केजरीवाल सरकार दिल्ली पर पास नए क़ानून को लेकर अब क्या कर सकती है?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
भारत की संसद में बुधवार को दिल्ली पर एक संशोधन बिल पास हुआ है. दिल्ली की सत्ता पर काबिज़ आम आदमी पार्टी का आरोप है कि इस नए संशोधन बिल के बाद दिल्ली सरकार का मतलब होगा सिर्फ़ 'उप-राज्यपाल', चुनी हुई सरकार नहीं.
इस बिल को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष एक बार फिर आमने सामने हैं. दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार के साथ इस मुद्दे पर विपक्ष की 10 से ज़्यादा पार्टियां साथ थीं. लेकिन बिल को राज्यसभा में रोका नहीं जा सका.
बिल क्या है? इसका दिल्ली वालों पर क्या असर होगा? इसकी चर्चा से पहले दिल्ली से जुड़ी कुछ बुनियादी बातें हैं, जो जानना ज़रूरी है.
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दिल्ली क्या कभी राज्य था?
अब जब दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार 'दिल्ली का बॉस कौन' के सवाल पर आपस में लड़ रहे हैं, तो ये और भी ज़रूरी हो जाता है कि दिल्ली के इतिहास को समझ लिया जाए.
बात साल 1952 की है, जब दिल्ली एक राज्य था. उसी साल 48 विधानसभा सीटों के लिए यहाँ चुनाव हुए. उसके बाद साल 1956 में इसे केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया.
फिर साल 1991 में कुछ और बदलाव हुए और दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा तो नहीं मिला, लेकिन एक विशेष दर्जा मिला.
भारत के संविधान में 69वाँ संशोधन हुआ और दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का दर्जा मिला. इसके लिए जीएनसीटीडी एक्ट (GNCTD) 1991 बना.
इसके लिए संविधान में धारा 239 A A को जोड़ा गया, जिसमें यहाँ सरकार कैसे चलेगी, इसके बारे में विस्तृत जानकारी दी गई.
ये है दिल्ली के राज्य से केंद्र शासित प्रदेश और उसके बाद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र बनने की छोटी सी कहानी.

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संसद में इस बार नया क्या हुआ?
साल 1991 से लेकर 2013 तक कुछ मौक़ों को छोड़ कर कमोबेश सब कुछ ठीक चला. दिल्ली में कई मुख्यमंत्री चुन कर आए, कभी बीजेपी के, तो कभी कांग्रेस के नेता मुख्यमंत्री बने.
कई सरकारों ने पूर्ण राज्य का दर्जा देने के कई वादे किए, लेकिन दिल्ली में जीएनसीटीडी एक्ट के ज़रिए काम काज चलता गया. इसको अमल में लाने के लिए नए बिज़नेस रूल भी 1993 में बने.
अब केंद्र सरकार उसी 1991 जीएनसीटीडी एक्ट में संशोधन लेकर संसद में आई थी.
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद से एक नया बिल दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार (संशोधन) विधेयक, 2021 पेश किया, जो बुधवार को दोनों सदनों से पारित हो गया.
दिल्ली सरकार का आरोप है कि ये बिल दिल्ली के लेफ़्टिनेंट गवर्नर (एलजी) यानी उप-राज्यपाल को अधिक शक्तियाँ देता है. जबकि केंद्र सरकार का तर्क है कि ये संशोधन विधेयक 1991 अधिनियम में मौजूद विसंगतियों को दूर करता है.

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नए बिल में क्या है?
इसमें 1991 के पुराने अधिनियम के चार प्रावधानों में संशोधन की बात कही गई है.
यह बिल उप-राज्यपाल को कई विवेकाधीन शक्तियाँ देता है, जो दिल्ली के विधानसभा से पारित क़ानूनों के मामले में भी लागू होती हैं.
बिल यह सुनिश्चित करता है कि मंत्री परिषद (या दिल्ली कैबिनेट) के फ़ैसले लागू करने से पहले उप-राज्यपाल की राय के लिए उन्हें 'ज़रूरी मौक़ा दिया जाना चाहिए'.
इसका मतलब हुआ कि मंत्रिमंडल को कोई भी क़ानून लागू करने से पहले उप-राज्यपाल की 'राय' लेना ज़रूरी होगा. इससे पहले विधानसभा से क़ानून पास होने के बाद उप-राज्यपाल के पास भेजा जाता था.

