मनरेगा: 'इसके भरोसे ही घर चल रहा है, अगर ये भी नहीं रहा तो तो पता नहीं...'

    • Author, आनंद दत्त
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

सबसे पहले जानते हैं मनरेगा (MGNREGA) क्या है?

  • मनरेगा के ज़रिए काम का अधिकार का क़ानून अगस्त, 2005 में पारित हुआ था. भारत में ये योजना अप्रैल 2008 से लागू.
  • इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक परिवार के एक शख़्स को 100 दिन तक रोज़गार देने का प्रावधान है.
  • मनरेगा योजना का क्रियान्वन ग्राम पंचायत के अधीन होता है.
  • रोज़गार चाहने वाले को पांच किलोमीटर के दायरे में काम देते हैं और न्यूनतम मज़दूरी का भुगतान किया जाता है.
  • आवेदन के 15 दिनों के भीतर काम नहीं मिलने पर आवेदक को बेरोज़गारी भत्ता दिए जाने का प्रावधान भी है.

झारखंड के लातेहार ज़िले के बनारसी नगेसिया चार एकड़ ज़मीन के मालिक थे. साल 2018 में पत्नी बीमार पड़ी तो तीन एकड़ ज़मीन को गिरवी रखना पड़ा. बदले में उन्हें 30 हज़ार रुपया मिला. इस ज़मीन को छुड़ाने के लिए पैसों का इंतज़ाम नहीं हुआ तो वह केरल चले गए. वहां अनानास के खेत में मज़दूरी करने लगे.

बनारसी नगेसिया को लॉकडाउन में घर वापस आना पड़ा. यहां मनरेगा में ही कई महीनों तक वह मज़दूरी करते रहे और अपना घर किसी तरह चला पाए. यही उनका सहारा बना. हालांकि, बीते दो सालों से उन्हें मनरेगा में भी मज़दूरी नहीं मिली है.

बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "मनरेगा में कभी एक महीने तो कभी दो महीने देरी से पैसा मिलता है. इसलिए यहां काम छोड़ना पड़ा. तब से आज तक हम अपनी ज़मीन नहीं छुड़ा पाए हैं. हफ्ते में एकाध दिन मज़दूरी मिल जाती है, जिससे किसी तरह घर चल रहा है."

झारखंड के ही लातेहार ज़िले के चंपा पंचायत की गुलाब देवी को मनरेगा के तहत लगातार काम मिल रहा है. इन पैसों से उनकी एक बेटी और एक बेटा स्कूल में पढ़ रहा है. बीते 2 फरवरी को वह महुआडांर प्रखंड स्थित बैंक से अपना पैसा निकालने आई थीं. वो कहती हैं, "पैसा भले ही देरी से आता है, लेकिन इसके भरोसे ही घर चल रहा है. अगर ये भी नहीं रहा तो तो पता नहीं बच्चे कैसे पढ़ेंगे,घर कैसे चलाएंगे."

मनरेगा बजट में कटौती

अब देशभर में इन जैसे मज़दूरों पर संकट बढ़ने की आशंका है. इस साल अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) के लिए वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए कुल 60,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है.

यह पिछले वित्तीय वर्ष यानी 2022-23 के संशोधित बजट 89,000 करोड़ रुपए से करीब 34 फीसदी कम है. हालांकि यह पहली बार नहीं है, लगातार तीसरे साल मनरेगा के बजट में कटौती की गई है. इससे पहले वित्तीय वर्ष 2022-23 में 25.5 फीसदी, 2021-22 में 34 फीसदी कटौती की गई थी.

यह भी तब हो रहा है, कभी मनरेगा को असफलता का स्मारक बताने वाले पीएम मोदी जब खुद कह चुके हैं कि कोविड महामारी के दौरान ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बनाए रखने में मनरेगा का महत्वपूर्ण योगदान रहा.

जानकार बताते हैं कि बजट में कटौती का मतलब साफ है श्रम दिवस कम होंगे और मज़दूरों के रोज़गार के अवसरों में कमी आएगी. हालांकि भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट के बाद अपने मीडिया इंटरव्यू में कहा है, "मनरेगा मांग आधारित योजना है. मांग के आधार पर बजट आवंटन को बढ़ाना संभव है. राज्य से अगर और मांग आयी तो हम संसद से सप्लीमेंटरी डिमांड कर सकते हैं."

