कोरोना अपडेट: खाड़ी देशों से इतने लोगों को क्या वापस ला पाएगी मोदी सरकार

    • Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

हफ़्तों के इंतज़ार के बाद आख़िर वो घड़ी आ पहुंची थी.

बालाचंद्रुदू शनिवार दोपहर कुवैत से हैदराबाद जानेवाली उड़ान एआई-988 में 159 अन्य यात्रियों के साथ सवार थे.

पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे कुवैत ऑयल कंपनी में काम करनेवाले बालाचंद्रुदू परिवार के पास पहुंचना चाहते थे.

उन्होंने भारतीय दूतावास में पंजीकरण भी करवाया था, लेकिन अपनों के बीच वापस लौटने की ख़्वाहिश रखनेवालों की क़तार लंबी है और 'उन्हें मालूम नहीं था कि उनका नंबर आएगा या नहीं.'

बालाचंद्रुदू उन 1373 भारतीयों में शामिल थे, जो शनिवार को दुबई, कुवैत, मस्कट, शारजाह, कुआलालंपुर (मलेशिया) और ढाका (बांग्लादेश) से चेन्नई, कोच्चि, तिरुचिरापल्ली, हैदराबाद, दिल्ली और लखनऊ पहुंचे.

'मिशन वंदे भारत

'मिशन वंदे भारत'-प्रवासियों को देश वापस लाने की ये योजना सात मई से शुरू हुई है.

पहले दिन अबू धाबी और दुबई से 354 यात्रियों को केरल के कोच्चि और कोझिकोड ले जाया गया. इसके बाद खाड़ी और विश्व के दूसरे मुल्कों से भी भारतीयों को वापस लाने का सिलसिला जारी है.

पर आसिफ़ ख़ान को और इंतज़ार करना होगा, आसिफ़ ख़ान जो डर के मारे अपनी तस्वीर तक देने को राज़ी नहीं, क्योंकि 'कफाला' सिस्टम के तहत उनका पासपोर्ट उनके स्पॉन्सर के पास है, और 25 दिनों पहले नए पासपोर्ट के लिए आवेदन करने के बावजूद भी दूतावास से उन्हें नया पासपोर्ट जारी नहीं हो पाया है.

कुवैत में ही आसिफ़ ख़ान जैसे कम से कम 40 हज़ार आप्रवासी भारतीय हैं जो पासपोर्ट खो जाने, स्पॉन्सर के ज़रिए पासपोर्ट वापस न करने, वीज़ा एक्सपायर हो जाने वग़ैरह की वजह से वहां 'फंसे' हैं.

खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीय

रिपोर्टों के मुताबिक़ फिलीपिंस, मिस्र, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे देशों के बड़ी संख्या में ग़ैर-कानूनी प्रवासी कुवैत में मौजूद हैं जिनके लिए स्थानीय हुकूमत ने एक एमनेस्टी (छूट) देने का ऐलान किया है.

इसके तहत ऐसे लोगों के देश वापस जाने के लिए अप्लाई करने की स्थिति में न ही किसी तरह का कोई जुर्माना लिया जाएगा, बल्कि वापसी तक उनके खाने-पीने का इंतज़ाम भी कुवैती हुकूमत करेगी. साथ ही वो उनकी वापसी का टिकट भी देगी.

केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने इस सिलसिले में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर को अप्रैल के पहले हफ़्ते में एक ख़त भी लिखा था.

आसिफ़ ख़ान कहते हैं, "मेरा एक बेटा कोरोना की वजह से धारावी में फंस गया है, मेरा परिवार गांव में अकेला है और रिश्तेदार बीवी से मारपीट कर रहे हैं इसलिए किसी भी तरह घर पहुंचने में मेरी मदद की जाए."

खाड़ी के देशों में काम कर रहे कम से कम 3,50,000 भारतीयों ने देश वापस आने के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया है. इसमें तक़रीबन 2,50,000 संयुक्त अरब अमीरात और 60,000 सऊदी अरब से ही हैं. बहरीन, ओमान, क़तर और कुवैत में मौजूद दूतावासों की वेबसाइटों पर भी भारतीयों ने वापस जाने के लिए फॉर्म भरे हैं.

किन्हें प्राथमिकता मिलेगी?

