झारखंड: जॉब कार्ड डिलीट होने से मनरेगा में नहीं मिल रहा काम, दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर- ग्राउंड रिपोर्ट

    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए, मनिका (झारखंड) से

26 जनवरी की सुबह जब सरकारी दफ़्तरों में जलेबी-बूंदी बांटी जा रही थी, तब पानपती देवी एल्युमिनियम के अपने तसले (बरतन) में अरवा चावल का भात बनाने में व्यस्त थीं.

उन्होंने माड़ निकाला और घर के बच्चों को माड़-भात और नून (नमक) खाने के लिए दिया. ख़ुद भी यही खाया और इस तरह गणतंत्र दिवस पर उनके दिन की शुरुआत हुई.

एक दिन पहले उन्होंने भात-साग बनाया था.

वे झारखंड की राजधानी रांची से 145 किलोमीटर दूर लातेहार ज़िले के मनिका प्रखंड के दासडीह गांव में रहती हैं. कोपे पंचायत के इस छोटे से गांव की आबादी करीब 200 है, लेकिन दासडीह गांव में इन दिनों इतने लोग नहीं रहते.

पानपती देवी के पति नंदकिशोर सिंह और उनके बेटों की तरह गांव के अधिकतर मर्द गोवा, केरल या महाराष्ट्र जैसे राज्यों में कमाने (मज़दूरी करने) गए हैं.

मनरेगा एक्ट में गांव में ही काम की गारंटी के बावजूद उन्हें काम नहीं मिल रहा है. इन लोगों में से अधिकतर के जॉब कार्ड डिलीट कर दिए गए हैं. उन्हें इसका कारण भी नहीं बताया गया है.

पानपती देवी और उनके पति नंदकिशोर सिंह का जॉब कार्ड भी डिलीट हो चुका है.

उनका बड़ा परिवार है. कुल 14 सदस्य हैं. छह बेटे, दो बहुएं और चार पोते-पोतियों वाले उनके परिवार के अधिकतर पुरुष सदस्य गोवा में काम करते हैं. वे अपनी बहुओं और उनके बच्चों के साथ गांव में रहती हैं.

मनरेगा में पहले कितना मिलता था काम

पहले उन्हें मनरेगा में महीने में 10-12 दिन काम मिल जाता था.

तब उनके पति गांव में ही रहते थे. दोनों पति-पत्नी काम कर घर का खर्च चलाते थे. लेकिन, अब ऐसा नहीं है. पति गोवा में हैं और वे दासडीह में.

पानपती देवी बीबीसी से कहती हैं, ''हमनी सन मकई के भात, मड़ुआ, सांवा के भात, कोदो, इहे सब खाई हति. काम हइए नइखे त दाल-भात, अंडा आ मुर्ग़ा कहां से लईबई. ऐही त बात हई. गांव-घर के हाल-चाल. गांव में सूखा हई. सागो ना मिलइत. पइसा हई न त खरीदबई कहां से.''

''(हमलोग मक्का, मड़ुआ, कोदो और सांवा खाते हैं. गांव में काम नहीं है तो दाल, अंडा या मुर्गा कहां से लाएंगे. गांव-घर का यही हाल-चाल है. पैसा नहीं है तो खाना खरीदेंगे कहां से.)''

उन्होंने कहा, ''मेरे पति अब छह-छह महीने घर से बाहर रहते हैं. मनरेगा में काम नहीं मिल रहा है. हमारे पास आधार कार्ड, बैंक खाता और सभी ज़रूरी कागजात हैं. फिर भी जॉब कार्ड डिलीट कर दिया. मुझे करीब दो साल से कोई काम नहीं मिला है. अब हम फिर से जॉब कार्ड के लिए आवेदन देंगे.''

मुझसे बातचीत के वक्त पानपती देवी ने हाथों में अपना जॉब कार्ड रखा था, लेकिन वह कार्ड मनरेगा के ऑनलाइन सिस्टम से डिलीट हो चुका है.