उनके इस तर्क में दम ज़रूर दिखता है. पिछले साल के बजट के दौरान योजना के लिए 73 हज़ार करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे जिसे बाद में संशोधित करके 89,400 करोड़ किया गया. लेकिन वास्तविकता में 98,468 करोड़ रुपये ख़र्च किए गए.

लेकिन मनरेगा को लेकर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि एक साल की मज़दूरी दूसरे साल में जाने से ये ख़र्च बढ़ता है. इसका मांग से कोई सीधा संबंध नहीं है.

वहीं आईआईटी दिल्ली में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर रितिका खेड़ा ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "हर साल जिस बजट की घोषणा होती है, उसका अधिकांश हिस्सा पिछले साल की मज़दूरी में ख़र्च होती है. वित्तीय साल में अक्टूबर आते आते तक पैसा ख़त्म हो जाता है. सरकार कहती है कि हम मांग के मुताबिक बजट बढ़ा सकते हैं लेकिन इतना नहीं किया जाता है जिससे हर साल का ख़र्च पूरा किया जा सके."

क्यों ज़रूरी है मनरेगा

झारखंड के पाकुड़ ज़िले का झेनागड़िया वो गांव है, जहां साल 2006 में नरेगा (तत्कालीन नाम) के तहत पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत के लिए इसका चयन किया गया था.

गांव के जावेद अली उस वक्त नरेगा मज़दूरों के नेता बनाए गए थे. वो बताते हैं, "झेनागड़िया में पांच तालाब, 12 चेकडैम बनाए गए. इन चेकडैम और तालाब के आसपास लगभग 1500 बीघा खेत हैं. परिवर्तन का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि साल 2009 के बाद हम लोगों ने चावल और आटा खरीदा नहीं है. जबकि 2007 से पहले हमने कभी गेहूं की खेती नहीं की थी. क्योंकि पानी का साधन ही नहीं था."

चार साल पहले उन्होंने अपनी बेटी रजीना बीबी की शादी की है. रजीना भी मनरेगा में मज़दूरी कर चुकी हैं. जावेद अली ने उन्हें ससुराल भेजते वक्त 16 हज़ार रुपए का पलंग, 12 हज़ार रुपए की अलमारी के अलावा 20 हज़ार रुपए नकद भी विदाई के वक्त दिए थे.

झारखंड के ही चाईबासा ज़िले के सोनुआ प्रखंड के दोराई हेम्ब्रम मनरेगा मज़दूर हैं. उन्हें 14 दिन का पैसा नहीं मिला है. वो कहते हैं, "मेरे तीन बच्चे हैं. तीनों ही पढ़ाई करते हैं, लेकिन कुछ दिनों से वह ट्यूशन नहीं जा पा रहे हैं. क्योंकि उन्होंने फीस नहीं जमा किया है."

आगे की बातचीत में वो बताते हैं, "मनरेगा में पैसा कम हुआ है, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है. लेकिन अगर उन्हें काम नहीं मिला तो बच्चों को लेकर विदेश चले जाएंगे." यहां विदेश से उनका मतलब किसी दूसरे राज्य से है.

क्यों हुई कटौती

ऐसे में सवाल उठता है कि मज़दूरों का सबसे बड़ा सहारा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने के दावों के बीच आखिर मनरेगा मद में पैसे की कटौती क्यों की गई?

मनरेगा के प्रारूप को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नरेगा संघर्ष समिति से जुड़े निखिल डे इस पर विस्तार से बात करते हैं.

वो कहते हैं, "सरकार ने ऐसा निर्णय क्यों लिया, यह समझ से परे है. ये अमीर वर्ग को और देना चाह रहे हैं. ये चुनावी वर्ष है यदि सरकार राशन और मनरेगा का पैसा काट रही है, तब तो ये साफ़ है कि उन्हें परवाह वोटों की भी नहीं है."

