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उत्तराखंड: समान नागरिक संहिता क्या समलैंगिक शादी के लिए बना सकती है रास्ता? – प्रेस रिव्यू
सुप्रीम कोर्ट के समलैंगिक शादी को लेकर आए फ़ैसले के बाद अब ध्यान उत्तराखंड में यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) या समान नागरिक संहिता को लेकर बनाए पैनल पर जा सकता है.
मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई स्पष्ट स्टैंड नहीं लिया था. कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में जेंडर न्यूट्रल क़ानून बनाने की संभावना तलाश की जानी चाहिए.
अख़बार द इकोनॉमिक टाइम्स में छपी एक ख़बर के अनुसार उत्तरखंड के यूसीसी पैनल जिन मामलों पर विचार कर रहा है उनमें से एक समलैंगिक शादी है. पैनल पर ऐसे क़ानून की सलाह देने की ज़िम्मेदारी है, जिसमें विवाह और तलाक संबंधी, गुज़ारा भत्ता, उत्तराधिकारी और उत्तराधिकार संबंधी क़ानून जैसे सभी परिवार संबंधी क़ानूनों के उद्देश्यों को जगह दी जाए.
अख़बार लिखता है कि पैनल जिस रिपोर्ट और ड्राफ़्ट क़ानून पर काम कर रहा है वो मूलरूप से काफी हद तक जेंडर न्यूट्रल है ताकि क़ानून की भाषा और भाव को प्रगतिशील रखा जा सके- इसमें महिला और पुरुष जैसे लैंगिक शब्दों की जगह 'स्पाउस' (साथी) शब्द का इस्तेमाल किया गया है जो किसी लिंग विशेष को नहीं बताता.
समलैंगिक शादी और लिव-इन रिश्तों के दो मुद्दों पर अगल-अलग तरह की राय मिलने के बाद पैनल में इन दो मुद्दों को लेकर तीखी बहस हुई जिसके बाद पैनल ने जेन्डर न्यूट्रल रहने के तरीकों को अपनाया.
अख़बार लिखता है कि समलैंगिक शादी पर कई लोगों के अलावा आम जनता ने भी पैनल को राय दी थी.
इनमें प्रदेश के सूदूर इलाक़ों में रह रही निरक्षर महिलाएं भी शामिल थीं जिन्होंने पैनल को अपनी राय भेजी थी. इनमें से कई का कहना था कि समलैंगिक शादी को इस आधार पर इज़ाज़त दी जानी चाहिए कि हर इंसान को सम्मान के साथ जीने का हक़ है.
हालांकि पैनल को मिली कई लोगों की राय में इसका विरोध किया गया था, इसमें कई जाने-माने राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन शामिल थे.
पैनल में उन मुश्किलों पर भी बहस हुई जिन्हें समलैंगिक लोग अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में झेलते हैं, साथ ही समलैंगिक जोड़ों के साथ समाज में होने वाले भेदभाव से लेकर उनके सामने उत्तराधिकार को लेकर आने वाली परेशानी पर भी चर्चा हुई. पैनल में जिन विषयों पर बहस हुई उनमें एक अहम मुद्दा समलैंगिक जोड़ों की क़ानूनी मान्यता का था.
अख़बार लिखता है कि पैनल की रिपोर्ट के पहले ड्राफ्ट में शादी में समानता सुनिश्चित करते हुए अधिक जेंडर-न्यूट्रल रवैया अपनाया गया है. हालांकि ये भी कहा गया है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार करना बेहतर होगा क्योंकि मामला पहले ही सुनवाई के लिए कोर्ट में है.
अब मंगलवार को आए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद ध्यान एक बार फिर समलैंगिकों के सामने रोज़ाना की दिक्कतों पर आ गया है और इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि इस विषय पर आगे की बहस के लिए यूसीसी पैनल पर लोगों का ध्यान जाएगा.
पैनल का कहना था कि लिव-इन रिश्तों के लिए एक रजिस्ट्रेशन जैसी व्यवस्था होनी चाहिए क्योंकि इस तरह के रिश्तों में ब्लैकमेल, जबरन वसूली, हिंसा और अपराध की संभावना को रोकने की ज़रूरत है.
उत्तराखंड के यूसीसी पैनल का मामला दिलचस्प है. पैनल की चेयरपर्सन रिटायर्ड जस्टिस रंजना देसाई ने जून में कहा था कि पैनल जल्द ही अपनी रिपोर्ट के साथ-साथ ड्राफ्ट यूसीसी क़ानून पेश करेगा.
लेकिन पैनल ने अब तक अपनी रिपोर्ट पेश नहीं की है. पैनल का कार्यकाल भी अगले साल जनवरी के आख़िरी महीने तक के लिए बढ़ा दिया गया है.
