'युवा अफ़्रीका' पर कब तक राज करेंगे बुज़ुर्ग नेता? दुनिया जहान

इक्वेटोरियल गिनी, ज़िम्बाब्वे और घाना के राष्ट्रपति.

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इमेज कैप्शन, घाना, ज़िम्बाब्वे और इक्वेटोरियल गिनी के राष्ट्रपति की उम्र मीडियन एज 62 वर्ष से अधिक है

अफ़्रीका महाद्वीप में 54 देश हैं और वहां के बहुसंख्यक लोगों की उम्र 30 वर्ष से कम है. यानी अफ़्रीका, दुनिया की सबसे अधिक युवा आबादी वाला महाद्वीप है.

लेकिन कई अफ़्रीकी देशों का शासन ऐसे नेताओं के हाथों में है जिनकी उम्र सत्तर या अस्सी साल से अधिक है.

इनमें से कई नेता दशकों से सत्ता में हैं और नज़दीकी भविष्य में उनकी सत्ता छोड़ने की कोई योजना नज़र नहीं आ रही है.

इस सप्ताह हम दुनिया जहान में यही जानने की कोशिश करेगे कि क्या अफ़्रीका के बुज़ुर्ग नेता युवा आबादी पर शासन कर पाएंगे?

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नियमों से खिलवाड़

नीदरलैंड की इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फ़ॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस में वरिष्ठ सलाहकार एडम कैसी अबेबे कहते हैं कि अफ़्रीका के कुछ क्षेत्रों में नेता सत्ता से चिपके रहना चाहते हैं.

मीडियन एज, किसी देश की आबादी की उम्र का संकेत देती है. मीडियन एज अगर कम है, तो इसका अर्थ है कि उस देश की आबादी की उम्र कम है और वहां युवाओं की आबादी बढ़ रही है.

“अफ़्रीका में मीडियन एज बीस साल के आसपास है, लेकिन दुनिया में सबसे अधिक बुज़ुर्ग नेता अफ़्रीका में हैं जो कि चौंकाने वाली बात है.”

अफ़्रीकी देशों के नेताओं की मीडियन एज 62 वर्ष है. ज़िम्बाब्वे, घाना और नामीबिया के राष्ट्रपतियों की उम्र इस मीडियन एज से 20 वर्ष अधिक है.

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अफ़्रीकी देशों के नेताओं की मीडियन एज 62 वर्ष है. ज़िम्बाब्वे, घाना और नामीबिया के राष्ट्रपतियों की उम्र इस मीडियन एज से 20 वर्ष अधिक है.

एडम अबेबे कहते हैं कि नेता जितना ज्यादा देर तक सत्ता में बने रहेंगे, उनकी और देश की आबादी की मीडियन एज में अंतर बढ़ता जाएगा. कोई राष्ट्रपति सत्ता में कब तक रह सकता है, यह उस देश का संविधान निर्धारित करता है. आमतौर पर किसी नेता के लिए अधिकतम दो कार्यकाल तक सत्ता में रहने का प्रावधान होता है.

डॉक्टर एडम कैसी अबेबे ने कहा कि कई नेता संविधान के नियमों के साथ खिलवाड़ करते हैं. मिसाल के तौर पर युगांडा, कैमरून, इक्वेटोरियल गिनी और जिबौती के राष्ट्रपतियों ने सत्ता में बने रहने के लिए संविधान में कई बार बदलाव किए हैं. और इनका नाम अफ़्रीका ही नहीं बल्कि दुनिया के कुछ सबसे बुज़ुर्ग नेताओं में आता है.

कुछ देशों ने अधिकतम कार्यकाल की सीमा पूरी तरह हटा दी है. इक्वेटोरियल गिनी के राष्ट्रपति तियोदोरो ओबियांग गुएमा,45 सालों से सत्ता में हैं. एडम अबेबे कहते हैं कि कुछ देशों में नेता चुनाव टालते रहते हैं.

मिसाल के तौर पर डीआरसी के पूर्व राष्ट्रपति कबीला ने यही किया. ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें डर था कि अगर चुनाव हुए तो वो हार जाएंगे. लंबे समय से सत्ता में रहे नेता गद्दी क्यों नहीं छोड़ना चाहते, इसके कुछ कारण हैं.

