दिल्ली अध्यादेश: सुप्रीम कोर्ट में किस मोड़ पर है केजरीवाल सरकार और केंद्र की लड़ाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल

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    • Author, अंशुल सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दिल्ली में अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग दिल्ली सरकार करेगी या केंद्र सरकार, इस सवाल का जवाब अब सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ तय करेगी.

सु्प्रीम कोर्ट में दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार की याचिका पर सुनवाई कर रही तीन जजों की बेंच में चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल थे.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, बेंच ने अपने दस पन्नों के आदेश में अनुच्छेद 239 एए (7) के तहत संविधान पीठ के सामने दो क़ानूनी सवाल रखे हैं.

  • पहला- दिल्ली के लिए क़ानून बनाने की संसद की शक्तियों की सीमाएं क्या हैं?
  • दूसरा - क्या संसद अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए प्रशासनिक सेवाओं पर नियंत्रण वापस लेने के संबंध में क़ानून बनाकर दिल्ली सरकार के लिए 'शासन के संवैधानिक सिद्धांतों को निरस्त' कर सकती है?

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के प्रशासन को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच लंबी क़ानूनी लड़ाई को ख़त्म करने की ज़रूरत है.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़

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अदालत ने क्या कहा?

चीफ़ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने दस पन्नों के अपने आदेश में संविधान पीठ के लिए दो प्रारंभिक मुद्दे उठाए हैं.

पहले मुद्दे का संबंध अध्यादेश की धारा-3ए को शामिल किए जाने से है. धारा-3ए नेशनल कैपिटल टेरिटेरी ऑफ़ दिल्ली (एनसीटीडी) की विधायी शक्तियों से राज्य सूची की प्रविष्टि 41 (सेवाएं) को हटाती है. प्रविष्टि 41 को हटाए जाने से दिल्ली सरकार के पास सेवाओं पर कार्यकारी शक्ति नहीं रह जाती है.

दूसरा मुद्दा है कि क्या कोई क़ानून सेवाओं पर दिल्ली सरकार की कार्यकारी शक्तियों को पूरी तरह से ख़त्म कर सकता है? क्योंकि अध्यादेश में कहा गया है कि प्रविष्टि 41 के तहत सेवाओं का पहलू भी धारा-3ए की वैधता के साथ जुड़ा हुआ है.

बीते गुरुवार को सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली सरकार की इस दलील को ख़ारिज कर दिया कि मामले को संविधान पीठ के पास भेजने की ज़रूरत नहीं है.

दिल्ली सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि मामले को संविधान पीठ को सौंपने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि मामले का फ़ैसला तीन जजों की बेंच कर सकती है.

अदालत का कहना था कि इसके लंबित रहने के दौरान पूरी व्यवस्था पंगु बन जाएगी.

दिल्ली सरकार के अलावा केंद्र सरकार ने भी दिल्ली में सेवाओं के नियंत्रण पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दायर की थी.

एक तरफ़ सुप्रीम कोर्ट ने अध्यादेश का मामला संविधान पीठ के पास भेज दिया है तो दूसरी तरफ़ केंद्र सरकार अध्यादेश को संसद में पेश करने जा रही है.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच चल रही लड़ाई ख़त्म हो जाएगी?

क्या सुप्रीम कोर्ट अध्यादेश को निरस्त कर सकता है?

लंबी सुनवाई के बाद और संविधान पीठ के भारी भरकम फ़ैसलों के बावजूद अधिकारों पर विवाद का निर्णायक समाधान क्यों नहीं हो रहा है?

इन सवालों का जवाब जानने के लिए बीबीसी ने क़ानून के जानकारों से बात की है.

विराग गुप्ता

क्या सुप्रीम कोर्ट अध्यादेश निरस्त कर सकता है?

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अदालत से अध्यादेश निरस्त होने की बात पर सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता का कहना है कि ऐसा तभी हो सकता है जब अध्यादेश को संविधान के बुनियादी ढांचे के ख़िलाफ़ माना जाए.

बकौल विराग गुप्ता अध्यादेश में दो बातें ऐसी लिखी गई हैं जिससे इसे जल्द निरस्त करवाने के आसार नज़र नहीं आते हैं.

वो कहते हैं, "पहली बात है कि दिल्ली सीमित अर्थों में केंद्र शासित प्रदेश भले हो लेकिन व्यापक तौर पर देश की राजधानी है. दिल्ली में सभी संवैधानिक संस्थानों के साथ सुप्रीम कोर्ट और विदेशी दूतावास मौजूद हैं. इसलिए पूर्ण राज्य को लेकर दिया गया संविधान पीठ का फ़ैसला सवालों में है."

"दूसरी बात है कि संसद ने बालाकृष्णन समिति की सिफारिशों के आधार पर साल 1991 में दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी (एनसीटी) क़ानून बनाया था. बालाकृष्णन समिति ने भी सेवाओं के नियंत्रण को केंद्र सरकार के अधीन रखने की सिफारिश की थी."

हिमाचल प्रदेश नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर चंचल कुमार सिंह मानते हैं कि अदालत में दिल्ली अध्यादेश निरस्त भी हो सकता है.

प्रोफ़ेसर चंचल कुमार सिंह कहते हैं, "संविधान के अनुच्छेद 123 एवं 239 एए(7) में केंद्र सरकार को विशेष परिस्थितियों में अध्यादेश लाने का अधिकार है लेकिन इसके आधार पर संविधान के अनुच्छेद 239 एए को सुचारू रूप से कार्यान्वित किया जाए न कि उसे पूरी तरह से बदल दिया जाए."

"कुल मिलाकर आप अनुच्छेद 239 एए में संशोधन तो कर सकते हैं लेकिन उसका आधार नहीं बदल सकते हैं. अध्यादेश के मामले में केंद्र सरकार ने अनुच्छेड़ 239 एए के आधार से छेड़छेाड़ की कोशिश की है."

प्रोफ़ेसर कुमार का कहना है कि ये अध्यादेश लाकर केंद्र सरकार ने एक तरीके से सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को ख़ारिज ही कर दिया है.

प्रोफ़ेसर चंचल कुमार सिंह

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के लिए फ़िलहाल पांच जजों की संविधान पीठ का गठन किया है.

इसके आगे के संभावित पहलुओं को लेकर वकील विराग गुप्ता कुछ परिस्थितियों का ज़िक्र करते हैं.

पहली परिस्थिति- सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के अनेक फ़ैसलों के बावजूद दिल्ली में सत्ता की जंग का झगड़ा नहीं सुलझ पा रहा है. 1997 में नौ जजों ने एनडीएमसी मामले में कहा था कि दिल्ली सीमित अर्थों में ही राजधानी है. इसलिए दिल्ली सरकार के अधिकारों में कमी के लिए सरकार अगर संसद के माध्यम से क़ानूनी बदलाव करती है तो वह अनैतिक हो सकता है, लेकिन उसे सुप्रीम कोर्ट से ख़ारिज करवाना मुश्किल है. अगले लोकसभा चुनाव तक यह मामला अगर नहीं सुलझता तो फिर निर्णायक फै़सले के लिए नौ या ज्यादा जजों की बेंच का गठन करना पड़ सकता है.

दूसरी- सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को संविधान पीठ में भेजे जाने के साथ यह भी सवाल किया था कि ऐसे मामलों पर अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में सीधी सुनवाई कितनी सही है. फिलहाल इस मामले में दो पहलू उभरते हैं पहला, क्या सरकार के अध्यादेश को संसद से मंजूरी मिलेगी. दूसरा, क्या संसद को दरकिनार करके सरकार नए तरीके से अध्यादेश का नवीनीकरण कर सकती है.

तीसरी- अधिकारियों के ट्रांसफर पोस्टिंग के बारे में सिविल सेवा बोर्ड के गठन के लिए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था. यह व्यवस्था दिल्ली में पहले से है. उस बोर्ड के गठन के स्वरूप और अधिकारों के बारे में संसद के पास क़ानून बनाने की शक्ति है और इससे संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं होता. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फै़सले के बाद सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से जो क़ानूनी बदलाव किए हैं उसे दिल्ली सरकार अदालत की अवमानना मामला बताने की कोशिश कर रही है.

