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समलैंगिक विवाह पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से समुदाय में निराशा लेकिन उम्मीद भी
- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लंबे इंतज़ार के बाद सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इंकार कर दिया है. हालांकि पांच जजों की खंडपीठ कुछ मुद्दों पर सहमत नज़र आई वहीं कुछ मुद्दों पर साफ़ असहमति भी दिखाई दी.
खंडपीठ ने एकमत से माना कि वो समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं दे सकती और कहा कि ये संसद के अधिकार क्षेत्र का मामला है.
साथ ही, कोर्ट ने समलैंगिक जोड़ों को सामाजिक और क़ानूनी अधिकार देने के लिए पैनल का गठन करने के सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया.
लगभग 14 करोड़ की आबादी वाले इस समुदाय को सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का बेसब्री से इंतज़ार था.
जिस तेज़ी से अप्रैल और मई महीने में इस मामले की सुनवाई हुई, समुदाय के लोगों को सकारात्मक फ़ैसले की उम्मीद थी लेकिन मंगलवार को आए निर्णय से वे काफ़ी मायूस नज़र आए.
निराशा हाथ लगी
मुंबई में अपने पार्टनर के साथ 19 साल से रह रहे डॉ. प्रसाद राज दाड़ेकर फ़ोन पर लंबी सांस भरते हुए कहते हैं, ''जैसे ही मैंने फ़ैसला सुनना शुरू किया, मेरी आंखों से आंसू बहने लगे. हम 19 साल से रुके हुए थे. समान अधिकार को लेकर हमारी लड़ाई जारी रहेगी.''
समलैंगिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले अशोक राव कवि निराशा व्यक्त करते हुए कहते हैं, ''जब हमें धारा 377 के दायरे से बाहर निकाला गया था तो हमें कुछ तो मिला था. लेकिन आज आपने एक पैनल बनाने की बात कही है और सब सरकार पर छोड़ दिया. मैं फ़ैसले के इंतज़ार में बूढ़ा हो गया लेकिन इतने साल बाद भी कुछ हाथ नहीं लगा.''
दरअसल, इससे पहले साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था.
इस मामले पर चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा था कि 'समलैंगिकता अपराध नहीं है. समलैंगिकों के भी वही मूल अधिकार हैं जो किसी सामान्य नागरिक के हैं. सबको सम्मान से जीने का अधिकार है.'
वहीं, मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जिसमें केंद्र सरकार की तरफ़ से एक्सपर्ट पैनल बनाने की बात की गई थी.
विशेषज्ञों के इस पैनल की अध्यक्षता कैबिनेट सचिव करेंगे जो समलैंगिक जोड़ों को शादी समेत कई अधिकार देने पर विचार करेंगे.
पिछले 34 साल से समलैंगिक रिश्ते में रह रहीं पिया चंदा ने इस फ़ैसले पर कहा, ''सुप्रीम कोर्ट पासिंग दि पार्सल खेल रहा है.''
'कमेटी में हमें भी शामिल किया जाए'
वहीं एक्टिवस्ट हरीश अय्यर का कहना था, ''इस कमेटी में हमें भी नुमाइंदा बनाया जाना चाहिए और वो एकतरफ़ा नहीं होनी चाहिए. हमारे समुदाय के लोगों को अपने विधायक या सांसद के पास जाना चाहिए और बताना चाहिए कि हम उतने ही अलग हैं, जितने दो लोग होते हैं.''
हालांकि, मंगलवार को दिए गए फ़ैसले में कोर्ट ने शादी करने के अधिकार को मूलभूत अधिकारों में नहीं माना है. लेकिन इस बात को दोहराया कि ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स लोग मौजूदा क़ानून के तहत शादी कर सकते हैं.
साथ ही जजों ने विशेष विवाह अधिनियम, 1954 पर भी बात की. इस अधिनियम के अंतर्गत अंतर-धार्मिक और अंतर-जातीय विवाह को पंजीकृत किया जाता है और मान्यता दी जाती है.
सुप्रीम कोर्ट में फ़ैसला सुनाए जाने के दौरान अधिनियम के शब्दों में बदलाव की बात हुई लेकिन अंत में बेंच ने कहा कि विशेष विवाह अधिनियम में बदलाव लाना क़ानून के दायरे में नहीं है.