वो कहते हैं, "ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बनाए रखने और मज़बूत करने में मनरेगा सबसे बड़ा इनपुट है. क्योंकि कोई परिवार सब्ज़ी लेता है, कोई दवा लेता है, कोई कुछ और खरीदता है, इससे बाजार में मल्टीप्लायर इफैक्ट होता है. उन इलाकों में कभी किसी सरकार ने इंडस्ट्री नहीं खड़ी की है. मनरेगा से ही ग्रामीण इलाकों में बाज़ार चलता है. पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी हो या कोविड का दौर, मनरेगा ने ही बचाया. इस बात को सभी बड़े अर्थशास्त्रियों ने भी माना."

वहीं प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ कहते हैं, "बजट फिर से मनरेगा, राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम, बाल पोषण योजनाओं और मातृत्व लाभ जैसी महत्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को कमज़ोर कर रहा है. इन सभी योजनाओं के आवंटन में वास्तविक रूप से गिरावट आई है. सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात के रूप में, इन योजनाओं पर संयुक्त व्यय पिछले 18 वर्षों में सबसे कम है."

रितिका खेड़ा कहती हैं, "अचरज यह है कि 2014 से 2018 तक मोदी सरकार ने मनरेगा का बजट बढ़ाया लेकिन दूसरे कार्यकाल में लगातार कटौती हो रही है. यह एक तरह से इस योजना को ख़त्म करने की स्थिति पैदा करने जैसी है. जो लोग रोज़ कमाते हैं और खाते हैं, उनका पैसा बक़ाया रखने से क्या स्थिति होगी, ये लोग खुद ही ऊब जाएंगे और इसमें काम नहीं तलाशेंगे."

आंकड़ों में मनरेगा मज़दूर

केंद्र सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक बीते 2 फरवरी 2023 तक देश भर में 15,06,76,709 एक्टिव मज़दूर हैं. यानी जिन्हें इस वक्त काम मिल रहा है.

वहीं देशभर में कुल रजिस्टर्ड मज़दूरों की संख्या 29,72,36,647 है.

जहां तक मज़दूरी मिलने की बात है, हरियाणा में सबसे अधिक 331 रुपए प्रतिदिन के लिहाज़ से दिया जाता है.

वहीं छत्तीसगढ़ में सबसे कम 204 रुपए दिए जाते हैं. झारखंड में 201 रुपए मज़दूरी है. लेकिन राज्य सरकार अपनी तरफ से 27 रुपया और दे रही है.

ओडिशा में 222 रुपये मज़दूरी है. वहां राज्य सरकार 104 रुपया अधिक मिलाकर दे रही है.

क्या पड़ेगा प्रभाव

मनरेगा का बजट कम होने से ज़ाहिर है लोगों को काम कम मिलेगा.

मनरेगा वाच नामक संस्था के संयोजक झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज कहते हैं, "पहले ही मनरेगा के तहत 45 प्रतिशत लोगों को ही काम मुहैया हो पा रहा है. यही नहीं, हाल ही में यूएन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के 50 प्रतिशत आदिवासी भुखमरी की कगार पर हैं. इस कटौती का असर सबसे अधिक आदिवासी बहुल राज्यों पर पड़ने वाला है. झारखंड में तो सुखाड़ (योजना) घोषित हो चुका है."

वो आगे कहते हैं, "दूसरा प्रभाव पलायन पर पड़ेगा. पहले के मुकाबले यह और बढ़ेगा, जिससे शहरों में सस्ता श्रम और आसानी से उपलब्ध हो सकेगा. यह सीधे तौर पर उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाएगा."

निखिल डे इसे अलग तरीके से समझाते हैं. "वो कहते हैं, जनवरी 2023 तक 16 हज़ार करोड़ रुपया बकाया है. मार्च आते-आते इसके 25,000 करोड़ तक हो जाने की संभावना है. यह पैसा केंद्र सरकार नई घोषणा यानी 60 हज़ार करोड़ रुपए से ही राज्यों को देगी."

इस लिहाज़ से देखें तो पिछले बकाये की वजह से नए वित्तीय वर्ष यानी 2023-24 के खाते में 35,000 हज़ार करोड़ ही बच रहे हैं.

