तुर्की को क्या भारत और चीन ने मिलकर रोक दिया, टर्किश और रूसी एक्सपर्ट क्या कह रहे हैं?

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तुर्की नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन यानी नेटो का सदस्य है.
नेटो पश्चिम के देशों का गुट है और रूस इससे चिढ़ा रहता है.
यूक्रेन नेटो में शामिल होना चाहता है और रूसी राष्ट्रपति पुतिन को यह बर्दाश्त नहीं है. यूक्रेन पर रूस के हमले को लेकर पुतिन नेटो को भी एक वजह बताते रहे हैं.
नेटो को रूस और चीन विरोधी संगठन के रूप में भी देखा जाता है.
अब तुर्की ब्रिक्स में शामिल होना चाहता है. तुर्की ने औपचारिक रूप से ब्रिक्स में शामिल होने के लिए आवेदन भी किया है.
ब्रिक्स को पश्चिम के देश अपने ख़िलाफ़ देखते हैं. अगर तुर्की को ब्रिक्स में जगह मिलती है तो यह नेटो का इकलौता देश होगा.
पिछले हफ़्ते ही रूस के कज़ान शहर में ब्रिक्स का 16वां समिट हुआ है. ब्रिक्स के संस्थापक देश ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन हैं. 2011 में इसमें दक्षिण अफ़्रीका शामिल हुआ था.
इसी साल जनवरी में ब्रिक्स का विस्तार हुआ. यूएई, ईरान, इथियोपिया और मिस्र इसके नए सदस्य बने. इसके अलावा इस साल ब्रिक्स के पार्टनर देशों की घोषणा हुई, जिसमें तुर्की का भी नाम है.
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन भी कज़ान पहुँचे थे. अर्दोआन ने यहाँ कहा कि वह ब्रिक्स गुट से अच्छे संबंध के लिए प्रतिबद्ध हैं.
तुर्की को ब्रिक्स में शामिल किए जाने को लेकर भारत के विश्लेषक सवाल भी उठाते रहे हैं.

तुर्की की सदस्यता पर सवाल
भारत के जाने-माने सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने तुर्की के ब्रिक्स में शामिल होने को लेकर कहा, ''क्या किसी ऐसे देश को ब्रिक्स में शामिल किया जाना चाहिए जो एक सैन्य गठबंधन का हिस्सा है? तुर्की नेटो का सदस्य है और उसने ब्रिक्स की सदस्यता के लिए आवेदन किया है. चीन पाकिस्तान को भी शामिल करना चाहता है. पाकिस्तान और चीन में सैन्य सहयोग के साथ रणनीतिक साझेदारी भी है. इसके बावजूद पाकिस्तान भयानक आर्थिक संकट से जूझ रहा है.''
पिछले हफ़्ते शुक्रवार को जर्मन प्रकाशक बिल्ज़ ने ख़बर चला दी थी कि तुर्की को ब्रिक्स में शामिल होने से भारत ने रोक दिया.
इसके बाद सोशल मीडिया पर यह ख़बर आग की तरह फैली. इसके पहले पाकिस्तान को लेकर ख़बर आई थी कि रूस और चीन के चाहने के बावजूद भारत ने पाकिस्तान को ब्रिक्स में शामिल होने से रोक दिया.

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पीएम मोदी ने ब्रिक्स के समापन भाषण में कहा था कि सभी फ़ैसले सर्वसम्मति से होने चाहिए और ब्रिक्स के संस्थापक सदस्यों का सम्मान होना चाहिए. पीएम मोदी की इस टिप्पणी को पाकिस्तान को ब्रिक्स की सदस्यता नहीं मिलने से जोड़कर देखा गया.
हालांकि भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित मानते हैं कि पाकिस्तान ने ब्रिक्स की सदस्यता के लिए अप्लाई करने से पहले होमवर्क नहीं किया था.
उन्होंने एक पाकिस्तानी न्यूज़ चैनल से बातचीत में कहा, ''पाकिस्तान को ब्रिक्स में पार्टनर देश का भी दर्जा नहीं मिला. कहां पाकिस्तान ब्रिक्स की सदस्यता चाहता था. पाकिस्तान को लग रहा था कि रूस और चीन से ही सब कुछ हो जाएगा. भारत के बारे में भी उसे सोचना चाहिए था. हमारी कोशिश को भारत ने नाकाम कर दिया.''