खाड़ी देशों समेत दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फँसे भारतीयों को देश वापस लाने का एलान केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सोमवार यानी 4 मई को किया था.

इसके बाद गृह सचिव अजय कुमार भल्ला ने एक विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किया जिसके मुताबिक़ देश वापस जाने की इच्छा रखनेवाले भारतीयों को नज़दीकी दूतावास में पंजीकरण करवाना होगा, जिसके बाद सरकार विमान/जहाज़ का इंतज़ाम करेगी और वापस लौटने वालों में गर्भवती महिलाओं, रोगियों, वृद्ध नागिरकों और मुसीबत में फंसे कामगारों को प्राथमिकता दी जाएगी.

प्रेस अधिकारी नीरज अग्रवाल के मुताबिक़ यूएई में "वापसी की इच्छा रखनेवाले तक़रीबन ढाई लाख फॉर्म अब तक भरे जा चुके हैं, दूतावास में इनके आकलन के बाद लोगों से संपर्क किया जा रहा है जिसके आधार पर फिर किन्हें किस क्रम में जाना है इसकी लिस्ट तैयार की जाती है."

इसके लिए 30 लोगों की एक टीम लगातार काम कर रही है, नीरज अग्रवाल ने कहा, "मौजूद डेटा की छानबीन और लोगों से बातचीत के बाद अंदाज़ा होता है कि रजिस्ट्रेशन करवाने वालों में से हर चौथा-पाँचवाँ व्यक्ति स्वदेश वापसी को लेकर सीरियस है."

वापसी का इंतज़ाम

कुवैत में वाणिज्य दूतावास ने भारतीयों के बीच काम करने वाली स्वंयसेवी संस्थाओं की मदद भी ली है.

सऊदी अरब में मौजूद भारतीय दूतावास ने वापस जाने की ख़्वाहिश रखने वालों का रजिस्ट्रेशन अप्रैल अंत से ही शुरू कर दिया था, और साठ हजार भारतीयों ने इसके लिए ऑनलाइन अप्लाई भी किया.

इसके बाद दूतावास ने लोगों को सलाह दी है कि वो धैर्य बनाए रखें क्योंकि इतनी बड़ी संख्या के लिए वापसी का इंतज़ाम करने में वक़्त लगेगा.

सऊदी अरब से लोगों को भारत वापस लाने का काम 8 मई से शुरू हुआ, जिसके तहत पहली उड़ान रियाद से भरी गई.

आनेवाले दिनों में दम्माम और जेद्दाह से भी फ्लाइट की घोषणा की गई है. पहले सप्ताह में यहां से 15,00 प्रवासी भारतीय देश वापस लौट सकेंगे.

धैर्य जवाब दे रहा है...

लेकिन देरी की वजह से वहाँ फँसे लोगों की मदद करने वालों और मेहमान मुल्कों का धैर्य जवाब दे रहा है.

आंध्र प्रदेश के कटप्पा ज़िले के निवासी मोहम्मद इलियास कहते हैं लोग दो-दो सप्ताह से अधिक समय से कैंपों में रह रहे हैं जहां इतनी बड़ी संख्या के लिए पर्याप्त टॉयलेट, बाथरूम वग़ैरह की सुविधा नहीं है.

स्थानीय प्रशासन ने नौकरी से बाहर हो गए लोगों, जिनके वीज़ा एक्सपायर हो गए हैं, जो घूमने गए और वहां जाकर लॉकडाउन की वजह से अटक गए हैं, उनके रहने के लिए स्कूलों, विला और दूसरी जगहों पर इंतज़ाम किए हैं.

बीबीसी को भेजे गए एक वीडियो में बीमार लोगों के साथ कैंपों में रखी गई तीन महिलाएं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी से 'अपनी बहनों को वापस लाने की गुहार करते-करते' रो पड़ीं.

लोग बुरी तरह से डरे हुए भी हैं...

यूनाइटेड तेलुगू फ्रंट के वेंकट कोदुरी कहते हैं, "जो भारतीय स्थानीय प्रशासन का हिस्सा हैं या सरकारी कंपनियों में काम कर रहे हैं उन्हें तो फ़िलहाल दिक्क़त नहीं हो रही है, लेकिन निर्माण के क्षेत्र में लगे मज़दूरों, या छोटे ठेकेदारों के साथ लगे लाखों लोगों की नौकरियां चली गई हैं, जिसकी वजह से उनके रहने का ठिकाना सीधे तौर पर उनके हाथों से चला गया है और इस तबक़े के पास किसी तरह की जमा-पूंजी भी नहीं."

मोहम्मद इलियास ने कहा, "मानव संसाधन क्षेत्र से जुड़े खाड़ी में काम करने वाले एक मैनेजर ने कहा कि कंपनियों ने 25 से लेकर 45 फ़ीसदी तक सैलेरी कट की है. साथ ही लोग बुरी तरह से डरे हुए भी हैं."

अबू धाबी की एक पेट्रोलियम कंपनी में मिशन वीज़ा (ख़ास अवधि के लिए किसी कंपनी के साथ काम करने का वर्क परमिट) पर आए 1500 मज़दूरों में से एक की मौत हो गई थी जिसे लेकर मज़दूरों में ख़ासा ग़ुस्सा था.

उनमें से एक राम सिंह ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार सिर्फ़ बड़े लोगों के लिए फ़्लाइट का इंतज़ाम कर रही है और अगर उन लोगों के जल्द से जल्द वापसी का इंतज़ाम नहीं किया गया तो वो भूख हड़ताल शुरू कर देंगे.

सरकार की आलोचना

प्रवासियों को लाने के लिए किराया वसूल किए जाने को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार की तीखी ओलोचना हुई है और लोगों ने खाड़ी युद्ध जैसे समय से इसकी तुलना की है जब भारत सरकार ने देशवासियों को बाहर से लाने के लिए किसी तरह का किराया नहीं लिया था.

कोल्लम में क्वारंटीन में मौजूद विनीत योहानन का दुबई से केरल लौटना किसी की मदद से ही संभव हो पाया.

विनीत कहते हैं, "मेरे पास तो टिकट के 750 दिरहम थे नहीं क्योंकि मैं विज़िट वीज़ा पर गया था और मुझे काम नहीं मिल पाया था फिर कोविड 19 की वजह से विमान सेवाएं बंद हो गई और मैं वहां फँस गया, वो तो भला हो उस मेहरबान का जिसने मेरा टिकट स्पॉन्सर किया."

वेलफेयर फंड का इस्तेमाल

नीरज अग्रवाल कहते हैं इस तरह के लोगों की टिकट ख़रीदने में भारतीय दूतावास भी अपने पास मौजूद वेलफेयर फंड का इस्तेमाल कर रहे हैं.

ख़बरों के मुताबिक़ वंदे भारत मिशन के दूसरे चरण में 100 से भी अधिक उड़ानों की योजना है जिसमें मध्य एशिया, अफ़्रीका और यूरोप के कई देशों से भारतीयों को वापस लाया जाना है.

केरल के अतिरिक्त गृह सचिव विश्वास मेहता कहते हैं कि प्रवासियों को वापस लाने का सबसे बड़ा चैलेंज है इस बात के लिए सतर्क रहना कि कहीं इससे वायरस का फैलाव तेज़ न हो, इसलिए ये व्यवस्था की गई है कि उन्हें ही फ्लाइट बोर्ड करने की इजाज़त होगी जो कोरोना-निगेटिव हैं और प्लेन के लैंड करने के बाद फिर से पैसेंजर की जांच होगी, साथ ही सभी पैसेंजर्स को 14 दिनों के क्वारंटीन में भी जाना होगा.

स्वदेश वापस आने की इच्छा

आगे की रणनीति पहले हफ्ते में आए परिणाम के आधार पर तय होगी.

केरल सरकार ने वापसी के लिए पंजीकरण की जो प्रक्रिया शुरू की थी उसके तहत तक़रीबन चार लाख केरल के लोगों ने स्वदेश वापस आने की इच्छा ज़ाहिर की है लेकिन उन सबको जल्दी ला पाना संभव नहीं होगा.

सामान्य दिनों में केरल के चार बड़े हवाई अड्डों पर 92 उड़ाने आती-जाती हैं जोकि अभी के हालात में मुमकिन नहीं है.

खाड़ी के देशों में काम करनेवाले तक़रीबन 85 लाख प्रवासी भारतीयों में से 22 लाख का ताल्लुक केरल से है.

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