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नए बिल से पहले दिल्ली में कैसे चलता था कामकाज
संविधान के जानकार प्रोफ़ेसर चंचल कुमार कहते हैं, "संविधान की धारा 239 AA का उद्देश्य था, दिल्ली में चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार को कुछ पॉवर देना. इसलिए कैबिनेट का प्रावधान किया गया और गवर्नर को लेफ़्टिनेंट गवर्नर नाम दिया गया. कैबिनेट और एलजी- दोनों के बीच कामकाज का बँटवारा भी किया गया."
"ज़मीन, पब्लिक ऑर्डर और क़ानून व्यवस्था का अधिकार उप-राज्यपाल को दिया गया और बाक़ी दूसरे विषयों का कामकाज दिल्ली सरकार के ज़िम्मे सौंपा गया, जिसमें उप-राज्यपाल को बीच की कड़ी की ज़िम्मेदारी दी गई."
"संविधान की धारा 239 AA में ये प्रावधान भी है कि जब दिल्ली सरकार और एलजी के बीच किसी मुद्दे पर विवाद हो, तो राष्ट्रपति का निर्णय ही मान्य होगा. और इसको लागू करने के लिए संसद क़ानून बना सकती है."
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नए बिल की ज़रूरत क्यों पड़ी?
दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार (संशोधन) विधेयक, 2021 पेश करते हुए केंद्रीय गृह राज्यमंत्री ने कहा, "1991 एक्ट में कुछ कमियाँ थीं और कुछ स्पष्टीकरण की ज़रूरत थीं, जिसे इस संशोधन विधेयक से दूर करने की कोशिश की जा रही है."
"चूँकि इसी संसद ने 1991 का एक्ट पास किया था, इस वजह से संसद को इसमें बदलाव का अधिकार है. नए विधेयक में प्रस्तावित संशोधन, हाल में दिए गए कोर्ट के निर्णयों के मुताबिक़ हैं."
यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि दिल्ली में वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था तीन क़ानूनों पर आधारित है. संविधान की धारा 239 AA, जीएनसीटीडी एक्ट 1991 और ट्रांजैक्शन ऑफ़ बिज़नेस ऑफ़ जीएनसीटीडी रूल्स 1993.

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दिल्ली का बॉस कौन - इस पर कोर्ट ने क्या कहा है?
केंद्रीय गृह राज्यमंत्री के बयान के मुताबिक़ दिसंबर 2013 तक दिल्ली और केंद्र के बीच कामकाज में इन क़ानूनों के आधार पर प्रशासनिक कामकाज में कोई दिक़्क़त नहीं आई.
लेकिन दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार आने के बाद एलजी के साथ कामकाज को लेकर तकरार बढ़ी और इसे परिभाषित करने के लिए केजरीवाल सरकार कोर्ट पहुँच गई.
पाँच सदस्यों की संवैधानिक पीठ का फैसला साल 2018 में आया, जिसमें दिल्ली की चुनी हुई सरकार को ही क़ानून बनाने का अधिकार दिया है, तीन अपवाद (ज़मीन, पब्लिक ऑर्डर और क़ानून व्यवस्था) छोड़कर.
केंद्र सरकार को लगा कि पुराने क़ानून में संशोधन करने की ज़रूरत है, ताकि इसकी तकनीकी और क़ानूनी अस्पष्टताओं को दूर किया जा सके.

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नए क़ानून पर दिल्ली सरकार का पक्ष
आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने राज्यसभा में बिल पर चर्चा के दौरान केंद्र सरकार के बिल को असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक करार दिया है.
उन्होंने राज्यसभा में कहा, "मैं भारत के संविधान को बचाने के लिए इस सदन के एक-एक शख़्स से न्याय माँगने के लिए खड़ा हुआ हूँ. देश का संविधान रहेगा, तो सत्ता पक्ष रहेगा, विपक्ष रहेगा और देश रहेगा. संविधान की धारा 239 AA क्लॉज 6 कहता है कि दिल्ली की चुनी हुई मंत्री परिषद, दिल्ली की विधानसभा के प्रति उत्तरदायी और जवाबदेह होगी. संविधान में जो लिखा है, उसे सरकार एक सिंपल संशोधन से परिवर्तित करना चाहती है. दिल्ली सरकार को जो अधिकार दिए गए थे, वो संविधान संशोधन के आधार पर दिए गए थे. केंद्र सरकार का बिल असंवैधानिक है अलोकतांत्रिक है."
संजय सिंह का कहना है कि केंद्र सरकार केवल इसलिए ये संशोधन लेकर आ रही है, क्योंकि बीजेपी दो बार दिल्ली में चुनाव हारी है. एक बार आम आदमी पार्टी को 70 में से 67 सीटें मिलीं और दूसरी बार 62 सीटें मिलीं.
यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि विधानसभा चुनाव के उलट, दिल्ली में आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने के बाद दो लोकसभा चुनाव हुए, दोनों में बीजेपी ने सातों सीटों पर जीत दर्ज की.
बीबीसी ने उनसे पूछा कि क़ानून बनाना तो संसद का काम है, तो फिर बिल असंवैधानिक कैसे हुआ?
इस पर उन्होंने कहा, "संविधान में कोई संशोधन करना होता है तो उसके लिए संविधान संशोधन बिल लाने की ज़रूरत होती है. साधारण संशोधन बिल से ये नहीं किया जा सकता. संविधान संशोधन बिल को पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की ज़रूरत होती है. इसलिए ये बिल अपने आप में असंवैधानिक था."
यह पूछे जाने पर कि केजरीवाल सरकार का अगला क़दम क्या होगा? उन्होंने कहा, "आम आदमी पार्टी सड़क से संसद तक लड़कर ही पहुँची है. हम सभी विकल्पों पर विचार कर रहें हैं."
दरअसल पार्टी को अगला क़दम उठाने के लिए नोटिफिकेशन का इंतज़ार करना होगा.

