फ़र्ज़ी जज नौ साल तक गुजरात में कैसे चला रहा था नकली अदालत

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- Author, भार्गव पारिख
- पदनाम, बीबीसी गुजराती के लिए
गुजरात की राजधानी गांधीनगर के एक व्यस्त इलाक़े में एक शॉपिंग सेंटर में लोग सुबह से ही एक संकरी सीढ़ी पर बैठकर अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं.
अदालत के कारिंदे की वर्दी में खड़ा एक आदमी ज़ोर से आवाज़ लगाता है और लोग अपने वकीलों के साथ दौड़ पड़ते हैं. जज की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति दलीलें सुनता है और फ़ैसला सुनाता है.
पहली नज़र में यही ज़ाहिर होता है कि सामान्य अदालत में कामकाज का सिलसिला जारी है. लेकिन शाम होते-होते हालात बदलने लगते हैं.
शाम को जब अदालत का काम ख़त्म हो जाता है, तो जज मुवक्किलों से बात करने लगता है और उनके पक्ष में फ़ैसला सुनाने के लिए पैसे की मांग करता है. अगर डील हो जाती है, तो पक्ष में फ़ैसला दे दिया जाता है.


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किसी फिल्म की कहानी को टक्कर देने वाली यह घटना गांधीनगर की है, जहां एक नकली अदालत और नकली जज को अहमदाबाद पुलिस ने हिरासत में लिया है.
बीते 22 अक्तूबर को जब पुलिस ने नकली जज मॉरिस सैमुअल क्रिश्चियन को कोर्ट में पेश किया तो उसने जज के सामने खुद को एक मध्यस्थ अदालत के जज के तौर पर पेश करने की कोशिश की.
इतना ही नहीं, उसने जज के सामने शिकायत की कि पुलिस ने उसे पीटा और उससे अपराध क़ुबूल कराया, जिसके बाद जज ने उसकी मेडिकल जांच कराने का आदेश दिया.
मॉरिस को कस्टडी में भेजा

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सबूतों के आधार पर सिटी सिविल कोर्ट के जज जयेश एल. चौटिया ने मॉरिस क्रिश्चियन के ख़िलाफ़ फ़र्ज़ी कोर्ट स्थापित करने और फ़र्ज़ी ढंग से फ़ैसले जारी करने के लिए धोखाधड़ी और साज़िश का मामला तत्काल दर्ज करने का आदेश दिया है.
मॉरिस को 10 दिन की कस्टडी में भेज दिया गया है. सिविल कोर्ट ने मॉरिस के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 170, 420, 465, 467, 471 और 120बी के तहत एफ़आईआर दर्ज़ करने का आदेश दिया है.
पिछले कुछ महीनों में गुजरात में प्रधानमंत्री कार्यालय में काम करने वाला एक फ़र्ज़ी उच्च अधिकारी, मुख्यमंत्री कार्यालय में काम करने वाला एक नकली अधिकारी, फ़र्ज़ी सरकारी दफ्तर, नकली टोल बूथ और फ़र्ज़ी पुलिस अधिकारी पकड़े जा चुके हैं.
अब फ़र्ज़ी अदालत और फ़र्ज़ी जज के पकड़े जाने की यह घटना सामने आयी है.
बीबीसी गुजराती ने इस मामले से जुड़े वकीलों और एक पुलिस अधिकारी से बात की कि कैसे फ़र्ज़ी जज एक फ़र्ज़ी अदालत चलाते हुए पकड़ा गया और कैसे वह जनता को धोखा दे रहा था.
एक साल में 500 फ़ैसले

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अहमदाबाद में फ़र्ज़ी कोर्ट चलाने वाला मॉरिस क्रिश्चियन पिछले नौ साल से ये काम कर रहे थे.
पुलिस के मुताबिक, मॉरिस ने दावा किया है कि उनके पास क़ानून में पीएचडी की डिग्री है.
उन्होंने अहमदाबाद, वडोदरा और गांधीनगर भूमि विवादों में मध्यस्थ वकील के तौर पर काम करने का दावा किया है.
अहमदाबाद ज़ोन-2 के पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) श्रीपाल शेषमा ने बीबीसी को बताया,''मॉरिस क्रिश्चियन मूल रूप से साबरमती के रहने वाले हैं."
उन्होंने बताया,"कुछ साल पहले मॉरिस ने गांधीनगर में एक फ़र्ज़ी अदालत शुरू की और एक पुलिस शिकायत के कारण अदालत का स्थान बदल दिया. वह वर्तमान में गांधीनगर के सेक्टर 24 में एक फ़र्ज़ी कोर्ट चला रहे थे."
पुलिस के मुताबिक, मॉरिस ने सिटी सिविल कोर्ट में स्वीकार किया है कि उन्होंने पिछले एक साल में गांधीनगर, अहमदाबाद और वडोदरा में विवादित भूमि मामलों के 500 मामलों में फ़ैसले दिए हैं.
मॉरिस के पड़ोसी क्या कहते हैं?

