफ़ संभालेंगे. उनके विचार में भी शहबाज़ शरीफ़ की सरकार अधिक मज़बूत नहीं होगी.
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