लोकसभा में दिल्ली सर्विस बिल पास, केजरीवाल अब राज्यसभा में क्या करेंगे

अमित शाह

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गुरुवार को लोकसभा में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (संशोधन) विधेयक पारित हो गया है.

इस विधेयक के ज़रिए मोदी सरकार उस अध्यादेश को क़ानून बनाना चाहती है, जिसमें दिल्ली के उपराज्यपाल के पास दिल्ली में अधिकारियों की पोस्टिंग या ट्रांसफ़र का आख़िरी अधिकार होगा.

माना जा रहा है कि सोमवार को ये विधेयक राज्यसभा में पारित हो सकता है.

इस विधेयक के पारित होने से पहले सदन में सत्ता और विपक्ष के नेताओं के बीच चार घंटे तक तीखी बहस हुई.

विपक्ष ने इसे देश के संघीय ढांचे पर हमला बताया तो वहीं गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि विपक्ष इस बिल का विरोध इसलिए कर रहा है क्योंकि अगर वो ऐसा नहीं करेंगे तो अरविंद केजरीवाल उनके गठबंधन को छोड़ देंगे.

अमित शाह ने विपक्ष के उस दावे को सिरे से ख़ारिज कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद संसद ये क़ानून नहीं बना सकता.

उन्होंने सदन में कहा कि अरविंद केजरीवाल नौकरशाहों को अपने कंट्रोल में इसलिए रखना चाहते हैं क्योंकि उन्हें बंगले के निर्माण और अन्य मामलों में हुए कथित भ्रष्टाचार में पकड़े जाने का डर है.

उन्होंने ये भी कहा कि ये अध्यादेश लाना इसलिए ज़रूरी था क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद दिल्ली सरकार उन अधिकारियों के तबादले करने लगी थी जो केजरीवाल पर लगे आरोपों की जांच का हिस्सा थे, सतर्कता विभाग के कामकाज़ को रोकने की कोशिश की गई.

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आवास मामले में हुए भ्रष्टाचार से डर रहे हैं केजरीवाल - अमित शाह

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अमित शाह ने कई मामलों का हवाला दिया, जिनमें केजरीवाल सरकार के ख़िलाफ़ सतर्कता विभाग जांच कर रहा है.

उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद दिल्ली सरकार की चिंता सड़कें, पानी की सप्लाई, सफ़ाई और स्वास्थ्य होना चाहिए था, लेकिन उन्हें सबसे ज़्यादा चिंता सतर्कता विभाग की थी, इन लोगों ने सतर्कता विभाग को इसलिए निशाना बनाया क्योंकि यहाँ कई सारी संवेदनशील फाइलें पड़ी हैं."

"इस विभाग में शराब नीति के केस की फ़ाइलें हैं, जिसमें दिल्ली के डिप्टी सीएम जेल में हैं. यहां सीएम के आवास को बनाने में मोटे पैसे खर्च करने के मामले की फ़ाइल है, जो उन्हें आने वाले समय में मुश्किल में डाल सकती है.”

उन्होंने ये भी कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद माना है कि संसद को राष्ट्रीय राजधानी के लिए क़ानून बनाने का अधिकार है और संविधान सभा का भी यही मत था कि दिल्ली केंद्र शासित राज्य रहे."

उन्होंने नेहरू, राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल और सी गोपालाचारी जैसे तमाम विभूतियों के बयानों का ज़िक्र करते हुए कहा कि ये सभी दिल्ली को केंद्र शासित राज्य ही चाहते थे.

अमित शाह ने ये भी कहा कि दिल्ली में विधासभा हुआ करती थी लेकिन 1956 में इसे वापस ले लिया गया और उस समय नेहरू ने इस क़दम के ‘बदली हुई परिस्थितियों’ के नाम पर उचित ठहराया था.

लोकसभा में आम आदमी पार्टी के अकेले सांसद सुशील कुमार रिंकू ने इस विधेयक की कॉपी सदन में फ़ाड़ दी और इस वजह से उन्हें सदन से पूरे मॉनसून सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया.

