कोरोना वायरस: 20 लाख करोड़ के पैकेज से मनरेगा के लिए 40 हज़ार करोड़ का आवंटन

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"50 दिन से काम नहीं मिला है. ना पति को ना मुझको. पहले मनरेगा में काम नहीं मिलता था तो पति शहर चले जाते थे. वहां कोई ना कोई काम मिल ही जाता था. लेकिन जब से ये बीमारी आया है ना.... सब बंद है दीदी."

झारखंड के दुमका के एक छोटे से गाँव में रहने वाली शुभारानी टूडु, फ़ोन पर बात करते हुए ना तो 'कोरोना वायरस' बीमारी का नाम सही से बोल पा रही है, ना ही 'लॉकडाउन' का.

लेकिन इन दोनों शब्दों की अहमियत उनकी ज़िंदगी में किसी और के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है.

जहां रोज़ कमा कर खाना ही जीवन की नियति हो, अगर वहाँ 50 दिन से काम ही ना मिला हो, तो पाँच आदमी का परिवार क्या खाए और क्या रोए.

शुभारानी टूडु का हाल भी देश के बाक़ी प्रवासी मज़दूरों जैसा है. फ़र्क इतना कि वो सड़क पर पैदल बच्चों के साथ नहीं है. राशन की दुकान पर इस बार क़िस्मत से चावल के साथ दाल मिल गया था, तो चूल्हा जला ले रही है. रसोई में सब्ज़ी बने तो अरसा हो गया है.

कोरोना काल में केंद्र सरकार ने परिवार के प्रत्येक व्यक्ति को 5 किलो अतिरिक्त चावल और दाल देने का फ़ैसला किया था. शुभारानी के परिवार को वो फ़ायदा ज़रूर मिला है.

लेकिन जिस दिन आख़िरी बार घर पर सब्ज़ी बनी थी, मानो वो त्योहार का दिन था. उस दिन को याद करते हुए शुभारानी कहती हैं, "एक घर में खप्पड़ ठीक करने का काम पति को मिला था, उस दिन मज़दूरी मिली थी, 120 रुपया. उसी दिन ही सब्ज़ी बनी थी दीदी."

शुभारानी झारखंड के दुमका में अपने पति और तीन बच्चों के साथ रहती हैं. सबसे बड़ा बेटा 10 साल का है. बाक़ी दो बच्चे 8 साल और 6 साल के हैं.

कोरोना के पहले की ज़िंदगी आलीशान नहीं थी, लेकिन अपने में ख़ुश थी शुभारानी. परिवार के पास मनरेगा कार्ड है. लेकिन पिछले दो महीने से वहाँ सब कुछ बंद पड़ा है, इसलिए कमाई का कोई ज़रिया नहीं.

भारत सरकार की महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत गांव में रहने वालों को घर के पास ही साल में 100 दिन का रोज़गार मुहैया कराने का प्रावधान है.

हालाँकि 24 मार्च से 20 अप्रैल तक पूर्ण लॉकडाउन की वजह से मनरेगा काम पर पाबंदी लगी थी. लेकिन 21 अप्रैल से दोबारा से मनरेगा में काम शुरू करने की छूट दे दी गई थी. बावजूद इसके कई इलाक़ों में काम अब तक शुरू नहीं हुआ है.

शुभारानी के गाँव में कुछ लोगों को कुंआ बनाने का काम तो मिला है, लेकिन वो तीन गाँव दूर है. छोटे बच्चों को घर पर अकेले छोड़ कर जाना भी चाहे तो साधन नहीं हैं. बीमारी के डर से बच्चों को साथ ले जाना नहीं चाहती और घर के पास कोई काम है नहीं.

मनरेगा के आँकड़े

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को 20 लाख करोड़ की दूसरी किश्त की घोषणा करते हुए दावा किया:

•13 मई तक 14.62 लाख पर्सन-डे का काम जेनरेट हुआ.

•मनरेगा के तहत 10 हज़ार करोड़ का ख़र्च किया गया.

•2.33 करोड़ मनरेगा का काम मांगने वालों को 13 मई तक काम दिया गया.

•पिछले साल के मुकाबले 40-50 फीसदी ज्यादा व्यक्ति मनरेगा के तहत एनरोल किए गए.

•अब प्रवासी मजदूरों को भी मनरेगा के तहत काम देना का अभियान चलाया जाएगा.

