इसराइल-फ़लस्तीन: वो पुराना फॉर्मूला, जो 'दुश्मनी' ख़त्म कर सकता है

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- Author, मार्टिन आसेर, लमीस अलतालेबी और पॉल क्यूसिएक
- पदनाम, बीबीसी अरबी सेवा
इसराइल पर हमास का हमला. जवाब में इसराइल की बमबारी और ग़ज़ा में जमीनी हमला.
क्या दो महीने से जारी इसराइल हमास युद्ध से फ़लस्तीन के मुद्दे का अंतत: कोई नतीजा सामने आ सकता है?
दो राष्ट्र वाले फॉर्मूले की पैरवी करने वाले मानते हैं कि अक्टूबर से शुरू हुई हिंसा ने विरोधाभासी तौर पर उनके मकसद को ही आगे बढ़ाया है.
दो राष्ट्र सिद्धांत के तहत पश्चिमी किनारे, ग़ज़ा पट्टी और पूर्वी यरुशलम में साल 1967 की संघर्षविराम रेखा से पहले के क्षेत्र में एक स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र के निर्माण की बात थी, जिसे इसराइल के साथ शांति से रहना होगा.
7 अक्टूबर के भयावह हमले के दो सप्ताह पहले ही इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहुंच कर इसराइल और इसके अरब पड़ोसियों के बीच ‘ शांति की एक नई सुबह’ की शुरुआत का ऐलान किया था.
नेतन्याहू ने कहा, '' एक चौथाई सदी तक ‘तथाकथित विशेषज्ञों’ ने अपने नज़रिये के साथ दबदबा बनाए रखा. इस नज़रिए के मुताबिक इसराइल के साथ दो राष्ट्र के फॉर्मूले पर सौदेबाजी की ज़रूरत पर जोर दिया गया था. साथ ही ये भी कहा गया था कि भविष्य में जो फ़लस्तीन बने, उसकी ज़मीन जॉर्डन और भू-मध्यसागर के बीच हो. लेकिन ये नज़रिया अभी तक एक भी शांति समझौता नहीं करवा पाया.''
उन्होंने कहा, ''2020 में मैंने जो नज़रिया पेश किया उससे तुरंत ही हम एक जबरदस्त सफलता तक जा पहुंचे. अरब देशों के साथ हमने चार महीनों में ही चार समझौते किए.’’
ये वो तथाकथित समझौते थे, जिन्हें अब्राहम समझौता कहा जाता है और जो ट्रंप प्रशासन ने अपने इसराइली फलस्तीन शांति प्रयासों के जरिये करवाए थे. लेकिन इन समझौतों का वही हश्र हुआ जो इससे पहले के अमेरिका की मध्यस्थता में कराए गए समझौतों का हुआ था.

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अब्राहम समझौता


नेतन्याहू ने कहा, ''इन समझौतों की गति फ़लस्तीनियों की इसराइल को खत्म कर देने की उनकी फतांसी को छोड़ने और शांति का रास्ता अपनाने को राजी कर लेगी.''
इसके बाद उन्होंने एक ''नए मध्य पूर्व'' का नक्शा दिखाया, जिसका मतलब था कि फ़लस्तीन अब समर्पण करता है और इसके साथ ही दो राष्ट्र के समाधान का फॉर्मूला भी खत्म हो चुका है.
इस बीच ये माना गया कि बाइडन सरकार ने पिछले सात अमेरिकी राष्ट्रपतियों के तुलना में इसराइल-फ़लीस्तीन की फाइल पर कम काम किया है.
फरवरी में अमेरिकी विदेश विभाग ने जो बयान दिया, उसकी भाषा दो राष्ट्र के मामले में कुछ इस तरह थी-
बयान के मुताबिक,अमेरिकी विदेश विभाग को दो राष्ट्र का फॉर्मूला तो दूर की बात लग रही थी. लेकिन उसने कहा था कि ''अमेरिका उम्मीद का दायरा बरकरार रखने के लिए प्रतिबद्ध है.''

