असम की हिमंत सरकार के इस फ़ैसले को क्यों बताया जा रहा है 'अल्पसंख्यक विरोधी'?

हिमंत बिस्वा सरमा (फ़ाइल फ़ोटो)

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इमेज कैप्शन, असम सरकार ने अब सामुदायिक समारोहों में भी बीफ़ पर पाबंदी लगा दी है.
    • Author, तोरा अग्रवाल
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, असम से बीबीसी हिंदी के लिए

इस सप्ताह की शुरुआत में असम में रेस्तरां और सामुदायिक समारोहों सहित सार्वजनिक जगहों पर बीफ़ खाने पर पाबंदी लगा दी गई है.

आलोचकों ने इस क़दम को "अल्पसंख्यक विरोधी" क़रार दिया है और इसके पीछे असम में हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार का मक़सद संप्रदायों के बीच ध्रुवीकरण करना बताया है.

भारत में मुस्लिम आबादी के प्रतिशत के हिसाब से कश्मीर के बाद असम दूसरा बड़ा राज्य है, ये आंकड़ा 2011 की जनगणना के अनुरूप है.

विपक्ष इसे राज्य के अगले विधानसभा चुनाव से भी जोड़कर देख रहा है और जानकार इस क़दम को असम की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी नुक़सान वाला क़दम बता रहे हैं.

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'झारखंड में मिली नाकामी को छिपाने की कोशिश'

सांप्रदायिक बयानबाज़ी के लिए चर्चा में रहने वाले मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 4 दिसंबर को गुवाहाटी में पत्रकारों से कहा कि उनके मंत्रिमंडल ने असम में "सार्वजनिक तौर पर बीफ़ खाने पर पूरी तरह से पाबंदी लगाने" का फ़ैसला किया है.

उन्होंने कहा, "अब से किसी भी रेस्तरां या होटल में बीफ़ नहीं परोसा जा सकेगा."

सरमा ने कहा कि यह फ़ैसला साल 2021 के उस क़ानून को मज़बूत करने के लिए लिया गया है, जिसे उनकी सरकार असम में मवेशियों के व्यापार को रेगुलेट करने के लिए लेकर आई थी.

असम कैटल प्रिवेंशन एक्ट 2021, मवेशियों के ट्रांसपोर्ट पर पाबंदी को कड़ा करता है और मवेशियों की बलि के साथ-साथ, हिंदू धार्मिक केंद्रों के पांच किलोमीटर के दायरे में बीफ़ की ख़रीद-बिक्री पर भी प्रतिबंध लगाता है.

बीफ़

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इमेज कैप्शन, असम में 2026 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.
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असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा, "हम तीन साल पहले एक क़ानून लाए थे और इसे काफ़ी कारगर पाया गया. अब हम इसे ज़्यादा सख्त बना रहे हैं. असम में होटलों, रेस्तरांऔर यहां तक ​​कि सार्वजनिक समारोहों में भी अब बीफ़ न तो परोसा जा सकेगा, और न ही खाया जा सकेगा."

मुस्लिम हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली सिविल सोसायटी संगठनों के साथ-साथ असम में विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री की इस घोषणा की आलोचना की है.

वो इसे साल 2026 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र उठाया गया क़दम बता रहे हैं.

इस घोषणा के फौरन बाद असम से सांसद और कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने कहा कि मुख्यमंत्री "झारखंड में बीजेपी की अपमानजनक हार के बाद अपनी नाकामी को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं."

वहीं असम कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेन बोरा ने बीबीसी हिंदी से कहा कि इस फ़ैसले का मक़सद, "वित्तीय संकट, महंगाई और बेरोज़गारी जैसे वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाना" है.

हालांकि, हिमंत बिस्वा सरमा ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा था कि यह कांग्रेस पार्टी की वजह से ही किया जा रहा है.

उन्होंने कहा, "कांग्रेस प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जो भी मांग रही थी, हम वही पूरा कर रहे हैं."

राजनीतिक घमासान

गौरव गोगोई और अन्य कांग्रेस नेता

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इमेज कैप्शन, कांग्रेस के गौरव गोगोई ने असम सरकार के इस फ़ैसले की आलोचना की है

दरअसल राज्य सरकार का यह फ़ैसला सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्षी कांग्रेस के नेताओं के बीच हाल ही में हुए उपचुनावों में कांग्रेस की हार के बाद शुरू हुई ज़ुबानी जंग के कुछ दिनों बाद आया है.

कांग्रेस के जानेमाने नेता रकीबुल हुसैन के बेटे तंजील हुसैन सामागुरी विधानसभा सीट पर चुनाव हार गए थे. इस सीट से बीजेपी उम्मीदवार डिप्लू रंजन सरमा को जीत मिली थी.

इसके बाद रकीबुल हुसैन ने आरोप लगाया कि हिमन्त बिस्वा सरमा और बीजेपी ने मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं को बीफ़ परोसकर और हिंदुत्व के मुद्दे पर "धोखा" देकर लुभाया है.

