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यूपी में किस हाल में है मिड डे मील योजना?
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
मध्याह्न भोजन योजना यानी मिड डे मील शायद उन योजनाओं में सबसे ऊपर हो जो अक़्सर अपनी उपलब्धियों को लेकर नहीं बल्कि ख़ामियों और भ्रष्टाचार की वजह से चर्चित रहती है.
चाहे खाने की गुणवत्ता का सवाल हो, खाना बनाने में लापरवाही और भ्रष्टाचार का मामला हो या फिर खाना खाते समय छात्रों के साथ सामाजिक भेदभाव का, आए दिन ऐसी ख़बरें आती रहती हैं.
पिछले महीने बलिया ज़िले में कथित तौर पर दलित छात्रों को अलग खाना परोसने की ख़बर आई तो मिर्ज़ापुर में छात्रों को पौष्टिक भोजन के नाम पर सिर्फ़ नमक और रोटी खाने को दिया गया.
बलिया में तो ज़िलाधिकारी ने मौक़े पर पहुंचकर ख़बर को निराधार बताते हुए कुछ विरोधी नेताओं को ही आड़े हाथों लिया, वहीं मिर्ज़ापुर में अधिकारियों ने चार दिन बाद उसी पत्रकार के ख़िलाफ़ सरकारी काम में बाधा पहुंचाने का आरोप लगाते हुए क़ानूनी कठघरे में खड़ा कर दिया जिसने छात्रों को नमक रोटी देने की ख़बर दिखाई थी.
मध्याह्न भोजन योजना भारत सरकार और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयास से संचालित योजना है जिसे 15 अगस्त 1995 में लागू किया गया था. पहले इस योजना के तहत बच्चों के अभिभावकों को अनाज उपलब्ध कराया जाता था लेकिन साल 2004 से सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश के मुताबिक पका-पकाया भोजन प्राथमिक विद्यालयों में उपलब्ध कराने की योजना शुरू की गई.
मिड डे मील देने वाले स्कूलों में सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों के अलावा मदरसे भी शामिल हैं.
सरकारी आंकड़े और खाने का मेन्यू
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में क़रीब 1,68,768 विद्यालय ऐसे हैं जहां बच्चों को मिड डे मील दिया जाता है जिसके माध्यम से इन स्कूलों में एक करोड़ 80 लाख से ज़्यादा बच्चों को पौष्टिक भोजन मुहैया कराया जाता है.
सप्ताह के हर दिन बच्चों को खाने में क्या दिया जाएगा, इसका बाक़ायदा मेन्यू तैयार है जिसे हर स्कूल में अनिवार्य रूप से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखाया जाता है.
भोजन बनाने के लिए रसोइए रखे गए हैं जो गैस चूल्हे पर भोजन बनाते हैं. लेकिन आए दिन इसमें तमाम तरह की अनियमितता की ख़बरें राज्य के हर कोने से आती रहती हैं.
पिछले दिनों संभल में अभिभावकों ने इसलिए हंगामा कर दिया कि बच्चों को ख़राब खाना मिल रहा है. अभिभावकों का कहना था कि मिड डे मील में बासी खिचड़ी और सड़े केले दिए जाते हैं जबकि दूध के नाम पर तो सिर्फ़ खानापूर्ति की जाती है.
यह स्थिति तब है जब सरकार हज़ारों करोड़ रुपये इस योजना पर न सिर्फ़ ख़र्च कर रही है बल्कि मॉनीटरिंग और क्रियान्वयन के लिए वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के नेतृत्व में एक प्राधिकरण का गठन किया हुआ है. इसके अलावा सोशल ऑडिटिंग की भी व्यवस्था लागू है.
कहां है चूक?
इतनी सारी क़वायद के बावजूद यह योजना फलीभूत क्यों नहीं हो पा रही है, वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं, "यदि हम यूपी की बात करें तो शहरों में तो ये योजना ठीक काम कर रही है क्योंकि वहां इसकी मॉनीटरिंग भी ठीक होती है और कई स्तर के अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों की निग़ाह पड़ती रहती है.''
