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कोरोना लॉकडाउन: प्रवासी मज़दूरों के लिए क्या कर रही हैं राज्य सरकारें
- Author, टीम बीबीसी हिंदी
- पदनाम, नई दिल्ली
कोरोना संक्रमण को लेकर किए गए लॉकडाउन की वजह से देश के विभिन्न राज्यों में फंसे हुए प्रवासियों को घर वापस लाने की मुहिम चल रही है. इस क्रम में हज़ारों की संख्या में प्रवासी मज़दूरों का भी अपने अपने राज्यों में वापस लौटना जारी है.
दूसरे राज्यों में फंसे इन मज़दूरों को विशेष ट्रेनों और बसों से लाया जा रहा है. हालांकि हज़ारों की तादाद में पहुंच रहे मज़दूरों को लेकर राज्य की चिंताएं अब बढ़ने लगी हैं क्योंकि क्वारंटीन की समायवधि ख़त्म होते ही राज्य सरकारों को इनके लिए रोज़गार की वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी.
वैसे उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों ने स्थानीय स्तर पर ऐसी ही कुछ वैकल्पिक व्यवस्था करने की योजना बनाई है.
चलिए देखते हैं कि उत्तर प्रदेश समेत बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश में पहुंच रहे इन प्रवासी मज़दूरों की तादाद कितनी और स्थिति कैसी है और साथ ही यह भी कि राज्य सरकारें इनके भविष्य को लेकर क्या किसी योजना पर काम कर रही हैं. आखिर क्या है राज्य सरकार की तैयारी?
यूपी में स्थानीय स्तर पर रोज़गार देने की तैयारी
उत्तर प्रदेश में बीबीसी के सहयोगी समीरात्मज़ मिश्र ने बताया कि पिछले चार दिनों में क़रीब चार लाख प्रवासी मज़दूर उत्तर प्रदेश में दूसरे राज्यों से आ चुके हैं.
रेलवे मंत्रालय ने अब तक जितनी ट्रेनें चलाई हैं, उनमें सबसे ज़्यादा उत्तर प्रदेश के ही अलग-अलग शहरों में आई हैं. राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि सरकार बाहर से आने वाले मज़दूरों को स्थानीय स्तर पर ही रोज़गार देने की एक महत्वाकांक्षी योजना तैयार कर रही है. इसके लिए एक व्यापक कार्ययोजना बनाने के लिए मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश भी दिए हैं.
राज्य के अपर मुख्य सचिव अवनीश अवस्थी के मुताबिक, "सीएम योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वापस आए सभी श्रमिकों का अनिवार्य रूप से स्वास्थ्य परीक्षण किया जाए और 14 दिनों तक क्वारंटीन में रखने और स्वस्थ होने के बाद ही उनके घर जाने दिया जाए. इसके अलावा उनका स्वास्थ्य परीक्षण करने वाली टीम को भी 14 दिन के क्वारंटीन में रखा जाए."
प्रवासी मजदूरों की समस्याओं को देखते हुए राज्य सरकार ने एक जनसुनवाई पोर्टल भी लॉन्च किया है जहां रजिस्ट्रेशन कराकर प्रवासी मज़दूर अपने घर जा सकते हैं. इस पोर्टल पर प्रदेश के बाहर अथवा दूसरे किसी राज्य के जो लोग प्रदेश में फंसे हैं वो भी अपना रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं.
प्रवासी मजदूरों के लिए राज्य ने 'प्रवासी राहत मित्र' नाम से एक ऐप भी लॉन्च किया है जिसका मक़सद मज़दूरों को विभिन्न योजनाओं के तहत काम दिलाना है. इस ऐप की मदद से मज़दूरों के स्वास्थ्य पर निगरानी रखने में भी सहूलियत होगी.
सभी ज़िलों के डीएम के नेतृत्व में डेटा एकत्र करने की ज़िम्मेदारी नगर विकास विभाग और ग्रामीण क्षेत्र में पंचायती राज विभाग को सौंपी गई है.
राज्य के अपर मुख्य सचिव अवनीश अवस्थी ने बताया कि प्रवासी मज़दूरों को मनरेगा में रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी ज़िलों के लिए हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं. उनके मुताबिक जो भी मज़दूर मनरेगा में काम करना चाहता हो वो इन पर फ़ोन करके मदद ले सकता है.
बिहार में सरकारी दावों से इतर अव्यवस्था
बिहार में बीबीसी की सहयोगी सीटू तिवारी ने बताया कि बिहार राज्य आपदा प्रबंधन विभाग की वेबसाइट के मुताबिक 11 मई की सुबह 11 बजे तक गुजरात, पंजाब, राजस्थान सहित 13 राज्यों से 83 ट्रेन आ चुकी थी जिससे 95,660 यात्री आ चुके हैं.
बिहार में कुल 187 ट्रेनों से 2,15,326 लोगों को लाये जाने की प्रक्रिया चल रही है. पूर्व मध्य रेल के सीपीआरओ राजेश कुमार के मुताबिक 12 मई को देश के अलग अलग हिस्सों से 19 ट्रेन बिहार पहुंचेगी.
प्रवासी मज़दूरों की चुनौती को देखते हुए राज्य में प्रखंड और पंतायत स्तर पर क्वारंटीन सेंटर बनाए गए हैं. आपदा प्रबंधन के मुताबिक प्रखंड स्तर पर बने 3,880 क्वारंटीन केन्द्रों में फिलहाल 1,54,209 व्यक्ति रह रहे हैं.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मुताबिक इन सेंटर्स पर अच्छा और समय पर खाना, दरी, चादर, कपड़े, बर्तन, मच्छरदानी और चिकित्सीय सुविधा की व्यवस्था की गई है. क्वारंटीन पीरियड के ख़त्म होने पर प्रत्येक प्रवासी मज़दूर को 500 रुपये और बिहार आने में खर्च हुए रेल टिकट की राशि की अदायगी की जाएगी.
वहीं देश के दूसरे हिस्सों से पैदल या अन्य साधनों से बिहार के बॉर्डर पर पहुंचने वालों के लिए 23 राहत केन्द्र बनाए गए हैं. जहां पर मेडिकल स्क्रीनिंग करके उन्हें संबंधित ज़िलों के क्वारंटीन सेंटर में बसों से भेजा जा रहा है.
रोहतास के दावथ ब्लॉक के कवई हाई स्कूल में बने क्वारंटीन सेंटर में रह रहे उमाशंकर यादव 6 मई को बिहार के करमनासा बार्डर पहुंचे. वे बताते हैं कि कर्मनासा बॉर्डर पर उनका मेडिकल स्क्रीनिंग किया गया और खाने के पैकेट्स दिए गए लेकिन अगले दिन सुबह यानी 7 मई को वहां सुबह 11 बजे तक न तो खाने के लिए कुछ दिया गया और न ही वहां पानी उपलब्ध था.
7 मई को क्वारंटीन सेंटर पहुंचे उमाशंकर सेंटर की बदहाली से परेशान हैं. वो बताते हैं, "सेंटर में लुंगी गमछा, बाल्टी मिल गया लेकिन साफ़ सफ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं है. यहां हम लोगों ने चादर घर से मंगवाया है. खाने में भी सिर्फ चावल दिया जा रहा है तो आदमी कोरोना से बीमार न पड़े लेकिन क्वारंटीन में ज़रूर बीमार पड़ जाएगा."
वहीं कोटा से आई छात्र कृतिका शंकर बताती हैं, " ट्रेन में खाने के लिए बिरयानी का पैकट दिया गया था लेकिन पीने का पानी नहीं दिया गया. यहां दानापुर स्टेशन पर नाश्ते का पैकट, पानी, जूस दिया गया था और मेडिकल स्क्रीनिंग करके 21 दिन के लिए होम क्वारंटीन कर दिया गया है."