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सितंबर में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने इसराइली और फ़लस्तीनी नेताओं से जो बातचीत की थी, उसमें राजनीतिक फॉर्मूला नदारद था.
अब बहुत कुछ बदल चुका है.
3 नवंबर को अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा, ''अमेरिका का इस बात में विश्वास बना हुआ है कि इसका व्यावहारिक और एक मात्र रास्ता दो राष्ट्र के हल से ही गुजरता है’’
लेकिन विरोधाभास और बाधाएं 25 साल पहले शुरू हुई शांति की संभावनाओं को रोक रही हैं. मसला अब और जटिल हो गया है.
शांति की संभावनाएं कैसे धूमिल हुईं

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यासिर अराफ़ात की अगुआई में काम कर रहे पीएलओ के फतह गुट और इसराइल के बीच दो राष्ट्र वाले समाधान का खाका दोनों की ओर से 1993 में एक दूसरे को मान्यता देने के समय ही खींच लिया गया था. नॉर्वे की मध्यस्थता में बैकचैनल सौदेबाजी की वजह से ये समझौता यहां तक पहुंचा था.
लेकिन तथाकथित ओस्लो प्रक्रिया कभी अपनी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच पाई. इसके उलट इसने पहले से ज्यादा कठिन समस्याएं पैदा कर दी.
'शांति के एवज में जमीन' सौदे ने इसराली क्षेत्र में फलस्तीनी अथॉरिटी के स्वराज (सेल्फ-रूल) के नियम को स्थापित कर दिया. वो ये क्षेत्र था जिस पर इसराइल ने 1967 के युद्ध पर कब्जा कर लिया था.
लेकिन सैन्य कब्जा और यहूदियों की बस्तियों से जुड़ी गतिविधियां चलती रहीं. और तथाकथित 'स्थायी दर्जे से जुड़े मुद्दों’ को बाद के लिए रख दिया गया.'
इनमें 1948 के पहले अरब-इसराइल युद्ध के बाद इसराइल का अस्तित्व सामने आने और 1947 में विभाजन के लिए संयुक्त राष्ट्र के मतदान के बाद फ़लस्तीनी शरणार्थियों के दर्जे का मसला भी शामिल है.
इसराइल ने 1967 में पूर्वी यरुशलम को मिला लिया था.
यह दोनों पक्षों के लिए धार्मिक रूप से इतना अहम था कि किसी के लिए इसमें झुकना मुमकिन नहीं था.
आखिरकार वर्षों की कूटनीतिक नुमाइश के बाद इन मुद्दों पर 2000 में कैंप डेविड में तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की मध्यस्थता में बात हुई. लेकिन इसराइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री एहुद बराक और उस समय फ़लस्तीनी अथॉरिटी के राष्ट्रपति अराफात मतभेदों को मिटा नहीं पाए.
इस नाकामी के लिए हर किसी ने दूसरे पर ठीकरा फोड़ा. इसराइल और अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि अराफात ने इतना बढ़िया सौदा ठुकराया. शायद ही उन्हें कभी इससे बढ़िया प्रस्ताव मिलता.
फ़लस्तीनियों ने इसे शर्मनाक करार दिया, जो उनकी जरूरतों से काफी कम था. जैसे कि वो पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाना चाहते थे.