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भारत का नाम कैसे आया?
लेकिन तुर्की का मामला पूरी तरह से अलग है.
जर्मन मीडिया की रिपोर्ट आने के बाद सोशल मीडिया पर यह भी लोग कहने लगे कि तुर्की और पाकिस्तान में दोस्ती है, इसीलिए भारत ने तुर्की को रोक दिया.
लेकिन तुर्की को रोकने में भारत के अलावा चीन का भी नाम लिया जा रहा है. रूस के एक विश्लेषक का कहना है कि चीन को वीगर मुसलमानों पर तुर्की के रुख़ को लेकर नाराज़गी है और भारत को पाकिस्तान से उसकी जुगलबंदी के कारण आपत्ति है.
चीन में वीगर मुसलमानों के ख़िलाफ़ कथित अत्याचार को लेकर तुर्की हमेशा से मुखर रहा है, जो कि चीन को रास नहीं आता है.
यूट्यूब पर पोस्ट किए एक वीडियो में रूसी विश्लेषक करीम हास ने कहा है कि तुर्की को ब्रिक्स का सदस्य बनाने का प्रयास कामयाब नहीं रहा. हास का कहना है कि तुर्की को ब्रिक्स की सदस्यता नहीं मिलने के मुख्य रूप से तीन कारण हैं.
पहला कारण यह है कि ब्रिक्स अभी चार नए सदस्यों- ईरान, यूएई, इथियोपिया और मिस्र को पूरी तरह से जोड़ने की कोशिश कर रहा है.
इन्हें इसी साल ब्रिक्स की पूर्णकालिक सदस्यता मिली थी. दूसरा कारण है कि चीन वीगर मुसलमानों पर तुर्की के रुख़ से ख़फ़ा रहता है. इसके अलावा चीन तुर्की की अर्थव्यवस्था को लेकर भी अपना अलग दृष्टिकोण रखता है. चीन को लगता है कि तुर्की ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक के लिए बोझ साबित होगा, लेकिन चीन के बेल्ट एंड रोड परियोजना में तुर्की की ख़ास अहमियत भी है.
हास तीसरा कारण भारत को मानते हैं. वह कहते हैं, ''तुर्की की पाकिस्तान के साथ ऐतिहासिक क़रीबी है. दूसरी तरफ़ आर्मीनिया और अज़रबैजान की लड़ाई में तुर्की और भारत बिल्कुल अलग-अलग खड़े हैं. भारत आर्मीनिया को हथियार दे रहा है और तुर्की अज़रबैजान के साथ खड़ा है. ऐसे में भारत भी तुर्की को सदस्यता दिलाने के मामले अनिच्छुक है.''

