संभल: 10 दिसंबर तक बाहरी लोगों के प्रवेश पर बैन, समाजवादी पार्टी के नेताओं को पुलिस ने रोका

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उत्तर प्रदेश के संभल में जिला प्रशासन ने दस दिसंबर तक बाहरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है. यहां मौजूद शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद जिला प्रशासन ने ये कदम उठाया है.
प्रशासन के मुताबिक़ उसने जिले में बेहतर क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के मद्देनज़र ये कदम उठाया है.
जिला प्रशासन ने इस बीच संभल आ रहे समाजवादी पार्टी के 15 सदस्यीय दल में शामिल नेताओं और कार्यकर्ताओं को रोक दिया है.
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार संभल की शाही जामा मस्जिद कमेटी की याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस और संभल जिला से पूरी तरह तटस्थ रहकर शांति बहाल करने का निर्देश दिया था.

संभल में 24 नवंबर को शाही जामा मस्जिद में सिविल कोर्ट के आदेश के बाद दूसरी बार सर्वे के दौरान हिंसा भड़क उठी थी.
पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प में पांच लोगों की मौत हो गई थी. हालांकि पुलिस ने चार मौतों की ही पुष्टि की है.
संभल के सिविल कोर्ट में मस्जिद को मंदिर बताते हुए एक याचिका दायर की गई थी. उसके बाद सिविल कोर्ट ने शाही जामा मस्जिद के सर्वे का आदेश दिया था.
संभल जिला प्रशासन ने क्या कहा?

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संभल में हुई हिंसा का मामला शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
सुप्रीम कोर्ट में चीफ़ जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस और संभल जिला प्रशासन को तटस्थ रहने और इलाक़े में शांति व्यवस्था बहाल करने का निर्देश दिया.
सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देश के बाद शनिवार को संभल प्रशासन ने अपना रुख़ सख़्त किया और दस दिसंबर तक यहां बाहरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ संभल के जिलाधिकारी राजेंद्र पेन्सिया ने कहा कि जिले में शांति और क़ानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 (संभावित ख़तरे या शरारतपूर्ण हरकत की आशंका जैसे आपात मामलों में आदेश जारी करने की ताकत ) के तहत जारी आदेश की अवधि 31 दिसंबर तक के लिए बढ़ा दी गई है.
उन्होंने समाचार एजेंसी से कहा, ''जिले में दस दिसंबर तक प्रतिबंधात्मक आदेश भी जारी रहेंगे. दस दिसंबर तक जिले में बगै़र अनुमति के किसी भी बाहरी व्यक्ति, सामाजिक संगठन और जन प्रतिनिधि को यहां प्रवेश की इज़ाज़त नहीं है.''
समाजवादी पार्टी के नेताओं के संभल प्रवेश पर रोक

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प्रशासन ने शांति और क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए गए कदमों के तहत ही शनिवार को संभल आ रहे समाजवादी पार्टी के कई नेताओं को रास्ते में ही रोक दिया.
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने संभल प्रशासन के इस कदम पर कड़ा एतराज़ जताते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ''ऐसा प्रतिबंध अगर सरकार पहले ही उन पर लगा देती, जिन्होंने दंगा-फ़साद का सपना देखा और उन्मादी नारे लगवाए तो संभल में सौहार्द-शांति का वातावरण नहीं बिगड़ता.''
उन्होंने लिखा,''भाजपा जैसे पूरी की पूरी कैबिनेट एक साथ बदल देते हैं, वैसे ही संभल में ऊपर से लेकर नीचे तक का पूरा प्रशासनिक मंडल निलंबित करके उन पर साज़िश के तहत लापरवाही का आरोप लगाते हुए सच्ची कार्रवाई करे और उन्हें बर्खास्त करे. किसी की जान लेने का मुक़दमा भी चलना चाहिए. भाजपा हार चुकी है.''
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ संभल जा रहे पार्टी नेताओं के दल का नेतृत्व कर रहे विपक्ष के नेता माता प्रसाद पांडे ने लखनऊ में अपने घर के बाहर पत्रकारों को बताया कि गृह सचिव संजय प्रसाद ने उन्हें फोन कर संभल न जाने को कहा था.