वहीं बच्चा गोद लेने पर मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि क्वीयर और अविवाहित कपल बच्चा गोद ले सकते हैं. इसके समर्थन में जस्टिस एस के कौल ने कहा कि गोद लेने के अधिकार में बदलाव लाया जाना चाहिए ताकि क्वीयर समुदाय के लोगों को भी इसमें जोड़ा जा सके.
लेकिन तीन जजों ने इन सुझावों पर असहमति जताई. इससे साफ़ हो गया कि समलैंगिक जोड़ों को यह अधिकार नहीं दिया जाएगा.
'हमसफ़र ट्रस्ट' के संस्थापक रह चुके अशोक काक का कहना था, ''हमें बच्चे गोद लेने का अधिकार, उत्तराधिकारी बनाने का अधिकार, पेंशन और राशन कार्ड देने समेत सब बातों का फ़ैसला सरकार पर डाल दिया है. एक चॉकलेट दिखा कर हमें ऐसे ही छोड़ दिया है.''
बहस में पक्ष और विपक्ष
इससे पहले कोर्ट में हुई सुनवाई में याचिकाकर्ताओं के वकीलों का तर्क था कि शादी दो लोगों का मिलन है, न कि सिर्फ एक महिला और पुरुष का. ऐसे में उन्हें शादी करने का अधिकार न देना संविधान के ख़िलाफ़ है क्योंकि संविधान सभी नागरिकों को अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने का अधिकार देता है और सेक्शुअल ओरिएंटेशन के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है.
सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में दलील दी थी कि प्यार करने और साथ रहने का अधिकार बुनियादी है मगर शादी एक 'संपूर्ण अधिकार नहीं है' और यह बात विषमलैंगिक (महिला-पुरुष) जोड़ों पर भी लागू होती है. उन्होंने कहा कि कई सारे रिश्तों पर रोक है, जैसे कि इनसेस्ट (परिवार के सदस्यों के बीच सम्बंध) पर.
सरकार ने समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने के बजाय समलैंगिक जोड़ों की 'मानवीय पहलुओं से जुड़ी चिंताओं' को सुलझाने के लिए कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाने का प्रस्ताव दिया था.
वहीं धार्मिक संगठन समलैंगिक विवाह का विरोध करते हैं और वो ऐसे संबंध को आप्राकृतिक बताते हैं.
नामउम्मीदी में उम्मीद
समाचार एजेंसी एएनआई से वकील करुणा नंदी ने कहा, "हालांकि इस मामले में चार अलग-अलग फै़सले हैं लेकिन सभी इस बात पर सहमत हुए कि क्वीयर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए और राज्य सरकारें ये कर सकती हैं."
"उनका कहना था कि शादी का अधिकार मूलभूत अधिकार नहीं है लेकिन संविधान में शादी के अधिकार से जुड़े विभिन्न पहलू हैं जिसमें आर्टिकल 21 भी शामिल है. इसके तहत निजता का अधिकार मिलता है जो आपकी प्रतिष्ठा की रक्षा करता है."
डॉ. प्रसाद राज कहते हैं कोर्ट ने ये कहा कि ये सभी अधिकार समुदाय को मिलने चाहिए लेकिन इसे सरकार पर छोड़ दिया है.
उनके अनुसार, ''सरकार मानेगी कि हमारे लिए ये अधिकार अहम है. चुनाव का मौसम है. वो भी जानते हैं कि हमारा समुदाय भी वोटर है और वो इतने बड़े समुदाय को निराश नहीं करना चाहेगी और वो हमारे पक्ष में सोचेगी.''
समलैंगिक समुदाय के लोगों का कहना है कि वो आदेश को विस्तार से पढ़ना चाहेंगे लेकिन जितना उन्हें समझ आया है, उसके मुताबिक़, उन्हें संस्थाओं के ज़रिए सरकार के सामने अपना पक्ष रखना होगा वे इसी तरह से अपनी बात समझाने की कोशिश करेंगे.
भारत में एलजीबीटीक्यू+ समुदाय की आबादी साढ़े 13 से 14 करोड़ के बीच है और हाल के सालों में समलैंगिकता को लेकर स्वीकार्यता में बढ़ोतरी देखने को मिली है. ख़ासकर दिसंबर 2018 के बाद से, जब सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर निकाला था.
दुनिया के 34 देशों में समलैंगिक विवाह मान्य हैं. एशिया की बात की जाए तो ताइवान और नेपाल पहले ही इसे मान्यता दे चुके हैं.
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