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मिड डे मील योजना भारत के लिए क्यों ज़रूरी है: नज़रिया
- Author, रीतिका खेड़ा
- पदनाम, आईआईएम अहमदाबाद
हाल ही में, मेरे एक सहकर्मी ने बताया कि अपने बच्चे के स्कूल के चयन में यह निर्णायक रहा कि स्कूल में खाना दिया जाता है कि नहीं.
न सिर्फ़ अपनी सुविधा के लिए (माँ-बाप दोनों काम करते हैं) लेकिन इसलिए भी कि घर से लाये गए टिफिन की बच्चे आपस में तुलना करने लगते हैं, जिसका बुरा असर पड़ता है.
स्कूल में मिड डे मील के दो ज़रूरी पहलू इससे सामने आते हैं.
पहला कि बच्चे को सुबह स्कूल भेजना एक किस्सा है - उठाना, तैयार करना और साथ ही, खिलाना और खाना देना.
स्कूल में यदि मिड डे मील मिले तो कामकाजी माँओं को कुछ राहत मिलती है.
गरीब घरों के कुछ बच्चे तो खाली पेट ही आते हैं, और स्कूल के बाद घर जाकर खाते हैं. जिस बच्चे के पेट में चूहे दौड़ रहे हों, क्या उस बच्चे के लिए मन लगा कर पढ़ाई करना मुमकिन है?
इस नज़रिये से देखें तो मिड डे मील योजना, शिक्षा का अभिन्न हिस्सा है. स्कूलों में नामांकन, उपस्थिति और पढ़ाई तीनों में मददगार है. पौष्टिक खाना मिले तो कुपोषण पर भी वार कर सकती है.
दूसरा, मिड डे मील स्कीम एक समाज की रचना में भी महत्वपूर्ण कदम है.
स्कूल में खाने का समय होता है, तो बच्चे पहले हाथ धोते हैं, थाली धोते हैं, लाइन से बैठते हैं (या लाइन बनाकर खाना लेने जाते हैं), एक साथ बैठकर खाते हैं - इन सभी का अपना महत्त्व है.
खाने से पहले हाथ धोना, स्वास्थ्य शिक्षा का एक सरल लेकिन ज़रूरी पाठ है. हर जाति-वर्ग के बच्चे, साथ बैठकर खाएंगे तो लोकतंत्र का अहम पाठ पाते हैं.
उपरोक्त गिनाई गयी खूबियों के अलावा, इस योजना की क्या भूमिका हो सकती है उसे समझने के लिए जापान के मिड डे मील स्कीम का यह वीडियो ज़रूर देखें.
आश्चर्य की बात यह है कि आज भी देश में इस योजना की उपयोगिता को लेकर सवाल हैं.
यह शायद इसलिए कि क्रियान्वयन में अंतर-राजीय रूप से काफ़ी अंतर है, और कई लोगों के दिमाग में मिड डे मील योजना को लेकर जो छवि है वह ख़बरों में कवरेज से बनती है.
मिड डे मील पर ख़बरें कब और क्यों?
पिछली बार जब राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया का ध्यान इस योजना पर गया (2013 में) तब बिहार में बच्चों की मौत हुई थी (स्कूल में रसोई घर और बर्तन न होने की वजह से खाद्य तेल को कीटनाशक की डिब्बी में भरकर लाया गया.)
रोज़ जो 10-12 करोड़ बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी खाना खाते हैं, उस पर न लोगों की नज़र जाती है, न पत्रकारों की.
मिड डे मील स्कीम कब और क्यों शुरू हुई
केंद्र की तरफ से यह योजना 1995 में शुरू हुई.
इससे पहले, पका हुआ भोजन देने में तमिलनाडु सबसे आगे रहा - तब के वहां के मुख्यमंत्री MGR, जगहसाई और निंदा के बावजूद डटे रहे और सब अड़चनों को सुलझाने पर ध्यान दिया.
इसके साथ ही गुजरात, और कुछ अन्य राज्यों (मध्य प्रदेश, ओडिशा शामिल हैं) के कुछ हिस्सों में पका हुआ भोजन दिया जाता है.
