अरविंद केजरीवाल का 'रेफरेंडम' का फ़ैसला: गिरफ्तारी का डर या रणनीतिक चाल?

अरविंद केजरीवाल

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    • Author, अभिनव गोयल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

‘क्या केजरीवाल जी को गिरफ्तारी के बाद इस्तीफ़ा देना चाहिए या जेल से ही सरकार चलानी चाहिए?’

ये वो अहम सवाल है जिसका जवाब जानने और अरविंद केजरीवाल के समर्थन में लोगों को एकजुट करने के लिए आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में घर-घर दस्तक देने का फ़ैसला लिया है. 

इसे लेकर सोशल मीडिया पर भी चर्चा हो रही है. कइयों का कहना है कि अरविंद कजरीवाल गिरफ्तारी से बचना चाहते हैं इसलिए आम आदमी पार्टी इस तरह का अभियान चला रही है.

पार्टी ने शुक्रवार, 1 दिसंबर से ‘मैं भी केजरीवाल’ सिग्नेचर कैंपेन की शुरुआत की है. पहले चरण में यह अभियान 20 दिसंबर तक चलाया जाएगा. 

इस अभियान में आम आदमी पार्टी के विधायक, मंत्री, पार्षद और सभी पदाधिकारी दिल्ली के सभी 2600 पोलिंग स्टेशन को कवर करेंगे. 

अभियान का दूसरा चरण 21 से 24 दिसंबर तक चलेगा, जिसमें जनसंवाद कार्यक्रम होंगे और इस तरह के सवालों को उसमें भी उठाया जाएगा. 

फिलहाल पार्टी के कई बड़े नेताओं के ख़िलाफ़ ईडी और सीबीआई की कार्रवाई चल रही है. दिल्ली के कथित शराब घोटाले में केजरीवाल सरकार में उप मुख्यमंत्री रहे मनीष सिसोदिया और सांसद संजय सिंह जेल में हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेता सत्येंद्र जैन भी अभी तक जेल से बाहर नहीं आ पाए हैं और अब पार्टी के मुखिया और सीएम अरविंद केजरीवाल को भी ईडी नोटिस दे चुकी है. 

ऐसे में पार्टी के इस तरह के अभियान के क्या मायने हैं? जैसा सोशल मीडिया पर चर्चा की जा रही है क्या सच में गिरफ्तारी के डर से आम आदमी पार्टी इस तरह की तैयारी कर रही है? एक और महत्वपूर्ण सवाल ये कि यह अभियान उसके लिए कितना कारगर साबित हो सकता है?

इन्हीं सब सवालों के जवाब जानने के लिए बीबीसी हिंदी ने वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री, वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार कृष्ण मोहन शर्मा और आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता और वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष से बात की है. 

दिल्ली में सिग्नेचर कैंपेन

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‘इस पर्चे को जरूर पढ़ें’

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दिल्ली सरकार में मंत्री और प्रदेश संयोजक गोपाल राय का कहना है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार करने की तैयारी की जा रही है और उसे देखते हुए 'मैं भी केजरीवाल' सिग्नेचर कैंपेन शुरू किया गया है. 

वो कहते हैं, "भाजपा षड़यंत्र कर रही है और अब केजरीवाल को गिरफ्तार कर दिल्ली को ठप करना चाहती है. ऐसी स्थिति में दिल्ली के लोगों की राय जानने के लिए घर-घर जाकर उन्हें एक पर्चा दिया जाएगा और उनसे राय ली जाएगी."

इस अभियान के केंद्र में एक पन्ने का पर्चा है, जिसका शीर्षक है, "अरविंद केजरीवाल को क्यों गिरफ्तार करना चाहते हैं नरेंद्र मोदी?"

अरविंद केजरीवाल की एक तस्वीर के साथ इस पर्चे में चार सवाल और उनके जवाब लिखे हुए हैं. ये सवाल हैं- शराब घोटाला फ़र्जी कैसे है?, मोदी जी केजरीवाल जी से काम में मुकाबला नहीं कर पा रहे?, क्या मोदी जी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हैं? क्या केजरीवाल जी को गिरफ्तारी के बाद इस्तीफा देना चाहिए या जेल से ही सरकार चलानी चाहिए?

इस पूरे पर्चे में आम आदमी पार्टी ने यह बताने की कोशिश की है कि अरविंद केजरीवाल पूरी तरह निर्दोष हैं, केंद्र की बीजेपी सरकार उन्हें फंसाने की कोशिश कर रही है और उन्हें जेल में डालना चाहती है. 

सिग्नेचर कैंपेन

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सिग्नेचर कैंपेन से क्या हासिल होगा

'जनलोकपाल आंदोलन' से दिल्ली की सत्ता के शिखर पर पहुंचने वाले अरविंद केजरीवाल एक बार फिर जनता के बीच हैं और अपने चिर-परिचित अंदाज में एक तरह से 'रेफरेंडम' यानी जनमत संग्रह करवा रहे हैं. 

वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार कृष्ण मोहन शर्मा कहते हैं कि इस तरह के अभियान से अरविंद केजरीवाल यह जानना चाहते हैं कि लोगों का विश्वास उनमें बना हुआ है या नहीं. 

वो कहते हैं, "केजरीवाल इस अभियान से न सिर्फ गिरफ्तारी के मुद्दे पर बल्कि अपनी कमियों और आने वाले चुनावों में किन मुद्दों पर काम करने की ज़रूरत है, इसे लेकर वो लोगों की नब्ज़ टटोलना चाहते हैं और फिर उसी आधार पर अपनी रणनीति तय करना चाहते हैं. केजरीवाल सरकार हमेशा से सहानुभूति की सरकार रही है और इसमें भी इसे भुनाने की कोशिश ही दिखाई देती है."