कांग्रेस को तय करना है गठबंधन कौन से स्तर पर है- अखिलेश
मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन की कम होती संभावना के बीच अखिलेश यादव ने कहा है कि ये कांग्रेस पर है कि वो अपना स्टैंड स्पष्ट करे.
मंगलवार को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि ये कांग्रेस पर निर्भर है कि वो इंडिया गठबंधन में अपने साथियों की स्थिति स्पष्ट करे और ये बताए कि सीट शेयरिंग केवल राष्ट्रीय स्तर पर होगा या फिर इसे राज्य स्तर पर भी अमल में लाया जाएगा.
अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार अखिलेश यादव ने कानपुर में कहा, "ये कांग्रेस को बताना पड़ेगा कि इंडिया गठबंधन अगर देश के स्तर पर है तो देश के किस स्तर पर है. अगल ये प्रदेश के स्तर पर नहीं है तो भविष्य में भी प्रदेश के स्तर पर नहीं होगा. ये तो कांग्रेस को बताना होगा मैं इसमें कुछ नहीं बोल सकता."
मध्य प्रदेश चुनावों को लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच चली बैठक को लेकर अखिलेश यादव ने कहा कि "दोपहर एक बजे तक सीट शेयरिंग को लेकर चर्चा होती रही. बात आगे नहीं बढ़ सकी, मतलब आगे नहीं बढ़ सकी."
रविवार को कांग्रेस ने मध्य प्रदेश की सात सीटों में से चार सीटों पर उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की. इन सीटों पर समाजवादी पार्टी पहले ही अपने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर चुकी है.
इंडिया गठबंधन में सहयोगी के तौर पर समाजवादी पार्टी ने इसे लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी और चार और उम्मीदवारों के नामों की लिस्ट जारी कर दी.
मध्य प्रदेश के लिए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष रामायण सिंह पटेल ने अख़बार से कहा, "कांग्रेस के साथ गठबंधन की सभी सभावनाएं ख़त्म हो चुकी हैं."
अखिलेश यादव के क़रीब माने जाने वाले समाजवादी पार्टी के एक नेता ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि बीजेपी को हराने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है.
वहीं मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता पीयूष बाबेले ने कहा है कि सीट शेयरिंग पर आख़िरी फ़ैसला पार्टी हाई कमान लेगी. इस बीच एक और कांग्रेस नेता ने कहा है कि समाजवादी पार्टी जितनी सीटें जीत सकती है उससे कहीं अधिक सीटों पर किस्मत आज़माना चाहती है.
मध्य प्रदेश के लिए कांग्रेस के घोषणापत्र में आईपीएल टीम, 25 लाख का बीमा का वादा
मध्य प्रदेश में चुनावों से पहले कांग्रेस ने मंगलवार को वचन पत्र नाम से अपना घोषणापत्र जारी किया है.
अख़बार द हिंदू में छपी ख़बर के अनुसार इसमें राज्य की आईपीएल टीम, परिवारों के लिए 25 लाख का स्वास्थ्य बीमा और 10 लाख के एक्सीडेंट बीमा की बात की गई है.
साथ ही कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में जाति सर्वे करवाने, ओबीसी को 27 फ़ीसदी आरक्षण, दो लाख तक के कृषि कर्ज़ माफ़ करने और पुराने पेन्शन सिस्टम को फिर से बहाल करने की बात की है.
106 पन्नों के इस दस्तावेज़ में कांग्रेस ने कहा है कि यदि वो सत्ता में आई तो 2,600 रुपया प्रति क्विंटल की दर से किसानों से गेहूं और 2,500 रुपया प्रति क्विंटल की दर से किसानों से चावल खरीदेगी. साथ ही बेरोज़गारों को 1,500 से 3,000 रुपये तक प्रति माह बेरोज़गारी भत्ता देगी.
घोषणापत्र जारी करते हुए कांग्रेस प्रदेश कमिटी के अध्यक्ष कमलनाथ ने नन्दिनी गौ-धन योजना लाने की बात की और कहा कि इसके तहत सरकार दो रुपया प्रति किलो की दर से गोबर खरीदेगी.
मध्य प्रदेश की 230 सीटों के लिए चुनाव 17 नवंबर को कराए जाने हैं, मतों की गिनती 3 दिसंबर को होगी. माना जा रहा है कि इस बार के चुनावों में मुक़ाबला मुख्य रूप से कांग्रेस और सत्ताधारी बीजेपी के बीच है.
कांग्रेस ने एक बार फिर नारी सम्मान योजना के तहत महिलाओं को प्रतिमाह 1,500 रुपये के भत्ते और 500 रुपये में एलपीजी सिलेंडर देने की अपनी घोषणा को दोहराया है. साथ ही उसने शहरों में महिलाओं के लिए फ्री बस सेवा का वादा किया है. कर्नाटक में इसी साल मई में चुनाव जीतने वाली कांग्रेस वहां भी इस तरह की योजनाओं की बात की थी.