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आलोचकों का कहना है इसराइल ने अपने प्रमुख दुश्मन को बेअसर करने का अपना मकसद बहुत पहले हासिल कर लिया था. इसलिए वो उस जमीन को क्यों छोड़ता, जिस पर इतने समय में इतना बड़ा निवेश किया था.
खास कर फ़लस्तीनी आबादी वाले इलाकों में फ़लीस्तीनी अथॉरिटी को दिया गया सुरक्षा नियंत्रण.
अराफात एक कमजोर स्थिति से सौदेबाजी कर रहे थे जबकि अमेरिकी मध्यस्थ नि:संदेह इतिहास में किसी भी दो राष्ट्रों की तुलना में इसराइल से ज्यादा नजदीकी रिश्ता साझा कर रहे थे.
कई और ऐसी चीजें थीं जिनसे दो राष्ट्र के समाधान की ओर बढ़ना मुश्किल हो गया.
इस्लाम प्रतिरोधी आंदोलन हमास की स्थापना ग़ज़ा में 1987 में हुई थी. ये शांति के लिए अपने प्रतिद्वंद्वी संगठन की ओर से अपनाए गए कुछ नरम रुख और छूट से असहमत था.
उसे मौका मिल गया और वो 1994 के बाद फिदाइन बमबारी के जरिये बातचीत को पटरी पर आने से रोकता रहा.
वहां बसने वाले धार्मिक लोगों ने इस दौर का फायदा उठाया और यहूदी मौजूदगी का विस्तार करने में लग गए. उस जमीन का जिसे उनका ‘प्रॉमिस लैंड’ बताया गया था.
ओस्लो के बाद क्या हुआ?

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2000 में, जब दूसरे इंतेफादा के नाम से जाना जाने वाले फ़लस्तीन विद्रोह भड़का तो इसराइली राजनीति का केंद्र काफी हद तक दक्षिणपंथी रुझान की ओर चला गया.
ओस्लो समझौते के पीछे इसराइल की लेबर पार्टी का समर्थन था. लेकिन धीरे-धीरे ये पार्टी अप्रासंगिक हो गई. लेकिन यहूदी बस्तियों का समर्थन बार-बार मुखर होता रहा.
वोटर उस वक्त दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी के नेता और अराफात के कट्टर विरोधी एरियल शेरॉन की ओर देख रहे थे. उन्हें लग रहा था शेरॉन ही उन्हें मुसीबत से निकाल सकते हैं.
बगावती फ़लस्तीन आबादी को इसराइल की सैन्य ताकत का सामना करना पड़ा, जबकि शेरॉन की कैबिनेट ने इसराइल और वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों को फलीस्तीनियों से अलग करने वाले बैरियर खड़े कर दिए.
अराफात को 2004 में उनके निधन से पहले तक रामाल्ला में ही रोक दिया गया.

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शेरॉन ने ग़ज़ा में रहने वाले 15 लाख फ़लस्तीनी निवासियों से वहां बसने वाले कुछ हजार लोगों को अलग कर दिया. साथ ही अपन सैनिकों को परिधि में तैनात कर दिया. वेस्ट बैंक की चार अलग-थलग बस्तियों को भी खाली करा लिया गया.
यहूदी बस्तियों में रहने वालों को फ़लस्तीनियों से इस तरह अलग करने की प्रक्रिया का भारी असर हुआ. इसका मकसद था कि कैसे एक भारी आबादी वाली फ़लस्तीनी इलाके के अंदर इसराइली इलाकों में रहने वाले इसराइली बहुसंख्यकों को सुरक्षित कर दिया जाए.
शेरॉन के एक शीर्ष सलाहकार ने उस समय एक पत्रकार से कहा था कि राजनीतिक सौदेबाजी को खत्म करने के लिए ‘फॉर्मेल्डेहाइड की एक खास मात्रा’ की जरूरत है.
हालांकि शेरॉन के इस कदम ने लिकुड और बस्तियों को अलग करने वालों के समर्थकों को दो फाड़ कर दिया. शेरॉन को फर्क नहीं पड़ा. 2006 का चुनाव जीतने के लिए उन्होंने एक नई पार्टी बना डाली.
चुनाव से पहले उन्हें ब्रैन हेमरेज हो गया. इससे ये जानना बाकी ही रह गया कि क्या वेस्ट बैंक में भी ऐसी ही कोई योजना उनके दिमाग में थी. अगर ऐसी कोई योजना होती थी उसे लागू करने शेरॉन के ही बूते की बात होती.