सैमुअल फर्नांडिस मॉरिस क्रिश्चियन अहमदाबाद के साबरमती इलाक़े के कबीर चौक इलाक़े में रहने वाले पुराने पड़ोसी हैं.
बीबीसी से बात करते हुए वे कहते हैं, ''मॉरिस ने छोटी उम्र से ही बड़े सपने देखे. वह लोगों से पैसे लेता था. मॉरिस की मां गोवा की रहने वाली थीं और पिता राजस्थान के थे.''
उन्होंने आगे कहा, '' मॉरिस ने लोगों से पैसे उधार लिए और कभी वापस नहीं किए. उनकी इस आदत के कारण साबरमती में सभी लोग उनसे दूर रहने लगे."
उन्होंने बताया, "मॉरिस का परिवार यहां से दूसरी जगह चला गया. जब हम कुछ साल बाद मिले, तो मॉरिस ने कहा कि उन्होंने विदेश में पढ़ाई की है और जज बन गए हैं.''
सैमुअल फर्नांडिस के मुताबिक़ मॉरिस एक बड़े अधिकारी की तरह रहते थे. वह कार में यात्रा करते थे और यहां तक कि उनका बैग पकड़ने के लिए भी उनके पास एक आदमी होता था.
मॉरिस क्रिश्चियन ने मॉक कोर्ट कैसे बनाया?

