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गुजरात बीजेपी को क्या नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं मिल पाया है?
- Author, अंशुल सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी 12 साल से ज़्यादा समय तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे थे.
2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात में 11 साल के भीतर तीन चेहरे मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल चुके हैं.
यानी बतौर मुख्यमंत्री मोदी ने जितने साल काम किया, लगभग उतने ही साल में तीन मुख्यमंत्री आ गए.
गुरुवार को मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इस्तीफ़ा नहीं दिया लेकिन उनके मंत्रिमंडल के सभी 16 मंत्रियों ने पद छोड़ दिए थे.
माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल में फेरबदल कुछ वर्गों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के प्रति नाराज़गी को कम करने के लिए किया गया, जो लगभग तीन दशकों से गुजरात की सत्ता पर क़ाबिज़ है.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से जब गुजरात की कैबिनेट में बदलाव पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह एक सामान्य प्रक्रिया है.
न्यूज़ चैनल आज तक से बातचीत में अमित शाह ने कहा, "गुजरात में दस मंत्रियों के लिए सीटें खाली थीं. मुख्यमंत्री जी की सहूलियत के लिए सभी ने इस्तीफ़े दिए हैं ताकि वो अपनी नई टीम बना सकें. चुनाव के साथ इसका कोई लेना-देना नहीं है."
अगले ही दिन यानी शुक्रवार को नए मंत्रिमंडल का शपथ ग्रहण समारोह हुआ लेकिन कुछ सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब अब तक नहीं मिला है.
मसलन नरेंद्र मोदी के दिल्ली पहुंचने के बाद अचानक से मुख्यमंत्री से लेकर पूरा मंत्रिमंडल क्यों बदल दिया जाता है?
क्या गुजरात को अब तक नरेंद्र मोदी का विकल्प नहीं मिल पाया है?
कब और किन परिस्थितियों में बदले गुजरात के सीएम?
जनवरी 2001 में गुजरात में भीषण भूकंप आया था, जिसमें हज़ारों लोग मारे गए और तबाही हुई.
तब केशुभाई पटेल गुजरात के मुख्यमंत्री थे. मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस समय तक केशुभाई पटेल की लोकप्रियता में गिरावट होने लगी थी. इसमें भूकंप के अलावा और भी कई फ़ैक्टर शामिल थे.
इन परिस्थितियों में भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने गुजरात में चेहरा बदलने का दांव खेला.
नरेंद्र मोदी उस समय तक पार्टी में एक रणनीतिकार और संगठनात्मक नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे, हालांकि वह कभी चुनाव नहीं लड़े थे और न ही कोई प्रशासनिक पद संभाला था.
अक्टूबर 2001 में, बीजेपी ने केशुभाई पटेल को हटाकर नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री नियुक्त किया.
तब मोदी विधायक तक नहीं थे. बाद में मोदी ने राजकोट विधानसभा सीट से उपचुनाव जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया.
कुछ ही समय बाद राज्य में सांप्रदायिक दंगे हुए लेकिन इसके बावजूद नरेंद्र मोदी ने चार बार राज्य के सीएम पद की शपथ ली.
2014 में मोदी प्रधानमंत्री बनकर दिल्ली पहुंचे और राज्य की कमान पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में आनंदीबेन पटेल को सौंपी गई.
आनंदीबेन के कार्यकाल में पाटीदार आंदोलन हुआ और ऊना में दलितों के साथ हिंसा हुई.
अगस्त, 2016 में आनंदीबेन पटेल ने अपनी उम्र का हवाला देते हुए इस्तीफ़ा दे दिया लेकिन मीडिया में कहा गया कि आंदोलन के दौरान स्थिति न संभाल पाने के कारण ऐसा हुआ.
इसके बाद विजय रूपाणी गुजरात के मुख्यमंत्री बने. रूपाणी को राज्य सरकार का नेतृत्व ऐसे समय सौंपा गया था जब विधानसभा चुनाव में डेढ़ साल से भी कम समय बचा था और पाटीदार आंदोलन के धीमा पड़ने का कोई संकेत नहीं दिख रहा था.
उनके नेतृत्व में हुए 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को कांग्रेस से कड़ी टक्कर मिली. 182 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी 115 से 99 पर सिमट गई और कांग्रेस को 77 सीटें मिलीं.
पांच साल के बाद सितंबर, 2021 में रूपाणी ने इस्तीफ़ा दिया और उनकी जगह पाटीदार समुदाय से आने वाले भूपेंद्र पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया.
क्यों मची रहती है उथल-पुथल?
जब भूपेंद्र पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री चुना गया तो सभी को आश्चर्य हुआ था. पटेल पहली बार बीजेपी का गढ़ कही जाने वाली घाटलोडिया सीट से चुनाव जीते थे और अपने पहले कार्यकाल में ही सीएम बन गए थे.
अहमदाबाद के वरिष्ठ पत्रकार राजीव शाह कहते हैं, "भूपेंद्र पटेल जब सीएम बने थे तो गुजरात की जनता उन्हें ठीक से जानती तक नहीं थी. लोग आनंदीबेन से परिचित थे और रूपाणी को संगठन में काम करने की वजह से जानते थे."