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अराफात के उत्तराधिकारी महमूद अब्बास ने इसे ओस्लो सिद्धांत का उल्लंघन बताया लेकिन बस्तियों को अलग बसाने के इस काम को ग़ज़ा के हमास नेताओं ने अपने प्रतिरोध की जीत करार दिया.
लेकिन मिस्र के सहयोग से इसराइल ने ग़ज़ा की नाकेबंदी और मजबूत कर दी और फिर लगातार हिंसा होने लगी. उग्रवादी हमले करने लगे.
उनकी ओर से इसराइल पर रॉकेट दागे जाने लगे. दूसरी ओर इसराइल फ़लस्तीनियों के विद्रोह को दबाने के लिए छापेमारी और बमबारी का सहारा लेता रहा.
लेकिन इस बीच वेस्ट बैंक में हमास तेजी से उभर रहा था.
2006 में फ़लस्तीनी अथॉरिटी के विधायी चुनाव में हमास को बहुमत मिला क्योंकि राजनीतिक पार्टी फ़तह से वोटरों का मोहभंग हो चुका था. उनकी नज़र में फतह फ़लस्तीनी आजादी और भ्रष्टाचार विहीन प्रशासन देने में नाकाम रहा था.
हमास पर इस बात का अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ने लगा कि वो फ़लस्तीनी प्रतिबद्धताओं का पालन करे. हिंसा छोड़े और इसराइल को मान्यता दे. हमास इसके लिए तैयार नहीं था.
हमास ने ताकत के बल पर ग़ज़ा से फ़लस्तीन अथॉरिटी को निकाल बाहर किया. इससे एक हथियारबंद प्रतिरोधी आंदोलन का केंद्र ग़ज़ा फतह प्रशासित वेस्ट बैंक से अलग हो गया.
वो वेस्टबैंक जो शांति समझौते के प्रति प्रतिबद्ध था. ये अलग बात है कि इसमें शांति बहाल होने की संभावना कम ही थी.
लेकिन हमास के रुख में बदलाव दिखा जो ये संकेत दे रहा था कि आने वाले दिनों में वो राजनीतिक समाधान की ओर रुख कर सकता है.
इसमें हिंसा खत्म करने की पेशकश और 1967 में इसराइल के कब्जे वाले क्षेत्र पर एक इलाका कायम करने का सुझाव हो सकता था.
लेकिन हमास ने अपने उस चार्टर को नहीं बदला जिसमें उस इसराइल का वजूद मिटाने का आह्वान किया गया था, जो वेस्ट बैंक में अपना क्षेत्र और यहूदियों की आबादी बढ़वा रहा था.
वक़्त के साथ हमास ने ग़ज़ा में इसराइल की निगरानी की कमी का भी फायदा उठाया और तेजी से अपनी सैन्य क्षमता विकसित की. इसमें उसने लेबनान के हिज्बुल्लाह की मदद ली.
नए हालात