कमलनाथ ने कहा है कि राज्य में मेनिफेस्टो बनाने के लिए पार्टी को क़रीब 9,000 लोगों ने अपनी राय दी थी. उन्होंने कहा, "मुझे रोज़ाना लोगों ने मुलाक़ात के दौरान या फिर व्हाट्सऐप पर अपनी राय भेजी. मुझे कई पोस्टकार्ड भी मिले हैं. जिन इलाक़ों में मैं गया वहां मैंने लोगों से राय लेने के लिए डिब्बे लगवाए, इनमें भी कई लोगों ने अपनी राय पर्ची में लिखकर डाली थी."
अख़बार के अनुसार कांग्रेस के वचन पत्र में 1,290 वादे हैं जिनमें 59 विषयों से जुड़ी 101 मुख्य गारंटी हैं. पार्टी ने अपने मेनिफेस्टों में मुख्य रूप से महिला, युवा, किसानों, मज़दूरों, परिवारों, धारणाओं और सामाजिक न्याय जैसे सात विषयों में बांटा है.
कमलनाथ ने ये भा कहा कि मध्य प्रदेश की भी खुद की आईपीएल टीम होनी चाहिए और कांग्रेस इसे सच बनाएगी.
अख़बार के अनुसार मध्य प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसे "झूठ का दस्तावेज़" करार दिया.
उन्होंने कहा, "पांच साल पहले भी उन्होंने आम लोगों से 9,000 वादे किए थे लेकिन उसने उनमें से एक भी वादा पूरा नहीं किया. एक बार फिर उन्होंने झूठ का एक दस्तावेज़ पेश कर दिया है लेकिन आम लोग इस पर यकीन नहीं करेंगे."
नेशनल पेन्शन स्कीम में बदलाव कर सकती है सरकार
केंद्र सरकार साल के ख़त्म होने से पहले नेशनल पेन्शन स्कीम (एनपीएस) में बदलाव कर सकती है ताकि सरकारी कर्मचारियों को रिटायरमेन्ट के बाद उनकी आख़िरी पगार का 40 से 45 फ़ीसदी मिल सके.
हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक ख़बर के अनुसार इस पर चल रही चर्चा के बारे में जानने वाले दो लोगों ने बताया है कि एक उच्च स्तरीय पैनल फिलहाल इस मामले को देख रहा है और उसकी सलाह के बाद इसे लागू किया जा सकता है.
कर्मचारियों की पेन्शन को लेकर बहस तेज़ हो रही है और राजनीतिक पार्टियां इस पर बंटी नज़र आ रही हैं.
जिन राज्यों में विपक्षी पार्टियों की सरकारें हैं वो पुरानी पेन्शन स्कीम (ओपीएस) को फिर से बहाल कर रहे हैं, जिसके तहत पेन्शनधारियों को अपनी आख़िरी पगार का 50 फ़ीसदी तक मासिक पेन्शन के रूप में मिलता है.
2004 में केंद्र सरकार ने मार्केट लिंक्ड पेन्शन योजना लॉन्च की थी जिसमें किसी तरह की मासिक आय की गारंटी नहीं थी. एक दूसरा मुद्दा इसमें ये था कि एनपीएस में जहां कर्मचारी अपने वेतन का 10 फ़ीसदी हिस्सा देते थे वहीं सरकार अपनी तरफ से 14 फ़ीसदी हिस्सा देती थी और इसी से रिटायमरमेन्ट के बाद पेन्शन मिला करती थी. लेकिन पुरानी पेन्शन स्कीम में कर्मचारी को किसी तरह का आर्थिक योगदान नहीं देना होता था.
एक अधिकारी ने अख़बार को बताया कि नई पेन्शन योजना में बदलाव के बाद "बीमे के तहत मिलने वाली रकम राशि का हिसाब" इस तरह किया जाएगा ताकि इससे व्यक्ति को ज़्यादा पैसा मिले.
कहा ये भी जा रहा है कि इसमें कर्मचारी और सरकार की तरफ से फंड में दिए जाने वाले योगदान में भी बदलाव किए जा सकते हैं.
एनपीएस के तहत पेन्शनभोगी व्यक्ति अपनी पूरी रक़म का 60 फ़ीसदी हिस्सा रिटायरमेन्ट के वक्त निकाल सकता है, इस पर कोई टैक्स नहीं लगेगा. बाकी की 40 फ़ीसदी रक़म वो फिर से किसी स्कीम में जमा कर सकते हैं ताकि उन्हें हर साल उससे आय मिलती रहे. इससे होने वाली आय पर टैक्स लगता है.
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