कृष्ण मोहन कहते हैं, "यह सिर्फ समर्थन जुटाने के लिए किया जा रहा है. इसे वोटर मैनेजमेंट अभियान भी कह सकते हैं. अगर इस अभियान से वे लोग पांच लाख नए वोटर जोड़ने में भी कामयाब रहे तो यह एक बड़ी सफलता होगी."

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री इस अभियान को एक रणनीति के तौर पर देखते हैं. वे कहते हैं कि पार्टी के कई नेताओं के जेल में जाने से अरविंद केजरीवाल दबाव में हैं और ऐसी स्थिति में वे 'काउंटर ऑफेंसिव' की रणनीति पर काम कर रहे हैं.

हेमंत अत्री कहते हैं, "पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव नतीजे अगर बीजेपी के पक्ष में नहीं आते हैं तो वो इंडिया गठबंधन के प्रति हमलावर हो सकती है और उनका पहला निशाना अरविंद केजरीवाल होंगे. ऐसे में केजरीवाल इस तरह के अभियान से आक्रामक होने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वे पहले से सामने वाले पर दबाव डाल सकें."

दिल्ली में केजरीवाल का अभियान

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जेल से क्या सरकार चला सकते हैं?

कई मौकों पर आम आदमी पार्टी कह चुकी है कि अगर ईडी अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार करती भी है तो वे जेल से दिल्ली सरकार चलाएंगे.

आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता और वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष भी अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी की संभावना की बात करते हैं. 

वो कहते हैं, "देश में कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी को जेल हुई हो और उसने जेल से सरकार चलाई हो. जब बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को जेल हुई तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था."

आशुतोष कहते हैं, "यह संवैधानिक नैतिकता का सवाल ज्यादा है और ऐसे में अगर वे गिरफ्तार होते हैं तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए. अगर किसी विपक्षी पार्टी के नेता पर कोई आरोप लगता है तो ये तुरंत उसके इस्तीफे की बात करते हैं और अब जब इन पर बात आई है तो ये जनता के बीच जा रहे हैं. ये सब ड्रामा है, इसका कोई फायदा नहीं होने वाला है."

वो कहते हैं कि जेल में रहकर सरकार चलाने में कई दूसरी चुनौतियां भी हैं 

हेमंत अत्री कहते हैं, "अगर क्लास 4 का सरकारी कर्मचारी भी जेल जाता है, या पुलिस उसे रिमांड पर लेती है, तो 24 घंटे के अंदर वह आधिकारिक तौर पर सस्पेंड हो जाता है, ऐसे में मुख्यमंत्री तो बहुत बड़ा पद है."

आशुतोष, पत्रकार

हेमंत अत्री कहते हैं कि आम आदमी पार्टी गिरफ्तारी के बाद जेल से सरकार चलाने का जो सवाल जनता से पूछ रही है, वह अपने आप में लॉजिकल नहीं है, वह सिर्फ पॉलिटिकल पोस्चरिंग है. 

हालांकि वे कुछ घटनाओं का जिक्र करते हैं, जिसमें कुछ नेताओं ने जेल में रहते हुए संवैधानिक पदों पर काम किया है. 

वो कहते हैं, "दिल्ली के जेल मंत्री सत्येंद्र जैन को जब जेल हुई तो उन्होंने कई हफ्तों के बाद इस्तीफ़ा दिया था. साल 2009 से 2014 तक हरियाणा में ओम प्रकाश चौटाला विपक्ष के नेता थे और तिहाड़ जेल में बंद थे. यह एक संवैधानिक पद है और इस पद पर रहने वाले व्यक्ति को कैबिनेट मंत्री का रैंक हासिल होता है."

वो कहते हैं, "ओम प्रकाश चौटाला को सज़ा सुनाई गई थी और उन्होंने अपने पद से कभी इस्तीफा नहीं दिया. जो भी फाइल होती थी, वह जेल जाती थी और वहां से वे अपने काम करते थे, क्योंकि बहुत सारी संवैधानिक नियुक्तियों में भी विपक्ष के नेता की जरूरत होती है."

दिल्ली में सिग्नेचर कैंपेन

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उपराज्यपाल की भूमिका

वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण मोहन शर्मा कहते हैं कि दिल्ली का असली बॉस उपराज्यपाल है और अगर ऐसी स्थिति दिल्ली में पैदा होती है तो उनका एक्शन देखने वाला होगा. 

वो कहते हैं, "दिल्ली में 239एए का प्रावधान है, जिसके तहत उपराज्यपाल के पास विशेष प्रावधान है. वे केजरीवाल को बुला कर ये कह सकते हैं कि आप इस्तीफा दीजिए नहीं तो हम आपको हटा रहे हैं."

कृष्ण मोहन दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल विजय कपूर के समय की एक घटना का जिक्र करते हैं. वे दिल्ली में अप्रैल 1998 से जून 2004 तक उपराज्यपाल रहे थे. 

वो कहते हैं, "विजय कपूर के समय में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के चार मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के मामले चले थे. उन्होंने सीएम को बुलाकर कहा था कि शाम पांच बजे तक अगर आप मंत्रियों का इस्तीफा नहीं लेती हैं तो वे उन्हें सस्पेंड कर देंगे और शीला दीक्षित को इस्तीफा लेना पड़ा था."

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