डॉक्टर एडम कैसी अबेबे कहते हैं, “कुछ नेता मानते हैं कि अगर वो सत्ता से हटे तो देश की व्यवस्था बिखर जाएगी और जब वह अपना कार्यकाल बढ़ाते हैं, तो उसके लिए वो पुलिस और सेना का इस्तेमाल करते हैं. नतीजतन काफ़ी हिंसा होती है और बाद में वो सत्ता से हटना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें डर रहता है कि उन्हें उनकी कार्रवाइयों के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है. कुछ लोग भ्रष्टाचार के आरोपों और सज़ा से बचने के लिए सत्ता में जमे रहना चाहते हैं. कई ऐसे लोग भी हैं, जो इन नेताओं के ज़रिए अपना हित साधते हैं. वो नहीं चाहते कि यह नेता सत्ता से बाहर हों.”

तो अब सवाल यह है कि कितने बुज़ुर्ग नेता को शासन के लिए बहुत बुज़ुर्ग माना जाए?

एडम अबेबे कहते हैं कि इसका कोई सीधा जवाब तो नहीं है. वो नहीं मानते कि इस मुद्दे का मकसद बुज़ुर्ग लोगों को बाहर करना है.

मगर मसला यह है कि नेता अपने कार्यकाल को बढ़ाता चला जाता है तो उसका विरोध होता है, हिंसा होती है और नतीजतन स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संभावना ख़त्म होती जाती है.

कैमरून में अगला राष्ट्रपति चुनाव अगले साल जून में होगा

राष्ट्रपति पॉल बिया.

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इमेज कैप्शन, कैमरून के राष्ट्रपति पॉल बिया 91 वर्ष के हैं.

34 साल के अचालेके क्रिस्चियन लेके कैमरून के रहने वाले हैं और वो वहां युवा सशक्तिकरण के लिए काम करने वाली संस्था लोकल यूथ कॉर्नर के कार्यकारी निदेशक हैं.

वो बताते हैं कि कैमरून के राष्ट्रपति पॉल बिया 91 वर्ष के हैं, लेकिन कैमरून की आबादी की मीडियन एज मात्र 19 वर्ष है.

वो कहते हैं कि जहां तक सरकार का कैमरून की युवा आबादी के साथ जुड़ने का सवाल है, यह काम अभी निर्माणाधीन स्तर पर ही है. देश के युवाओं को सरकार से काफ़ी अपेक्षाएं हैं और नये अवसरों की ज़रूरत है. हर देश में युवा वर्ग को परिभाषित करने के लिए आयु निर्धारित है. दो करोड़ अस्सी लाख की आबादी वाले कैमरून में 18 से 35 वर्ष के बीच के लोगों को युवा माना जाता है.

अचालेके क्रिस्चियन लेके ने बताया कि कैमरून की 75 प्रतिशत आबादी 18 से 35 वर्ष के बीच के लोगों की है. यह युवा तय कर सकते हैं कि कौन उनका मार्गदर्शन और नेतृत्व करे.

मगर, इस आयु वर्ग के सभी लोग असल में यह चुनाव नहीं कर सकते. क्योंकि, कैमरून में मतदान का अधिकार पाने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष है. कैमरून के राष्ट्रपति पॉल बिया लगभग 42 साल से सत्ता में हैं. देश के अधिकांश लोगों ने उनके अलावा दूसरा नेता देखा ही नहीं है.

अचालेके क्रिस्चियन लेके कहते हैं कि कैमरून का समाज पितृसत्तात्मक है और जहां अभी भी युवाओं को नासमझ माना जाता है. इसकी वजह से युवा अब देश की समस्याओं के लिए बुजुर्गों को दोषी ठहराने लगे हैं.

“सबसे बड़ा मुद्दा रोज़गार और ग़रीबी का है. हाल में लोगों के सामने चुनौतियां बढ़ गयी हैं. टैक्स बढ़ गया है. पिछले साल तक घर ख़र्च 600 फ्रैंक प्रति माह था, जो अब 800 फ़्रैंक हो गया है. इसका सबसे अधिक प्रभाव युवाओं पर पड़ा है. क्योंकि यह तबका नौकरी करता है, बेहतर शिक्षा प्राप्त करने की कोशिश करता है. इसी तबके को सबसे कम संसाधन उपलब्ध होते हैं. यह बहुत गंभीर मसला है.”