राजीव शाह बताते हैं, "नरेंद्र मोदी और अमित शाह यह सोचते हैं कि समय-समय पर बदलाव करते रहना चाहिए. इससे लोगों में यह संदेश जाता है कि सत्ता में नए चेहरे आ रहे हैं और सत्ता विरोधी लहर से निपटने में मदद मिलती है. इसलिए गुजरात की राजनीति में समय-समय पर प्रयोग होते हैं और स्थिरता नहीं रहती है."
2022 में गुजरात विधानसभा चुनाव से एक साल पहले 2021 में बीजेपी ने मुख्यमंत्री विजय रूपाणी समेत पूरी कैबिनेट को हटा दिया था. इसके बाद बीजेपी ने 182 में से 156 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया था.
वरिष्ठ पत्रकार अजय उमट कहते हैं, "गुजरात बीजेपी की राजनीतिक प्रयोगशाला है. जब भी विरोध की आहट होती है तो बीजेपी कोई चांस नहीं लेना चाहती है. उनको लगता है कि इससे निपटने का सबसे अच्छा तरीक़ा है- चेहरा बदल दो. इसे 'नो रिपीट थ्योरी' कहते हैं."
"जैसे आनंदीबेन के समय पाटीदार आंदोलन हुआ था. इसके अलावा अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी भी मैदान में थे. इससे आनंदीबेन के ख़िलाफ़ माहौल बन रहा था और फिर आनंदीबेन को हटा दिया गया."
कोरोना महामारी के दौरान गुजरात हाई कोर्ट ने कोरोना से संबंधित मामलों को ठीक से नहीं संभालने के लिए गुजरात सरकार की आलोचना की थी.
विजय रूपाणी पर कोरोना काल में मिसमैनेजमेंट के आरोप लगे. तब उन पर ये आरोप भी लगे कि राजकोट की एक प्राइवेट कंपनी द्वारा बनाए गए 'धमण' नाम के वेन्टिलेटर मरीज़ों के इलाज में कारगर नहीं थे, लेकिन सरकार ने इसका बचाव किया था.
अजय उमट का कहना है, "कोरोना में जब गुजरात सरकार की भद्द पिटी तो लोगों में बहुत नाराज़गी थी. सरकार को तब लगा कि एक साल बाद 2022 का चुनाव विजय रूपाणी के नेतृत्व में नहीं जीत सकते इसलिए उन्हें हटा दिया गया. "
गुजरात में मोदी का विकल्प क्यों नहीं?
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात में दो बार विधानसभा चुनाव हुए. दोनों बार पीएम मोदी बीजेपी के चुनाव प्रचार का मुख्य चेहरा थे.
साल 2022 में मोदी ने राज्य के विभिन्न हिस्सों में 31 से अधिक रैलियों को संबोधित किया और तीन बड़े रोड शो का नेतृत्व किया, जिससे उनकी सक्रियता और प्रचार की व्यापकता स्पष्ट होती है.
उन्होंने ख़ुद की भूमिका को दिखाते हुए 2022 में "आ गुजरात, मैं बनाव्यू छे" (मैंने यह गुजरात बनाया है) नारा दिया था.
राजीव शाह मानते हैं, "मोदी का विकल्प अभी तक बीजेपी में नहीं है इसलिए गुजरात में भी नहीं है. अगर शीर्ष नेतृत्व बदलता है तो गुजरात में भी परिस्थितियां बदल जाएंगी. गुजरात के मुख्यमंत्री स्वतंत्र होकर काम नहीं कर सकते हैं. उन्हें दिल्ली की सलाह या आदेश जो आप समझें, माननी पड़ती है."
"असल में यह भारतीय राजनीति की समस्या है जो व्यक्ति आधारित है. गुजरात मोदी का गृह राज्य है इसलिए उनका यहां ज़ोर ज़्यादा रहता है."
गुजरात विधानसभा चुनाव को राष्ट्रीय राजनीति में बीजेपी के लिए एक इम्तिहान माना जाता है. इसी 'गुजरात मॉडल' का उदाहरण देकर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और गुजरात में उनकी सक्रियता की एक बड़ी वजह यह भी है.
अजय उमट का कहना है कि जैसे बरगद के पेड़ के नीचे कभी बड़ा पेड़ नहीं पनप सकता, वैसा ही हाल गुजरात का है.
वह कहते हैं, "गुजरात से भले ही मोदी और शाह चले गए हों लेकिन गुजरात की राजनीति पर आज भी उनकी पकड़ उतनी ही मज़बूत है. अंतिम निर्णय यही दोनों लेते हैं. यही कारण है कि मोदी का विकल्प नहीं मिला क्योंकि मोदी अभी भी गुजरात को दिल्ली से चलाते हैं."
गुजरात में अगले साल पंचायत चुनाव हैं. इसके बाद दो साल बाद यानी 2027 में विधानसभा चुनाव है. पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए यह देखना दिलचस्प होगा कि इन चुनावों में सरकार में फेरबदल का कितना और कैसे असर पड़ता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित