प्रशांत किशोर ने राजनीति छोड़ने के अपने बयान पर अब क्या कहा, उनके दावे बिहार चुनाव में क्यों हवा हो गए?

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने कहा था कि अगर जनता दल (यूनाइटेड) ने चुनाव में 25 से ज़्यादा सीटों पर जीत दर्ज की तो वह राजनीति छोड़ देंगे.
जेडीयू ने बिहार में 85 सीटें जीती हैं. इसके बाद से यह सवाल उठ रहा था कि क्या प्रशांत किशोर राजनीति छोड़ेंगे?
मंगलवार को पटना में हुई प्रेस कॉन्फ़्रेंस में प्रशांत किशोर ने अपने इस बयान पर सफाई दी है. उन्होंने कहा, "मैं उस बात पर बिल्कुल कायम हूं. अगर नीतीश कुमार की सरकार ने ये वोट नहीं ख़रीदे हैं, तो मैं राजनीति से संन्यास ले लूंगा."
प्रेस कॉन्फ़्रेंस में एक पत्रकार ने उन्हें काउंटर किया कि 'जब आपने ये बयान दिया था, तब ये शर्तें क्यों नहीं बताईं थीं?'
इस पर प्रशांत किशोर ने कहा, "मैं किस पद पर हूं कि इस्तीफ़ा दे दूं? मैंने ये तो नहीं कहा था कि बिहार छोड़कर चले जाएंगे. मैंने राजनीति छोड़ रखी है, राजनीति कर ही नहीं रहे हैं. लेकिन ये तो नहीं कहा है कि बिहार के लोगों की बात उठाना छोड़ देंगे."
जन सुराज पार्टी का दावा है कि नीतीश कुमार की सरकार ने चुनाव से पहले कई सारी योजनाएं लाईं और बिहार की जनता के खातों में पैसे भेजे. इसकी वजह से एनडीए फिर सत्ता में आई है और जन सुराज को हार मिली है.

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चुनावी रणनीतिकार से राजनीति के मैदान में उतरे प्रशांत किशोर के लिए बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे एक बुरे सपने की तरह हो सकते हैं.
बीते क़रीब तीन साल से बिहार में लगातार सियासी यात्राएं और सभाएं करने वाले प्रशांत किशोर की पार्टी को इन चुनावों में बड़ा झटका लगा है. ऐसा तब है जब प्रशांत किशोर बीजेपी से लेकर जेडीयू और टीएमसी तक कई दलों को सत्ता तक पहुँचाने का दावा करते रहे हैं.
हालांकि प्रशांत किशोर ख़ुद अपनी जन सुराज पार्टी के लिए ज़्यादा कुछ नहीं कर पाए. चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने कई मौक़ों पर दावा किया था कि इस बार बिहार में बदलाव होगा और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे.
उन्होंने बिहार में शिक्षा, रोज़गार और पलायन को बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की थी. उनकी जन सुराज पार्टी का चुनाव चिह्न भी स्कूल बैग है.
उनके जन सुराज अभियान का नारा भी रहा है, "जनता के सुंदर राज के लिए, बिहार के बदलाव के लिए."
बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का प्रदर्शन बेहद ख़राब रहा है. पार्टी ने बिहार की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बनाई, लेकिन वोटिंग से पहले ही उसे झटके लगना शुरू हो गए थे.
जन सुराज पार्टी के कई उम्मीदवारों ने अपना नामांकन वापस ले लिया, इससे प्रशांत किशोर के लिए हालात असहज दिखने लगे.
हालाँकि प्रशांत किशोर ने ये भी आरोप लगाया था कि उनके उम्मीदवारों को डरा धमकाकर नाम वापस कराए गए.
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का प्रदर्शन

