हमास के साथ युद्धविराम ख़त्म होते ही अमेरिका ने इसराइल के लिए खींची 'लक्ष्मण रेखा'

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- Author, जेरेमी बॉवेन
- पदनाम, बीबीसी इंटरनेशनल एडिटर
इसराइल और हमास के बीच जब तक युद्धविराम चला, तब तक किसी तरह का संघर्ष न होना एक कूटनीतिक उपलब्धि थी.
अब, सात दिनों के पॉज़ यानी अस्थाई युद्धविराम के बाद इसराइल और हमास बहुत बड़ी सैन्य और राजनीतिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं.
हमास के लिए यह यह बचे रहने की लड़ाई है. जब तक हमास के बंदूकधारी गोलियां चलाते रहेंगे या फिर इसराइल पर रॉकेट दाग़ते रहेंगे, तब तक वे कहेंगे कि 'हमारी हार नहीं हुई' है.
वहीं, तुलना में बहुत ज़्यादा सैन्य ताक़त होने के बावजूद इसराइल का काम अब और ज़्यादा पेचीदा हो गया है.
इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने प्रण लिया है कि वह सात अक्टूबर को क़रीब 1200 लोगों की जान लेने वाले हमास के हमले का 'बदला' लेंगे.
जंग फिर से शुरू होने के चंद घंटों बाद इसराइली सरकार ने फिर से अपने तय लक्ष्य हासिल करने की कोशिश शुरू कर दी है. ये लक्ष्य हैं, 'बंधकों को छुड़ाना, हमास का ख़ात्मा और यह तय करना कि ग़ज़ा कभी इसराइल के बाशिंदों के लिए ख़तरा न बन पाए.'
लेकिन ऐसा कैसे किया जाएगा और आगे क्या होगा?
इसराइल के पीएम नेतन्याहू, उनके राजनीतिक सहयोगियों, विरोधियों और अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन की सबसे बड़ी चिंता इस समय यही होगी. ख़ासकर ब्लिंकन की, जो जंग शुरू होने से अब तक इसराइल की चार यात्राएं कर चुके हैं.

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ब्लिंकन का कड़ा बयान
शायद ब्लिंकन जानते थे कि मानवीय पॉज़ को लंबा करने की उनकी कोशिशें नाकाम हो जाएंगी.
जंग फिर से शुरू होने से पहले शाम को, उन्होंने इसराइल के 'अपनी रक्षा करने के अधिकार' को लेकर अमेरिका के समर्थन को दोहराया और एक बार फिर हमास की निंदा की.
ब्लिंकन ने फिर दोहराया, "इसराइल अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और युद्ध के कानूनों के तहत कार्रवाई कर रहा है, जबकि वह ऐसे आतंकवादी समूह का सामना कर रहा है जो इन दोनों का ही सम्मान नहीं करता."
इसके बाद ब्लिंकन ने इस मामले में सार्वजनिक तौर पर पहली बार कड़ा बयान दिया और बताया कि इसराइल को जंग कैसे लड़नी चाहिए.
उनकी बातों का ज़िक्र का विस्तार से करने लायक है, क्योंकि यह एक चेकलिस्ट की तरह है, जिसमें बताया गया है कि अमेरिका अपने सहयोगी से किस तरह से जंग लड़ने की उम्मीद रखता है.

ब्लिंकन ने कहा कि इसराइल को नागरिकों के जीवन की रक्षा के लिए अधिक प्रभावी कदम उठाने चाहिए. इसके तहत दक्षिणी और मध्य ग़ज़ा में ऐसे क्षेत्रों और स्थानों की स्पष्ट और सटीक रूप से जानकारी देनी चाहिए, जहां लोग सुरक्षित रहकर जंग के दायरे से बच सकते हैं.
ब्लिंकन के मुताबिक़, ग़ज़ा के अंदर नागरिकों को विस्थापित होने से बचाना चाहिए. इसके लिए अस्पतालों, बिजली घरों और पानी की सुविधाओं जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों को नुक़सान से बचाना होगा.
साथ ही, विस्थापित होकर दक्षिणी ग़ज़ा गए नागरिकों को जल्द से जल्द उत्तर में लौटने का विकल्प देना चाहिए. ग़ज़ा में स्थायी आंतरिक विस्थापन नहीं होना चाहिए.