कृतिका ने बीबीसी को बताया कि दानापुर स्टेशन से घर ले जाने वाली बसों ने ज़्यादातर छात्रों को बीच रास्ते में ही छोड़ दिया था. खुद कोटा से 5 बैग साथ लेकर लौटी कृतिका को गांधी मैदान में बस ने छोड़ दिया जहां से उन्हें अपने घर खुद लौटना पड़ा.
सरकार 'कोरोना सहायता' मद से प्रत्येक राशन कार्ड धारी को 1000 रुपये दे रही है जिस पर अब तक सरकारी दावों के मुताबिक 1270.60 करोड़ रुपये खाते में ट्रांसफर हुए हैं. इसके अलावा मुख्यमंत्री विशेष सहायता के तहत भी दूसरे राज्यों में फंसे बिहार के प्रवासी मज़दूरों को 1000 रुपये दिए जा रहे हैं. लेकिन सरकार की तरफ से दी जा रही सहायता के लिए मज़दूरों को आनलाइन रजिस्ट्रेशन करना है, जो मज़दूरों के लिए मुश्किल साबित हो रहा है.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सभी विभागों को प्रवासी मज़दूरों के कौशल के आधार पर रोज़गार के अवसर सृजन करने और ग्रामीण स्तर पर इसके अवसर बढ़ाने का निर्देश दिया है. लेकिन अभी इसे लेकर सरकार की तरफ से कोई ठोस काम किया जाना बाकी है.
राज्य के सामने एक चुनौती ये भी है कि अभी बिहार में एक दिन में महज 1800 लोगों की सैंपलिंग हो पा रही है जिसे राज्य सरकार बढ़ाकर 10 हज़ार करना चाहती है क्योंकि घर लौटने वाले प्रवासी मज़दूरों से कोरोना संक्रमण बढ़ने की आशंका है.
मज़दूरों का रोज़गार झारखंड की सबसे बड़ी चिंता
राँची में बीबीसी के सहयोगी रवि प्रकाश ने बताया कि झारखंड में इस सप्ताह कोरोना संक्रमित पाए गए लोगो में अधिक संख्या, प्रवासी मज़दूरों की है. वे महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के राज्यों से अपने घर लौटे हैं. संक्रमित लोगों को कोविड के लिए डेडिकेटेड अस्पतालों में भर्ती कराया गया है. बाक़ी मजदूर होम क्वारंटीन किए गए हैं.
ऐसे में सरकार की सबसे बड़ी चिंता इन मज़दूरों का इलाज कराना और बाद में इन्हें रोज़गार उपलब्ध कराना है.
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस संबंधित सतर्कता बरतने के आदेश दिए हैं.
उन्होंने मीडिया से कहा, "प्रवासी लोगों के लिए बनाए गए पोर्टल पर क़रीब 6 लाख लोगों में झारखंड वापसी के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है. इनमें से अधिकतर मज़दूर हैं. हमारी सरकार उन्हें वापस लाने के प्रति गंभीर है. कुछ ट्रेनें चलायी जा रही हैं. यह सिलसिला आगे भी चलेगा. दक्षिण के राज्य, जहाँ मज़दूरों की संख्या कम है उन्हें बस या ट्रेन से लाना संभव नहीं है. ऐसे मज़दूरों के लिए ज़रूरत पड़ी तो हमारी सरकार स्पेशल फ्लाइट्स भी चलाएगी.
मुख्यमंत्री ने कहा, "हमारी दूसरी चिंता उनका इलाज और रोज़गार है. हमने मज़दूरों को ध्यान में रखकर तीन योजनाएँ लाँच की हैं. इसके लिए 20 हज़ार करोड़ का प्रावधान किया गया है. प्रधानमंत्री के साथ मंगलवार को हुई वीडियो कान्फ्रेंसिंग में भी मैंने मनरेगा की मज़दूरी कमसे कम 50 प्रतिशत बढ़ाने और रोज़गार गारंटी के दिनों की संख्या बढ़ाने की माँग की है. इनके इलाज के लिए पंचायत स्तर पर आइसोलेशन सेंटर की रूपरेखा भी तैयार है."
हालाँकि, अभी भी कई मज़दूर पैदल अपने घरों को लौट रहे हैं. दो दिन पहले ऐसे ही कुछ मज़दूर रामगढ़ के पास हुई सड़क दुर्घटना में अपनी जान गँवा बैठे.
विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि सरकार को इन मज़दूरों को लेकर और गंभीर होना पड़ेगा क्योंकि झारखंड में एक घर में कई-कई लोग रहते हैं. ऐसे लोग होम क्वारंटीन कैसे कर पाएँगे.
मध्य प्रदेश में अब भी पैदल पहुंच रहे मज़दूर
मध्य प्रदेश में बीबीसी के सहयोगी शुरैह नियाज़ी ने बताया कोरोना संकट की वजह से हुए लॉकडाउन के बाद मध्यप्रदेश के मज़दूर अपने राज्य का रुख कर रहे हैं. सरकार के दावे के मुताबिक़ अब तक 2.15 लाख प्रदेश में सरकारी मदद से वापस आ चुके हैं वही हज़ारों की तादाद में मजदूर पैदल ही प्रदेश लौट रहे हैं.
आने वाले मज़दूर अपने शोषण और परेशानी की दर्दनाक कहानी बयां कर रहे हैं. लगभग 40 दिन से भी ज़्यादा फंसे रहे इन मज़दूरों के पास न तो अब काम है और न ही पैसे. जो थोड़े पैसे इन्होंने कमाए थे वो लगभग ख़त्म हो चुके हैं.
प्रदेश में पहुंचते ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इनका स्वागत करने और खान पान की व्यवस्था करने के आदेश ज़िला कलेक्टरों को दिए हैं. लेकिन हक़ीक़त में स्थिति कुछ और है. ज़्यादातर मज़दूरों की मदद के लिए स्थानीय लोग और संस्था ही नज़र आ रहे हैं.
रमेश शंकर पैदल ही नासिक से अपनी मंज़िल के लिए अपने दोस्तों के साथ चले हैं. रमेश ने बताया कि किराए के लिए न तो पैसे हैं न ही कोई दूसरा साधन मिल रहा है इसलिए पैदल ही जा रहे हैं.
भोपाल में स्थानीय संस्थाएं इन्हें खाना और पानी मुहैया करा रही हैं. इसके साथ ही कोशिश की जा रही है कि इन्हें आगे पैदल न जाना पड़े और कुछ साधन उपलब्ध करा दिया जाएं.
वही शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि कहीं भी किसी भी मज़दूर को प्रदेश की सीमा के अंदर पैदल न चलने दिया जाए लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो पाया है.
सरकार ने आदेश दिया है कि दूसरे प्रदेश के मज़दूरों को भी उनके प्रदेश की सीमा तक प्रदेश की गाड़ियां छोड़ कर आएंगी.
इंदौर, भोपाल जैसे शहरों में हज़ारों की तादाद में अपनी मंज़िल की तरफ जाते मज़दूरों को देखा जा सकता है. लगभग 42 डिग्री तापमान में बच्चे, औरतें और मर्द पैदल ही चले जा रहे है. उन्हें देख कर ही उनकी स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
वही अपर मुख्य सचिव एवं प्रभारी स्टेट कंट्रोल रूम श्री आईसीपी केशरी ने बताया कि सरकार प्रदेश के मज़दूरों को लाने के लिए ट्रेनों की तादाद बढ़ा रही है.
उन्होंने कहा, "पहले सरकार ने 56 ट्रेनों का रिक्विजिशन भेजा था, अब 15 ट्रेनों का और भेजा जा रहा है. इस तरह से कुल 71 ट्रेनों की मांग की जा चुकी है."
हालांकि कई अन्य राज्यों की तरह यहां अब तक प्रवासी मज़दूरों के भविष्य को लेकर राज्य सरकार में कोई सुगबुगाहट नहीं दिखी है.
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