ऐसे में सदन में आम आदमी पार्टी की ग़ैर मौजूदगी में विपक्ष की बाक़ी पार्टियों ने सरकार के बिल का कड़ा विरोध करते हुए इसे देश की संघीय संरचना पर हमला बताया और राज्यों के हक़ को ख़त्म करने वाला बताया.

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अमित शाह ने केजरीवाल पर केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के बीच लगातार गतिरोध बनाए रखने का आरोप लगाया और कहा कि दोनों ही सरकारों के बीच शक्तियों का विभाजन 1993 से चला आ रहा है और केंद्र और दिल्ली में अलग-अलग पार्टियों की सरकार होने के बावजूद कामकाज सहजता से चलता रहा.

उन्होंने कहा, “इससे पहले कोई भी सरकार दूसरी सरकार की शक्तियों को हड़पना नहीं चाहती थी. ना कांग्रेस और ना ही बीजेपी ने आपस में लड़ाई की लेकिन साल 2015 में स्थिति बदल गई. जब से आम आदमी पार्टी सत्ता में आई लोगों की सेवा करने के बजाय इनका उद्देश्य केंद्र सरकार से लड़ना ही रहा है.”

गृहमंत्री ने विपक्षी पार्टियों पर निशाना साधते हुए कहा, “ये एकता केजरीवाल को गठबंधन में बनाए रखने के लिए दिखाई जा रही है. आप लोग पीएम नरेंद्र मोदी को हरा नहीं पाएंगे, बीजेपी को अपने दम पर फिर बहुमत मिलेगा. जैसे ही आप केजरीवाल की शर्त मानते हुए आज इस बिल के ख़िलाफ़ वोट करेंगे वो आपको फिर छोड़ देंगे."

"जनता आपको देख रही है और इस तरह लोगों का यक़ीन नहीं जीत सकते आप, यूपीए ने अपने 10 साल में क्या किया उसे देख कर ही जनता तय करेगी. यूपीए सरकार में 12 लाख करोड़ का घोटाला हुआ था और आप फिर आम आदमी पार्टी के भ्रष्टाचार को समर्थन दे रहे हैं वो भी सिर्फ़ गठबंधन के लिए ये भी जनता देख रही है.”

केजरीवाल

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केजरीवाल और विपक्ष ने क्या कहा

लोकसभा में इस विधेयक के पारित होने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने गुरुवार को बीजेपी पर दिल्ली के लोगों की पीठ में छूरा घोंपने का आरोप लगाया.

उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “हर बार बीजेपी ने वादा किया कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देंगे. 2014 में मोदी जी ने ख़ुद कहा कि प्रधानमंत्री बनने पर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देंगे, लेकिन आज इन लोगों ने दिल्ली वालों की पीठ में छुरा घोंप दिया. आगे से मोदी जी की किसी बात पे विश्वास मत करना.”

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा, “आज लोकसभा में अमित शाह जी को दिल्ली वालों के अधिकार छीनने वाले बिल पर बोलते सुना. बिल का समर्थन करने के लिए उनके पास एक भी वाजिब तर्क नहीं है. बस इधर उधर की फ़ालतू बातें कर रहे थे. वो भी जानते हैं वो ग़लत कर रहे हैं. ये बिल दिल्ली के लोगों को ग़ुलाम बनाने वाला बिल है. उन्हें बेबस और लाचार बनाने वाला बिल है . इंडिया ऐसा कभी नहीं होने देगा.”

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अधीर रंजन चौधरी

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कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा, “यह दिल्ली है, दिल्ली हमारा दिल है. दिल्ली के साथ बार-बार छेड़छाड़ क्यों की जा रही है? संघीय ढांचे के साथ इसी तरह छेड़छाड़ होती रही तो हिंदुस्तान तबाह हो जाएगा. इस अध्यादेश को लाने में जल्दबाजी क्यों की गई? अध्यादेश लाने की क्या जरूरत थी? नई व्यवस्था में दिल्ली के मुख्यमंत्री की शक्तियां सीमित कर दी जाएंगी.”

जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा, “ 2015 में दिल्ली में ऐसी सरकार बनी जिसका काम ही नहीं है सेवा करना, अरे भाई, दिल्‍ली सरकार जनता की सेवा कर रही है या नहीं, यह फैसला करने वाले आप कौन होते हैं. आपको यह हक किसने दिया, यह हक तो सिर्फ़ दिल्ली की जनता को है.

