दिल्ली सर्विस बिल पर राज्यसभा में केजरीवाल का फँसा पेच, जानिए कौन साथ, कौन ख़िलाफ़

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केंद्र सरकार ने मंगलवार को लोकसभा में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (संशोधन) विधेयक पेश किया.
इस विधेयक के ज़रिए मोदी सरकार उस अध्यादेश को क़ानून बनाना चाहती है, जिसमें दिल्ली के उपराज्यपाल के पास दिल्ली में अधिकारियों की पोस्टिंग या ट्रांसफ़र का आखिरी अधिकार होगा.
विपक्ष को उम्मीद थी कि इस विधेयक को लोकसभा में ना सही तो राज्यसभा में पूरा दम दिखा कर पारित होने से रोका जाएगा.
लेकिन मंगलवार को जब जगनमोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस और नवीन पटनायक के बीजू जनता दल ने इस बिल पर मोदी सरकार के समर्थन करने का एलान किया तो अब विपक्ष की उम्मीद पर पानी फिरता नज़र आ रहा है.
वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और बीजेडी के पास राज्यसभा में नौ-नौ सांसद हैं. इनके समर्थन के साथ बीजेपी विधेयक को राज्यसभा में पास करने के लिए बहुमत का आंकड़ा आराम से हासिल कर लेगी.
इस समय राज्यसभा में 238 सदस्य हैं, सात सीटें खाली हैं. विधेयक को पारित कराने के लिए सदन के कुल संख्या बल का आधा समर्थन होना चाहिए, यानी 119 वोट. विपक्ष के खेमे में अगर भारत राष्ट्र समिति यानी बीआरएस को भी जोड़ लें तो उनके पास 110 से भी कम सांसदों का समर्थन है.

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राज्यसभा में केजरीवाल के साथ और ख़िलाफ़ में कौन-कौन?
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इस विधेयक के ख़िलाफ़ समर्थन जुटाने के लिए बीते दिनों अलग-अलग पार्टियों के नेताओं से मिल रहे थे.
लेकिन आँकड़ों का जो समीकरण अब बनता दिख रहा है वो केजरीवाल सरकार के पक्ष में नहीं जा रहा है.
- राज्यसभा में बीजेपी के पास 92 सांसद हैं, जिनमें पांच नॉमिनेटेड सदस्य हैं. एनडीए के पास कुल 103 सांसद हैं.
- एआईएडीएमके का पास चार सांसद हैं.
- आरपीआई (अठावले), असम गण परिषद, पट्टाली मक्कल काची, तमिल मनीला कांग्रेस (मूपनार), नेशनल पीपल्स पार्टी, मिज़ो नेशनल फ्रंट, यूनाइटेड पीपल्स पार्टी (लिबरल) के पास 1-1 सांसद हैं.
- बीजेडी और वाईएसआर के पास पास 9-9 सदस्य हैं यानी 18 सदस्यों का समर्थन बीजेपी के पास है.
- मोदी सरकार के पास अब तक के गणित के हिसाब से 121 का संख्या बल है.
- बीएसपी, टीडीपी और जेडीएस जिनके पास एक-एक सदस्य हैं वो भी सरकार को समर्थन दे सकते हैं.


विपक्ष के साथ कौन
- अब बात करते हैं विपक्ष के पास मौजूद संख्या बल की. 26 पार्टियों के गठबंधन वाले इंडिया के कुल 98 सदस्य सदन में हैं. अकेले कांग्रेस के पास 31 सांसद हैं.
- आम आदमी पार्टी के पास 10 और डीएमके पा पास 10 सदस्य हैं.
- टीएमसी के पास 13 और आरजेडी के पास 6 सदस्य हैं.
- सीपीआई(एम) और जेडीयू के पास 5-5 सदस्य हैं.
- एनसीपी के पास चार और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के पास तीन सांसद हैं.
- जेएमएम और सीपीआई के पास 2-2 सांसद हैं.
- आईयूएमएल, केरल कांग्रेस (एम), आरएलडी और एमडीएमके के पास 1-1 सांसद हैं.
- बीआरएस इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है लेकिन अगर वो भी अरविंद केजरीवाल के समर्थन में वोट देता है तो 7 वोट विपक्ष को और मिल सकते हैं. यानी अधिक से अधिक विपक्ष के पास 105 सदस्यों का समर्थन ही हो सकता है.

