छत्तीसगढ़ में पुलिस और माओवादियों की क्रॉस फायरिंग में आदिवासियों की मौत का मामला क्या है

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    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए

छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित इलाकों में पुलिस और माओवादियों के बीच मुठभेड़ों और कथित क्रॉस फायरिंग पर लगातार सवाल उठ रहे हैं.

पिछले सप्ताह ही आदिवासियों ने सुरक्षाबलों पर बीजापुर के बोड़गा गांव में घर के भीतर घुसकर एक अधेड़ महिला राजे ओयाम को गोली मारने का आरोप लगाया है.

राजे ओयाम को गंभीर स्थिति में जगदलपुर के सरकारी अस्पताल में भर्ती किया गया.

लेकिन राज्य के गृहमंत्री विजय शर्मा ने इसे क्रॉस फायरिंग का मामला बताया है.

इधर पुलिस ने भी दावा किया है कि पिछले मंगलवार की दोपहर राजे ओयाम को क्रॉस फायरिंग में गोली लगी थी. गोली लगने के अगले दिन बुधवार को, उन्हें गांव से प्राथमिक उपचार के लिए भैरमगढ़ लाया गया.

क्या कहती है पुलिस?

तथाकथित क्रॉस फायरिंग की घटनाओं के विरोध में प्रदर्शन करते आदिवासी

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बीजापुर की पुलिस उपाधीक्षक गरिमा दादर के मुताबिक़, ''पुलिस और माओवादियों के बीच क्रॉस फायरिंग में बोड़गा निवासी 44 साल की महिला राजे ओयाम को गोली लगी. घायल महिला को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भैरमगढ़ में प्राथमिक उपचार के बाद हायर सेंटर जगदलपुर की ओर रवाना किया गया.''

पुलिस के अनुसार ज़रूरत पड़ने पर राजे ओयाम को ख़ून देने के लिए पुलिस के जवानों को भी जगदलपुर रवाना किया गया.

लेकिन बोड़गा गांव के आदिवासियों ने सरकार के दावे को ग़लत बताया है.

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एक ग्रामीण ने बीबीसी से कहा, ''पुलिस ने बीमार राजे ओयाम को उस समय गोली मारी, जब वो घर में थीं. मुठभेड़ की कहानी पूरी तरह झूठी है. पुलिस के जवान लगातार माओवादियों के नाम पर निर्दोष आदिवासियों को गोली मार रहे हैं.''

राजे ओयाम के भतीजे फगनू मरकाम ने कहा कि उनकी बुआ बच्चों को खाना खिला रही थीं, उसी समय सुरक्षाबलों के जवान घर में घुसे.

फगनू मरकाम ने कहा, ''बुआ की पीठ में गोली लगी थी. उनको 24 घंटे बाद इलाज के लिए गांव से भैरमगढ़ लाया गया. इसके बाद उन्हें जगदलपुर अस्पताल में भर्ती किया गया है.''

सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी ने भी सुरक्षाबलों पर गंभीर आरोप लगाए हैं. सोनी सोरी ने अस्पताल ले जाए जाते वक़्त राजे ओयाम से बात की थी जिसमें उन्होंने पूरा मामला समझने की कोशिश की.

सोनी सोरी ने कहा कि पुलिस क्रॉस फायरिंग की कहानी पूरी तरह से झूठी है.

सोनी सोरी ने बीबीसी से कहा, ''जंगल में तेंदू पत्ता तोड़ने, रस्सी लाने या लकड़ी लाने के लिए जाने वाले आदिवासियों को तो पुलिस माओवादी बता कर प्रताड़ित करती ही थी, उन्हें गोली मारती ही थी, अब घरों के भीतर घुस कर, आदिवासियों को गोली मारी जा रही है और फिर उसे क्रॉस फायरिंग का नाम दे दिया जा रहा है. ऐसा लग रहा है कि जैसे आदिवासी इसी तरह मारे जाने के लिए पैदा हुआ है.''

सोनी सोरी, सामाजिक कार्यकर्ता और आदिवासी नेता
ALOK PUTUL
पुलिस पहले तेंदू पत्ता और लकड़ी के लिए जंगल जाने वाले आदिवासियों को माओवादी बताकर मारती थी. अब घरों में घुसकर गोली मारी जा रही है और उसे क्रॉस फायरिंग का नाम दिया जा रहा है.
सोनी सोरी
सामाजिक कार्यकर्ता और आदिवासी नेता

क्रॉस फायरिंग पर सवाल

भाकपा (माओवादी) की ओर से लगाया गय़आ बैनर

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इमेज कैप्शन, भाकपा (माओवादी) की ओर से लगाया गया बैनर

छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ महीनों से क्रॉस फायरिंग में गोली लगने या मौत की घटनाओं पर लगातार सवाल उठ रहे हैं.

इससे पहले 30 जनवरी को बीजापुर के बोड़गा गांव में ही एक आदिवासी युवक रमेश ओयाम की गोली लगने से मौत हुई थी. शुरू में पुलिस ने दावा किया कि पुलिस के साथ मुठभेड़ में एक माओवादी मारा गया है.

रमेश ओयाम के सगे भाई बस्तर पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स में हैं.

कुछ वक़्त बाद पुलिस ने जानकारी दी कि माओवादियों के साथ मुठभेड़ के दौरान, रमेश ओयाम को क्रॉस फायरिंग में गोली लगी थी.

इस क्रॉस फायरिंग के आरोप को झूठा बताते हुए बीजापुर के 21 गांवों के आदिवासियों ने लगातार धरना-प्रदर्शन किया.

आदिवासियों का आरोप था कि अपने नवजात बच्चे की छठी के लिए मुर्गा ख़रीदने के लिए जा रहे रमेश ओयाम को पुलिस ने मार डाला और फिर फर्ज़ी मुठभेड़ की कहानी गढ़ दी.

मृतक की पत्नी अपने दूधमुंहे बच्चे के साथ पुलिस के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों में शामिल हुईं. इसके अलावा बस्तर के सातों ज़िलों को आदिवासियों ने बंद भी कराया.

इसी तरह एक जनवरी को बीजापुर के ही मुदवेंडी गांव की रहने वाली मासे सोढ़ी की छह महीने की बच्ची मंगली सोढ़ी गोली लगने से मारी गई थी और मासे सोढ़ी घायल हो गई थी.

पुलिस ने इस घटना में भी क्रॉस फायरिंग में गोली लगने का दावा किया था.

हालांकि, मासे सोढ़ी ने आरोप लगाया था कि सड़क निर्माण के लिए उस दिन जेसीबी के साथ सुरक्षाबलों के सैकड़ों जवान आए थे और गांव के लोगों को भी वहां बुलाया गया था, इसी दौरान जवानों ने तीन गोली चलाई, जिसमें मेरी गोद में दूध पी रही बेटी मंगली को गोली लगी और वहीं उसकी मौत हो गई. गोली से मासे की हाथ में भी चोट आई.

इसी तरह बीजापुर के ही बेल्लमनेन्ड्रा गांव की मासे कारम, मंगली पुनेम और कल्ला मडकाम ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि बीस जनवरी को गांव के आठ लोग गोरनम में आयोजित एक धरना में भाग लेने के लिए जा रहे थे. उसी दौरान पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें सामने की ओर चल रहे तीन लोग मारे गए.

मारे जाने वालों में 40 साल के कोसा कारम, 15 साल की सोनी मड़काम और 14 साल की नागी पुनेम शामिल थीं. आरोप है कि इसके बाद पुलिस ने अन्य दो लोगों को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया.

हालांकि पुलिस ने इसे मुठभेड़ की घटना बताया है.

बीजापुर के कांग्रेस विधायक विक्रम मंडावी कहते हैं, ''लगातार क्रॉस फायरिंग की घटनाएं ज़िले में बढ़ रही हैं और लगातार उन मामलों को लेकर परिवारजनों के द्वारा संदेह बताना कि वो क्रॉस फायरिंग नहीं है, वहां पर उन्हें गोली मारा गया, ये परिवारजनों का आरोप है.''

न्यायिक जांच पर कार्रवाई नहीं

तथाकथित क्रॉस फायरिंग की घटनाओं के विरोध में प्रदर्शन करते आदिवासी

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विक्रम मंडावी ने आरोप लगाया कि पिछले दिनों कांकेर जिले के कोयलीबेड़ा थाना में हुए कथित पुलिस माओवादी मुठभेड़ में तीन निर्दोष आदिवासी मारे गए.

कांग्रेस पार्टी ने इस मामले में पिछले बुधवार को राज्यपाल से मुलाकात कर इस मामले की न्यायिक जांच की मांग की है. लेकिन राज्य सरकार इस मामले में गंभीर नहीं है.

हालांकि मानवाधिकार कार्यकर्ता और छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला इन परिस्थितियों के लिए कांग्रेस पार्टी को बराबर का ज़िम्मेवार मानती हैं.

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आम आदमी पार्टी से जुड़ी प्रियंका शुक्ला पुराने मामलों का हवाला देते हुए कहती हैं कि भाजपा के शासनकाल में जून 2012 में बीजापुर के सारकेगुड़ा में हुए कथित मुठभेड़ में 17 लोग मारे गए थे. इसी तरह बीजापुर के एड़समेटा में 17 मई 2013 को तीन नाबालिग समेत नौ लोग मारे गए थे. पुलिस ने तब इन सबको इनामी माओवादी बताते हुए, इनके पास से भारी मात्रा में हथियार बरामद होने का भी दावा किया था.

प्रियंका कहती हैं, ''इन दोनों मामलों की न्यायिक जांच की रिपोर्ट कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में सामने आई, जिसमें आयोग ने साफ़-साफ़ कहा कि मारे जाने वाले निर्दोष आदिवासी थे और पुलिस ने चारों तरफ़ से घेर कर गोलीबारी में उन्हें मार डाला था. दुखद है कि विधानसभा में रिपोर्ट पेश करने के बाद भी कांग्रेस सरकार ने इन रिपोर्टों पर एक प्राथमिकी तक दर्ज नहीं की. इन रिपोर्टों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया.''

लेकिन छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला इन आरोपों से इंकार करते हैं.

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सुशील आनंद शुक्ला ने बीबीसी से कहा कि भाजपा के कार्यकाल में ये फर्ज़ी मुठभेड़ हुए थे और तब कांग्रेस विपक्ष में थी. हमारी मांग पर ही न्यायिक जांच आयोग का गठन किया गया था.

सुशील आनंद शुक्ला ने कहा, ''हमारी सरकार ने न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट विधानसभा में रखी थी और उसमें कार्रवाई की अनुशंसा भी की थी. अब जबकि सरकार बदल गई है, तब यह भाजपा की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह अपने कार्यकाल के इन फर्जी मुठभेड़ों के मामले में न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट पर कार्रवाई करे और आदिवासियों को न्याय दे.''

बीबीसी ने छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा से इस बारे में सवाल किया.

इस पर विजय शर्मा कहते हैं, ''नक्सलवाद से परेशान बस्तर का आम आदिवासी अब विकास चाहता है और इसे रोकने के लिए विकास विरोधी दुष्प्रचार करते हैं. अभी तक की जानकारी, तथ्यों के अनुसार गोली, क्रॉस फायरिंग में लगी है. कुछ और तथ्य भविष्य में आएंगे तो हम दिखवाएंगे.''

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