ललन सिंह ने कहा कि दिल्ली में लोकतांत्रिक बहुमत से चुनी हुई सरकार का गला घोंटकर पिछले दरवाजे से दिल्लीवासियों पर शासन करने के उद्देश्य से यह अध्यादेश केंद्र सरकार ने लाया है.

केजरीवाल

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राज्यसभा में क्या होगा?

माना जा रहा है कि सोमवार को इस विधेयक को राज्यसभा में पेश किया जाएगा.

संख्याबल के आधार पर राज्यसभा में एनडीए काफ़ी मज़बूत स्थिति में नज़र आ रही है ऐसे में बिल को इस सदन में पास कराना मोदी सरकार के लिए कोई बड़ी चुनौती नहीं है.

जगनमोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस और नवीन पटनायक के बीजू जनता दल ने इस बिल पर मोदी सरकार के समर्थन के बाद अब विपक्ष की उम्मीद पर पानी फिरता नज़र आ रहा है.

इस समय राज्यसभा में 238 सदस्य हैं, सात सीटें खाली हैं.

विधेयक को पारित कराने के लिए सदन के कुल संख्या बल का आधा समर्थन होना चाहिए, यानी 119 वोट. विपक्ष के खेमे में अगर भारत राष्ट्र समिति यानी बीआरएस को भी जोड़ लें तो उनके पास 110 से भी कम सांसदों का समर्थन है.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इस विधेयक के ख़िलाफ़ समर्थन जुटाने के लिए बीते दिनों अलग-अलग पार्टियों के नेताओं से मिल रहे थे.

लेकिन आँकड़ों का जो समीकरण अब बनता दिख रहा है वो केजरीवाल सरकार के पक्ष में नहीं जा रहा है.

  • राज्यसभा में बीजेपी के पास 92 सांसद हैं, जिनमें पांच नॉमिनेटेड सदस्य हैं. एनडीए के पास कुल 103 सांसद हैं.
  • एआईएडीएमके का पास चार सांसद हैं.
  • आरपीआई (अठावले), असम गण परिषद, पट्टाली मक्कल काची, तमिल मनीला कांग्रेस (मूपनार), नेशनल पीपल्स पार्टी, मिज़ो नेशनल फ्रंट, यूनाइटेड पीपल्स पार्टी (लिबरल) के पास 1-1 सांसद हैं.
  • बीजेडी और वाईएसआर के पास पास 9-9 सदस्य हैं यानी 18 सदस्यों का समर्थन बीजेपी के पास है.
  • मोदी सरकार के पास अब तक के गणित के हिसाब से 121 का संख्या बल है.
  • बीएसपी, टीडीपी और जेडीएस जिनके पास एक-एक सदस्य हैं वो भी सरकार को समर्थन दे सकते हैं.
राज्यसभा के समीकरण
राज्यसभा के समीकरण

विपक्ष के साथ कौन

  • अब बात करते हैं विपक्ष के पास मौजूद संख्या बल की. 26 पार्टियों के गठबंधन वाले इंडिया के कुल 98 सदस्य सदन में हैं. अकेले कांग्रेस के पास 31 सांसद हैं.
  • आम आदमी पार्टी के पास 10 और डीएमके पा पास 10 सदस्य हैं.
  • टीएमसी के पास 13 और आरजेडी के पास 6 सदस्य हैं.
  • सीपीआई(एम) और जेडीयू के पास 5-5 सदस्य हैं.
  • एनसीपी के पास चार और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के पास तीन सांसद हैं.
  • जेएमएम और सीपीआई के पास 2-2 सांसद हैं.
  • आईयूएमएल, केरल कांग्रेस (एम), आरएलडी और एमडीएमके के पास 1-1 सांसद हैं.
  • बीआरएस इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है लेकिन अगर वो भी अरविंद केजरीवाल के समर्थन में वोट देता है तो 7 वोट विपक्ष को और मिल सकते हैं. यानी अधिक से अधिक विपक्ष के पास 105 सदस्यों का समर्थन ही हो सकता है.

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