मनरेगाः रोज़गार की गारंटी देने वाला क़ानून क्या दम तोड़ रहा है?

    • Author, अरुणा रॉय
    • पदनाम, सामाजिक कार्यकर्ता, बीबीसी हिंदी के लिए

'हर हाथ को काम दो, काम का पूरा दाम दो' - 1996 के बाद से मनरेगा का ये नारा रहा है.

मनरेगा ने तेज़ी से बढ़ते ग़ैर-बराबरी वाले समाज में रोज़गार और इसके लिए बजटीय आवंटन तक पहुंच को एक लोकतांत्रिक अधिकार की मान्यता दिलाई है.

ग़ैर-बराबर सामाजिक आर्थिक स्थितियों और ख़ासकर बेरोज़गारी की देन है- ग़रीबी. ग्रामीण बेरोज़गारी का कोई चेहरा नहीं है, ये काग़ज़ों में महज़ कुछ संख्याएं और विकास का एक फ़ुटनोट भर है.

भारतीय अर्थव्यवस्था को बनाने में ‘अकुशल’ मज़दूरों के योगदान को अप्रासंगिक बताकर ख़ारिज कर दिया जाता है. मनरेगा ने मानवीय श्रम को पहचाना और राजनीतिक व्यवस्था में इसे जगह दिलाई.

इसके साथ ही पहली बार सम्पन्न भारत का सामना हाशिये के लोगों की लोकतांत्रिक और संगठित आवाज़ से हुआ था.

साल 2016 में जोसेफ़ स्टिग्लिट्ज़ (अर्थशास्त्र में नोबल पुरस्कार विजेता) ने कहा था, "महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लायमेंट गारंटी एक्ट (मनरेगा) भारत का एकमात्र सबसे बड़ा प्रगतिशील कार्यक्रम और पूरी दुनिया के लिए सबक है."

जोसेफ़ स्टिग्लिट्ज़ ने ये बात इस सवाल के जवाब में कही थी कि भारत कैसे ग़ैर-बराबरी को कम या ख़त्म कर सकता है.

अन्य कार्यक्रमों से कैसे है अलग?

मनरेगा से पहले पलायन और इसकी वजह से पैदा हुए संकट का कोई हल नहीं था. पुराने रोज़गार कार्यक्रम जैसे, जेआरवाई, काम के बदले भोजन, आकाल राहत कार्य आदि केवल काग़ज़ों पर ही थे.

इस पृष्ठभूमि में 1990 के दशक के मध्य में जन संगठनों, ट्रेड यूनियनों और कई अभियानों ने महाराष्ट्र ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना की तर्ज़ पर रोज़गार गारंटी क़ानून बनाने की मांग शुरू कर दी.

मनरेगा ने काम की गारंटी के अधिकार को विस्तार दिया और अधिकारों, पारदर्शिता और जवाबदेही का पूरा खाका प्रस्तुत किया.

साल 2000 से 2004 के बीच जनता के 'चुनावी घोषणापत्रों' का यह मुख्य हिस्सा बन गया.

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) ने 2004 में नेशनल कॉमन मिनिमम प्रोग्राम को लेकर अपनी मंशा का ऐलान किया.

मनरेगा हर ग्रामीण परिवार को न्यूनतम वेतन के साथ 100 दिन के रोज़गार की गारंटी देता है.

मनरेगा अन्य ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रमों से बहुत सारे मामलों में अलग हैः

  • काम की मांग करते हुए श्रमिक अपनी नागरिकता और अधिकार को स्थापित करता है और फ़ैसला लेने में हिस्सेदार बनता है.
  • चोरी और भ्रष्टाचार की पहचान करने और रोकने के लिए ग्रामसभा द्वारा नियमित रूप से सोशल ऑडिट की शुरुआत, अवधारणा और व्यवहार दोनों स्तरों पर एक नागरिक निगरानी है.
  • श्रमिकों के अधिकार एक क़ानूनी ढांचे के भीतर थे और इसने भारत के विकास, अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने में उन्हें अधिक बराबरी से हिस्सेदार बना दिया.
  • यह पहला क़ानून था जिसने अर्थव्यवस्था में मानवीय श्रम के योगदान को मान्यता दिलाई.
  • पहली बार ऐसा हुआ कि पंचायतों और ग्रामसभा को मिलने वाला फंड बढ़ाया गया.
  • मनरेगा का मकसद मांग के आधार पर काम की गारंटी और इसकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक लचीला बजट सुनिश्चित करना था. इसने भारत में पलायन की समस्या को संबोधित किया. यह अपना लक्ष्य निर्धारित करता था और जो लोग काम करने के इच्छुक हैं उन्हें न्यूनतम मज़दूरी के आधार पर रोज़गार की पेशकश करता था.