इसी गांव की कविता देवी और कुनीता देवी की भी यही व्यथा है. मनरेगा के जॉब कार्ड डिलीट हो चुके हैं. उन्हें इसकी वजह भी नहीं बताई गई है. इन सबके पास आधार कार्ड हैं और सबने मनिका के स्टेट बैंक में अपना खाता खुलवा रखा है.

काम का पैसा नहीं मिला

कुनीता देवी ने बीबीसी से कहा, ''मुझे दो साल से कोई काम नहीं मिला. मैं गांव के स्कूल में रसोइया का काम करती हूं. उससे मिलने वाले पैसे से घर चलता है. मेरे पति भी मज़दूरी करते हैं तो किसी तरह हम अपना और अपने चार बच्चों के भोजन का इंतज़ाम कर पाते हैं.''

वो कहती हैं, ''मेरा जॉब कार्ड डिलीट तो हुआ ही, पहले से किए काम के करीब तीन हज़ार रुपये का भुगतान भी नहीं हुए. बैंक खाता में पैसा आया ही नहीं. अब लोग भी काम मांगने नहीं जाते हैं. क्योंकि पेमेंट फंस जा रहा है.''

कविता देवी को भी मनरेगा से कोई काम नहीं मिल पा रहा है. वे अपनी शिकायत लेकर मनिका प्रखंड कार्यालय गई थीं. उन्हें आश्वासन मिला कि उनका कार्ड फिर से बन जाएगा लेकिन कार्ड अभी तक नहीं बन पाया है. उनका पुराना कार्ड मनरेगा मेट ने रख लिया था. अब वो भी उनके पास मौजूद नहीं है.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि जॉब कार्ड एक्टिव रहने की स्थिति में वे लगातार काम मांगती थीं. उन्हें 100 दिन काम मिल भी जाता था. लेकिन, पिछले कई महीने से उन्हें कोई काम नहीं मिला, क्योंकि उनका जॉब कार्ड डिलीट हो चुका है.

जंगल का पत्तल जीने का सहारा

लातेहार जिले के मनिका से करीब 260 किलोमीटर दूर पश्चिम सिंहभूम जिले के सोनुवा प्रखंड में भी ऐसी ही कहानियां हैं. यहां के लोंजो पंचायत की सुवोनशोरी सिंह गोंड आदिवासी हैं. अपनी उम्र के छठे दशक में भी वे अपने गांव में अकेली रहने पर मजबूर हैं. उनके पति की मौत हो चुकी है और बच्चे नहीं हैं.

वे साल 2016 से अपने पति सुधीर सिंह के साथ मनरेगा का काम करती थीं, लेकिन उनका जॉब कार्ड डिलीट हो चुका है. करीब दो साल पहले उनके पति की मौत हो गई. इसी दौरान मनरेगा का काम मिलना बंद हुआ, तो जिंदगी मुश्किल हो गई.

अब वे रोज सुबह पास के जंगलों में पत्ते चुनकर और दातून बेचकर अपना गुज़ारा करती हैं. उनका भी आधार कार्ड है, लेकिन मनरेगा की काग़ज़ी प्रक्रिया में उसकी सीडिंग नहीं हो सकी और जॉब कार्ड डिलीट कर दिया गया.

मनरेगा का यह हाल क्यों

चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज दावा करते हैं कि मनरेगा को लेकर केंद्र की 'बीजेपी सरकार कभी संवेदनशील नहीं रही. इस कारण सारी दिक़्क़तें हो रही हैं.'

जेम्स हेरेंज ने बीबीसी से कहा, ''हम लोग पिछले एक साल से यह सवाल उठा रहे हैं. लेकिन, केंद्र सरकार का पूरा दबाव है इसलिए झारखंड की सरकार चाहकर भी कुछ खास नहीं कर पा रही है. पिछले साल 2023 की 2 फ़रवरी से 2 मई के बीच झारखंड में करीब 11 लाख 48 हजार जॉब कार्ड डिलीट किए गए थे. इनमें से अधिकतर का कारण मज़दूरों को पता ही नहीं है. क्योंकि, तकनीकी मामला कई स्तर का है. वह मज़दूरों को समझ नहीं आता और न कर्मचारियों को.''

उन्होंने यह भी कहा, '' जॉब कार्ड को फिर से इंस्टॉल करना या एबीपीएस के लिए उनकी सीडिंग एक स्तर का काम नहीं है. पहले पंचायत, फिर ब्लॉक, तब जिला कार्यालय और अंततः यह पूरी प्रक्रिया राज्य स्तर पर पूरी की जानी है. बैंक के अधिकारी का भी दायित्व है कि वे समय पर मज़दूरों के खाते की आधार सीडिंग करा दें. अब एक स्तर पर भी लापरवाही हुई, तो यह सीडिंग नहीं हो पाएगी और अंततः मज़दूरों का जॉब कार्ड डिलीट कर दिया जाएगा. जबकि, उन्हें काम की ज़रूरत है और वे काम मांग भी रहे हैं.''

उधर, केंद्र सरकार का कहना है कि जॉब कार्ड कथित अनियमितताओं को रोकने के उद्देश्य से डिलीट किए गए हैं. उन्हें फिर से बनाना राज्य सरकारों की ज़िम्मेदारी है.

साढ़े सात करोड़ जॉब कार्ड डिलीट हुए

मनरेगा मज़दूरों के मुद्दों पर काम करने वाली संस्था ‘लिब टेक इंडिया’ द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले दो साल के दौरान भारत में करीब साढ़े सात करोड़ से भी अधिक मनरेगा मज़दूरों के जॉब कार्ड डिलीट किए गए हैं. इनमें से अधिकतर मज़दूरों को इसकी वजह भी नहीं बताई गई और न उनके कार्ड दोबारा बनाने की कोशिशें की गईं.

क्या कहते हैं आंकड़े

भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक़ मनरेगा के तहत देश में निबंधित कुल 25.25 करोड़ लोगों में से 14.35 करोड़ मज़दूर एक्टिव श्रेणी में रखे गए हैं.

मतलब, ऐसे मज़दूरों ने पिछले तीन वित्तीय वर्षों में कमसे कम एक दिन काम किया है. इन्हीं आंकडों के अनुसार 2023 के अंत तक इन एक्टिव मज़दूरों में से करीब 12.7 प्रतिशत मज़दूर केंद्र सरकार की ओर से अनिवार्य किए गए आधार आधारित भुगतान प्रणाली (एबीपीएस) के लिए योग्य नहीं पाए गए हैं.

एबीपीएस के तहत मज़दूरों का जॉब कार्ड उनके आधार से लिंक्ड होना चाहिए. यही आधार कार्ड उनके बैंक खाते से जुड़ा हो और फिर इसकी सीडिंग नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) से होनी चाहिए.

एबीपीएस में मज़दूरों के आधार कार्ड संख्या को उनका वित्तीय पता मानकर मज़दूरी का भुगतान करने का प्रावधान किया गया है.

केंद्र सरकार का क्या कहना है?

संसद के मानसून सत्र के दौरान एक सवाल के जवाब में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा था कि ये जॉब कार्ड कथित अनियमितताओं को रोकने के उद्देश्य से डिलीट किए गए हैं.

उन्होंने यह भी कहा था, ''जाली जॉब कार्ड के अलावा नकली जॉब कार्ड, ग्राम पंचायत से स्थायी तौर पर चले जाने, अब काम के इच्छुक नहीं होने और जॉब कार्ड में नामित व्यक्ति की मौत हो जाने जैसी वजहों से जॉब कार्ड डिलीट किए गए. लेकिन, इसे अद्यतन करना राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की जवाबदेही है. यह लगातार चलने वाला काम है.''

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