तुर्की का यह रुख़ क्या हैरान करने वाला है, क्या भारत करेगा समर्थन?

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तुर्की ब्रिक्स समूह में शामिल होना चाहता है.
समाचार एजेंसी एपी से तुर्की के एक अधिकारी ने इसकी पुष्टि की है. हालांकि तुर्की ने इस बारे में औपचारिक एलान नहीं किया है.
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने भी दो सितंबर को कहा था- तुर्की ने ब्रिक्स में शामिल होने की इच्छा जताई है.
तुर्की नेटो का सदस्य देश है. नेटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन. नेटो दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1949 में बना था. इसे बनाने वाले अमेरिका, कनाडा और अन्य पश्चिमी देश थे. इसे इन्होंने सोवियत यूनियन से सुरक्षा के लिए बनाया था. तब दुनिया दो ध्रुवीय थी. एक महाशक्ति अमेरिका था और दूसरी सोवियत यूनियन.
तुर्की पहला ऐसा नेटो देश है, जो ब्रिक्स में शामिल होना चाहता है.
ब्रिक्स विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का गुट है. ब्रिक्स में ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ्रीका शामिल हैं. इसे चीन के नेतृत्व वाला गुट माना जाता है. कई लोग इसे पश्चिम को चुनौती देने वाले गुट के रूप में देखते हैं.

भारत पर क्या असर
नेटो पश्चिम के देशों का संगठन है. चीन और रूस इस गुट को अपने विरोधी के रूप में देखते हैं.
ब्रिक्स के विस्तार से भारत का असर इस गुट में कैसा रहेगा?
तुर्की कश्मीर के मामले में पाकिस्तान के समर्थन में बोलता रहा है. अर्दोआन कई बार कश्मीर का मुद्दा यूएन में उठा चुके हैं. ऐसे में तुर्की ब्रिक्स में शामिल होता है तो भारत के समर्थन में उसका रुख़ शायद ही रहे.
तुर्की के ब्रिक्स में शामिल होने की ख़बर पर भारत के पूर्व विदेश सचिव और रूस में भारत के राजदूत रहे कंवल सिब्बल ने लिखा है, ''नेटो सदस्य के रूप तुर्की ब्रिक्स में शामिल नहीं हो सकता है.
उन्होंने लिखा है, ''ब्रिक्स का एजेंडा आर्थिक सहयोग से आगे भी जाता है. ये राजनीतिक है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सत्ता का फिर से सुंतलन बैठाना इसका लक्ष्य है. इसका आर्थिक लक्ष्य भी इसी दिशा में बढ़ता दिखता है. जो देश ब्रिक्स में शामिल होना चाहते हैं वो पश्चिम से आगे अपने राजनयिक संबंधों को विस्तार देना चाहते हैं. ये रणनीति का हिस्सा है.''
सिब्बल लिखते हैं, ''ब्रिक्स में आने से रूस की सुरक्षा भी बढ़ती है. रूस के तुर्की से अच्छे संबंध हैं. रूस तुर्की की मदद जारी रख सकता है. लेकिन ब्रिक्स में तुर्की को लाने के कुछ अंजाम भी होंगे. ब्रिक्स में शामिल किए जाने की योग्यता तय करनी चाहिए. नेटो सदस्य को ब्रिक्स में लाने का कोई मतलब नहीं है.''
भारत यह नहीं चाहेगा कि ब्रिक्स में वैसे देश शामिल हों जो उसके हितों के आड़े आते हैं. लेकिन रूस और तुर्की के अच्छे संबंध है. ऐसे में रूस तुर्की को ब्रिक्स में शाामिल करने का समर्थन करता रहा है.
पिछले साल अगस्त में ब्रिक्स के विस्तार की बात हो रही थी तो भारत के जाने-माने सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने लिखा था, "ऐसा लगता है कि नए सदस्यों को शामिल करने के मामले में चीन की छाप है, जो रूस के समर्थन से ब्रिक्स को आक्रामक तरीके से विस्तार दे रहा है.''
''जिस तरह चीन ने एससीओ में भारत को सिर्फ़ पाकिस्तान के साथ ही आने दिया उसी तरह अब ब्रिक्स में प्रतिद्वंद्वियों की जोड़ी में भारत और चीन के अलावा, तीन नए भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी होंगे. ईरान और सऊदी अरब. मिस्र और इथियोपिया. ब्राज़ील और अर्जेंटीना. (अर्जेंटीना के प्रवेश को ब्राजील का समर्थन हासिल था.) ऐसे भू-राजनैतिक जोड़े के नए सदस्यों की सूची में एकमात्र अपवाद संयुक्त अरब अमीरात है, जिसके प्रवेश के लिए भारत ने जोर लगाया था. शी ने खुश होकर कहा- यह सदस्यता विस्तार ऐतिहासिक है."
कई लोग मानते हैं कि ब्रिक्स का विस्तार भारत के हक़ में नहीं होगा बल्कि चीन की स्थिति मज़बूत होगी.