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आम आदमी पार्टी का दावा
मंगलवार को जब गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (संशोधन) विधेयक पेश किया तो विपक्ष ने इसे ‘लोकतंत्र की हत्या’ बताया. इसके जवाब में अमित शाह ने पलटवार करते हुए कहा कि ये आरोप राजनीति से प्रेरित हैं.
आम आदमी पार्टी का समर्थन करते हुए लोकसभा में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि यह विधेयक दिल्ली सरकार के अधिकारों का ‘अपमानजनक उल्लंघन’ है. तृणमूल सदस्य सौगत रॉय ने कहा कि यह विधेयक केवल सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के लिए लाया गया है.
अमित शाह ने सदन में कहा, “ हमारा संविधान संसद को दिल्ली के लिए क़ानून बनाने की अनुमति देता है. इस विधेयक के किसी भी विरोध का कोई संवैधानिक आधार नहीं है और यह राजनीति से प्रेरित है. विपक्ष के पास संसदीय प्रक्रिया का हवाला देने का कोई कारण नहीं है.”
इस बिल के लोकसभा में पेश होने के बाद आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा, “विपक्ष के पास बिल को राज्यसभा में रोकने के लिए पर्याप्त संख्या है.”
हालांकि आम आदमी पार्टी का ये दावा संख्या के आधार पर मज़बूत नज़र नहीं आ रहा है.

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के उलट मोदी सरकार का अध्यादेश
इस साल 11 मई को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने दिल्ली में अधिकारियों के ट्रांसफ़र और पोस्टिंग के अधिकार को लेकर केजरीवाल सरकार के समर्थन में फ़ैसला सुनाया था.
कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि ज़मीन, पुलिस और सार्वजनिक आदेश को छोड़कर अधिकारियों के ट्रांसफ़र और पोस्टिंग का अधिकार समेत सभी मामलों पर दिल्ली सरकार का पूरा अधिकार होना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एम आर शाह, जस्टिस कृष्ण मुरारी, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस पीएस नरसिम्हा शामिल थे.
हफ़्ते भर बाद, केंद्र सरकार ने 19 मई को राष्ट्रीय राजधानी से संबंधित संविधान के विशेष प्रावधान अनुच्छेद- 239एए के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए दिल्ली में अधिकारियों की ट्रांसफ़र और पोस्टिंग को लेकर एक अध्यादेश जारी किया था.
अध्यादेश के ज़रिए सेवाओं के नियंत्रण को लेकर आख़िरी फैसला लेने का अधिकार उपराज्यपाल को वापस दे दिया गया था.
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (संशोधन) अध्यादेश, 2023 के तहत दिल्ली में 'दानिक्स' कैडर के 'ग्रपु-ए' अधिकारियों के तबादले और उनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए 'राष्ट्रीय राजधानी लोक सेवा प्राधिकरण' गठित किया जाएगा.
दानिक्स का मतलब है दिल्ली, अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप, दमन एंड द्वीप और दादरा एंड नागर हवेली सिविल सर्विसेस.
प्राधिकरण में दिल्ली के मुख्यमंत्री, दिल्ली के मुख्य सचिव और दिल्ली के गृह प्रधान सचिव समेत कुल तीन सदस्य होंगे. मुख्यमंत्री को इस प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया गया है लेकिन अधिकारियों के तबादले और नियुक्ति से जुड़े फैसले लेने का हक़ तो होगा लेकिन आख़िरी मुहर उपराज्यपाल की होगी.
इसके बाद दिल्ली सरकार अध्यादेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई.
कोर्ट में दायर याचिका ने दिल्ली सरकार ने कहा था कि केंद्र सरकार का अध्यादेश असंवैधानिक है और अध्यादेश पर तुरंत रोक लगाने की मांग की गई थी.
सुनवाई के दौरान अदालत ने अध्यादेश पर तुरंत रोक लगाने से इनकार कर दिया था लेकिन केंद्र सरकार और उपराज्यपाल को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था.
ये मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए पहुंचा है.
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