मंदी से उबारने में थी अहम भूमिका

राजनीतिक बराबरी अपर्याप्त है. आम्बेडकर ने लगातार कहा था कि आर्थिक सामाजिक बराबरी को हल करना बेहद ज़रूरी है.

मनरेगा को संविधान के अनुच्छेद-21 और सरकारी नीति के निर्देशक सिद्धांतों के आधार पर बनाया गया था. इसमें सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को साझा करने का खाका खींचा गया था.

सूखा, ग्रामीण संकट और व्यापक बेरोज़गारी को हल करने के लिए मनरेगा एक महत्वपूर्ण और टिकाऊ उपाय है, इसे अब हमारे राजनीतिक ‘राष्ट्रीय सर्वसम्मति’ का हिस्सा हो जाना चाहिए.

जब 2008 में वैश्विक आर्थिक संकट आया था, इसने भारत को आर्थिक मंदी से उबरने में मदद की.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था फली-फूली और बाज़ार मंदी का शिकार नहीं हुए. कोविड महामारी के दौरान जब रिवर्स पलायन हुआ, यही मनरेगा, घर लौटे करोड़ों श्रमिकों की लाइफ़लाइन बन गया जिसकी पहले खूब आलोचना हुई थी.

इसने एक अकल्पनीय भारी आर्थिक संकट का सामना, भली-भांति परीक्षण किए गए एक व्यवस्थित डिज़ाइन के साथ किया और अस्तित्व बचाने के लिए उपजी मांग को पूरा किया.

बदकिस्मती से सरकार ने ग़रीबी रेखा को नीचे लाने और मनरेगा को लागू करने में इस मौक़े को गंवा दिया.

भ्रष्टाचार के ख़त्म करने के नाम पर...

सरकार ने भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के नाम पर पूरे तंत्र को ही निष्क्रिय कर दिया-

  • देरी और इनकार ये एक तरीक़ा रहा है- लेकिन ग़रीबों को रोज़मर्रा के खर्च पूरे करने के लिए हर रोज़ काम करना होता है. भुगतान में देरी, श्रमिकों को इससे दूर कर उधर धकेलता है जहां मज़दूरी तुरंत मिलती है, भले ही ये न्यूतम मज़दूरी से कम हो.
  • भुगतान न देना, एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है- पश्चिम बंगाल में एक करोड़ मज़दूरों को एक साल से भुगतान नहीं दिया गया है. भारत सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार पर तथाकथित भारी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है. दुखद है कि सरकारी भ्रष्टाचार के लिए लोगों को दोहरी सज़ा दी जा रही है.
  • टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अधिकार देने से मना करने के लिए किया जा रहा है- हाज़िरी और मज़दूरी को सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह से अव्यवहारिक एनएमएमएस ऐप को अनिवार्य कर दिया गया है. सभी मनरेगा कार्यस्थलों पर सुपरवाइज़रों को अपने फ़ोन से हर दिन दो बार सभी वर्करों के फ़ोटो अपलोड करने होते हैं, जबकि उनमें से कई जगहों पर नेटवर्क या तो बहुत कमज़ोर होता है या होता ही नहीं. लाखों लोग अपनी मज़दूरी से महरूम हो गए क्योंकि उनका काम रिकॉर्ड नहीं हो पाया.
  • भारत सरकार के अपर्याप्त बजट ने 15 से अधिक राज्यों में मनरेगा को पंगु कर दिया है.
  • योजना को लागू करने, योजना बनाने में जन भागीदारी और प्रभावी सोशल ऑडिट में पारदर्शिता को सुनिश्चित करने में एजेंसियां फ़ेल हुई हैं.
  • प्रतिबद्ध प्रशासकों और ग्रामीण आधारभूत ढांचे को मज़बूत और विकसित करने के तंत्र के बावजूद, क़ानूनी दायरे में एजेंसियों की जवाबदेही तय करना लगभग असंभव बन गया है. एक तरह से अधिकार सम्मत फ़्रेमवर्क में यही संभावना भी है और चुनौती भी.