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ब्रिक्स में ऐसा क्या है
ब्लूमबर्ग ने दो सितंबर को एक रिपोर्ट की थी. इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि कुछ महीने पहले तुर्की ने ब्रिक्स में शामिल होने के लिए आवेदन दिया था.
समाचार एजेंसी एपी और रॉयटर्स के मुताबिक़, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन की पार्टी के प्रवक्ता उमर सेलिक ने कहा कि अर्दोआन कई बार कह चुके हैं कि तुर्की ब्रिक्स का सदस्य बनने की ख़्वाहिश रखता है.
उमर कहते हैं, ''इस मुद्दे पर हम स्पष्ट हैं. ये प्रक्रिया जारी है. लेकिन इस मामले में अभी कुछ पुख़्ता नहीं है. हमारे राष्ट्रपति ने स्पष्ट कहा है कि तुर्की ब्रिक्स समेत सभी अहम मंचों से जुड़ना चाहता है.''
ब्रिक्स की स्थापना 2006 में हुई थी. 2010 में इस समूह में साउथ अफ़्रीका जुड़ा. हाल ही में इस समूह में कई और देशों के शामिल होने की प्रक्रिया शुरू हुई है.
इन देशों में ईरान, मिस्र, इथियोपिया, यूएई शामिल हैं. सऊदी अरब भी इस समूह में शामिल होने पर विचार कर रहा है.
वहीं अज़रबैजान ने आधिकारिक तौर पर ब्रिक्स में शामिल होने के लिए आवेदन दिया है.
ब्रिक्स के सदस्य देश ग्लोबल साउथ की आवाज़ के तौर पर उभरे हैं. ब्रिक्स सदस्य देश संयुक्त राष्ट्र, आईएमएफ़, वर्ल्ड बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों में सुधारों और हिस्सेदारी की बात कहते रहे हैं.
ब्रिक्स की अगली बैठक अक्तूबर 2024 को रूस में होनी है.

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अर्दोआन ब्रिक्स में क्यों आना चाहते हैं
अर्दोआन तुर्की की सत्ता में दो दशक से ज़्यादा वक़्त से हैं.
अर्दोआन तुर्की के लिए ज़्यादा स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की ओर बढ़ते दिखते हैं ताकि दुनिया में अपने असर को बढ़ा सकें.
तुर्की यूरोपीय यूनियन में शामिल होना चाहता था लेकिन उसे जगह नहीं मिली. कई लोग कहते हैं कि मुस्लिम बहुल देश होने के कारण तुर्की को ईयू में जगह नहीं मिली. ऐसे में तुर्की अपनी पहचान को लेकर जूझता रहा है. नेटो में होने के बावजूद तुर्की की लाइन नेटो के रुख़ से बिल्कुल अलग होता है.
अगस्त के आख़िरी हफ़्ते में अर्दोआन ने कहा था कि तुर्की को पूर्व और पश्चिम दोनों से रिश्ते बेहतर करने चाहिए.
अर्दोआन ने कहा था, ''हमें यूरोपीय संघ और शंघाई कॉर्पोरेशन ऑर्गेनाइजेशन (एससीओ) में से किसी एक को नहीं चुनना होगा. बल्कि हमें इन दोनों और दूसरी संस्थाओं से भी रिश्ते बनाने होंगे.''
तुर्की के एक तरफ़ यूरोप है और दूसरी तरफ एशिया. तुर्की 1952 में नेटो का सदस्य बना था.
तुर्की ने यूरोपीय संघ में शामिल होने की बातचीत 2005 में शुरू की थी. मगर इस मामले में तुर्की को सफलता नहीं मिली है.
मिडिल ईस्ट आई की एक रिपोर्ट में तुर्की की नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी के स्कॉलर हयाती उनलु के हवाले से इस बारे में कई बातें कही गई हैं.
हयाती उनलु ने कहा, ''तुर्की के ब्रिक्स में शामिल होने की ख्वाहिश को पश्चिम से मुंह मोड़ने के तौर पर नहीं देखना चाहिए. तुर्की पश्चिम से अलग रिश्तों का नया नेटवर्क बनाना चाहता है ताकि आर्थिक चुनौतियों से निपटा जा सके.''

