एलजी को ज़्यादा पावर देने वाला बिल: केजरीवाल ने कहा, भारतीय लोकतंत्र के लिए शोक का दिन

अरविंद केजरीवाल

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दिल्ली को लेकर जिस बिल पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को आपत्ति थी उसे बुधवार को राज्यसभा में भी पास कर दिया गया. इस बिल को सोमवार को लोकसभा में पास किया गया था.

इस बिल पर विपक्ष काफ़ी विरोध कर रहा था. राज्यसभा में जब इस बिल को रखा तो विपक्ष ने वॉकआउट कर दिया. सदन के उप-सभापति हरिवंश नारायण सिंह ने ध्वनिमत के आधार पर इस बिल को पास घोषित किया.

बिल पास होने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट किया है, "राज्यसभा ने जीएनसीटीडी संशोधन बिल पास कर दिया. भारतीय लोकतंत्र के लिए शोक का दिन. हम लोगों को वापस उनकी शक्ति दिलाने के लिए संघर्ष जारी रखेंगे. जो भी बाधाएं आएं, हम अच्छा काम करना जारी रखेंगे. काम न ही रुकेगा और न ही धीमा पड़ेगा."

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इस बिल के अनुसार किसी भी कार्यकारी फ़ैसले से पहले दिल्ली की सरकार को एलजी से राय लेनी होगी. इस बिल में स्पष्ट करने की कोशिश की गई है कि दिल्ली में सरकार का मतलब उपराज्यपाल यानी एलजी ही है. इस बिल पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि यह असंवैधानिक है.

लोकसभा में क्या हुआ था

इससे पहले सोमवार को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी कृष्णा रेड्डी ने कहा था कि 'राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सरकार संशोधन बिल 2021' को लाना ज़रूरी हो गया था क्योंकि दिल्ली सरकार के कामकाज से जुड़े कई मुद्दों पर अस्पष्टता थी और अदालतों में भी इसे लेकर कई मामले दर्ज हुए थे.

रेड्डी ने कहा, "आप इसे राजनीतिक बिल ना कहिए. ये केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली में तमाम मुद्दों पर जारी टकराव की स्थिति को ख़त्म करने के लिए लाया गया है. इस बिल से तकनीकी दिक़्क़तें और भ्रम दूर होंगे और प्रशासन की क्षमता बढ़ेगी."

इस बिल के अनुसार दिल्ली में सरकार मतलब दिल्ली के उपराज्यपाल हैं. दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने इस बिल का विरोध किया है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार से आग्रह किया था कि वो बिल वापस ले ले.

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'आप' का विरोध

अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट कर कहा था, "जीएनसीटीडी संशोधन बिल का लोकसभा में पास होना दिल्ली की जनता का अपमान है. जिन्होंने दिल्ली में वोट देकर जिताया था, उनसे यह बिल सारी शक्ति वापस ले रहा है. दिल्ली को चलाने की ताक़त उन्हें दी जा रही है, जिन्हें चुनाव में हार मिली थी. बीजेपी ने लोगों को धोखा दिया है."

लोकसभा में रेड्डी ने कहा, "1996 से केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच रिश्ते अच्छे रहे. सारे मसले बातचीत के ज़रिए सुलझाए गए. हालाँकि 2015 से कई मसले उभरे और दिल्ली हाई कोर्ट में कई विवाद गए. यहाँ से भी कुछ निर्देश दिए गए. कोर्ट ने भी कहा था कि दिल्ली सरकार कार्यकारी मामलों में एलजी को सूचित करेगी. जब 1991 में जीएनसीटीडी एक्ट लागू किया गया तब कांग्रेस की सरकार थी और दिल्ली को विधानसभा के साथ केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया और सीमित विधायी शक्तियाँ दी गईं. यह हमने नहीं किया है. ऐसा तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने किया था."

एलजी

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रेड्डी ने कहा, "उपराज्यपाल प्रशासक हैं और उन्हें हर दिन की गतिविधियों की जानकारी लेने का अधिकार है. हमने दिल्ली सरकार से ना ही कोई शक्ति छीनी है और ना ही एलजी को अतिरिक्त ताक़त दी है."

बिल पास करने के दौरान विपक्षी सांसदों ने मोदी सरकार पर तानाशाही का आरोप लगाया तो रेड्डी ने आपत्ति जताते हुए कहा कि एनडीए सरकार ने कुछ भी ग़लत या नहीं किया है बल्कि दिल्ली सरकार को लेकर जारी भ्रम को ख़त्म किया है.

बिल पर बहस में कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा, "यह बिल असंवैधानिक है क्योंकि राज्य सरकार की क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण कर रहा है."

आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान ने भी इस बिल का कड़ा विरोध किया और वापस लेने की मांग की.

दिल्ली

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दिल्ली बनाम केंद्र

1991 में संविधान के 239एए अनुच्छेद के ज़रिए दिल्ली को केंद्र शासित राज्य का दर्जा दिया गया था. इस क़ानून के तहत दिल्ली की विधानसभा को क़ानून बनाने की शक्ति हासिल है लेकिन वह सार्वजनिक व्यवस्था, ज़मीन और पुलिस के मामले में ऐसा नहीं कर सकती है.

दिल्ली और केंद्र सरकार के बीच टकराव कोई नई बात नहीं है. दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार बीजेपी शासित केंद्र सरकार के राष्ट्रीय राजधानी को लेकर लिए गए कई प्रशासनिक मामलों को चुनौती दे चुकी है.

1991 अधिनियम का अनुच्छेद 44 कहता है कि उप-राज्यपाल के सभी फ़ैसले जो उनके मंत्रियों या अन्य की सलाह पर लिए जाएंगे, उन्हें उप-राज्यपाल के नाम पर उल्लिखित करना होगा. यानी एक प्रकार से इसको समझा जा रहा है कि इसके ज़रिए उप-राज्यपाल को दिल्ली सरकार के रूप में परिभाषित किया गया है.

दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने बीजेपी पर दिल्ली सरकार की शक्तियों को कम करने का आरोप लगाया है.

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वहीं, बीजेपी का कहना है कि दिल्ली सरकार और एलजी पर 2018 में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद प्रस्तावित विधेयक आम आदमी पार्टी शासित सरकार के 'असंवैधानिक कामकाज़' को सीमित करेगा.

एलजी और दिल्ली सरकार के बीच कामकाज़ का मामला न्यायालय तक जा चुका है. चार जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने पाया था कि मंत्रिमंडल पर एलजी को अपने फ़ैसले के बारे में 'सूचित' करने का दायित्व है और उनकी 'कोई सहमति अनिवार्य नहीं है.'

14 फ़रवरी 2019 के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विधायी शक्तियों के कारण एलजी मंत्रिमंडल की सलाह से बंधे हुए हैं, वह सिर्फ़ अनुच्छेद 239एए के आधार पर ही उनसे अलग रास्ता अपना सकते हैं.

इस अनुच्छेद के अनुसार, अगर मंत्रिमंडल की किसी राय पर एलजी के मतभेद हैं तो वह इसे राष्ट्रपति के पास ले जा सकते हैं. न्यायालय ने कहा था कि इस मामले में एलजी राष्ट्रपति के फ़ैसले को मानेंगे.

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