उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी में इस्तीफ़ों की झड़ी, बेटे को मंत्री बनाने से बढ़ा असंतोष

उपेंद्र कुशवाहा

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इमेज कैप्शन, बेटे को मंत्री बनाए जाने को लेकर उपेंद्र कुशवाहा को अपनी पार्टी में विरोध का सामना करना पड़ा.

उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के सात नेताओं ने गुरुवार को पार्टी प्रमुख पर वंशवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए इस्तीफ़ा दे दिया.

उपेंद्र कुशवाहा राज्यसभा सांसद हैं जबकि उनकी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा हाल ही में संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव में सासाराम सीट से विधायक बनी हैं.

उम्मीद की जा रही थी कि नीतीश कुमार की नई कैबिनेट में कुशवाहा की पत्नी स्नेहलता मंत्री बनेंगी, लेकिन शपथ उनके बेटे दीपक प्रकाश ने ली.

दीपक प्रकाश को बिहार का पंचायती राज विभाग मिला है. हालाँकि दीपक प्रकाश अभी ना तो बिहार विधानसभा के सदस्य हैं और ना ही विधानपरिषद के.

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बिहार विधानसभा चुनावों में उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाली आरएलएम ने एनडीए गठबंधन के हिस्से के रूप में छह में से चार सीटें जीती थीं.

इन चार विधायकों को दरकिनार करके दीपक प्रकाश को मंत्री बनाया गया. इससे पार्टी के अंदर असंतोष पैदा हो गया.

सात पार्टी नेताओं ने उपेंद्र कुशवाहा के इस निर्णय का विरोध करते हुए इस्तीफा दे दिया.

इनमें बिहार राज्य पार्टी अध्यक्ष महेंद्र कुशवाहा और उपाध्यक्ष जितेंद्र नाथ शामिल हैं.

इस्तीफ़ा देने वाले नेताओं ने क्या कहा?

दीपक प्रकाश

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इमेज कैप्शन, आरएमएल की ओर से उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश ने मंत्री पद की शपथ ली.
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उन्होंने आरोप लगाया कि उपेंद्र कुशवाहा ने "समाजवादी सिद्धांतों का पालन करने के बजाय पारिवारिक राजनीति (वंशवाद) को बढ़ावा दिया."

महेंद्र कुशवाहा ने मीडिया से कहा, "उपेंद्र कुशवाहा अक्सर राजनीति में नैतिक मूल्यों की बातें करते हैं लेकिन जब मौक़ा आया, तो उन्होंने सत्ता के लिए अपने परिवार को तरजीह दी."

गुरुवार को पार्टी छोड़ने वाले अन्य नेता हैं, राज्य पार्टी महासचिव और प्रवक्ता राहुल कुमार, राज्य महासचिव एवं नालंदा ज़िला प्रभारी राजेश रंजन सिंह, राज्य महासचिव और जमुई जिला प्रभारी बिपिन कुमार चौरसिया, राज्य महासचिव एवं लखीसराय ज़िला प्रभारी प्रमोद यादव और शेखपुरा जिला अध्यक्ष पप्पू मंडल.

उपाध्यक्ष जितेंद्र नाथ ने कहा, "मैं नौ साल से पार्टी के साथ हूँ, लेकिन अब अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर अनिश्चित हूँ. श्री कुशवाहा का यह निर्णय वंशवाद को बढ़ावा देने का क्लासिक उदाहरण है."

राहुल कुमार ने कहा, "श्री कुशवाहा वंशवाद के जाल में फँस गए हैं."

उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के लिए यह कितना बड़ा झटका है? यही सवाल उनके एक क़रीबी दोस्त से पूछा तो उन्होंने नाम नहीं ज़ाहिर करने की शर्त पर कहा, ''उपेंद्र जी को अपने परिवार के सिवा किसी और पर भरोसा नहीं है. सच कहिए तो उन्हें ख़ुद पर भी भरोसा नहीं है. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि वह हर बार अपने ही फ़ैसले को बदलते हैं.''

उन्होंने कहा, ''कई लोग कह रहे हैं कि उनकी पार्टी पति, पत्नी और बेटे की बन गई है. इसके अलावा राजनीतिक रूप से वह बहुत अस्थिर रहते हैं. आप चिराग पासवान को देखिए. चिराग के साथ भी मुश्किलें आईं लेकिन उनमें एक किस्म की स्थिरता रही और इसका फ़ायदा भी मिला. लेकिन उपेंद्र जी के साथ ऐसा नहीं है.''

उपेंद्र कुशवाहा ने क्या कहा?

उपेंद्र कुशवाहा

अपने बेटे की कैबिनेट में नियुक्ति का बचाव करते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने कहा था कि वह "योग्य कंप्यूटर इंजीनियर" हैं.

उन्होंने कहा था, "दीपक प्रकाश कोई असफल छात्र नहीं हैं. उन्होंने कड़ी मेहनत की, कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की और नौकरी भी की. उन्हें ख़ुद को साबित करने का समय दें, मुझे यक़ीन है कि वे आपकी अपेक्षाओं और विश्वास पर खरा उतरेंगे."

दीपक प्रकाश अभी राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं लेकिन संभावना है कि जल्द ही राज्य विधान परिषद के सदस्य के रूप में निर्वाचित होंगे.