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तुर्की को क्यों नहीं मिली सदस्यता
हास मानते हैं कि यूक्रेन में जंग छिड़ने से पहले तुर्की और रूस के संबंध बहुत संतुलित नहीं थे. यूक्रेन पर रूस के हमले से पहले तुर्की से दोस्ती में रूस को ज़्यादा फ़ायदा था, लेकिन जंग के कारण चीज़ें बदल गई हैं.
हास कहते हैं, ''पश्चिमी देशों के प्रतिबंध के कारण रूस ट्रांजिट पॉइंट के लिए तुर्की पर निर्भर हो गया है. रूस का कच्चा तेल रिफाइन कहीं और हो रहा है और तुर्की के रास्ते यूरोप पहुँच रहा है. ऐसे में रूस पाबंदी के बावजूद तेल बेच पा रहा है. तुर्की अब भी इसका पूरा फ़ायदा नहीं उठा पा रहा है क्योंकि रूस के साथ आर्थिक मोर्चे पर उसका जुड़ाव उस तरह से नहीं है.''
रूस के ख़िलाफ़ तुर्की जी-7 और ईयू के प्रतिबंधों में शामिल है. ऐसे में तुर्की और रूस का द्विपक्षीय व्यापार बढ़ नहीं रहा है. 2022 में तुर्की और रूस का द्विपक्षीय व्यापार 68.70 अरब डॉलर था जो 2023 में 55.4 अरब डॉलर हो गया.
फ़ाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, तुर्की ने यूएस सैन्य तकनीक रूस को निर्यात करने पर रोक लगा दी है. इनमें सैन्य और सिविल इस्तेमाल दोनों से जुड़ी तकनीक हैं.
रूस और तुर्की के बीच हब प्रोजेक्ट को लेकर भी असहमति है. पुतिन ने 2022 में नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन डैमेज होने के बाद नया हब बनाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन अब बातचीत इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म को लेकर हो रही है. इसे लेकर यूरोप और अमेरिका चिंतित हैं कि कहीं रूस नए हब के ज़रिए पश्चिम के ऊर्जा प्रतिबंध को बाइपास ना कर दे.
तुर्की का रूस से गैस आयात भी घटकर 30 अरब क्यूबिक मीटर से 20.5 अरब क्यूबिक मीटर हो गया है. तुर्की और रूस के संबंधों में तीसरा अहम पहलू है कि अर्दोआन यूक्रेन को सैन्य सहयोग बढ़ा रहे हैं. ज़ाहिर है कि पुतिन को यह पसंद नहीं आ रहा है.
अमेरिकी मैगज़ीन फॉरन पॉलिसी (एफ़पी) ने अपने एक लेख में कहा है कि तुर्की अगर ब्रिक्स में आता है तो इस गुट की पश्चिम विरोधी पहचान कमज़ोर पड़ेगी और यह इसके हक़ में होगा.
एफ़पी ने लिखा है, ''अगर तुर्की ब्रिक्स में शामिल होता है तो इस गुट की गुटनिरपेक्ष वाली पहचान मज़बूत होगी. ये कहना आसान नहीं होगा कि ब्रिक्स पश्चिम विरोधी गुट है. लेकिन पश्चिम में तुर्की की पहचान संदिग्ध होगी. ब्रिक्स में चीन और रूस की पहचान पश्चिम विरोधी देश के रूप में है. ब्राज़ील, भारत और दक्षिण अफ़्रीका गुटनिरपेक्ष पहचान के साथ हैं. तुर्की शामिल होता है तो इस गुट को देखने का एक दूसरा नज़रिया भी होगा. नए सदस्यों में भी ईरान को छोड़ दें तो इथियोपिया, यूएई और मिस्र रूस-चीन के क़रीबी नहीं हैं.''