मनरेगा की दस ख़ास बातें

  • मनरेगा के ज़रिए काम का अधिकार का क़ानून अगस्त, 2005 में पारित हुआ था.
  • इस अधिनियम को सबसे पहली बार 1991में नरसिम्हा राव की सरकार में प्रस्तावित किया गया था.
  • मनरेगा को पहले भारत के 625 ज़िलों में लागू किया गया था.
  • साल 2008 में भारत के सभी ज़िलों में लागू कर दिया गया.
  • इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक परिवार के एक शख़्स को कम से कम 100 दिन तक रोज़गार देने का प्रावधान है.
  • मनरेगा योजना का क्रियान्वयन ग्राम पंचायत के अधीन होता है.
  • रोज़गार चाहने वाले को पांच किलोमीटर के दायरे में काम देते हैं और न्यूनतम मज़दूरी का भुगतान किया जाता है.
  • आवेदन के 15 दिनों के भीतर काम नहीं मिलने पर आवेदक को बेरोज़गारी भत्ता दिए जाने का प्रावधान भी है.
  • केंद्र सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक बीते दो फ़रवरी 2023 तक देश भर में 15,06,76,709 एक्टिव मज़दूर हैं. यानी जिन्हें इस वक़्त काम मिल रहा है.
  • वहीं देशभर में कुल रजिस्टर्ड मज़दूरों की संख्या 29,72,36,647 है.

बजट का टोटा

पीएम मोदी ने 2015 में कहा था कि मनरेगा, कांग्रेस की असफलता के एक जीते-जागते उदाहरण के रूप में जारी रहेगा. अकेले राजस्थान में 2020-21 के दौरान 74.3 लाख परिवारों के 1.08 करोड़ लोगों ने मनरेगा में काम किया था.

जब लाखों लोग अपने घर लौटे तो इसने बेरोज़गारी और भुखमरी के बीच एक बफ़र बनने का काम किया.

लेकिन भारत सरकार का रवैया ग़ैर जवाबदेही वाला रहा, उसने 2021-2022 वित्त वर्ष में मनरेगा के बजट आवंटन में 65 लाख करोड़ की कटौती कर दी.

मनरेगा एक अनोखा मांग आधारित क़ानूनी तंत्र है, जिस पर बजट की कमी से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए.

2023-2024 का केंद्रीय बजट मनरेगा के लिए एक आर्थिक धक्का था.

इस योजना के लिए सिर्फ़ 60 हज़ार करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जो कि मौजूदा वित्त वर्ष के संशोधित अनुमान 89 हज़ार 400 करोड़ रुपये से 32 फ़ीसदी कम था.

यही नहीं 2020-2021 में आवंटित एक लाख 11 हज़ार 500 करोड़ रुपये के बजट का यह लगभग आधा था.

हर साल भारत सरकार पर करोड़ों रुपये बकाया भुगतान बढ़ता जा रहा है.

बजटीय अनुमान और संशोधित अनुमान ने जानबूझ कर इस योजना के लिए पैसे की किल्लत पैदा कर दी है और करोड़ों ग़रीब मज़दूरों को समय से भुगतान से महरूम कर दिया है.

सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा- 'बंधुआ मज़दूरी' जैसा

इस भयावह हालात के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह ‘बंधुआ मज़दूरी’ से कम नहीं है और इसलिए यह संविधान के अनुच्छेद 23 का उल्लंघन है.

2008 से 2011 के बीच इस योजना के लिए सालाना आवंटन जीडीपी का 0.4 फ़ीसदी रहा.

इस योजना के लागू होने पर क़रीब से अध्ययन करने वाले अर्थशास्त्रियों और कार्यकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि ज़रूरत इस आवंटन से दोगुनी है, हालांकि फिर भी यह जीडीपी का एक मामूली हिस्सा ही है.

इस साल (2023) का 60 हज़ार करोड़ का बजट आवंटन जीडीपी का महज़ 0.2 फ़ीसदी है.

इसलिए, वास्तविक रूप से यह अभी तक सबसे कम मनरेगा आवंटन है. द पीपुल्स एक्शन फ़ॉर एम्प्लायमेंट गारंटी और नरेगा संघर्ष मोर्चा का अनुमान है कि इस समय सक्रिय जॉब कार्ड होल्डर के लिए औसतन 20 दिन से भी कम रोज़गार मिल रहा है.

सरकार ने दलील दी है कि मांग पूरी करने के लिए यह बजट पर्याप्त है और अगर ज़रूरत पड़ी तो संशोधित अनुमान में आवंटन को बढ़ा दिया जाएगा.

मनरेगा के कार्यान्वयन को अतीत में जाकर देखें तब समझ में आता है कि ये वायदे भी कितने खोखले हैं.

साझेदारी वाला लोकतंत्र 'डरावना' होता है क्योंकि यह अधिकार और जवाबदेही की मांग करता है और सरकार में नैतिक दरारों को उजागर करता है.

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