केंद्र की पके हुए खाने की योजना के बजाय कई राज्य बच्चों को सूखा अनाज दे दिया करते.
लेकिन 2001 में सर्वोच्च न्यायलय के हस्तक्षेप के बाद, सभी राज्यों में हड़बड़ी मच गयी.
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि अगले वर्ष स्कूल खुलने तक सबको पका हुआ खाना देना होगा.
वह ऐसा समय था जब सर्वोच्च न्यायलय के आदेश के उल्लंघन से प्रशासन डरता थे. (पिछले कुछ सालों से तुलना कीजिये; सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का - कि बच्चों को आधार की वजह से किसी लाभ से वंचित नहीं रखा जा सकता - न सिर्फ अंतरिम आदेश, आखिरी निर्णय का भी खुलेआम उल्लंघन है - इस हद तक, कि आज अब "खबर" लायक भी नहीं.)
सर्वोच्च न्यायलय के आदेश के पालन के लिए कई राज्यों ने हड़बडी में किसी भी तरह मिड डे मील स्कीम देना शुरू किया.
इसका मतलब यह था कि रसोई, बर्तन, रसोइया, इत्यादि व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया गया और जैसे-के-तैसे बच्चों को खाने के लिए कुछ न कुछ दिया जाने लगा.
उस समय मैंने राजस्थान में एक छोटा सा सर्वे किया.
राज्य सरकार बिलकुल तैयार नहीं थी - मास्टर और बच्चे खुद मिलकर घूघरी (उबाला हुआ गेहूं, नमक या चीनी के साथ) पकाने में लग गए. इससे राज्य सरकार पर दबाव बना, तो धीरे-धीरे व्यवस्था बैठायी गई.
रसोइया और हेल्पर की नियुक्ति, बर्तन की खरीद, और बाद में केंद्र सरकार की मदद से रसोई का निर्माण, पीने के पानी की व्यवस्था. कुछ राज्यों में लागू करते करते (जैसे बिहार), 1-2 साल बीत गए.
मिड डे मील स्कीम को लागू करना पहली पीढ़ी का मुख्य मुद्दा रहा.
नियमित रूप से बच्चों को खाना मिले, खाना पकाने के लिए सही व्यवस्था हो इस पर 2002 से लेकर 2010 तक काफी विकास हुआ.
लगभग सभी सरकारी स्कूलों में यह सब सुविधाएं होने लगी और यदि कभी कहीं भोजन नहीं दिया जाता, तो यह "खबर" बनने लगी.
दूसरे दशक के मुद्दे
अगली पीढ़ी या योजना के दूसरे दशक का, एक बड़ा मुद्दा है भोजन की पौष्टिकता.
हाल ही में उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर से आयी रोटी और नमक देने की ख़बर को इस सन्दर्भ में देखना ज़रूरी है.
आज यह मुद्दा इसलिए बना है क्योंकि नियमानुसार, बच्चों के मेनू में दाल मिलनी चाहिए थी.
मेनू का पालन न करना आम बात हो शायद, लेकिन इस हद तक की बच्चों को केवल नमक ही दिया जाए - इस तरह का उल्लंघन कम ही होता है.
इस सन्दर्भ में यह कहना ज़रूरी है कि देश के अलग राज्यों में स्थिति एक समान नहीं है. कुछ राज्य पहले से ही आगे थे. तमिलनाडु के अलावा आंध्र प्रदेश और केरल में योजना की स्थिति अच्छी रही है.
पिछले एक दशक में ओडिशा में कई सराहनीय पहलें हुई हैं. उदाहरण के लिए, गरीब राज्यों में गिनती के बावजूद, ओडिशा राज्य सरकार मिड डे मील में हफ्ते में दो दिन अंडा देती है.
उत्तर भारत के कई राज्य आज भी मिड डे मील स्कीम के क्रियान्वयन में पिछड़े रहे हैं. उदाहरण के लिए, जबकि दक्षिण और पूर्व के ज़्यादातर राज्यों में मिड डे मील के मेनू में अंडे के साथ साथ अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ दिए जाते हैं, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में आज भी अंडे के नाम पर बेतुकी राजनीति चल पड़ती हैं.