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प्रशांत किशोर ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के कार्यक्रम 'द लेंस' में कहा था कि उनकी पार्टी 'या तो अर्श पर होगी या फ़र्श पर होगी.' उन्होंने इसमें अपनी पार्टी के लिए 10 से भी कम सीटें या 170 से ज़्यादा सीटें जीतने का दावा किया था.
नतीजों के बाद बीबीसी से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण ने कहा, "हाल के समय में देखें तो प्रशांत किशोर अपने हर आकलन में ग़लत साबित हुए हैं. उन्होंने साल 2024 के चुनावों को लेकर दावा किया था कि बीजेपी को 300 से ज़्यादा सीटें आएंगी, जो सही साबित नहीं हुआ."
उनका मानना है, "ऐसा लगता है कि प्रशांत किशोर अपने आकलन में नीतीश कुमार से कोई व्यक्तिगत नाराज़गी निकाल रहे हैं, क्योंकि पहले वो नीतीश की पार्टी में रहे हैं."
हालाँकि राजनीतिक विश्लेषक और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र कुमार इस परिणाम को एक अलग तरीक़े से देखते हैं.
उन्होंने शुक्रवार को रिज़ल्ट के बाद कहा था, "प्रशांत किशोर की पार्टी के बहुत अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद किसी ने नहीं की होगी, ख़ुद प्रशांत किशोर ने ऐसी उम्मीद नहीं की होगी, लेकिन इस चुनाव ने कम से कम उनकी पार्टी को बिहार में हर किसी से परिचित करा दिया."
पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, "इस चुनाव को प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के लिए एक लॉन्चिंग पैड के तौर पर देखा जाना चाहिए और यह अपने कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ाने के लिए उनके पास एक मौक़ा था."
क्या केजरीवाल की कॉपी कर रहे थे प्रशांत किशोर

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प्रशांत किशोर शुरू में यह दावा कर रहे थे कि बिहार विधानसभा चुनाव में वो राघोपुर सीट से पार्टी के उम्मीदवार बनेंगे. यह वही सीट है जहां से आरजेडी के तेजस्वी यादव चुनाव लड़ रहे थे.
पीके के इस दांव को एक साहस भरा क़दम बताया जा रहा था. दिल्ली में आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने तीन बार की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को नई दिल्ली सीट से कुछ इसी तरह चुनौती दी थी.
केजरीवाल ने न केवल शीला दीक्षित को हरा दिया बल्कि दिल्ली में उनकी पार्टी कांग्रेस के विकल्प की तरह महत्वपूर्ण पार्टी बनकर स्थापित हो गई.
जबकि तेजस्वी यादव न तो बिहार की सत्ता पर काबिज़ थे और न ही उनके पास बहुत ज़्यादा सियासी तजुर्बा था, फिर प्रशांत किशोर ने अंतिम समय में चुनाव लड़ने से अपने कदम पीछे खींच लिए.
पीके ने बताया कि अन्य सीटों पर ध्यान देने के लिए उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं की मांग पर चुनाव नहीं लड़ा.
वरिष्ठ पत्रकार माधुरी कुमार कहती हैं, "प्रशांत किशोर की रणनीति सफल नहीं हुई, उन्होंने केजरीवाल पैटर्न पर राजनीति करने की सोची थी. लेकिन उनकी समझ में भूल थी. बिहार एक बड़ा राज्य है और एक साल की मेहनत के दम पर कोई राजनीति में नहीं छा सकता है."
माधुरी कुमार का मानना है, "जेन ज़ी हो, जेन एक्स हो या जेन वाय हो, यानी हर उम्र के लोग इस बात को समझते हैं. प्रशांत किशोर दूसरी स्थापित पार्टियों के लिए रणनीति बना सकते हैं, प्रशांत किशोर जिन्हें जिताने का दावा करते हैं वो जमे हुए लोग थे. राजनीति के लिए वर्षों तक लगा रहना होता है."
कहाँ से जगी उम्मीद