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नए बिल पर संविधान क्या कहता है?
लेकिन आम आदमी पार्टी के इन आरोपों में कितना दम है?
देश के जाने माने संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं, "संविधान संशोधन पर संशोधन बिल लाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होता है. भारत के संविधान के मुताबिक़ क़ानून बनाने का अधिकार संसद के पास है. संसद संविधान के दायरे में रहते हुए उसमें संशोधन कर सकती है. जबकि सुप्रीम कोर्ट क़ानून को और संविधान को परिभाषित कर सकता है."
सुभाष कश्यप इसके लिए उदाहरण देते हुए कहते हैं, "'राइट टू प्रॉपर्टी' का मूलभूत अधिकार भी संसद में संशोधन लाकर ही मूलभूत अधिकारों की सूची से हटाया गया था."
वो आगे कहते हैं कि जहाँ तक क़ानून बनाने के अधिकार की बात है, तो राज्य सूची में दिए गए विषयों पर राज्य क़ानून बनाने का अधिकार रखती है. लेकिन दिल्ली के मामले में राज्य के विषयों पर भी केंद्र क़ानून बना सकता है और किसी विषय पर अगर दोनों क़ानून बनाते हैं, तो केंद्र का क़ानून ही माना जाएगा.
दूसरे संविधान विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर चंचल कुमार कहते हैं, "आम आदमी पार्टी की ये बात सही है कि संविधान संशोधन से बने क़ानून में बदलाव के लिए संविधान संशोधन बिल ही लाना होगा."
"2018 में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 239 AA को परिभाषित करते हुए कहा था कि हमें इस धारा इसी उद्देश्य से परिभाषित करना है कि लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी हुई सरकार के अधिकार सुनिश्चित रहें."
"सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के आधार पर देखें तो नए संशोधन बिल पर सवाल उठाए जा सकते हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने किसी क़ानून को एक तरीक़े से परिभाषित कर दिया, तो संसद उस पर क़ानून नहीं बना सकती."
"दोनों अलग अलग बातें हैं. संसद को क़ानून बनाने का अधिकार संविधान से मिलता है, लेकिन वो क़ानून कितना संविधान संगत है, ये तय करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट का है."

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दिल्ली सरकार के पास क्या हैं विकल्प?
प्रोफ़ेसर चंचल कुमार की बातों से साफ़ है कि दिल्ली सरकार इस क़ानून को कोर्ट में चुनौती दे सकती है.
आम आदमी पार्टी की तरफ़ से ऐसे संकेत ख़ुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी ट्वीट कर दे चुके हैं.
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प्रोफ़ेसर चंचल कुमार कहते हैं, "अगर केजरीवाल सरकार कोर्ट जाने का मन बनाती है तो ये देखना ज़रूरी होगा कि इस फ़ैसले को चुनौती किस आधार पर देते हैं. अगर 2018 के फ़ैसले को आधार बना कर देते हैं, तो संविधान पीठ में ही इसकी सुनवाई होगी. क्योंकि पिछला फ़ैसला संवैधानिक पीठ का था."
सुभाष कश्यप कहते हैं दिल्ली सरकार के पास राजनीतिक विकल्प हैं. वो केवल राजनीतिक विरोध कर सकती है और इसका मुद्दा बना सकती है.
संविधान के आधार पर इस नए क़ानून का विरोध नहीं किया जा सकता और ना ही आम आदमी पार्टी की सरकार को ऐसा करना चाहिए.
वो कहते हैं कि परिभाषा के मुताबिक़ ही दिल्ली केंद्र द्वारा शासित प्रदेश है. हर केंद्र शासित प्रदेश में राष्ट्रपति का शासन चलता है, जो उप-राज्यपाल के सहारे शासन चलाते हैं. दिल्ली के मामले में यही मूल बात है.
अगर केजरीवाल सरकार कोर्ट जाने का मन बनाती है, तो वैसे तो सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हो सकती है. लेकिन 2018 के संवैधानिक पीठ के फ़ैसले को पटलने की बात, तो सुनवाई बड़ी बेंच को ही करनी होगी.
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