कैमरून में 21 वर्ष से अधिक के लोगों को मतदान का अधिकार तो है, लेकिन राजनीति में आने का अधिकार नहीं है.

अचालेके क्रिस्चियन लेके बताते हैं कि किसी राजनीतिक पार्टी मे नेतृत्व के लिए चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 33 वर्ष है और राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 35 वर्ष है. ऐसे में तकनीकी तौर पर देखा जाए तो, कोई युवा देश का राष्ट्रपति नहीं बन सकता.

अचालेके क्रिस्चियन लेके यह भी कहते हैं कि कैमरून के युवा नयी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके रोज़गार के नये मार्ग खोल रहे हैं, लेकिन उन्हें इसके लिए सरकार से सहायता की ज़रूरत है.

वहीं, कैमरून के उत्तरी क्षेत्र में देश के सुरक्षाबलों की नाइजीरिया के इस्लामी चरमपंथी गुट बोको हराम के साथ और दक्षिण पश्चिमी क्षेत्र में पृथक्तावादी गुटों के साथ हिंसक झड़पें होती रहती हैं. इस हिंसा की वजह से हज़ारों लोग विस्थापित हुए हैं और कई लोग देश छोड़ कर जाने की कोशिश कर रहे हैं.

अचालेके क्रिस्चियन लेके ने कहा कि कनाडा सरकार ने प्रवासन के लिए एक परीक्षा आयोजित की थी, जिसमें भाग लेने के लिए कैमरून के हज़ारों युवा पहुंच गए थे. हज़ारों युवा बेहतर ज़िंदगी की तलाश में अपनी ज़िंदगी दांव पर लगा कर भी मैक्सिको के रास्ते अमेरिका पहुंचने की कोशिश करते हैं.

जो युवा कैमरून में रह रहे हैं, उनकी ओर सरकार का विशेष ध्यान नहीं है. अचालेके क्रिस्चियन लेके कहते हैं कि देश के युवा अपनी समस्या सुलझाने के लिए सरकार के साथ मिल कर काम करना चाहते हैं. देश की बहुसंख्यक आबादी युवा है और सबसे ज़्यादा मुसीबतें उन्हीं को झेलनी पड़ रही है.

कैमरून में अगले राष्ट्रपति चुनाव अगले साल जून में होने वाले हैं. अगर राष्ट्रपति पॉल बिया चुनाव लड़ते हैं और जीत जाते हैं तो नब्बे पार कर चुके इस नेता का यह आठवां कार्यकाल होगा.

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प्रक्रिया का हिस्सा

बोला टिनुबू.

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इमेज कैप्शन, नाइजीरिया के राष्ट्रपति बोला टिनुबू 2023 में लोकतांत्रिक तरीके से राष्ट्रपति चुने गए.

नाइजीरिया में युवा सशक्तिकरण से जुड़ी संस्था नेटवर्क ऑफ़ यूथ फॉर सस्टेनेबल इनीशिएटिव की वरिष्ठ प्रोग्राम अधिकारी बोलूवाटीफ़े अजायी बताती हैं कि नाइजीरिया में बोला अहमद टिनुबू 2023 में लोकतांत्रिक तरीके से राष्ट्रपति चुने गए और एक लोकतांत्रिक नेता का देश का नेतृत्व संभालना नाइजीरिया के लिए अच्छी बात है.

राष्ट्रपति बोला टिनुबू 72 वर्ष के हैं और नाइजीरिया में मतदान के अधिकार के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष है.

“हमारी आबादी लगभग 20 करोड़ है और इसमें से 7 करोड़ युवा हैं, जो कि आबादी का बहुत बड़ा वर्ग है जिसमें 18 से 35 वर्ष के बीच की आयु के लोग शामिल हैं.”