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कोर्ट में सुनवाई के दौरान इस मामले के सरकारी वकील की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक़ साल 2015 में सरकार ने कोर्ट का बोझ कम करने के लिए मध्यस्थों को नियुक्त करना शुरू किया था.
इसमें दोनों पक्षों की सहमति से मामलों को सुलझाने के लिए मध्यस्थों और वकीलों को नियुक्त किया गया था.
इसी समय मॉरिस को मध्यस्थ होने का प्रमाण पत्र मिल गया और उसने सबसे पहले गांधीनगर के सेक्टर-21 में अपना फ़र्ज़ी कोर्ट शुरू किया.
इसमें उन्होंने एक न्यायाधीश की कुर्सी रखी, दो टाइपिस्ट नियुक्त किये, एक ज़मानतदार रखा और विवादित भूमि और भवन के मामलों में फ़ैसला देना शुरू किया.
इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल वेलफे़यर के क़ानूनी प्रमुख एडवोकेट दीपक भट्ट ने बीबीसी गुजराती से बातचीत में कहा, ''न्यायिक प्रक्रिया का बोझ कम करने के लिए मध्यस्थों और सुलह कराने वाले वकीलों की नियुक्ति की जाती है. यह नियुक्ति मध्यस्थ नियमों के अनुच्छेद 7 और 89 के अनुसार की गई है."
उन्होंने कहा, “मध्यस्थ का काम समझौता योग्य मामलों में दोनों पक्षों को लिखित समझौते के लिए समझाना है. यह लिखित समझौता तभी मान्य होगा, जब दोनों पक्षों ने मध्यस्थ के सामने अनुमोदित और हस्ताक्षरित किया हो."
दीपक भट्ट कहते हैं, “मध्यस्थ के पास अदालत की तरह आदेश देने की शक्ति नहीं है. मध्यस्थ द्वारा किया गया समझौता न्यायालय द्वारा अनुमोदित होने पर वैध होता है. उनकी नियुक्ति उच्च न्यायालय के परामर्श से और क़ानून एवं न्याय विभाग की मंजूरी से की जाती है.''
कैसे पकड़ा गया 'फ़र्ज़ी जज' मॉरिस?
डीसीपी श्रीपाल शेषमा का कहना है, ''सेक्टर-21 में फ़र्ज़ी कोर्ट चलाने के दौरान मॉरिस के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत दर्ज की गई थी. शिकायत के बाद मॉरिस ने रातोंरात अपना सेक्टर-21 का ऑफ़िस खाली कर दिया और सेक्टर-24 में कोर्ट शुरू कर दी."
मॉरिस के ख़िलाफ़ पहले भी पुलिस में शिकायत हो चुकी है. उनके ख़िलाफ़ अहमदाबाद क्राइम ब्रांच, मणिनगर और चांदखेड़ा में शिकायतें दर्ज की गई हैं. सबसे पहले उनकी शिकायत गुजरात बार काउंसिल ने की थी.
गुजरात बार काउंसिल की अनुशासन समिति के अध्यक्ष एडवोकेट अनिल केला ने बीबीसी गुजराती से बातचीत में कहा, ''एक बार हमने उनसे उनकी डिग्री के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्होंने विदेश में पढ़ाई की है और ऐसी डिग्री लेकर आए हैं कि वह देश में हर क्षेत्र में वकालत कर सकते हैं.''
उन्होंने कहा, ''हमारा पहला संदेह यह था कि अगर कोई शख़्स ऐसी किसी बड़ी डिग्री के साथ आता है, तो उसे सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करना चाहिए, उसे निचली अदालत में प्रैक्टिस क्यों करनी चाहिए?''
केला ने कहा, "जब बार काउंसिल ने उनकी डिग्री आदि की जांच की तो डिग्री फ़र्ज़ी पाई गई, जिसके आधार पर उन्होंने चार्टर के लिए आवेदन किया था. उनके पास वकालत करने का चार्टर भी नहीं था, इसलिए हमने 2007 में क्राइम ब्रांच में उनके ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज़ की."
केला ने यह भी जानकारी दी, '' हमें यह भी पता लगा कि उसे नौ अलग-अलग पासपोर्ट रखने और फ़र्ज़ी वीज़ा के लिए मुंबई में गिरफ़्तार किया गया था. हमें इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि वह फ़र्ज़ी अदालत चलाएगा.”
अहमदाबाद पुलिस के मुताबिक़ मॉरिस के ख़िलाफ़ अहमदाबाद क्राइम ब्रांच में शिकायत के अलावा 2012 में चांदखेड़ा पुलिस स्टेशन और 2015 में मणिनगर पुलिस स्टेशन में झूठे दस्तावेज़ों के चलते धोखाधड़ी के मामले दर्ज़ किए गए हैं.
अहमदाबाद का मामला क्या है?
अहमदाबाद के पालड़ी के ठाकोरवास में रहने वाले और दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम करने वाले बाबू ठाकोर का अपनी ज़मीन को लेकर अहमदाबाद नगर निगम से विवाद हो गया था.
बीबीसी से फ़ोन पर बातचीत में बाबू ठाकोर ने कहा, ''मैं एक दिहाड़ी मजदूर हूं और मेरी ज़मीन को लेकर विवाद चल रहा है. मेरे पास मामले को अदालत में ले जाने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए हमने मॉरिस क्रिश्चियन से मदद ली."
उन्होंने कहा, '' मॉरिस ने हमें बताया, ज़मीन की कीमत 200 करोड़ रुपये है, और मैं तुम्हें ज़मीन वापस दिला दूंगा. जमीन का पैसा आने पर 30 लाख रुपये फीस और दस्तावेज़ के लिए एक फ़ीसदी ख़र्च देना होगा. मैंने हां कहा, इसलिए मैंने अहमदाबाद कलेक्टर कार्यालय में नियुक्त किए गए वकील के अनुसार हस्ताक्षर किए थे. 2019 में उन्होंने मुझे आदेश दिया कि अब ये ज़मीन आपकी है."
गुजरात सरकार के शासकीय अधिवक्ता वीबी सेठ ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ''जब मैंने केस देखा तो उसमें लिखा था कि सरकार ने बाबू ठाकोर की ज़मीन अवैध तरीके से ले ली है.''
उन्होंने कहा, ''आठ से दस लाइन के आदेश में ज़मीन का क्षेत्रफल, ज़मीन किसके नाम पर कब से है, इसका कोई जिक्र नहीं था. इतना ही नहीं, ऑर्डर पर कोई स्टैम्प पेपर भी नहीं था.”
उन्होंने कहा, "जब हमने कोर्ट में जांच की तो पता चला कि मॉरिस क्रिश्चियन के पास मध्यस्थ का पद ही नहीं है. क्योंकि हाईकोर्ट की धारा 11 के तहत मध्यस्थ नियुक्त करने का कोई आदेश नहीं था. वह खुद स्पीड पोस्ट से पार्टी को पेश होने का आदेश देते थे.''
वीबी सेठ ने बताया, ''जब हमने बाबू ठाकोर की वकील क्रिस्टीना क्रिश्चियन से जिरह की, तो उन्होंने अदालत में स्वीकार किया कि वह आपराधिक मामलों में वकील हैं, न कि दीवानी मामलों की.''
उन्होंने कहा, ''हमने जांच की तो पता चला कि मॉरिस क्रिश्चियन के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले थे. इससे साफ़ हो गया कि सरकारी ज़मीन हड़पने के लिए ऐसी साजिश रची गई थी.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