सिद्धार्थ कालहंस कहते हैं, ''गांवों में ये योजना बिल्कुल भगवान भरोसे है. उसकी वजह ये है कि वहां न तो सही समय पर सामान पहुंच पाता है और न ही समय पर भुगतान हो पाता है. इसके अलावा ग्राम प्रधान, प्रधानाध्यापक और रसोइए की तिकड़ी भी इसके ठीक से लागू न हो पाने के लिए काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार है."
सिद्धार्थ कलहंस ये भी कहते हैं कि लखनऊ, मथुरा जैसे कुछ शहरों में अक्षयपात्र जैसी संस्थाओं के हवाले इस योजना को करने के कारण उसका क्रियान्वयन कहीं ज़्यादा बेहतर हुआ है लेकिन ऐसे स्कूलों की संख्या दो-चार प्रतिशत से ज़्यादा नहीं है.
दरअसल, गांवों में यह व्यवस्था मुख्य रूप से गांव के प्रधान और स्कूल के अध्यापक के विवेक पर चलती है. वहीं शहरी क्षेत्रों में इसकी मॉनीटरिंग अपेक्षाकृत अधिक तत्परता के साथ होती है, इसलिए आमतौर पर शिकायतें ग्रामीण क्षेत्रों से ही ज्यादा आती हैं.
मिड डे मील के लिए फ्लाइंग स्क्वैड
सरकार ने योजना की निगरानी यानी मॉनीटरिंग के लिए साल 2010 से आईवीआरएस आधारित प्रणाली को लागू किया है.
मिड डे मील प्राधिकरण के निदेशक विजय किरण आनंद बताते हैं, "इस प्रणाली के तहत प्रत्येक विद्यालय दिवस में विद्यालय के प्रधानाध्यापक, अध्यापक अथवा शिक्षामित्र के मोबाइल नंबर पर स्व-संचालित कॉल की जाती है, जिसके उत्तर अध्यापक भोजन ग्रहण करने वाले बच्चों की संख्या अपने मोबाइल फ़ोन के बटनों पर अंकित नंबरों के माध्यम से अंकित की जाती है. इस प्रकार केंद्रीकृत सर्वर पर भोजन ग्रहण करने वाले बच्चों की संख्या एवं भोजन न बनाने वाले विद्यालयों की संख्या दैनिक स्तर पर अंकित हो जाती है."
इसके अलावा भी व्यवस्था पर निगरानी के लिए कई और तंत्र विकसित किए गए हैं. साथ ही उच्चाधिकारियों से भी नियमित तौर पर स्कूलों की जांच और मिड डे मील की गुणवत्ता को परखने की ज़िम्मेदारी दी गई है.
उत्तर प्रदेश में हाल ही में नए बेसिक शिक्षा मंत्री के रूप में कार्यभार ग्रहण करने वाले सतीश द्विवेदी कहते हैं कि मिड डे मील की निगरानी के लिए एक ख़ास दस्ते यानी फ़्लाइंग स्क्वैड का गठन किया जा रहा है.
बीबीसी से बातचीत में सतीश द्विवेदी कहते हैं, "मंडल स्तर पर यह दस्ता काम करेगा और किसी भी स्कूल में अचानक पहुंच कर मिड डे मील का निरीक्षण कर सकेंगे और सीधे शासन को रिपोर्ट करेंगे. उन्हें इसके लिए किसी की अनुमति नहीं लेनी होगी. उनकी रिपोर्ट में जो भी ज़िम्मेदार पाया जाएगा, चाहे वो स्कूल के कर्मचारी या ग्राम प्रधान हों या फिर ज़िला स्तर के अधिकारी, उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी."
जानकारों का ये भी कहना है कि मिड डे मील का बजट इतना ज़्यादा नहीं है कि तय मानकों के अनुसार बच्चों को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराया जा सके, दूसरे उसमें भी नीचे से ऊपर तक बचा लेने की आकांक्षा भी इस योजना को भलीभूत नहीं होने दे रही है. इन सबके बावजूद, मॉनीटरिंग की नई व्यवस्था कितनी कारगर होती है, ये देखने वाली बात होगी.
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