मगर, नाइजीरिया के सामने भी कई चुनौतियां हैं. बोलूवाटीफ़े अजायी कहती हैं कि देश को जहां विद्रोही गुटों का सामना करना पड़ रहा है. वहीं, महंगाई और बेरोज़गारी भी बड़ी समस्या है. लोग इन समस्याओं से जूझते-जूझते थक गए हैं और युवाओं के सपने मुरझा रहे हैं. बढ़ती महंगाई और लचर प्रशासन के मुद्दे को उठाने के लिए अगस्त में नाइजीरिया में भारी विरोध प्रदर्शन हुए, जिसका नेतृत्व मुख्यत: युवाओं के हाथ में था.

सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की. सैकड़ों लोग ग़िरफ़्तार कर लिए गए और कई इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया. कम से कम बारह लोग मारे गए. विरोध प्रदर्शनों के शुरू होने के बाद राष्ट्रपति टीनुबू ने देश को संबोधित करते हुए कहा कि उनका प्रशासन स्थिति को सुधारने के लिए प्रयास कर रहा है.

बोलूवाटीफ़े अजायी का मानना है कि राष्ट्रपति के संबोधन से लोगों को लगा कि राष्ट्रपति उनकी समस्याओं को गंभीरता से ले रहे हैं. मगर, सभी लोग उनके आश्वासनों से सहमत नहीं हुए. छ साल पहले पिछली सरकार ने एक क़ानून पास करके राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु को 40 वर्ष से घटा कर 35 वर्ष कर दिया था और संसदीय चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु को 30 साल से घटा कर 25 साल कर दिया था. वर्तमान राष्ट्रपित बोला ने भी अपने मंत्रिमंडल में युवाओं को स्थान दिया.

बोलूवाटीफ़े अजायी ने आगे कहा कि राष्ट्रपति बोला ने अपने प्रशासन में 30 से 35 साल के बीच के कई लोगों को मंत्री बनाया है, जो कि एक बहुत अच्छा कदम है. कई युवा मंत्री बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. इससे पता चलता है कि अगर युवाओं को सत्ता में लाया जाए तो, वो बहुत अच्छा काम कर सकते हैं.”

राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिए आयु सीमा घटाने के बावजूद लोगों के सामने इस क्षेत्र में अभी भी कई बाधाएं हैं.

बोलूवाटीफ़े अजायी कहती हैं कि नाइजीरिया में चुनाव लड़ने के लिए और चुनाव प्रचार के लिए बहुत पैसों की ज़रूरत होती है. आम लोगों के पास इतने पैसे और संसाधन नहीं होते.

“आमतौर पर नाइजीरिया में यह धारणा होती है कि युवा नहीं जानते कि वो क्या चाहते हैं. मगर यह सच नहीं है. वो सामान्य सुविधाएं चाहते हैं, राजनीति में भूमिका चाहते हैं. लेकिन उस दिशा में कोई बड़ा बदलाव आता नहीं दिख रहा.”

बदलाव के एजेंट

सेनेगल के राष्ट्रपति.

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इमेज कैप्शन, 44 वर्षीय बासिरियो डियोमे फ़े सेनेगल के राष्ट्रपति बने.

सूडानी राजनीतिक विश्लेषक और कौनफ़्लूएंस एडवाइज़री नाम के थिंकटैंक की निदेशक ख़ालूद ख़ैर कहती हैं कि अफ़्रीका के सभी 54 देशों का अपना अलग इतिहास है और राजनीतिक संगठन का ख़ास तरीका है.

“अफ़्रीका में कई प्रकार की सरकारें है. कुछ तानाशाही सरकारें है और कहीं पर कुछ हद तक लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम है. इन सभी देशों में युवा व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए संघर्ष करते हैं और व्यवस्था को बदलने में बड़ी भूमिका निभाते हैं.”

इस साल अप्रैल में 44 वर्षीय बासिरियो डियोमे फ़े सेनेगल के राष्ट्रपति बने. वो अफ़्रीका में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए सबसे कम उम्र के राष्ट्रपति हैं.

ख़ालूद ख़ैर के अनुसार, सेनेगल एक महत्वपूर्ण मिसाल है क्योंकि दशकों से वह पश्चिम अफ़्रीका में एक अच्छे प्रशासन और शांतिपूर्ण समाज का उदाहरण बना रहा है. चुनाव से पहले पिछले राष्ट्रपति संविधान के नियमों के विरुद्ध जा कर तीसरा कार्यकाल हासिल करना चाहते थे, जिससे लोग चिंतित हो गए. देश में अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शन हुए. वो कहती हैं कि लोगों को संगठित करने के लिए राष्ट्रपति डियोमे फ़े ने काफ़ी मेहनत की क्योंकि वो ख़ुद किसी राजनीतिक तबके से नहीं आए थे, बल्कि सरकारी अधिकारी रहे थे.

