नेपाल भूकंप: कटोरी और थालियों से खोदकर मलबे में दबे लोगों को बचाने की कोशिश

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- Author, शरद के.सी.
- पदनाम, बीबीसी नेपाली सेवा
नेपाल के पश्चिमी हिस्से में आए भीषण भूकंप में अब तक 150 से ज़्यादा लोगों की जान गई है और 350 से ज़्यादा ज़ख़्मी हुए हैं.
हज़ारों लोग बेघर भी हो गए हैं जिन्हें खुले आसमान के नीचे सर्द रातें काटनी पड़ रही हैं.
राजधानी काठमांडू से 300 किलोमीटर पश्चिम में जाजरकोट और पश्चिमी रुकुम ज़िले भूकंप से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं.
शुक्रवार से अब तक यहां दर्जनों झटके महसूस किए जा चुके हैं. बीबीसी ने इन प्रभावित इलाक़ों में काफ़ी दूर बसे गांवों का दौरा किया.
इन गांवों में जान-माल का भारी नुक़सान हुआ है और लोगों को मदद की सख़्त ज़रूरत है.

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सामूहिक चिताएं
जाजरकोट में नालगड नगरपालिका के तहत आने वाले चिउरी गांव की तलहटी पर थुली भेरी नदी बहती है.
पानी के बहाव के साथ-साथ यहां लोगों के बिलखने और सिसकने की आवाज़ें भी गूंज रही हैं.
नदी किनारे रखे गए 13 शवों के इर्द-गिर्द लोग खड़े हैं. अपनों को खोने के ग़म में कुछ महिलाएं बेसुध हो गई थीं, जिन्हें एंबुलेंस से अस्पताल ले जाना पड़ा.
चिउरी गांव के 13 लोगों का एकसाथ अंतिम संस्कार किया गया. छह शवों को एक ही चिता पर रखा गया था, बाक़ी चिताएं अलग थीं.
चिउरी में 186 मकान हैं. शुक्रवार को आए भूकंप ने यहां ऐसी तबाही मचाई कि एक दर्जन से ज़्यादा लोगों की जान चली गई.
मरने वालों में दलित बस्ती में रहने वाले हीरे कामी, उनकी पत्नी और दो बच्चों भी शामिल हैं.
उनके पड़ोसियों और रिश्तेदारों को लगता है कि अगर जल्दी मदद पहुंचती तो हीरे कामी को बचाया जा सकता है.
हरि बहादुर चुनारा उस रात को याद करते हुए कहते हैं, “आधी रात को पूरे गांव में शोर और रोने की आवाज़ें सुनाई देने लगीं. हमने देखा कि हीरे कामी मलबे में दबे हुए ते और बात कर पा रहे थे. ”
गांव वालों ने कटोरी, थालियों और घर की दूसरी चीज़ों से खोदकर मलबा हटाने की कोशिश की ताकि दबे हुए लोगों को बचाया जा सके.
हत्तीराम महर नाम के एक युवक ने बताया कि उन्होंने भी हीरे कामी को बचाने की कोशिश की थी.
उन्होंने कहा कि 'गांव वालों ने कटोरी, थालियों और घर की दूसरी चीज़ों से खोदकर मलबा हटाने की कोशिश की ताकि दबे हुए लोगों को बचाया जा सके.'
जिस जगह हीरे कामी दबे हुए थे, उस ओर इशारा करते हुए महार बताते हैं, “हीरे ने आवाज़ दी कि मैं यहां हूं. यह सुनकर हम उस ओर गए. मगर उसी हाल में उन्होंने दम तोड़ दिया.”
हत्तीराम ने बताया कि हीरे कामी भी उनकी तरह भारत में काम करते थे और कुछ दिन पहले ही घर आए थे. वे नेपाल का सबसे बड़ा त्योहार तिहार मनाने के बाद वापस भारत जाने वाले थे.
हीरे कामी की सबसे बड़ी बेटी बच गई हैं. जैसे ही उन्हें पता चला कि एक बहन के अलावा बाक़ी सभी सदस्यों की मौत हो गई है तो वह बेसुध हो गईं. उन्हें एंबुलेंस में अस्पताल ले जाना पड़ा.
जैसे ही चिताओं की आग बुझने लगी, ग़म में डूबे लोग सड़क पार करके पहाड़ी पर मौजूद अपने उन घरों की ओर जाने लगे, जो भूकंप में तबाह हो गए हैं.

मदद का इंतज़ार
हरि बहादुर चुनारा मदद मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं. वह कहते हैं कि उनके पास सिर ढकने के लिए कुछ नहीं है. उन्हें नहीं पता कि कब मदद मिलेगी कि वह कुछ इंतज़ाम कर सकें.
जाजरकोट के नलगाड में भूकंप से बहुत ज़्यादा नुक़सान हुआ है. नगरपालिका के सूचना अधिकारी जूना शाही के मुताबिक़, यहां 52 लोगों की मौत हुई है.
लेकिन अब, सबसे बड़ा सवाल यह है कि बचे हुए लोगों की मदद कैसे की जाए.
हत्तीराम महर फिक्रमंद हैं कि अपने छोटे बच्चों को ठंड से कैसे बचाएंगे. वह कहते हैं, “उन्हें खुले में रात बितानी पड़ेगी. अगर टेंट मिल गए होते बड़ी मदद होती.”

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थुली भेरी नदी के दूसरे किनारे पर आठबिसकोट नगरपालिका में रहने वाले गणेश मल्ला अस्पताल में भर्ती हैं. उन्हें हेलिकॉप्टर से रेस्क्यू करके यहां लाया गया है.
सिसकते हुए वह कहते हैं, “मेरी दो बेटियों की मौत हो गई. मेरी पत्नी और बेटा घायल हैं. मुझे नहीं पता कि उनका इलाज कहां चल रहा है.”
भूकंप के बाद सुबह-सुबह जब घायलों को अस्पताल लाया गया तो उनकी पहचान नहीं की गई.
अस्पताल में ऑर्थोपेडिक सर्जन पदम गिरी ने कहा, “हमने केस 1 और केस 2 जैसे नंबर देकर इलाज करना शुरू किया था. कुछ लोगों के पास कपड़े भी नहीं थे. हमने उन्हें कपड़े दिए.”
उनके मुताबिक़, अस्पताल में 30 घायलों का इलाज किया जा रहा है.

ग़रीबों पर आफ़त
भूकंप का केंद्र बारेकोट में था, मगर कहा जा रहा है कि यहां उतना ज़्यादा नुक़सान नहीं हुआ है.
गणेश जी.सी. अध्यापक हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि लगभग सभी प्रभावित इलाक़ों में कच्चे मकान ढहे हैं.
इनमें से कई मकान तो तिनकों की तरह बिखर गए हैं. कुछ की दीवारें ढह गई हैं, जबकि कुछ में दरारें पड़ गई हैं.
हालांकि, कंक्रीट और सीमेंट के मकानों में कोई नुक़सान नहीं देखा गया.
गणेश ने बताया, “जब भी बाढ़ या भूस्खलन आते हैं, तो वे ग़रीबों के लिए आफ़त लाते हैं. भूकंप ने भी ग़रीबों को नुक़सान पहुंचाया है.”
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