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7 अक्टूबर और उसके नतीजों ने लंबे समय तक चले आ रहे इसराइल-फलस्तीन दुनिया की निगाहों में सबसे आगे कर दिया. लेकिन इसकी वजह से कई चीजें अब केंद्र में आ गईं.
इसराइली पक्ष में इस बात पर व्यापक सहमति है कि ग़ज़ा पट्टी में भले ही इसके नागरिकों के साथ कुछ भी हुआ हो लेकिन हमास को पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए.
नेतन्याहू के दक्षिणपंथी समर्थक की ग़ज़ा की आबादी को पूरी तरह हटा देने के पक्ष में हैं. फ़लस्तीनी पक्ष इसे एक और नकबा की तरह देखता है.
अरबी में नकबा को "तबाही" कहा जाता है, जो 1947 के अंतिम महीनों से लेकर 1949 के शुरुआती दौर को बताता है जब लगभग सात लाख फ़लस्तीनी उस जमीन से उजाड़ दिए गए जो इसराइल बन गई है.
इसराइल में वामपंथियों को डर है कि नेतन्याहू की नीतियां एक रंगभेदी राष्ट्र की ओर ले जा रही हैं. हमास को हटाने से हमास, फ़लस्तीनी अथॉरिटी और इसराइल जैसे तीन संगठन की जगह दो संगठनों में आपस में टकराव की स्थिति पैदा होगी. फिर इसराइल और हमास ही रह जाएंगी. इससे दो राष्ट्र का गणित फिर सामने आ जाएगा.
ऐसे ही एक लेखक और लेबर पार्टी के पूर्व समर्थक अब्राहम बर्ग ने बीबीसी को बताया कि इसराइलियों और फ़लस्तीनियों, दोनों को "वास्तविक सदमे" से उबरने में समय की जरूत है. लेकिन उनका मानना है कि आखिरकार वो वो दो राष्ट्र का ही विकल्प चुनेंगे क्योंकि खून-ख़राबा रोकने के लिए यही एक स्थायी उपाय है.
उन्होंने कहा, ''दीर्घकालिक शांति का वादा करने वाला जो भी राजनीतिक फॉर्मूला सामने आएगा उसे ज्यादातर इसराइली मान लेंगे.''
फ़लस्तीनी ग़ज़ा पर सैनिक कार्रवाई का परिणाम झेल रहे हैं. वेस्ट बैंक में वो सैन्य दबाव और वहां बसे यहूदियों की हिंसा का सामना कर रहे हैं. वो टीवी और सोशल मीडिया पर इसे देख रहे हैं और उससे उनके मन में तरह-तरह के विचार पैदा हो रहे हैं.
अरब वर्ल्ड फॉर रिसर्च एंड डेवलपमेंट (AWRAD) की ओर से ग़ज़ा और वेस्ट बैंक में रहने वाले फलस्तीनियों पर 31 अक्टूबर से 7 नवंबर तक किए गए एक सर्वे के मुताबिक़, इसमें हिस्सा लेने वाले 68 फीसदी लोगों का समर्थन दो राष्ट्र वाले समाधान के लिए घटा है.
आगे क्या?
फ़लस्तीनी भी अपने मकसद के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ने वाले समर्थन के प्रति सचेत रहेंगे.
रॉयटर्स/इप्सोस के एक सर्वे में ये जाहिर हुआ है कि पिछली पीढ़ियों की तुलना में युवा अमेरीकियों में इसराइल का समर्थन घट सकता है.
सर्वे में शामिल कम उम्र के 40 फीसदी लोगों ने कहा कि अमेरिका को इस मामले में एक तटस्थ मध्यस्थ की भूमिका निभानी चाहिए.
अभी ये अंदाजा लगाना जल्दबाजी होगी कि 2023 की घटनाएं इसराइल पर अब ज्यादा दबाव डाल सकेंगी. शांति वार्ता के प्रमुख पैरोकार अमेरिका का तीन दशक का संरक्षण की तुलना में क्या इसराइल अब ज्यादा में दबाव में होगा.
हालांकि अभी भी शांति की मांग करने वाले फ़लीस्तीनियों के लिए खुली बातचीत से पीछे हटने का अब कोई रास्ता नहीं बचा है. वो बातचीत जो भविष्य के फ़लस्तीनी राष्ट्र के लिए समझौतों के लिए और अधिक वक़्त दे सके.
इस तरह के संघर्षों के समाधान के विशेषज्ञ दलाल इरिक़त कहते हैं, ''कोई ठोस कदम उठाना होगा. ऐसा कदम जो इसराइल की सीमा को निर्धारित कर और उसके कब्जे को खत्म करे. बगैर ठोस कदम उठाए शांति प्रक्रिया की वही दोहराई जाने वाली अमेरिकी बयानबाजी को जारी रखने का कोई मतलब नहीं बनता.’’
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