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ठीक एक साल पहले बिहार में चार विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे. बिहार में यह उपचुनाव एक लिहाज़ से काफ़ी अहम था, क्योंकि इसमें प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी पहली बार चुनाव लड़ रही थी.
उस वक़्त तरारी और रामगढ़ की सीट बीजेपी के खाते में गई थी. इमामगंज सीट पर जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा यानी हम (सेक्युलर) ने कब्ज़ा किया, जबकि बेलागंज सीट जेडीयू के खाते में गई थी.
यानी पीके की पार्टी को किसी सीट पर जीत नहीं मिली और न ही वो किसी सीट पर मुक़ाबले में दिखी. लेकिन उसने कम से कम दो सीटों पर विपक्षी उम्मीदवारों की हार में अहम भूमिका निभाई थी.
उन नतीजों के बाद प्रशांत किशोर ने पत्रकारों से कहा, "जहां पिछले 50 साल से जाति की राजनीति का दबदबा हो वहां पहले ही प्रयास में 10 फ़ीसदी वोट लाना हमारा जलवा है या क्या है, ये आप तय कर लीजिए."
प्रशांत किशोर ने कहा, "अगर हमारी पार्टी को दस प्रतिशत वोट आया है तो यह मेरी ज़िम्मेवारी है. भले ही यह मेरी अकेली की ज़िम्मेवारी नहीं है. लेकिन मैं पीछे नहीं हटने वाला हूं. इस दस प्रतिशत को 40 प्रतिशत करना है. यह एक साल में हो या पांच साल में हो."
प्रशांत किशोर उसके बाद एक साल तक लगातार बिहार में अपनी पार्टी को आगे बढ़ाने की कोशिश में जुटे रहे, लेकिन इसका नतीजा उनके लिए किसी झटके से कम नहीं रहा है.
जन सुराज पार्टी इन चुनावों में 10% को आगे बढ़ाने में नाकाम तो रही ही, साथ ही पार्टी 5% वोट तक हासिल नहीं कर पाई.
माधुरी कुमार कहती हैं, "हवा में बातें करना कभी कभी काम करता है. जनता समझ चुकी है कि विकास किसे कहते हैं और यह कैसे हो सकता है. जनता ने देखा है कि नीतीश कुमार ने बीते 20 साल में बिहार में सिलसिलेवार तरीक़े से विकास किया है."
पीके का भविष्य

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नचिकेता नारायण का कहना है कि प्रशांत किशोर ने दावा किया था कि इस बार जेडीयू को 25 से कम सीटें आएंगी और अगर ऐसा नहीं हुआ तो वो राजनीति छोड़ देंगे, हालांकि नीतीश की पार्टी को इससे बहुत ज़्यादा सीटें मिलती दिख रही हैं. यानी पीके की यह भविष्यवाणी भी फ़ेल हो गई है.
तो क्या अब वो राजनीति के मैदान से विदाई ले लेंगे?
पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, "मुझे लगता है कि प्रशांत किशोर राजनीति छोड़कर भागेंगे नहीं. वो लंबी रेस के घोड़े हैं. उन्होंने पढ़े लिखे लोगों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की है."
"इन चुनावों में उनके लिए एक अच्छी ख़बर ये है कि बिहार का प्रमुख विपक्षी दल आरजेडी काफ़ी कमज़ोर हो चुका है तो अब उनके लिए पहले विपक्ष की जगह पर क़ब्ज़ा करने का लक्ष्य होगा, जो थोड़ा आसान दिखता है."
हालांकि पुष्पेंद्र कुमार मानते हैं कि आरजेडी के कोर वोटर्स उसके साथ अब भी जुड़े हुए हैं जो इन चुनावों में उसे मिले वोट से दिखता है.
इसकी तुलना में पीके के लिए बीजेपी, जेडीयू का सत्ता पक्ष के साथ जुड़े वोटों में सेंध लगाना थोड़ा आसान हो सकता है, हालाँकि प्रशांत किशोर के लिए भविष्य में कुछ करना चुनौतियों से भरा होगा.
वहीं नचिकेता नारायण मानते हैं कि बिहार में विपक्ष के कमज़ोर होने से विपक्षी दलों और प्रशांत किशोर के लिए मौजूदा नतीजों के बाद विपक्ष के साथ तालमेल बनाना आसान होगा.
वो कहते हैं, "मौजूदा परिणाम पीके के लिहाज़ से बहुत अप्रत्याशित नहीं हैं. हाँ सत्ता पक्ष को इतनी सीटें मिलना ज़रूर चौंकाने वाला है. ये तमाम एंटी इनकंबेंसी के बाद भी महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और हरियाणा जैसे परिणाम हैं."
"पीके ऐसी स्थिति में क्या करेंगे, इसके लिए थोड़ा इंतज़ार करना होगा. उनके बारे में हम बीते 3-4 साल से ही ज़्यादा जानते हैं, वो पहले क्या करते थे इसके बारे में बहुत जानकारी कम से कम बिहार में तो लोगों को नहीं है. इसलिए वो आगे क्या करेंगे ये बता पाना आसान नहीं है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

