सरमा ने हुसैन की टिप्पणियों पर पटलवार करते हुए कहा कि अगर कांग्रेस चाहेगी तो उनकी सरकार राज्य में बीफ़ पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करेगी.

प्रतिबंध की घोषणा करते हुए सरमा ने कहा कि कांग्रेस नेताओं के हालिया बयानों ने उन्हें और उनके सहयोगियों को मौजूदा मवेशी क़ानून पर विस्तार से चर्चा करने के लिए प्रेरित किया और इससे उन्हें एहसास हुआ कि इसे मज़बूत करने की ज़रूरत है.

हालांकि, कांग्रेस ने इन दावों को खारिज कर दिया है.

असम कांग्रेस के प्रवक्ता अमन वदूद ने कहा, "हमारे (कांग्रेस) नेताओं ने कहा कि बीजेपी ने हालिया चुनावों को जीतने के लिए अनुचित हथकंडे अपनाए, जिसमें धांधली और अधिकारियों की निष्क्रियता शामिल है."

"अब मुख्यमंत्री बैकफुट पर आ गए हैं, उन्होंने कैबिनेट के इस फ़ैसले को आगे बढ़ाने के लिए बहाने के रूप में बीफ़ का हवाला दिया है."

अल्पसंख्यकों पर असर

एआईयूडीएफ़ नेता बदरुद्दीन अजमल के साथ अमीनुल इस्लाम

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इमेज कैप्शन, एआईयूडीएफ़ नेता बदरुद्दीन अजमल के साथ अमीनुल इस्लाम (फ़ाइल फ़ोटो)

राजनीतिक बयानबाजी को अलग रख दें, तो मुसलमानों की क़रीब 34 फ़ीसदी आबादी (साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़) वाले असम में बीफ़ खाने पर पूरी तरह पाबंदी से जुड़े कई अहम पहलू हैं.

इसे सबसे ज़्यादा राज्य का बंगाली मुस्लिम समुदाय महसूस करता है, जो असम में मुस्लिम आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. उन्हें अक्सर "बाहरी" या बांग्लादेश से आए "अवैध प्रवासी" बताया जाता है.

इस समुदाय को नियमित तौर पर सरकार के उन क़दमों का सामना करना पड़ता है जो उन्हें ध्यान में रखकर उठाया जाता है. इनमें बेदखली अभियान, बाल विवाह पर नकेल कसना, जिसकी वजह से मुस्लिम पुरुषों की सामूहिक गिरफ़्तारी हुई है, शामिल है.

इसके अलावा ऐसे क़दमों में राज्य के संचालन में चलने वाले मदरसों को ध्वस्त करना, बहुविवाह पर प्रस्तावित प्रतिबंध और "लव जिहाद" से निपटने के लिए क़ानून लाने की योजनाएँ भी शामिल हैं.

बंगाली मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाले छात्र संगठन 'ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन' के अध्यक्ष रेजाउल करीम ने प्रतिबंध को "अल्पसंख्यक समुदाय को अलग-थलग करने और उन्हें निशाना बनाने की एक और घटना" बताया है.

यह देखते हुए कि साल 2021 के क़ानून से राज्य में बीफ़ के सेवन पर प्रतिबंध व्यावहारिक रूप से पहले से ही लागू है, कुछ जानकारों का कहना है कि सरकार का नया क़दम दिखावटी ज़्यादा है.

राज्य में बंगाली मुस्लिम हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी 'ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ़) के अमीनुल इस्लाम ने तर्क दिया कि पांच किलोमीटर के दायरे वाली पाबंदी यहां पहले से ही काफ़ी सख़्त है.

वो कहते हैं, "बहुत कम ऐसे इलाक़े हैं जो मंदिर के पांच किलोमीटर के दायरे से बाहर आते हैं. इसलिए, यह नई पाबंदी पूरी तरह से राजनीति है."

बीजेपी का जवाब

 हिमंत बिस्वा सरमा, साथ में बीजेपी उम्मीदवार डिप्लू रंजन सरमा

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इमेज कैप्शन, सामागुरी विधानसभा उपचुनाव के लिए प्रचार करते हिमंत बिस्वा सरमा, साथ में बीजेपी उम्मीदवार डिप्लू रंजन सरमा (फ़ाइल फ़ोटो)

हालांकि, गुवाहाटी के एक वकील और कांग्रेस पार्टी से जुड़े के. वदूद ने इसके "वास्तविक परिणामों" को लेकर चेतावनी दी है.

उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "इस तरह के क़ानून अल्पसंख्यक समुदायों को और ज़्यादा निशाना बनाने के हथियार बन जाते हैं. इन क़ानूनों से राज्य भर के पुलिस स्टेशनों को सशक्त बनाने के साथ, हम और अधिक कार्रवाई और निगरानी (गौ रक्षकों की) में इजाफ़ा देखेंगे."

वहीं, एआईयूडीएफ़ के नेता अमीनुल इस्लाम ने "सामुदायिक समारोहों" और "सार्वजनिक कार्यक्रमों" जैसे शब्दों में अस्पष्टता की ओर इशारा करते हुए कहा, "नए क़ानून प्रभावी रूप से मुसलमानों को उनके निजी समारोहों में भी बीफ़ परोसने से रोकते हैं."