वहीं प्रोफ़ेसर चंचल कुमार सिंह का कहना है कि अब संविधान पीठ को संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर अध्यादेश की वैधता की जांच करनी है.

वो कहते हैं, "अध्यादेश को अब चालू मॉनसूत्र सत्र के छह सप्ताह के भीतर पास होना है. अगर इस अवधि में अध्यादेश दोनों सदनों में पास नहीं हुआ तो यह खुद ही निरस्त हो जाएगा. छह हफ़्ते बहुत ज्यादा टाइम नहीं है."

"हो सकता है कि ये अध्यादेश दोनों सदनों से पारित होकर क़ानून बन जाए और सुप्रीम कोर्ट में इसके फ़ैसले को लेकर ज्यादा समय लग जाए लेकिन यह कानून भी वर्तमान याचिका के आधार पर अंडर चैलेंज रहेगा."

चंचल कुमार सिंह कहते हैं कि फ़िलहाल तो अध्यादेश को राज्यसभा में बहुमत मिलना मुश्किल दिखाई दे रहा है. अगर राज्यसभा में बहुमत नहीं मिला तो अध्यादेश कोर्ट के फ़ैसले से पहले ही निरस्त हो जाएगा.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल

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क्या है पूरा मामला?

इस साल के मई महीने की 11 तारीख़ को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने दिल्ली में अधिकारियों के ट्रांसफ़र और पोस्टिंग के अधिकार को लेकर अहम फ़ैसला सुनाया था.

कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि भूमि, पुलिस और सार्वजनिक आदेश को छोड़कर अधिकारियों के ट्रांसफ़र और पोस्टिंग का अधिकार समेत सभी मामलों पर दिल्ली सरकार का पूरा अधिकार होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एम आर शाह, जस्टिस कृष्ण मुरारी, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस पीएस नरसिम्हा शामिल थे.

इस फ़ैसले पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि ये 'लोकतंत्र की जीत है, सत्य की जीत है.'

हफ़्ते भर बाद केंद्र सरकार ने 19 मई को राष्ट्रीय राजधानी से संबंधित संविधान के विशेष प्रावधान अनुच्छेद- 239एए के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए दिल्ली में अधिकारियों की ट्रांसफ़र और पोस्टिंग को लेकर एक अध्यादेश जारी किया था.

अध्यादेश के ज़रिए सेवाओं के नियंत्रण को लेकर आख़िरी फैसला लेने का अधिकार उपराज्यपाल को वापस दे दिया गया था.

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (संशोधन) अध्यादेश, 2023 के तहत दिल्ली में 'दानिक्स' कैडर के 'ग्रपु-ए' अधिकारियों के तबादले और उनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए 'राष्ट्रीय राजधानी लोक सेवा प्राधिकरण' गठित किया जाएगा.

दानिक्स का मतलब है दिल्ली, अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप, दमन एंड द्वीप और दादरा एंड नागर हवेली सिविल सर्विसेस.

प्राधिकरण में दिल्ली के मुख्यमंत्री, दिल्ली के मुख्य सचिव और दिल्ली के गृह प्रधान सचिव समेत कुल तीन सदस्य होंगे. मुख्यमंत्री को इस प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया गया है लेकिन अधिकारियों के तबादले और नियुक्ति से जुड़े फैसले लेने का हक़ तो होगा लेकिन आख़िरी मुहर उपराज्यपाल की होगी.

इसके बाद दिल्ली सरकार अध्यादेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई. कोर्ट में दायर याचिका ने दिल्ली सरकार ने कहा था कि केंद्र सरकार का अध्यादेश असंवैधानिक है और अध्यादेश पर तुरंत रोक लगाने की मांग की गई थी.

सुनवाई के दौरान अदालत ने अध्यादेश पर तुरंत रोक लगाने से इनकार कर दिया था लेकिन केंद्र सरकार और उपराज्यपाल को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था.

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