साल 2022-23 में अब तक प्रति परिवार 42.85 दिन ही काम मिले हैं जबकि अधिनियम 100 दिन काम देने का वादा करती है. निखिल के मुताबिक, अगर इस बजट में कुछ और पैसा नहीं जोड़ा गया, तो इस वित्तीय वर्ष यानी 2023-24 में बमुश्किल 20 दिन ही काम मिल पाएगा.

केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते इससे इत्तेफाक नहीं रखते हैं. बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "देखिये डिमांड आधारित योजना है. इसका बजट से कोई लेना देना नहीं है. जैसे-जैसे डिमांड बढ़ेगी, पैसा बढ़ाया जाएगा."

हालांकि उन्होंने पिछला बकाया और बंगाल को बीते एक साल से पैसे न मिलने के सवाल पर कोई जवाब नहीं दिया.

इससे कितने लोग प्रभावित होंगे?

मनरेगा के तहत 262 स्कीमों की लिस्ट बनाई गई है. राज्य सरकार इन 262 में से अपने हिसाब से तय करती है कि हमारे राज्य में मनरेगा के तहत क्या काम कराने हैं. राज्य सरकार के निर्धारण के बाद ग्रामसभा में तय होता कि किस पंचायत में क्या काम होना है.

मनरेगा के तहत इस वक्त देभभर में 15 करोड़ से अधिक परिवार रजिस्टर्ड हैं. अगर प्रति मज़दूर तीन सदस्यों के पालन पोषण की ज़िम्मेदारी मानी जाए, तो सीधे तौर पर 45 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित होने जा रहे हैं.

यानी रूरल इकोनॉमी को धक्का लगेगा. बहुत बड़ा गरीब मज़दूर वर्ग और कर्ज़ में डूबेगा और बहुत परेशानी झेलेगा

इस योजना को ग्रामीण भारत की गरीबी को खत्म करने के उपाय के तौर पर भी देखा गया. आर्थिक सर्वेक्षण 2022-23 में केंद्र सरकार ने माना है कि मनरेगा ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्यक्ष तौर पर रोज़गार प्रदान कर रही है और अप्रत्यक्ष तौर पर ग्रामीण परिवारों को अपनी आय के स्रोतों में बदलाव लाने में मदद कर रही है.

कटौती की हो रही आलोचना

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार के इस कदम की आलोचना की है. उन्होंने धमकी भरे लहजे में कहा है, केंद्र सरकार ने अगर 100 दिनों की काम की योजना के लिए पैसे नहीं दिए तो उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस बड़े पैमाने पर आंदोलन करेगी.

झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने कहा था कि उम्मीद थी कि स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार जो कि कोरोना महामारी के समय सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे, उसको लेकर विशेष प्रबंध किये जाएंगे लेकिन, आशा के विपरीत शिक्षा, स्वास्थ्य एवं ग्रामीण भारत की जीवन रेखा मनरेगा के बजट में कटौती की गई है.

वहीं सीपीएम के नेता सीताराम येचुरी ने ट्वीट कर कहा है कि 'मनरेगा, सामाजिक सुरक्षा पेंशन, बाल पोषण कार्यक्रम और मातृत्व लाभ कार्यक्रम के आवंटन में कमी भारत को 20 साल पीछे ले जा रही है. यह हानिकारक है. मोदी का जुमलानॉमिक्स भारत को नई गहराइयों तक ले जा रहा है.'

वहीं इस योजना पर काम करने वाले जानकार जेम्स हेरेंज के मुताबिक, 'सरकार बजट कटौती करके योजना को आगे चल कर बंद करने की पृष्ठभूमि तैयार कर रही है. इस योजना के तहत अब सब मजदूरों का अटेंडेंस अनिवार्य कर दिया गया है. लेकिन जिस ऐप में ये दर्ज किया जाना है, उसमें कई तकनीकी दिक्कतें हैं.'

ना मज़दूरों के पास स्मार्टफोन हैं. ना तकनीक का ज्ञान, ना ही समुचित प्रशिक्षण.

सर्वर की खराबी और इंटरनेट ब्लैकआउट इस समस्या को कई गुना बढ़ा रहे हैं.

ऐसे में पूरी सम्भावना है कि मनरेगा में मानव दिवस में गिरावट आएगी और केंद्र सरकार को मनरेगा बजट आकार को घटाने का बहाना मिल जाएगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)