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चीन और रूस का रुख़
चीन और रूस का रुख़ ये रहा है कि वो ब्रिक्स समूह का विस्तार करना चाहते हैं.
दोनों देश पश्चिमी देशों के सामने ब्रिक्स को खड़ा करना चाहते हैं. ऐसे में अगर तुर्की ब्रिक्स का सदस्य बन गया तो एक बड़ा दांव होगा. इसके तहत यूरोपीय संघ का एक उम्मीदवार और नेटो सदस्य ब्रिक्स का सदस्य बन जाएगा.
तुर्की के विदेश मंत्री हकन फिदान ने जून 2024 में चीन दौरे के दौरान कहा था- हम ब्रिक्स में शामिल होना चाहते हैं और हम ऐसा क्यों नहीं चाहेंगे?
यूक्रेन रूस के बीच युद्ध के कारण भी नेटो सदस्यों के बीच मतभेद देखने को मिले हैं.
चीन इस जंग में रूस के साथ खड़ा रहा है. वहीं नेटो के दूसरे सदस्य देश यूक्रेन के साथ खड़े नज़र आए हैं.
ब्रिक्स समूह में चीन की अहम भूमिका देखी जाती है. ब्रिक्स का मुख्यालय चीन के शंघाई में है.
ब्रिक्स के ज़रिए तुर्की आर्थिक मामलों में ख़ुद को और मज़बूत करना चाहता है.
जानकारों का कहना है कि तुर्की रूस और मध्य एशिया के बीच गैस एक्सपोर्ट का गढ़ बनना चाहता है.
चीन और रूस के अलावा दक्षिण अफ्रीका भी ब्रिक्स के विस्तार का मुखर समर्थक हैं. लेकिन विस्तार को लेकर भारत और ब्राजील की अपनी आपत्तियां रही हैं.
कहा जाता है कि चीन- रूस ब्रिक्स के ज़रिए जी-7 देशों और अमेरिकी विश्व व्यवस्था को तोड़ना चाहते हैं.
चीनी विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के प्रिय प्रोजेक्ट बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव और ब्रिक्स का रणनीतिक गठजोड़ पश्चिचमी देशों के आर्थिक दबदबे को ख़त्म कर सकता है.
चीन पाकिस्तान को भी ब्रिक्स से जोड़ना चाहता है. हालांकि भारत विस्तार के पक्ष में कम नज़र आता है.
कहा जाता है कि पीपीपी पर आधारित जीडीपी के मामले में ब्रिक्स देशों ने सबसे अमीर देशों के संगठन जी-7 को पीछे छोड़ दिया है.
दुनिया की 40 फीसदी आबादी वाले ब्रिक्स देशों की वैश्विक जीडीपी में लगभग एक तिहाई हिस्सेदारी है. वैश्विक अर्थव्यवस्था भी अब ब्रिक्स देशों की ओर झुकती दिखती जा रही है.

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नए देश ब्रिक्स से जुड़ना क्यों चाहते हैं
जो देश ब्रिक्स की सदस्यता लेना चाहते हैं, वो इसे विश्व व्यापार संगठन, आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक और यूएन जैसे पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाले संगठन के विकल्प के तौर पर देखते हैं.
ग्लोबल साउथ के देशों को लगता है कि ब्रिक्स में उनकी ज्यादा सुनी जाएगी. ब्रिक्स के साथ आने से दूसरे सदस्य देशों के साथ मिल कर कारोबार, वित्तीय मदद और निवेश हासिल करने के ज्यादा मौक़ा मिलेगा.
कई देश पश्चिमी वित्तीय और सहायता एजेंसियों की कड़ी शर्तों से परेशान हैं. लिहाजा वे ब्रिक्स देशों के न्यू डेवलपमेंट बैंक की मदद चाहते हैं.
जानकारों की मानें तो मौजूदा विश्व व्यवस्था से इन देशों को सबसे ज़्यादा निराशा कोविड महामारी के वक़्त हुई थी जब पश्चिम के अमीर देशों ने जीवनरक्षक दवाओं की जमाखोरी शुरू कर दी थी.
अलग-अलग देशों ने ब्रिक्स की सदस्यता लेने की वजहें गिनाई हैं.
मगर इन वजहों के निष्कर्ष को समझा जाए तो ये पश्चिम के मुकाबले नई शक्ति से जुड़ने और उसे खड़ा करने की कोशिश के रूप में दिखती है.

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क्या है ब्रिक्स?
ब्रिक्स दुनिया की पाँच सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है.
ब्रिक्स अंग्रेज़ी के अक्षर B R I C S से बना वो शब्द है, जिसमें हर अक्षर एक देश का प्रतिनिधित्व करता है.
ये देश हैं ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका.
एक ब्रिटिश अर्थशास्त्री जिम ओ'निल ने दुनिया के सबसे ताक़तवर निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स में काम करने के दौरान यह शब्द गढ़ा था. तब यह शब्द BRIC था.
जब 2010 में दक्षिण अफ़्रीका को भी इस समूह से जोड़ा गया तो यह BRICKS हो गया.
पहली बार 2006 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में जी-8 समूह के शिखर सम्मेलन के साथ ही ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन यानी ब्रिक के नेताओं ने पहली बार मुलाक़ात की थी.
ये वो देश हैं जिनके बारे में कुछ जानकारों का मानना है कि साल 2050 तक वे विनिर्माण उद्योग, सेवाओं और कच्चे माल के प्रमुख सप्लायर यानी आपूर्तिकर्ता हो जाएंगे.
जानकारों का मानना है कि चीन और भारत विनिर्माण उद्योग और सेवाओं के मामले में पूरी दुनिया के प्रमुख सप्लायर हो जाएंगे जबकि रूस और ब्राज़ील कच्चे माल के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता हो जाएंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित












