कोरोना वायरस: गुजरात हाई कोर्ट रूपाणी सरकार से क्यों है खफ़ा?

    • Author, भार्गव पारिख
    • पदनाम, बीबीसी गुजराती संवाददाता

गुजरात हाई कोर्ट ने कोरोना से संबंधित मामलों को ठीक से नहीं संभालने के लिए गुजरात सरकार की आलोचना की है.

राज्य में कोरोना से अब तक कुल 888 मौतें हुई हैं और मरने वालों की संख्या के हिसाब से महाराष्ट्र के बाद गुजरात दूसरे नंबर पर है.

गुजरात हाई कोर्ट ने कहा है कि गरीब लोग सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए आते हैं लेकिन इसका यह मतलब नहीं लगाया जाना चाहिए कि उनकी ज़िंदगी की कोई क़ीमत नहीं है.

कोट ने कोरोना के मरीजों की सरकारी अस्पतालों में मृत्यु दर अधिक होने को चिंता का विषय बताया और कहा कि सरकार को और अधिक सजग होने की जरूरत है.

गुजरात हाई कोर्ट ने ये भी कहा है कि सरकार को युद्धस्तर पर जरूरतमंदों को सुविधाएँ मुहैया कराने की ज़रूरत है.

एक डॉक्टर की चिट्ठी

गुजरात हाई कोर्ट की इस नाराज़गी की वजह एक रेजिडेंट डॉक्टर की ओर से लिखा गया पत्र भी बताया जा रहा है.

हाई कोर्ट के स्वत: संज्ञान लेने के बाद गुजरात सरकार ने इस मामले में तत्काल कार्रवाई करने के लिए समय मांगा है.

इस मामले में गुजरात सरकार की ओर से सरकारी वकील मनीषा शाह ने सरकार का पक्ष रखते हुए कोर्ट से कहा कि अहमदाबाद में बढ़ते हुए मामलों को देखते हुए छह मई से सरकार ने युद्धस्तर पर कदम उठाए हैं.

सरकार ने 42 अस्पतालों को आदेश दिया है कि वो कोरोना मरीजों के लिए 50 बेड खाली रखें.

इससे पहले सरकार ने 23 अस्पतालों को (समझौते का मसौदा) एमओयू सौंपा है.

चार एमओयू फिलहाल लटके पड़े हैं और आठ अस्पतालों की सरकार के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर करने को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं है.

अस्पताल की बदहाली

कोर्ट ने अहमदाबाद सिविल अस्पताल में काम करने वाले रेजिडेंट डॉक्टर के एक पत्र का हवाला देते हुए अस्पताल की बदतर हालात के लिए सरकार को फटकार लगाई.

अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ कोर्ट के कड़े रुख की मुख्य वजह एक रेजिडेंट डॉक्टर का पत्र था.

पत्र में डॉक्टर ने सिविल अस्पताल की बदहाली के बारे में विस्तार से लिखा है.

डॉक्टर ने दावा किया है कि अस्पताल प्रबंधन इस बात को लेकर फिक्रमंद है कि अगर रेजिडेंट डॉक्टर संक्रमण की चपेट में आ गए तो काम कौन करेगा.

उनका कहना है कि कोई भी सीनियर डॉक्टर इमर्जेंसी में या फिर मरीजों को देखने दौरे पर नहीं आता.

सभी मरीजों को जूनियर डॉक्टर ही देखते हैं और इसके बावजूद सीनियर डॉक्टर उन्हें कायर और मूर्ख कहते हैं.

डॉक्टरों का कोरोना टेस्ट

अस्पताल प्रबंधन की तरफ से उन पर कोई कार्रवाई भी नहीं की जाती है.

पत्र में डॉक्टर ने लिखा है, "हमारे विभाग के आठ डॉक्टरों और मेरे यूनिट के पांच रेजिडेंट डॉक्टरों का कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आया है. हमें टेस्ट करवाने को लेकर भला-बुरा कहा गया है. पांच दिनों से 30 रेजिडेंट डॉक्टरों को मैरियट होटल में रखा गया है, वहीं इलाज चल रहा है."

"लेकिन अस्पताल प्रबंधन की ओर से किसी ने भी हमारी खोज-ख़बर नहीं ली है. जब मैं कोरोना वायरस से संक्रमित हुआ तब मैं किसी दूसरी ड्यूटी पर था. एलजी अस्पताल और अहमदाबाद के दूसरे 90 फ़ीसदी अस्पताल बंद होने की वजह से हम पर मरीजों का बढ़ती संख्या का दबाव था."

"इसके बावजूद हमें पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट या फिर एन-95 मास्क नहीं दिया गया. यहाँ तक कि हमारे पास दस्ताने भी नहीं थे. प्रबंधन दावा कर रहा था कि ये सभी चीजें 1,200 बेड वाले कोविड-19 अस्पताल को भेजा जा चुका है."

क्या सरकारी अस्पतालों में हालात सुधरेंगे?

रेज़िडेंट डॉक्टर का कहना है कि अस्पताल के प्रबंधन को इस बात की कोई चिंता नहीं है कि अगर कोई कोरोना पॉज़िटिव व्यक्ति अस्पताल में काम करता है तो वो दूसरे मरीज़ों के लिए संक्रमण का ख़तरा बढ़ा सकता है.

पत्र में रेज़िडेंट डॉक्टर ने लिखा है, "जिस दिन मेरा कोरोना टेस्ट पॉज़िटिव आया उस दिन मैंने तीन नॉर्मल डिलीवरी करवाई थी और ऑपरेशन के ज़रिए एक डिलीवरी करवाई थी. मैं करीब 20 मरीज़ों और नवजात शिशुओं के संपर्क में आया था. अब तक इस मामले में कोई कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग नहीं की गई है, न ही किसी अधिकारी ने मामले की जांच की है."

गुजरात हाई कोर्ट ने कहा है कि गरीबों को सुविधाएं देने में प्रदेश सरकार नाकाम रही है. अहमदाबाद सिविल अस्पताल में सुविधाओं की भारी कमी है और यहां वेन्टिलेटर और ऑक्सीजन सुविधाएं बढ़ाई जानी चाहिए.

कोर्ट ने कहा कि अधिक संख्या में मौतों के बाद भी सरकार कड़ा रुख़ नहीं अपना रही है. उचित स्वास्थ्य सेवा देने में जो अधिकारी नाकाम हुए हैं उनकी ज़िम्मेदारी तय की जानी चाहिए.

कोर्ट की चेतावनी

कोर्ट ने कहा कि मौजूदा संकट की स्थिति में जो डॉक्टर काम करने के लिए सिविल अस्पताल नहीं आ रहे हैं उनका तुरंत ट्रांसफर किया जाए. ये उचित नहीं है कि सीनियर डॉक्टरों की बजाय अधिकतर काम रेज़िडेंट डॉक्टरों को सौंप दिया जाए.

कोर्ट ने कहा कि सरकार को न केवल कोरोना टेस्ट की संख्या बढ़ानी चाहिए बल्कि निजी लैब में टेस्ट कराने वालों को भी टेस्ट का खर्च देना चाहिए. अस्पताल से डिस्टार्ज किए गए सभी मरीज़ों के लिए टेस्ट बाध्यकारी बनाया जाना चाहिए.

कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर और नर्स समेत सभी स्वास्थ्यकर्मियों को पीपीई किट्स और एन-95 मास्क दिए जाने चाहिए, साथ ही जो निजी अस्पताल कोरोना मरीज़ों के लिए बेड न मुहैय्या कराएं उनके ख़िलाफ आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत कार्यवाई होनी चाहिए.

कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर सरकार गुजरात के सबसे बड़े अस्पतालों में से एक में डॉक्टरों और मरीज़ों की मुश्किलों का नदान नहीं खोज सकी तो कोर्ट स्वयं वीडियो कॉन्फ्रेसिंग के ज़रिए डॉक्टरों से बात करेगी.

गुजरात हाई कोर्ट के जज जस्टिस पादरीवाला ने ये भी कहा कि महामारी के संकट को देखते हुए अपोलो, ज़ाइडस, ग्लोबल हॉस्पिटल, आनंद सर्जिकल और यूएन मेहता जैसे बड़े अस्पतालों को सरकार ने क्यों अपने हाथों में नहीं लिया है, सरकार इसका कारण बताए.

कोविड अस्पताल

अदालत की फटकार के बाद गुजरात सरकार ने तुरंत यूएन मेहता अस्पताल में कोरोना मरीज़ों के लिए 1,200 बेड वाला सुनिश्चित करने का फ़ैसला लिया है.

अहमदाबाद सिविल अस्पताल के सुपरिंटेंडेंट डॉक्टर एमएम प्रभाकर ने बीबीसी को बताया, "हम यहां काम करने वाले डॉक्टरों को पर्याप्त सुविधाएं दे रहे हैं. हम गुजरात हाई कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हैं और उसका पूरी तरह पालन करेंगे. हम कोर्ट की दी गई नई गाइडलाइन का भी पालन करेंगे. यूएन मेहता अस्पताल में 1,200 बेड वाला कोविड अस्पताल बना लिया गया है जो 25 मई से काम शुरू कर चुका है."

सरकारी अस्पतालों में अधिक मृत्यु दर के बारे में डॉक्टर एमएम प्रभाकर कहते हैं, "यहां आने वाले अधिकतर मरीज़ लास्ट स्टेज में होते हैं. दूसरे अस्तपालों की तुलना में यहां दोगुनी संख्या में मरीज़ों का इलाज होता है, इस कारण मृत्यु दर भी अधिक दिखती है."

डॉक्टर प्रभाकर का दावा है कि इस अस्पताल में अधिक संख्या में रोगी स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं. वो कहते हैं, "हमने यहां कोरोना संक्रमित महिलाओं की सफतलापूर्वक डिलीवरी करवाई है. सरकार को हमने उपकरणों की कमी के बारे में बताया है और सरकार आने वाले कुछ दिनों में सरकार अस्पताल के लिए इनकी व्यवस्था करेगी. उसके बाद मृत्युदर और भी कम हो जाएगी."

क्या कहती है सरकार?

स्वास्थ्य विभाग की प्रधान सचिव डॉक्टर जयंती रवि ने इस मामले टिप्पणी करने से ये कहते हुए इनकार कर दिया है कि मामला अभी कोर्ट में है.

उन्होंने कहा, "कोरोना को फैलने से रोकने के लिए हम हरसंभव कोशिश कर रहे हैं. लेकिन ये मामला अभी कोर्ट में हैं और इस पर मैं टिप्पणी नहीं कर सकती."

गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री और डिप्टी मुख्यमंत्री नितिन पटेल ने बीबीसी को बताया कि "कोरोना महामारी के बारे में राज्य सरकार कोई स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकती."

वो कहते हैं, "हमें आईसीएमआर की गाइडलाइन के अनुसार काम करना होता है और उसी के अनुसार हम काम कर रहे हैं."

नितिन पटेल ने यह भी दावा किया कि सिविल अस्पताल में सभी तरह की सुविधाएं दी जा रही हैं. उन्होंने कहा, "गुजरात में कोरोना मरीजों के लिए हमने 21,000 बेड की व्यवस्था की है."

उन्होंने कहा, "हाई कोर्ट ने पूछा है कि इस काम में कुछ अस्पतालों को क्यों शामिल नहीं किया गया है. हम इन अस्पतालों से बात कर रहे हैं. अगले सप्ताह सरकार कोर्ट के सामने अपना जवाब पेश करेगी."

कांग्रेस का आरोप

कांग्रेस नेता शक्तिसिंह गोहिल ने कहा है कि कोरोना महामारी को फैलने से रोकने में सरकार पूरी तरह से नाकाम रही है.

उनका कहना है कि इस महामारी से निपटने के लिए सरकार के पास कोई ऐक्शन प्लान ही नहीं है. इसी कारण अधिक संख्या में यहां लोगों की मौत हो रही है.

वो सवाल करते हैं कि अगर सरकार की नाकामी कोर्ट देख सकती है तो ये चीज़ सरकार खुद क्यों नहीं देख सकती?

क्या कहते हैं निजी अस्पताल?

गुजरात हाई कोर्ट ने निजी अस्पतालों के मुद्दे पर भी गंभीर प्रश्न उठाए हैं.

इस बारे में अपोलो अस्पताल के पीआरओ संदीप जोशी ने बीबीसी को बताया, "भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो अपोलो अस्पताल गांधीनगर जिले के भाट गांव में है. हालांकि अहमदाबाद नगर निगम ने कोरोना मरीज़ों के लिए यहां अलग बेड की मांग की है और हमने अगल बेड उपलब्ध कराए हैं. हम वहां कोरोना मरीज़ों का इलाज कर रहे हैं."

वहीं ज़ाइडस अस्पताल के बिज़नेस हेड डॉक्टर वीएन शाह ने बीबीसी को बताया, "हमने कोरोना मरीजों के लिए बेड सुनिश्चित करने से इनकार नहीं किया है. इस तरह की महामारी में हम अपनी सभी सुविधाएं मुहैया कराने के लिए तैयार हैं. सरकार का आदेश मिलते ही जल्द से जल्द कोरोना मरीज़ों के लिए अलग व्यवस्था की जाएगी."

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