वंशवाद को बढ़ावा देने के आरोप पर पूछे जाने पर उपेंद्र कुशवाहा ने कहा था, "मैंने पार्टी के लिए एक कठिन निर्णय लिया है. समुद्र मंथन में अमृत और विष दोनों निकलते हैं. कुछ लोगों को विष पीना पड़ता है. हां, मेरा वर्तमान निर्णय वंशवाद के आरोपों को जन्म देगा, लेकिन मैंने यह निर्णय लिया."

24 नवंबर को उपेंद्र कुशवाहा ने एक्स पर लिखा, ...कभी नीतीश जी ने कहा था - "खाना खाते वक्त मक्खियाँ भन-भनाएँगी. चिंता मत कीजिए. बाएँ हाथ से भगाते रहिए. दाहिने से खाते रहिए."

उपेंद्र कुशवाहा का राजनीतिक उतार चढ़ाव

नीतीश कुमार के बिहार में 10वीं बार मुख्यमंत्री बनने पर उपेंद्र कुशवाहा ने बधाई दी.

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इमेज कैप्शन, उपेंद्र कुशवाहा 2009 से 2023 के बीच जेडीयू से तीन बार अलग हुए थे.

2009 के बाद 2023 में तीसरी बार उपेंद्र कुशवाहा ने जेडीयू को छोड़ा था.

पहली बार जेडीयू छोड़ने के बाद उपेंद्र कुशवाहा ने शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए थे.

उपेंद्र कुशवाहा इससे पहले 2013 में जेडीयू से अलग हुए थे और अलग पार्टी बनाई थी.

साल 2014 में कुशवाहा एनडीए में शामिल हो गए थे, जबकि नीतीश कुमार आरजेडी के साथ चले गए थे.

उन्हें मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में मंत्री भी बनाया गया था.

इसके बाद कुशवाहा ने राष्ट्रीय लोक समता पार्टी बनाई और 2014 के लोकसभा चुनाव में वह एनडीए में शामिल थे.

इस चुनाव में उन्हें बिहार में तीन लोकसभा सीटें एनडीए से मिली थीं और तीनों पर जीत हुई थी.

साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में कुशवाहा की पार्टी ने 23 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन महज़ तीन सीटों पर ही वो खाता खोल पाई थी.

साल 2018 में कुशवाहा एनडीए से अलग हो गए थे. साल 2023 में जेडीयू से अलग होकर उन्होंने राष्ट्रीय लोक जनता दल (आरएलजेडी) बनाई.

उस समय उन्होंने कहा था, "नीतीश कुमार शायद कुछ ऐसे लोगों के बहकावे में आ गए थे, जिनका समाजवादी विचारधारा और विरासत से कोई लेना-देना नहीं था. जेडीयू समाजवादी आइकन कर्पूरी ठाकुर के दिखाए रास्ते से भटक गई थी. जब मैं 2021 में नीतीश कुमार के बुलावे पर जेडीयू में दोबारा शामिल हुआ था, मैं मानता था कि हम समाजवादियों को साथ रहना चाहिए."

कुशवाहा ने कहा कि उन्हें इस बात का अफ़सोस है कि नीतीश ने आरजेडी के साथ गठबंधन किया और बाद में यह संकेत भी दिया कि तेजस्वी प्रसाद यादव उनके उत्तराधिकारी होंगे.

मार्च 2021 में उपेंद्र कुशवाहा ने अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का जनता दल यूनाइटेड में विलय कर दिया था.

हालिया बिहार विधानसभा चुनावों में उपेंद्र कुशवाहा जेडीयू के साथ एनडीए गठबंधन में शामिल थे.

उनकी वापसी का मतलब है नीतीश कुमार की मुख्य राजनीतिक ज़मीन यानी ओबीसी कुर्मी-कोइरी वोटबैंक का मजबूत होना.

इन दो जातियों के गठबंधन को राजनीतिक शब्दावली में लव-कुश कहा जाता है और राज्य में इनकी आबादी लगभग 10 प्रतिशत के क़रीब है.

कुशवाहा भले ही पिछले विधानसभा चुनाव में कोई सीट न जीत पाए हों, लेकिन उन्होंने 30 सीटों पर 5,000 से 39,000 वोट लेकर जेडीयू के लिए स्पॉइलर का काम किया था.

जेडीयू को कम से कम एक दर्जन सीटों पर मगध (गया, औरंगाबाद और जहानाबाद) और शाहाबाद (भोजपुर, बक्सर, कैमूर और रोहतास) क्षेत्रों में और कुछ उत्तर बिहार सीटों पर नुक़सान हुआ था.

क्योंकि नीतीश और कुशवाहा एक ही राजनीतिक ज़मीन साझा करते हैं, इसलिए कुशवाहा का बहुत छोटा वोट प्रतिशत का इधर उधर होना भी कड़ी टक्कर में जेडीयू के लिए भारी नुक़सानदेह साबित होता है.

इस बात का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि साल 2015 में जिस जेडीयू की 71 सीटें थीं, वो 2020 के चुनाव में 43 ही रह गईं और जेडीयू तीसरे स्थान पर खिसक गई.

आरजेडी को 75 और बीजेपी को 74 सीटें मिलीं.

ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार को अपनी पार्टी मज़बूत करने के लिए हर विकल्प तलाशने पर मजबूर होना पड़ा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.