इस ताज़ा आदेश ने राज्य में असमिया भाषी मुसलमानों को भी नाराज़ कर दिया है, जिन्हें बीजेपी ने खुश रखने की कोशिश की है.

असमिया मुस्लिम समुदाय के एक पर्यावरण कार्यकर्ता और बैंकर आबिद आज़ाद ने कहा, "भले ही बीजेपी असमिया भाषी मुसलमानों के हितों के प्रति नरमी दिखाती हो, लेकिन ऐसे फै़सले उन पर भी असर डालते हैं."

उन्होंने कहा, "बहुसंख्यक समुदाय की धार्मिक भावनाओं के प्रति सम्मान दिखाते हुए मुसलमान हमेशा बीफ़ खाने के बारे में ढोल पीटने को लेकर बहुत सावधान रहे हैं. लेकिन, अब सत्तारूढ़ पार्टी अनावश्यक रूप से इसे एक मुद्दे में बदल रही है."

आज़ाद ने कहा, "ऐसी कार्रवाइयों से मुसलमानों को ठेस पहुँचती है, वो असुरक्षित महसूस करते हैं और उनमें नागरिक के तौर पर अस्तित्व से जुड़ी चिंताएँ पैदा होती हैं."

विपक्षी विधायक अखिल गोगोई.

इस फ़ैसले से असम की कई स्थानीय जनजातियों में ईसाई आबादी के कुछ हिस्से पर भी असर पड़ेगा.

आदिवासी बहुल ज़िले दीमा हसाओ के यूनाइटेड क्रिश्चियन फ़ोरम के हैया दारनेई ने कहा कि यह क़दम लोगों के निजी अधिकारों के उल्लंघन के बराबर है.

उन्होंने कहा, "हम बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं का सम्मान करते हैं, लेकिन हमें अपने गांवों में जो खाना चाहिए, वह खाने का अधिकार होना चाहिए."

हालांकि, बीजेपी ने इन चिंताओं को दरकिनार कर दिया है.

बीजेपी के मंत्री अशोक सिंघल ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मंदिरों के पास बीफ़ खाने से बहुसंख्यक समुदाय की भावनाएं आहत होती हैं. यह फै़सला सही दिशा में उठाया गया है और देश की धर्मनिरपेक्ष साख को बनाए रखेगा."

साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार "धार्मिक पहचान के आधार पर फ़ैसले नहीं लेती है."

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नुक़सान

असम खेत

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इमेज कैप्शन, असम में खेती की अपनी सीमाएं हैं जिसकी वजह से वहां कई ग्रामीण इलाक़ों में पशुपाल लोगों की जीविका का बड़ा साधन है (सांकेतिक तस्वीर)

कई लोगों का कहना है कि साल 2021 के क़ानून ने पहले ही राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंचाया है, जो औसतन कम खेती की वजह से पशुओं के व्यापार पर बहुत अधिक निर्भर है.

अर्थशास्त्री राजीब सूत्रधार के मुताबिक़, "राज्य के अधिकांश किसान कम दूध देने वाली नस्लों के मवेशी पालते हैं, वो मुनाफे़ के लिए गैर-दुधारू मवेशियों को बेचकर अतिरिक्त आय पर बहुत अधिक निर्भर होते हैं."

वहीं, किसान अधिकार कार्यकर्ता और विपक्षी विधायक अखिल गोगोई के अनुसार सरकार का यह नया क़दम अर्थव्यवस्था के लिए हालात और खराब कर देगा.

गोगोई ने कहा, "नदी किनारे रहने वाले कई गैर-मुस्लिम समुदायों के लिए मवेशी पालना आजीविका का मुख्य साधन है. हालांकि, उनके ट्रांसपोर्ट से जुड़े कठोर प्रतिबंधों ने इन समुदायों के अंदर डर पैदा कर दिया है."

उन्होंने कहा कि यह स्थिति किसानों को अपने मवेशियों को कम क़ीमतों पर बेचने के लिए मजबूर करती है, जिससे एक काला बाज़ार बन जाता है. बिचौलिए ग़रीब किसानों की क़ीमत पर मुनाफा कमाते हैं.

उन्होंने कहा, "उदाहरण के लिए, एक गाय जो पहले एक लाख रुपये में बिकती थी, अब केवल 60 हज़ार रुपये में बिक रही है. दूसरी ओर बीफ़, जो पहले सबसे किफ़ायती था, उसकी क़ीमत बढ़ गई है."

गोगोई का कहना है, "क़ीमतें सौ रुपये से बढ़कर चार-पांच सौ रुपये हो गई हैं, जिसका सबसे ज़्यादा असर ग़रीब मुसलमानों पर पड़ रहा है."

कांग्रेस के वदूद के मुताबिक़ नए फ़ैसले का मतलब है कि इससे हर कोई "नुक़सान" उठा रहा है.

उन्होंने कहा, "इससे बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीतिक बयानबाजी के अलावा किसी को कोई फ़ायदा नहीं होगा."

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