पहले तीन आँकड़े तो सरकार की बेवसाइट से मेल खाते हैं, लेकिन 40-50 फीसदी ज्यादा लोग मनरेगा के तहत ज्यादा एनरोल किए गए ये बात उनकी ही बेवसाइट पर नहीं दिखती.

सरकारी आँकड़ो के मुताबिक मार्च महीने तक तकरीबन 18 करोड़ 19 लाख पर्सन डे काम हुआ था. जो अप्रैल मई में 13 करोड़ 60 लाख पर्सन डे रह गया है.

रक्षिता स्वामी मनरेगा के तहत कई 'राइट टू वर्क' कैम्पेन से सालों से जुड़ी रही हैं. रक्षिता के मुताबिक, "पिछले पांच साल से मनरेगा का बजट लगभग एक सा ही रहा है. औसत देखें तो ये लगभग 60 हज़ार करोड़ का है. अगर सरकार ये कह रही है कि अब तक 10 हज़ार करोड़ खर्च हो गए तो ये कोई नई सूचना नहीं है. पिछले साल के बक़ाया चुकाने और नए साल के काम का पैसा देने में ये ख़र्च तो होना ही था."

गुरुवार को सरकार ने कहा कि प्रवासी मजदूरों को मनरेगा का काम देना का प्रबंध किया जा रहा है. रक्षिता इसे अच्छा क़दम मानती हैं. लेकिन उनका कहना है, "इसके लिए को अतिरिक्त रकम देनी चाहिए. पहले से आवंटित रकम में अगर 8 करोड़ प्रवासी मजदूरों को भी काम दिया जाएगा, तो पुराने मनरेगा मजदूरों के लिए क्या बचेगा."

भारत सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक़ इस साल अप्रैल के महीने में पिछले पांच सालों में सबसे कम काम हुआ है. साल 2015 को छोड़ दिया जाए तो ये पिछले पांच सालों में सबसे कम है. और सरकारी दावे के बिलकुल उलट भी.

मई में भी स्थिति बेहतर होती नज़र नहीं आ रही है, लेकिन उतनी बेहतर भी नहीं जितना वित्त मंत्री ने प्रेस कॉंफ्रेंस में कह दिया.

सरकार ने तो मई का महीना पूरा होने के पहले ही दावा कर दिया. मंत्रालय में जब हमने बात की तो उनका कहना था कि आँकड़ें, पूरे महीने के प्रोजेक्शन पर आधारित हैं. और बेवसाइट पर अपडेट होने में 10-15 दिन का वक़्त लगता है.

2020 के अप्रैल में ये आँकड़े तकरीबन 9 करोड़ पर्सन पर डे यानी व्यक्ति प्रति दिन के हैं.

पर्सन पर डे यानी व्यक्ति प्रति दिन का मतलब होता है 9 करोड़ लोगों को मनरेगा में एक दिन के लिए रोज़गार मिला, दूसरे शब्दों में 4.5 करोड़ लोगों को दो दिन का रोज़गार मनरेगा में मिला.

लेकिन महीने में एक-दो दिन काम करने से क्या पूरा महीना चल सकता है?

शुभारानी ने फ़ोन पर मुझसे जब ये सवाल पूछा, तो उनकी आवाज़ से नाराज़गी साफ़ झलक रही थी.

मनरेगा के तहत हर राज्य में मज़दूरी दर अलग-अलग है. मनरेगा के तहत होने वाले काम में मज़दूरी केंद्र सरकार देती और इस्तेमाल होने वाले मटेरियल का ख़र्च राज्य सरकारें वहन करती हैं. झारखंड में मज़दूरी फ़िलहाल 194 रुपए है.

मनरेगा की आधिकारिक बेवसाइट पर दर्ज़ आँकड़ों के मुताबिक़ देश में सबसे ज़्यादा मज़दूरी दर केरल सरकार देती है और सबसे कम राजस्थान सरकार देती है.

आख़िर समस्या कहाँ है?

रीतिका खेड़ा, आईआईएम अहमदाबाद में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. मनरेगा पर उन्होंने काफ़ी काम किया है. उनके मुताबिक़, "मनरेगा में अप्रैल के महीने में काम कम मिलना स्वाभाविक था. इसकी बड़ी वजह लॉकडाउन था, जो पूरे देश में लागू था. हालांकि उम्मीद की जानी चाहिए कि 21 अप्रैल के बाद इसमें तेज़ी आएगी, क्योंकि मनरेगा के काम पर से पाबंदियां 21 अप्रैल के बाद हटा ली गई थी."