पूर्व टैक्स अधिकारी डियोमे फ़े पर लोगो को भड़काने के आरोप लगे थे, लेकिन वो राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत गए. ख़ालूद ख़ैर का मानना है कि वो भ्रष्टाचार से लड़ना चाहते हैं. उनके इस अभियान के प्रति युवा वर्ग आकर्षित हुआ, क्योंकि वो भ्रष्टाचार को देश की समस्याओं की ज़ड़ मानता है. ख़ालूद ख़ैर कहती हैं कि यह अफ्रीका के दूसरे देशों के युवाओं को भी प्रेरित कर रहा है. वो किस प्रकार से शासन करेंगे, यह तो वक़्त ही बताएगा लेकिन लोगों में उम्मीद जगी है. मगर, ऐसी उम्मीद उन अफ़्रीकी देशों मे नज़र नहीं आती जहां तीस चालीस साल के सैनिक अधिकारी शासन कर रहे हैं.

ख़ालूद ख़ैर ने कहा, “अफ़्रीका के कई देशों मे युवा सैनिक अधिकारियों ने सरकार का तख्तापलट कर सत्ता हथिया ली है. वो कहते हैं कि युवा होने के नाते वो परिवर्तन ला सकते हैं. मगर माली और बुर्कीना फ़ासो में युवाओं के जीवन में ऐसा कोई बदलाव दिखाई नहीं दिया. दरअसल, तख़्ता पलटने कि वजह से उनकी सरकार के ख़िलाफ़ प्रतिबंध लग जाते हैं, देश में हिंसा होती है. उलटे स्थिति और बदतर हो जाती है.”

कई देशों में सरकार तक पहुंचना आम लोगों के लिए मुश्किल है. ख़ालूद ख़ैर कहती हैं कि ऐसे कई देशों में सोशल मीडिया की वजह से युवा संगठित हो रहे हैं और अपने अभियान को ज्यादा लोगों तक पहुंचा रहे हैं. वो सूडान की मिसाल देते हुए कहती हैं कि 2018 में ग़रीबी और बेरोज़गारी से निपटने में सरकार की नाकमयाबी के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर एक बड़ा अभियान शुरू हुआ और सड़कों पर भारी विरोध प्रदर्शन हुए.

अप्रैल 2019 में तीस साल से शासन कर रहे राष्ट्रपति ओमार अल बशीर की सरकार का सेना ने तख्तापलट कर दिया. ख़ालूद ख़ैर कहती हैं कि सूडान की तरह कीनिया में भी युवाओं के नेतृत्त्व में कुप्रशासन के ख़िलाफ़ संघर्ष किया गया है, क्योंकि लोग अब युवाओं पर भरोसा करने लगे हैं और उन्हें बदलाव के एजेंट के रूप मे देखने लगे हैं.

तो क्या अफ़्रीका के बुज़ुर्ग नेता युवा आबादी पर शासन कर पाएंगे? नयी पीढ़ी के नेता परिवर्तन की मांग कर रहे हैं. मगर, इसका यह मतलब नहीं है कि युवा हमेशा बेहतर नेता साबित होंगे. हां, उनसे यह उम्मीद ज़रूर की जाती है कि वो देश के युवाओं के मसलों को बेहतर तरीके से समझेंगे और उसके लिए सही नीतियां अपनाएंगे. इस बीच अफ़्रीका के युवा मुख्यधारा की राजनीति के अलावा सोशल मीडिया के ज़रिए भी आवाज़ उठा रहे हैं और उनकी आवाज़ बुलंद भी हो रही है. हमारी एक्सपर्ट ख़ालूद ख़ैर की राय है कि आने वाले कई वर्षों तक अफ़्रीका की युवा आबादी बढ़ती रहेगी और वहां उन्हीं के ज़रिए बदलाव भी आएगा.

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