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इसराइल की योजना के ख़तरे
जंग की शुरुआत में अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन इसराइल आए थे. इसराइल को सांत्वना देने के साथ ही उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि न्याय की चाह में 'ग़ुस्से में अंधे न हो जाएं', जैसा कि अमेरिका ने 11 सितंबर, 2001 को हुए अल क़ायदा के हमलों के बाद किया था.
ब्लिंकन की टिप्प्णियों से यह पता चलता है कि बाइडन को लगता है कि जिन नेतन्याहू के साथ उनके सहज रिश्ते नहीं रहे हैं, उन्होंने उनकी बात नहीं सुनी.
इसराइल ने इस युद्ध के जो लक्ष्य तय किए हैं, उन्हें पूरा करने के लिए ज़रूरी है कि वह अपने आक्रमण का अगला चरण दक्षिणी ग़ज़ा में हमास की मौजूदगी पर केंद्रित रखे. लेकिन जब उसने उत्तरी ग़ज़ा पर हमला किया था तब उसने फ़लस्तीनी नागरिकों को सुरक्षा के लिए दक्षिणी ग़ज़ा की ओऱ जाने के लिए कहा था.
अस्थायी युद्धविराम ख़त्म होने के कुछ घंटों बाद ही मिस्र की सीमा के साथ लगती ग़ज़ा की दक्षिणी सीमा के पास रफ़ाह में रह रहे फ़लस्तीनियों की इसराइली हवाई हमलों में जान चली गई.

इसराइल दक्षिणी ग़ज़ा में इन्फ्रास्ट्रक्चर को तबाह किए बिना यह दावा नहीं कर सकता कि उसने यहां से हमास का ख़ात्मा कर दिया है. उसका मानना है कि यहां याह्या सिनवार और अन्य नेता घनी आबादी वाले इलाक़े के नीचे बनी सुरंगों में हैं. उनके साथ में हमास के लड़ाके भी हैं.
अगर इसराइल उसी रणनीति का इस्तेमाल करने जा रहा है, जो उसने उत्तरी ग़ज़ा में अपनाई थी तो हजारों और नागरिक मारे जाएंगे. संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस पहले से ही ग़ज़ा के लोगों की दुर्दशा को भयंकर मानवीय तबाही बता चुके हैं.
मिस्र और अन्य देशों को डर है कि दक्षिण में रह रहे 20 लाख आम लोगों पर इसराइली सेना का दबाव बढ़ा तो वे सिनाई मरूस्थल से उनकी सीमाओं की ओर जाने को मजबूर हो जाएंगे. इससे मध्य पूर्व के सामने फ़लस्तीनी शरणार्थियों के रूप में एक नया संकट उभर आएगा.
अगर यह माना जाए कि इसराइल ने अमेरिका से वादा किया है कि फ़लस्तीनी नागरिकों को सुरक्षा के लिए कुछ ख़ास क्षेत्रों में जाने के लिए कहा जाएगा, तो भी, जिस तरह से इसराइल टैंकों, हवाई हमलों और भारी तोपों के साथ युद्ध कर रहा है, उससे इस योजना के सफल होने के बजाय नाकाम साबित होने की आशंका ज़्यादा है.
और अगर इसराइल अराजकता विरोधी हल्की रणनीति अपनाते हुए बिना भारी सुरक्षा के अपने सैनिकों की मदद से ज़मीन पर आगे बढ़ता है तो अब तक के मुक़ाबले उसके कहीं ज़्यादा सैनिक हताहत होंगे.

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अनिश्चितताओं का बोझ
इसराइल का अगला क़दम जो बाइडन के लिए भी काफ़ी अहम है क्योंकि उन्हें अपनी डेमोक्रैटिक पार्टी के प्रगतिशील धड़े से कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है.
जो बाइडन के मुख्य राजनयिक एंटनी ब्लिंकन ने सार्वजनिक तौर पर यह स्पष्ट रूप से बता दिया है कि अमेरिका इसराइल को किस तरह से हमास से लड़ते देखना चाहता है.
अगर इसराइल जो बाइडन की इच्छा के ख़िलाफ़ जाकर फ़लस्तीनी नागरिकों की हत्या करता है तो अमेरिकी राष्ट्रपति को यह तय करना होगा कि क्या वह इसराइल को इतना समर्थन देना जारी रख सकते हैं या नहीं.
अब तक इसराइल को अमेरिका न सिर्फ़ जंग के मैदान में समर्थन दे रहा है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र में भी उसने इसराइल को बचाने के लिए कई बार वीटो का इस्तेमाल किया है.
हमास हारा नहीं है. उसके पास जो इसराइल के बंधक बचे हुए हैं, उनके दम पर वह इसराइल के सैन्य अभियान को रोकने और उस पर देश के अंदर से मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का काम कर सकता है.
हमास के नेता याह्या सिनवार और उनके लोग ऐसे मौक़ों का भी फ़ायदा उठाने की कोशिश करेंगे, जब इसराइली सेना के अधिकारी अमेरिका के निर्देशों का पालन करते हुए कम आक्रामक रवैया अपनाएंगे.
यह जंग नए दौर में प्रवेश कर गई है और यह पूरा क्षेत्र भी नए दौर में दाख़िल हो चुका है.
कई फलस्तीनी और इसराइली, जो ग़ज़ा की जंग से दूर हैं, भविष्य की अनिश्चितताओं और ख़तरों के बोझ तले दबे हुए हैं.
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