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क्या भारत ने तुर्की को रोक दिया?
टर्किश एक्सपर्ट सिनान उल्गेन ऐसा नहीं मानते हैं कि तुर्की को भारत ने ब्रिक्स का सदस्य बनने से रोक दिया.
दरअसल, सिनान उल्गेन के बयान के आधार पर ही जर्मन अख़बार बिल्ज़ ने कहा था कि भारत ने तुर्की को रोक दिया.
सिनान उल्गेन ने ट्वीट कर कहा, ''मैंने बिल्ज़ को ब्रिक्स समिट पर इंटरव्यू दिया था, लेकिन संदर्भ से हटकर कई बातें मेरे नाम से कही गई हैं. तुर्की और भारत के संबंधों में दूरियां हैं लेकिन ब्रिक्स का सदस्य बनने से रोकने के लिए भारत ने कोई वीटो नहीं किया था. केवल भारत ही नहीं बल्कि कई देश ब्रिक्स के तेज़ी से विस्तार को लेकर सहमत नहीं हैं. तुर्की को लेकर अभी कोई सहमति नहीं बन पाई है.''
ये बात भी कही जा रही है कि इस बार के ब्रिक्स समिट में विस्तार कोई एजेंडा नहीं था. भारत के विश्लेषक भी तुर्की के ब्रिक्स में शामिल होने की कोशिश से असहज दिख रहे हैं.
भारत के पूर्व विदेश सचिव और रूस में भारत के राजदूत रहे कंवल सिब्बल ने सितंबर महीने में लिखा था, ''नेटो सदस्य के रूप में तुर्की ब्रिक्स में शामिल नहीं हो सकता है.''
उन्होंने लिखा था, ''ब्रिक्स का एजेंडा आर्थिक सहयोग से आगे भी जाता है. ये राजनीतिक है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सत्ता का फिर से सुंतलन बैठाना इसका लक्ष्य है. इसका आर्थिक लक्ष्य भी इसी दिशा में बढ़ता दिखता है. जो देश ब्रिक्स में शामिल होना चाहते हैं वो पश्चिम से आगे अपने राजनयिक संबंधों को विस्तार देना चाहते हैं. ये रणनीति का हिस्सा है.''
सिब्बल ने लिखा था, ''ब्रिक्स में आने से रूस की सुरक्षा भी बढ़ती है. रूस के तुर्की से अच्छे संबंध हैं. रूस तुर्की की मदद जारी रख सकता है. लेकिन ब्रिक्स में तुर्की को लाने के कुछ अंजाम भी होंगे. ब्रिक्स में शामिल किए जाने की योग्यता तय करनी चाहिए. नेटो सदस्य को ब्रिक्स में लाने का कोई मतलब नहीं है.''
भारत यह नहीं चाहेगा कि ब्रिक्स में वैसे देश शामिल हों जो उसके हितों के आड़े आते हैं. लेकिन रूस और तुर्की के अच्छे संबंध है. ऐसे में रूस तुर्की को ब्रिक्स में शाामिल करने का समर्थन करता रहा है.

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तुर्की ब्रिक्स में क्यों आना चाहता है?
अर्दोआन तुर्की की सत्ता में दो दशक से ज़्यादा वक़्त से हैं.
अर्दोआन तुर्की के लिए ज़्यादा स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की ओर बढ़ते दिखते हैं ताकि दुनिया में अपने असर को बढ़ा सकें.
तुर्की यूरोपीय यूनियन में शामिल होना चाहता था लेकिन उसे जगह नहीं मिली. कई लोग कहते हैं कि मुस्लिम बहुल देश होने के कारण तुर्की को ईयू में जगह नहीं मिली. ऐसे में तुर्की अपनी पहचान को लेकर जूझता रहा है. नेटो में होने के बावजूद तुर्की की लाइन नेटो के रुख़ से बिल्कुल अलग होता है.
अगस्त के आख़िरी हफ़्ते में अर्दोआन ने कहा था कि तुर्की को पूर्व और पश्चिम दोनों से रिश्ते बेहतर करने चाहिए.
अर्दोआन ने कहा था, ''हमें यूरोपीय संघ और शंघाई कॉर्पोरेशन ऑर्गेनाइजेशन (एससीओ) में से किसी एक को नहीं चुनना होगा. बल्कि हमें इन दोनों और दूसरी संस्थाओं से भी रिश्ते बनाने होंगे.''
तुर्की के एक तरफ़ यूरोप है और दूसरी तरफ एशिया. तुर्की 1952 में नेटो का सदस्य बना था.
तुर्की ने यूरोपीय संघ में शामिल होने की बातचीत 2005 में शुरू की थी. मगर इस मामले में तुर्की को सफलता नहीं मिली है.
मिडिल ईस्ट आई की एक रिपोर्ट में तुर्की की नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी के स्कॉलर हयाती उनलु के हवाले से इस बारे में कई बातें कही गई हैं.
हयाती उनलु ने कहा, ''तुर्की के ब्रिक्स में शामिल होने की ख़्वाहिश को पश्चिम से मुंह मोड़ने के तौर पर नहीं देखना चाहिए. तुर्की पश्चिम से अलग रिश्तों का नया नेटवर्क बनाना चाहता है ताकि आर्थिक चुनौतियों से निपटा जा सके.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित












