भारत के बड़े मीडिया संस्थान क्यों हैं चैटजीपीटी के ख़िलाफ़

सैम ऑल्टमैन

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इमेज कैप्शन, ओपनएआई के चीफ़ सैम ऑल्टमैन पिछले दिनों भारत में थे. उन्होंने भारत को कंपनी के लिए एक बड़ा मार्केट बताया था.
    • Author, उमंग पोद्दार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत के सबसे बड़े न्यूज़ आउटलेट्स ओपन एआई के ख़िलाफ़ एक मुक़दमे में शामिल होना चाहते हैं. ये वही अमेरिकी स्टार्टअप है जिसने चैटजीपीटी बनाया है.

इनमें 'इंडियन एक्सप्रेस', 'द हिंदू', 'इंडिया टुडे' और गौतम अदानी के स्वामित्व वाले एनडीटीवी समेत 10 से ज़्यादा सबसे पुराने भारतीय मीडिया प्रतिष्ठान शामिल हैं.

ये मीडिया हाउस जिस मुक़दमे से जुड़ना चाहते हैं वो भारत में अपनी तरह का पहला मामला है. इसे पिछले साल नवंबर में भारतीय न्यूज़ एजेंसी एशियन न्यूज़ इंटरनेशनल (एएनआई) ने दायर किया था.

एएनआई का आरोप है कि चैटजीपीटी ने उसके कॉपीराइट वाले कंटेंट को बिना इजाज़त इस्तेमाल किया है.

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ओपनएआई ने इन आरोपों से इनकार किया है. उसने बीबीसी से कहा कि वो केवल "सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डेटा" का इस्तेमाल करता है, जो ग़ैरक़ानूनी नहीं है.

एएनआई ने इस मुक़दमे में दो करोड़ रुपये का हर्ज़ाना मांगा है और ये चैटजीपीटी के लिए बहुत मायने रखता है क्योंकि वो भारत में अपने विस्तार की योजना बना रहा है.

ओपनएआई के लिए क्यों ख़ास है भारत?

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एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत, पहले से ही चैटजीपीटी के सबसे ज़्यादा यूज़र बेस वाला मार्केट है.

चैटजीपीटी जैसे चैटबॉट्स को बड़े पैमाने पर डेटा सेट से ट्रेनिंग दी जाती है जो इंटरनेट से कंटेंट इकट्ठा करके तैयार किया जाता है.

भारत में क़रीब 450 न्यूज़ चैनल और 17 हज़ार अख़बार हैं, जिनका कंटेंट इस टेक्नोलॉजी के लिए बेहद कारगर साबित हो सकता है.

हालांकि ये बहुत स्पष्ट नहीं है कि चैटजीपीटी क़ानूनी तौर पर किस तरह का या कौन सा डेटा इकट्ठा कर सकता है और किसका इस्तेमाल कर सकता है.

ओपनएआई पर दुनियाभर में 10 से ज़्यादा मुक़दमे चल रहे हैं. इन मुक़दमों को प्रकाशक, कलाकार, मीडिया और समाचार प्रतिष्ठान शामिल हैं. इन सभी का आरोप है कि चैटजीपीटी ने उनके कंटेंट का बिना इजाज़त इस्तेमाल किया है.

सबसे चर्चित मामला 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़ा है. दिसंबर 2023 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने ओपन एआई और इसके समर्थक माइक्रोसॉफ्ट से ऐसे ही मामले में अरबों डॉलर का हर्ज़ाना मांगा था.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मामलों के विशेषज्ञ वकील विभव मिथल का बयान

लॉ फ़र्म 'आनंद एंड आनंद' के आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस मामलों के विशेषज्ञ एडवोकेट विभव मिथल कहते हैं, ''किसी भी कोर्ट का फ़ैसला दूसरे एक जैसे मामलों के लिए दुनिया भर में प्रभावी साबित हो सकता है.''

मिथल का कहना है कि एएनआई की तरफ़ से दायर मुक़दमे का फ़ैसला ये तय कर सकता है कि 'भविष्य में एआई मॉडल कैसे काम करेंगे.' साथ ही ये भी तय कर सकता है कि 'कौन सा कॉपीराइट वाला न्यूज़ कंटेंट चैटजीपीटी जैसे एआई जनरेटिव मॉडल को ट्रेनिंग देने में इस्तेमाल किया जा सकता है."

अगर कोर्ट का फ़ैसला एएनआई के पक्ष में आता है तो इससे और मुक़दमे दायर होने की संभावना बढ़ सकती है. साथ ही, एआई कंपनियों को कंटेंट निर्माताओं के साथ लाइसेंस साझा करने के समझौते करने पड़ सकते हैं. चैटजीपीटी ने कुछ कंपनियों के साथ ऐसा करना शुरू कर दिया है.

मिथल कहते हैं, ''लेकिन फ़ैसला अगर ओपनएआई के पक्ष में आता है तो एआई मॉडल को ट्रेनिंग देने के लिए कॉपीराइट वाले कंटेंट के इस्तेमाल की आज़ादी बढ़ जाएगी.''

एएनआई का पूरा केस क्या है?

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एएनआई अपने सब्सक्राइबर्स को न्यूज़ उपलब्ध कराता है. ये सब्सक्राइबर इसके लिए भुगतान करते हैं. एएनआई के पास टेक्स्ट, तस्वीरों और वीडियो के बड़े आर्काइव के ख़ास कॉपीराइट्स हैं.

दिल्ली हाईकोर्ट में दायर अपने मुक़दमे में एएनआई ने आरोप लगाया है कि ओपनएआई ने बिना इजाज़त उसके कंटेंट का इस्तेमाल करके चैटजीपीटी को ट्रेनिंग दी है.

एएनआई का कहना है कि इससे चैटबॉट की क्षमता बढ़ी है और ओपनएआई को इसका सीधा फ़ायदा हुआ.

न्यूज़ एजेंसी ने बताया कि मुक़दमा दर्ज़ करने से पहले उसने ओपनएआई को इस बारे में बताया था कि उसका कंटेंट गैरक़ानूनी तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है. साथ ही उसने कंपनी से कहा था कि वो अगर उसका कंटेंट इस्तेमाल करना चाहती है तो लाइसेंस ले सकती है.

एएनआई का कहना है कि ओपनएआई ने ये प्रस्ताव ठुकरा दिया और एजेंसी को अपनी इंटरनल ब्लॉकलिस्ट में डाल दिया, जिससे उसका डेटा अब और इकट्ठा न किया जा सके. इसके अलावा, ओपनएआई ने एएनआई से कुछ 'वेब क्रॉलर्स' को बंद करने के लिए कहा ताकि उसका कंटेंट चैटजीपीटी तक न पहुंचे.

हालांकि एएनआई का दावा है कि इन सभी उपायों के बावजूद चैटजीपीटी अब भी उसके यूज़र्स की वेबसाइट्स से कंटेंट ले रहा है. एएनआई के मुताबिक़, इस लिहाज़ से ओपनएआई को ''अनुचित लाभ'' मिल रहा है.

एएनआई ने अपने मुक़दमे में ये भी दावा किया है कि चैटबॉट कुछ प्रॉम्प्ट (सवाल) के जवाब में उसके कंटेंट को जस का तस पेश करता है.

एएनआई कहता है कि कुछ मामलों में चैटजीपीटी ने कुछ ऐसे बयानों को भी न्यूज़ एजेंसी से जोड़ दिया जो एनआई के थे ही नहीं. उनका कहना है कि इससे एनआई की साख को नुकसान पहुंचा है. इससे जनता को गुमराह किया गया.

नुकसान के हर्ज़ाने के अलावा, एएनआई ने कोर्ट से ये भी अपील की है कि ओपनएआई को निर्देश दिया जाए कि न्यूज़ एजेंसी के कंटेंट को इकट्ठा और इस्तेमाल न किया जाए.

इसके जवाब में ओपनएआई का कहना है कि वो भारत में दायर मुक़दमे का विरोध करता है क्योंकि कंपनी और उसका सर्वर भारत में नहीं है. चैटबॉट को यहां ट्रेनिंग नहीं दी गई है.

दूसरी संस्थाएं क्या कह रही हैं?

वीडियो कैप्शन, इस तस्वीर की सच्चाई आपको हैरान कर देगी

दिसंबर में, फ़ेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स ने कोर्ट में एक याचिका दायर की जिसमें कहा गया कि ये संगठन भारत के 80 फ़ीसदी पब्लिशर्स का प्रतिनिधित्व करता है. इसमें पेंग्विन रैंडम हाउस और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के भारतीय कार्यालय भी शामिल हैं.

संगठन का कहना है कि ये मामला उन्हें "सीधे तौर पर प्रभावित" करता है, इसलिए उन्हें भी अपनी दलीलें पेश करने की इजाज़त दी जानी चाहिए.

एक महीने बाद डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए), जो देश के बड़े न्यूज़ आउटलेट्स का प्रतिनिधित्व करता है, साथ ही तीन और मीडिया आउटलेट्स ने इसी तरह की याचिका दायर की. उनका तर्क था कि ओपनएआई ने इंटरनेशनल न्यूज़ पब्लिशर्स जैसे एसोसिएटेड प्रेस और फ़ाइनेंशियल टाइम्स के साथ लाइसेंसिंग समझौते किए हैं, लेकिन भारत में ऐसा कोई मॉडल नहीं अपनाया गया.

डीएनपीए ने कोर्ट से कहा कि ये मुक़दमा पत्रकारों की आजीविका और देशभर के न्यूज़ इंडस्ट्री से जुड़ा हुआ है.

वहीं ओपनएआई ने तर्क दिया है कि चैटबॉट, न्यूज़ सब्सक्रिप्शन की जगह नहीं ले सकता और इनका इस्तेमाल इन चीज़ों के लिए नहीं किया जा सकता.

अभी तक कोर्ट ने पब्लिशर्स की इन याचिकाओं को मंजूर नहीं किया है और ओपनएआई ने दलील दी है कि कोर्ट को इन्हें सुनवाई के लिए मंजूर करना ही नहीं चाहिए.

हालांकि जज ने ये साफ़ किया है कि अगर इन संगठनों को अपनी दलीलें रखने की मंजूरी भी दी जाती है तो कोर्ट सिर्फ़ एएनआई के दावों तक ही सीमित रहेगी, क्योंकि ये जो अलग-अलग पक्ष हैं उन्होंने अपने मुक़दमे दायर नहीं किए हैं.

भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रेगुलेशन की क्या स्थिति है?

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इस बीच, ओपनएआई ने बीबीसी को बताया कि वो भारत समेत दुनियाभर के न्यूज़ आर्गेनाइजेशंस के साथ ''सकारात्मक साझेदारी और बातचीत'' कर रहा है ताकि ''मिलकर काम'' किया जा सके.

विशेषज्ञों का कहना है कि चैटजीपीटी के ख़िलाफ़ दुनियाभर में दायर ऐसे मुक़दमे चैटबॉट्स से जुड़ी ऐसी बातों को सामने ला सकते हैं, जिन पर अब तक ध्यान ही नहीं गया है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के ज़िम्मेदारी से इस्तेमाल किए जाने पर रिसर्च करने वाले डॉ. शिवरामकृष्णन आर. गुरुवयूर कहते हैं कि चैटबॉट्स को ट्रेनिंग देने के लिए इस्तेमाल किया गया डेटा भी एक ऐसा ही मुद्दा है.

वो कहते हैं कि एएनआई और ओपनएआई के बीच चल रहे केस से कोर्ट को चैटबॉट्स के डेटा सोर्स की जांच का मौका मिलेगा.

दुनियाभर की सरकारें एआई को रेगुलेट (नियमन) करने के तरीकों पर सोच रही हैं. 2023 में, इटली ने चैटजीपीटी पर रोक लगा दी थी, ये कहते हुए कि चैटबॉट की वजह से बड़े पैमाने पर निजी डेटा इकट्ठा करने और स्टोर करने से प्राइवेसी को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं.

पिछले साल यूरोपियन यूनियन ने एएनआई को रेगुलेट करने के लिए एक क़ानून को मंजूरी दी थी.

भारत ने भी एआई को रेगुलेट करने की योजना की तरफ़ इशारा किया है. 2024 के चुनाव से पहले सरकार ने एडवाइजरी जारी की, जिसमें कहा गया था कि जो एआई टूल अभी 'अंडर टेस्टिंग' हैं या जिन पर भरोसा नहीं किया जा सकता, उन्हें लॉन्चिंग से पहले सरकार से अनुमति लेनी होगी.

इसके अलावा, सरकार ने एआई टूल्स को अपने प्लेटफॉर्म पर सवालों के ऐसे जवाब देने से मना किया था जो भारत में अवैध माने जाते हैं या ''चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को ख़तरे'' में डाल सकते हैं.

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