समाजवादी पार्टी के नेताओं को संभल जाने से रोके जाने पर पार्टी के प्रवक्ता हरेंद्र मलिक ने कहा, ''हमें ये समझ नहीं आ रहा है कि पार्टी नेताओं को संभल जाने से क्यों रोका जा रहा है. क्या विपक्ष के नेता और सांसद इतने गै़र जिम्मेदार हैं उन्हें राज्य में कहीं जाने की इज़ाज़त नहीं दी जा सकती.''
उन्होंने कहा, ''हमारे दल में संभल के सांसद जिया उर्र रहमान बर्क और कैराना की सांसद इक़रा हसन शामिल है? आप बताएं हम वहां जाकर क्या ग़लत कदम उठा लेंगे. सरकार बिल्कुल तानाशाही के अंदाज में काम कर रही है.''
संभल के सांसद जिया उर्र रहमान बर्क ने कहा कि उन्हें भी संभल जाने से रोक दिया गया.
उन्होंने कहा, ''हम लोगों के दुख दर्द में शामिल होना चाहते हैं. हम सही रिपोर्ट लेना चाहते हैं कि जो लोग इसमें शामिल हैं, जिन्होंने वहां पर माहौल को ख़राब किया है...उसकी एक रिपोर्ट बनाकर अखिलेश यादव जी को सौंपना चाहते हैं जिससे कि हम आगे की कार्रवाई कर सकें."
नेताओं के जाने से माहौल ख़राब होने के सवाल पर जिया उर रहमान ने कहा, "अगर नेताओं के जाने से माहौल ख़राब होता तो सर्वे के पहले दिन जो 19 तारीख़ को हुआ था, उस दिन मैं खुद वहां मौजूद था, अन्य प्रतिनिधि भी मौजूद थे उस दिन माहौल क्यों ख़राब नहीं हुआ? जुमे के दिन 22 तारीख़ को हम लोग ख़ुद मौजूद थे तब माहौल क्यों ख़राब नहीं हुआ? माहौल ख़राब तब हुआ जब हम लोग वहां मौजूद नहीं थे."

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पुलिस ने जिया उर्र रहमान बर्क और सोहेल इक़बाल को संभल में हुई हिंसा का अभियुक्त बनाया है. हालांकि बर्क ने बीबीसी से कहा था कि उन पर झूठा मुक़दमा किया गया है.
दरअसल समाजवादी पार्टी के नेताओं की योजना पहले मुरादाबाद पहुंचने की थी. वहां से वो संभल की ओर कूच करने वाले थे.
पार्टी नेताओं के मुताबिक़ उनका इरादा हिंसा के शिकार लोगों और उनके परिवारों से मिलना था. लेकिन माता प्रसाद पांडे को उनके घर से बाहर नहीं निकलने नहीं दिया गया.
दूसरी जगहों से संभल की ओर बढ़ रहे नेताओं को भी रास्ते में ही रोक दिया गया. इसके विरोध में माता प्रसाद पांडे लखनऊ में धरने पर बैठ गए.
समाजवादी पार्टी ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि वो संभल में मारे गए लोगों के परिवारों को पांच-पांच लाख रुपये की मदद करेगी.
पार्टी ने लिखा है, ''संभल में हुई हिंसा में जान गंवाने वाले मृतकों के परिजनों को समाजवादी पार्टी पांच-पांच लाख रुपए की आर्थिक सहायता देगी. भाजपा सरकार से मांग है कि वो मृतकों के परिवारों को 25-25 लाख रुपए का मुआवज़ा दे.''
आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू
समाजवादी पार्टी के नेताओं को संभल जाने के रास्ते में रोके जाने पर पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के बयान और इसे लेकर पार्टी नेताओं की टिप्पणी के बाद विपक्ष और सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर और तेज़ हो गया.
अखिलेश यादव के बयान पर बीजेपी नेता और राज्य के उप मुख्यंत्री ब्रजेश पाठक ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है.
उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी के लोग संभल को 'राजनीतिक पर्यटन' समझ रहे हैं.
ब्रजेश पाठक ने कहा, "समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव को अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए. संभल की जो घटना है ये समाजवादी पार्टी के संरक्षित अपराधियों की देन है."
उन्होंने कहा, "हर स्थिति में हम वहां (संभल में) क़ानून का राज बनाए रखेंगे. समाजवादी पार्टी के जो सांसद और विधायक आपस में सिर फुटव्वल कर रहे हैं, अखिलेश यादव को पहले अपनी पार्टी को संभालना चाहिए, फिर राजनीतिक बयानबाज़ी करनी चाहिए."
"ये उसको राजनीतिक पर्यटन समझ रहे हैं. समाजवादी पार्टी ऐसी घटनाओं में राजनीतिक पर्यटन की दृष्टि से जाती है."
सुप्रीम कोर्ट ने संभल मामले पर क्या कहा था?