लेकिन रीतिका की मानें तो इसकी कोई गारंटी नहीं है. ऐसा मानने के पीछे वो वजहें भी गिनाती हैं. पहले तो ग्राम पंचायतों को ऐसे काम शुरू करने पड़ेंगे, जहाँ लोग काम पर तुंरत लौट सकें.

दूसरा ये कि लोगों में बीमारी का डर ना हो, नहीं तो डर के मारे वो काम पर लौट ही नहीं पाएंगे क्योंकि वो उसे सुरक्षित नहीं मानते. जैसा शुभारानी के साथ भी हो रहा है.

हालाँकि सरकार ने मनरेगा के कामों में भी सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क पहनने को अनिवार्य बना दिया है. लेकिन ज़मीन पर इसके पालन में दिक्कतें आ रही हैं.

रीतिका की मानें तो मनरेगा के काम में एक सिजनल पैटर्न हमेशा से देखने को मिलता रहा है. जब किसानी का काम ख़त्म होता है, तभी मनरेगा का काम अधिक होता है.

इसलिए अप्रैल के महीने में मनरेगा में लोगों को जो कम काम मिला है उसे केवल इस साल में मार्च के मुक़ाबले में ही देखने की ज़रूरत नहीं है. इसे पिछले सालों के अप्रैल महीने से भी तुलना करने की ज़रूरत है, जब लोगों को मनरेगा का काम अप्रैल के महीने में सबसे ज़्यादा मिला था.

आँकड़ों की बात करें तो मार्च के महीने में लगभग 18 करोड़ काम मिला था. लेकिन अप्रैल के महीने में वो आधा रह गया.

अगर पिछले साल से इसकी तुलना करें तो 2019 में अप्रैल के महीने में 27 करोड़ पर्सन पर डे का काम मनरेगा के तहत मिला.

रीतिका के मुताबिक़ मनरेगा मज़दूरों की कहानी में अभी की परिस्थिति में एक और परेशानी है. इनको अपना दिहाड़ी का काम नहीं मिला वो तो है ही, लेकिन इनके सगे-संबंधी जो शहरों में जाकर कमा कर पैसा भेजते थे, वो भी पैसे इन्हें नहीं मिल पा रहे हैं. यानी इन मज़दूरों को दोहरी मार झेलनी पड़ी है.

राज्यों का प्रदर्शन

सरकारी बेवसाइट पर उपलब्ध आँकड़ों के मुताबिक़ मई के महीने में मनरेगा के तहत काम देने की बात की जाए तो छत्तीसगढ़ का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा है. उसके बाद मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, ओडीशा और पश्चिम बंगाल का नंबर आता है.

सबसे ख़राब प्रदर्शन वाले राज्यों की बात करें तो तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश और अरूणाचल प्रदेश में तो मई में अब तक एक रोज़गार नहीं दिया गया है. उत्तराखंड, तमिलनाडु, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा ऐसे राज्य हैं जिनमें रोज़गार मिलने की शुरूआत हुई है, लेकिन बहुत कम है उसकी दर.

केंद्र सरकार का एलान

26 मार्च को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर मनरेगा मज़दूरों के लिए मज़दूरी बढ़ाए जाने का एलान किया था. मनरेगा के तहत मज़दूरों को मिलने वाले मज़दूरी दर को केंद्र सरकार ने 182 रुपए से बढ़ा कर 202 रुपए कर दिया.

प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उन्होंने कहा, "5 करोड़ मनरेगा परिवारों को इससे फ़ायदा मिलेगा. मज़दूरी दर बढ़ाने से 2000 रुपए प्रति मज़दूर फ़ायदा पहुंचेगा".

लेकिन वित्त मंत्री के इस गणित से मनरेगा पर सालों से काम करने वाले जानकार भरोसा ही नहीं कर पा रहे. इन मज़दूरों के साथ जुड़ कर काम करने वाले 635 जानकारों ने वित्त मंत्री के प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बाद मिल कर कहा, वित्त मंत्री की घोषणा काफ़ी नहीं है.

मज़दूरी बढ़ाने का एलान तो केंद्र सरकार को बढ़ती मंहगाई के मद्देनज़र करना ही था. सरकार को दरअसल 100 दिन के काम को आगे बढ़ाने की ज़रूरत है.

कई राज्यों ने मनरेगा के तहत 200 दिन काम देने का सुझाव केंद्र सरकार को भी भेजा है.

ग्राम सभाओं की परेशानी

मनरेगा के तहत लोगों को रोज़गार देने का काम ग्राम सभाओं से पहले पास करना होता है. लेकिन लॉकडाउन की वजह से ग्राम सभाएँ बैठ नहीं पा रही हैं और इस वजह से काम का डिमांड ही नहीं हो पा रहा है. दरअसल यही है सबसे बड़ी परेशानी.

राजस्थान में सरपंच संघ के प्रदेश अध्यक्ष भँवर लाल ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "मनरेगा में काम ना होने के तीन कारण है. एक तो हम मिल ही नहीं पा रहे हैं, तो जायज़ा कैसे लें क्या काम होना है. दूसरा ये कि रोड अगर बनानी भी है तो उसमें इस्तेमाल होने वाले मटेरियल ही नहीं मिल रहे हैं, तीसरी बात ये कि हमारा पहले का बकाया पेमेंट ही सरकारें चुका नहीं पाई हैं, आगे का काम कैसे कराएं."

भँवर लाल की बात से जानकार भी इत्तेफ़ाक रखते हैं. रक्षिता स्वामी के मुताबिक ये सभी वाजिब दिक्कतें है.

कोरोना के ख़ौफ़ से डिमांड रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पा रही हैं. ग्राम सभाएँ मिल कर, बैठ कर बात ही नहीं कर पा रही हैं.

वो कहती हैं, "प्रशासन अपनी तरफ़ से घर-घर जा कर काम क्या कराना है, ये पूछ नहीं रहे है. ऐसे में मनरेगा में काम मिले तो मिले कैसे."

रक्षिता के मुताबिक़ एक दिक्कत ये भी है कि सरकारी आदेशों में सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क पहनना और बार-बार हाथ धोने की बात तो की गई है. लेकिन ज़मीन पर इसको ग्राम पंचायतों के स्तर पर अमल में कैसे लाया जाए. इसके लिए भी तो बजट चाहिए.

गरीबी मिटाने में मनरेगा से मदद

साल 2017 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंस में छपे एक लेख के मुताबिक, मनरेगा ने ग्रामीण भारत में लोगों की कमाई पर सकारात्मक प्रभाव डाला है, जिसकी वजह से गरीबी उन्मूलन में भी मदद मिली है. हालांकि रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि इसको लागू करने में अब भी बहुत सी खामियां हैं, जिसे दूर किया जाए, तो नतीजे और बेहतर हो सकते हैं. मसलन आज भी हर मनरेगा कार्ड वाले को 100 दिन का रोजगार पूरा नहीं मिलता है.

रीतिका भी इस बात से सहमत हैं. उनके मुताबिक मनरेगा के दो अहम फायदे हैं. पहला तो ये कि इस स्कीम के तहत ख़ास तौर पर आदिवासी और दलित महिलाओं को काफी काम मिलता है. तकरीबन 50 फीसदी महिलाएं ही मनरेगा में काम करती है. दूसरा फ़ायदा ये कि मनरेगा आने से प्राइवेट क्षेत्रों में जो मजदूरी दर है वो भी बेहतर हुई है, क्योंकि लेबर मार्केट में इसकी वजह से प्रतिस्पर्धा बढ़ी है.

समाधान क्या है?

रीतिका केवल समस्या ही नहीं गिना रही. वो सरकार को समाधान भी सुझा रही हैं. उनके मुताबिक़, "सरकार ना केवल उन लोगों को काम मुहैया कराए जो मज़दूर मनरेगा साइट पर काम के लिए पहुंच रहे हैं. बल्कि कैश पेमेंट की भी व्यवस्था कराए."

रक्षिता कहती हैं, "सरकार मनरेगा मज़दूरों के साथ साथ प्रवासी मज़दूरों की समस्याओं का हल भी मनरेगा में काम दे कर कर सकती है. जो प्रवासी मज़दूर अभी घर लौटे हैं, उनके भी मनरेगा कार्ड बनवा कर उन्हें भी काम दिया जाए, तो एक तीर से दो शिकार हो सकते हैं."

दोनों लोगों ने जो समाधान सुझाए हैं, उसके लिए पैसों की ज़रूरत पड़ेगी. इसलिए सबकी आंखें सरकार के 2 लाख करोड़ के राहत पैकेज की तरफ़ है. क्या इस पैकेज में उनका भी नंबर आएगा?

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