अंडे पौष्टिकता के हिसाब से तो ज़रूरी हैं ही, इन्हे ग्रामीण क्षेत्रों में देना व्यावहारिक भी है. प्रोटीन अन्य के स्रोतों (जैसे कि दाल और दूध) से यह बेहतर हैं, गर्मी में दूध की तरह आसानी से खराब भी नहीं होते और दूध-दाल की तरह इन्हे पानी घोलकर पतला भी नहीं किया जा सकता.
अंडे पर कई लोग ऐतराज़ करते हैं कि बहुत बच्चे शाकाहारी हैं; भले हों, लेकिन बाकी जो नहीं हैं, कम से कम उन्हें तो अंडा मिलना चाहिए? जिस तरह स्कूल में ज़बरदस्ती अंडा देने की नीति नहीं लायी जा सकती, वैसे ही जो खाते हैं, उनको रोका भी नहीं जाना चाहिए.
कुछ दिन पहले ग्रामीण बंगलुरु की कुछ आंगनवाड़ियों में मैंने पाया कि शाकाहारी घरों की मायें आंगनवाड़ी टीचर से आग्रह करती हैं कि उनके बच्चे को अंडा खिलाएं क्योंकि वे (मायें) घर पर नहीं खिला सकती.
इससे उम्मीद बनती है कि जागरूकता आने से, अंडे पर बेतुकी राजनीति करना मुमकिन नहीं रहेगा.
उत्तर प्रदेश में नमक-रोटी
पोषण का सवाल भ्रष्टाचार से भी जुड़ा है. पहले दशक में न राज्य सकारें, न केंद्र सरकारें मध्यान्न भोजन पर पैसा खर्च करने को राज़ी थी. समय के चलते, लोगों के दबाव और इसकी लोकप्रियता के कारण, मध्यान्न भोजन के लिए राशि को बढ़ाया गया. बिहार और ओडिशा में अंडा देने की नीति इसी का नतीजा है.
कुछ राज्यों में जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी की वजह से, कुछ लोग बच्चों के हिस्से को भी खाने में लगे हैं. मिर्ज़ापुर का किस्सा इस मुद्दे को उजागर करती है.
मिर्ज़ापुर में भ्रष्टाचार तो मुद्दा है ही, प्रशासनिक प्रतिक्रिया शायद उससे भी बड़ा मुद्दा है. जब पत्रकार ने खबर बनायी, तो पहले जिला प्रशासन ने माना कि गलती हुई है और जांच भी की. लेकिन कुछ दिनों बाद, पत्रकार पर आरोप लगाकर प्राथमिकी दर्ज की गयी है.
पत्रकार पवन जयसवाल ने बार-बार कहा है कि वह केवल अपना काम कर रहा है. आज उत्तर प्रदेश में प्रतिकूल खबर देना गुनाह बन गया.
जब समाज में कुछ गलत हो रहा है तब मीडिया की ज़िम्मेदारी और फ़र्ज़ है कि उसे उजागर करे. एक तरह से देखा जाए तो पत्रकार प्रशासन का काम आसान करते हैं.
भ्रमण किये बग़ैर, ऑफिस में बैठे-बैठे अधिकारी को जानकारी मिल सकती है. लेकिन यह सब तब, जब प्रशासन में सुधार लाने की मंशा हो.
एक पत्रकार को प्राथमिकी से धमकाने से कई पत्रकार, सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाने से पहले दो बार सोचेंगे. यदि ऐसा हुआ, तो हमारे लोकतंत्र के खोखला होने का डर है. मिर्ज़ापुर, लखनऊ और उत्तर प्रदेश के पत्रकारों को एक अभियान के रूप में कुछ दिनों तक केवल माध्यन्न भोजन को कवर करना चाहिए.
इससे प्रशासन को एक सन्देश जाएगा कि पत्रकार डरेंगे नहीं, और दूसरा, उत्तर प्रदेश में मध्यान्न भोजन योजना की सच्चाई भी लोगों और सरकार के सामने आएगी जिससे इसमें सुधार भी लाया जा सकता है.
(लेखिका भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद में एसोशिएट प्रोफ़ेसर हैं और ये उनके निजी विचार हैं)
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