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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के संभल की शाही जामा मस्जिद से जुड़े मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस और संभल ज़िला प्रशासन को कड़ा निर्देश दिया था.
सर्वोच्च अदालत ने प्रदेश की पुलिस और संभल ज़िला प्रशासन को 'पूरी तरह तटस्थ' रहकर शांति बहाल करने का निर्देश दिया है.
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने मस्जिद के मामले में सिविल कोर्ट को सुनवाई रोकने का आदेश दिया. बेंच ने ये भी कहा कि सिविल कोर्ट के एडोवेकेट कमिश्नर की तैयार सर्वे रिपोर्ट सीलबंद कवर में रखी जाए.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संभल मस्जिद कमिटी के लिए इस मामले में कई क़ानूनी विकल्प मौजूद हैं. यह कमिटी पूरे मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गई थी.
संभल शाही मस्जिद कमिटी ही मस्जिद के प्रबंधन का काम देखती है.
बेंच ने ये साफ़ कर दिया कि निचली अदालत (सिविल कोर्ट ) तब तक कोई सुनवाई नहीं करेगी जब तक कि मस्जिद कमिटी की याचिका (अगर वो कोई याचिका दायर करती है) हाई कोर्ट में सूचीबद्ध न हो जाए.
अगर सिविल कोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ कोई याचिका दायर की जाती है तो हाई कोर्ट को इसे तीन दिन के अंदर सुनवाई के लिए लिस्ट करनी होगी.
जस्टिस संजीव खन्ना ने इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज को संबोधित करते हुए कहा, ''यह सुनिश्चित करें कि शांति और एकता बनी रहे. आपके लिए पूरी तरह तटस्थ रहना ज़रूरी है.''
बेंच ने केएम नटराज को निर्देश दिया कि सिविल कोर्ट में अब और कोई दस्तावेज़ न दाखिल किया जाए.
संभल कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई आठ जनवरी को तय की थी.
चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा कि वो इस केस की मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते.
संभल में क्या हुआ था

संभल की यह ऐतिहासिक जामा मस्जिद भारतीय पुरातत्व सर्वे के तहत संरक्षित स्मारक है.
बीते रविवार को शाही जामा मस्जिद स्थानीय लोगों और पुलिस के बीच झड़पों का केंद्र बन गई थी. इस हिंसा में पांच लोग मारे गए, हालांकि पुलिस ने अधिकारिक तौर पर चार लोगों की मौत की ही पुष्टि की है.
संभल की शाही जामा मस्जिद को लेकर ये नया विवाद 19 नवंबर को तब शुरू हुआ जब संभल से क़रीब 25 किलोमीटर दूर स्थित कैला देवी मंदिर के महंत ऋषिराज महाराज और उनके साथ मिलकर कुछ लोगों ने एक याचिका संभल की अदालत में दाख़िल की.
उन्होंने मस्जिद के हरिहर मंदिर होने का दावा किया. अदालत ने कुछ ही घंटे के भीतर मस्जिद परिसर के सर्वे का आदेश पारित कर दिया और उसी दिन अदालत के आदेश पर मस्जिद परिसर का सर्वे भी हुआ.
19 नवंबर को हुए इस सर्वे के दौरान भी भीड़ जुटी थी लेकिन कोई तनाव नहीं हुआ था. हालात तब बिगड़े तब जब रविवार को दूसरे सर्वे के दौरान भीड़ और पुलिस बल आमने-सामने आ गए. कई घंटों तक पत्थरबाज़ी होती रही.
कैला देवी के मंदिर के विशाल परिसर में महंत ऋषिराज महाराज का आश्रम का है. महंत ऋषिराज यहां बचपन से ही रह रहे हैं और इस समय इस धर्मस्थल के संचालन को वही संभाल रहे हैं.
उन्हें पुलिस सुरक्षा मिली है और उनके निजी कर्मी भी उनके क़रीब तैनात रहते हैं.
बीबीसी से बातचीत में मस्जिद के प्राचीन मंदिर होने का दावा करते हुए महंत ऋषिराज गिरी कहते हैं,''वो हरिहर मंदिर ही है, जो भी साक्ष्य हैं वो हमने कोर्ट को उपलब्ध करा दिए हैं, माननीय न्यायालय 29 नवंबर को आपको कोई अच्छा निर्णय सुनाएगा.''
जब उनसे पूछा गया कि ये दावा अभी क्यों किया गया जबकि ये मस्जिद यहां सदियों से है तो उन्होंने कहा, ''अयोध्या मंदिर पर भी दावा बहुत साल बाद हुआ था. हमें लगा कि अब अपने मंदिर को वापस लेने का सही समय आ गया है तो हमने अदालत का रुख़ किया.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित















