घर के काम की ज़िम्मेदारी महिलाओं पर ही क्यों?

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प्रियंका रोज़ बुलंदशहर के काकोड़ से क़रीब 50 किलोमीटर दूर ग्रेटर नोएडा की सोसाइटी के घरों में खाना बनाने का काम करने आती हैं.
इसके लिए उन्हें रोज़ सुबह 4.30 बजे उठ कर घर के काम निपटाने पड़ते हैं लेकिन इसमें उन्हें पति से कोई मदद नहीं मिलती है.
प्रियंका के पति भी उनकी तरह ही असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं.
प्रियंका के पति को महीने में सत्रह-अठारह दिन ही काम मिल पाता है यही वजह है कि उन्हें भी काम पर आना पड़ता है. अब स्थिति ये है कि उनकी कमाई पति के बराबर हो गई है.
कमाई के मामले में प्रियंका भले ही पति के बराबर आ गई हों पर घर के सभी काम आज भी उन्हें ही करने पड़ते हैं.
बीबीसी की सहयोगी अंजलि दास से प्रियंका मिश्रित ब्रजभाषा में कहती हैं, "सुबह उठ कर घर का काम करती हूं, खाना बनाती हूं. बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजती हूं. फिर मैं अपने काम पर निकलती हूं. रोज़ काम पर आने जाने में ढाई घंटे से अधिक लगते हैं. थक कर घर पहुंचती हूं. लेकिन बच्चों के लिए खाना बनाने से लेकर अन्य सभी काम ख़ुद ही करती हूं. पति से कोई मदद नहीं मिलती "
ये कहानी केवल प्रियंका की नहीं है. शीला रानी दिल्ली से सटे गुरुग्राम में रहती है.

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वे एक निजी कंपनी में काम करती हैं. कोरोना के दौरान उनके पति की नौकरी छूट गई, तमाम कोशिशों के बाद सफलता नहीं मिली और अब वे घर पर रहते हैं.
लेकिन शीला का बोझ दोगुना हो गया है.
वे कहती हैं, ''मैं घर का भी काम करती हूं और नौकरी भी. मेरे पति मेरी घर के काम में कोई मदद नहीं करते हैं.''
घर के कामों का असमान बँटवारा

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जब हम भारत में घरेलू काम को लेकर पति-पत्नी के काम की स्थिति को देखते हैं, तो यही परिदृश्य कमोबेश ज़्यादातर घरों में दिखता है, जहां पुरुषों की तुलना में महिलाएं कहीं अधिक घर के काम करती हैं.
रोज़मर्रा के जीवन में कुछ ऐसे भी काम हैं जिनकी ग़िनती तो एक काम के रूप में होती है पर उन्हें पूरे दिन बार-बार करते रहना पड़ता है.
द टाइम यूज़ सर्वे 2019 (नेशनल सैंपल सर्वे) में ये सामने आया कि भारतीय महिलाएं हर दिन पुरुषों के मुक़ाबले तीन गुना घर का काम करती हैं.

इतना ही नहीं घर के सदस्यों से वे भावनात्मक रूप से भी अधिक जुड़ी होती हैं. वो पुरुषों के मुक़ाबले घर के सदस्य का ख़्याल रखने में दोगुना समय देती हैं.
यानी जब बात घर के कामकाज़ की ज़िम्मेदारी की आती है तो पुरुषों के मुकाबले महिलाएं इसे लेकर न केवल अधिक सोचती हैं बल्कि भावात्मक रूप से भी अधिक मेहनत करती हैं.
आखिर ऐसा क्यों है और क्या हम इसे लेकर कुछ कर सकते हैं?
छिपे हुए और कभी न ख़त्म होने वाले काम

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घर में कितने छिपे हुए काम हैं, इसे माप पाना मुश्किल है क्योंकि ये एक तरह से अदृश्य होते हैं और इन्हें अन्य कामों के साथ-साथ ही किए जाने की ज़रूरत होती है.
ऐसे में इनकी स्पष्ट पहचान और मुख्य काम से अलग कर देख पाना मुश्किल होता है कि ये कौन से काम हैं, कब शुरू हुए और कहां ख़त्म होंगे.
ऐसे छिपे हुए काम कई तरह के होते हैं; उदाहरण के लिए जैसा कि हम सभी जानते हैं कि पुरुषों की तुलना में बच्चों की देखभाल का अधिकतम काम महिलाओं के हिस्से आता है. यहां तक कि अपने छोटे बच्चे के साथ (नौकरी या अन्य कारणों से) नहीं होने पर भी मां को उसकी ही चिंता रहती है.
इससे अतिरिक्त तनाव पैदा होता है क्योंकि चाहे आप किसी दूसरे काम पर फ़ोकस क्यों न कर रहे हों आपके दिमाग़ में अपने बच्चे की चिंता हमेशा बनी रहती है.
बीबीसी के वर्कलाइफ़ पर छपे एक लेख के अनुसार 2019 में हावर्ड यूनिवर्सिटी से सोशियोलॉजी और सोशल पॉलिसी में पीएचडी कर रहीं एलिसन डेमिंगर ने 35 जोड़ियों पर एक शोध किया. इसमें भाग लेने वाली अधिकतर जोड़ी को यह अहसास हुआ कि घर के काम का एक बहुत बड़ा हिस्सा महिलाओं के ज़िम्मे आता है जबकि ये घरेलू काम का सामान्य तरीका नहीं होना चाहिए.
बीबीसी संवाददाता मेलिसा होगेनबूम को एलिसन डेमिंगर ने बताया, "अगर ये बताएं कि रोज़ के कामों को पूरा करने के लिए हमें हर दिन कितनी प्लानिंग करनी पड़ती है तो स्पष्ट हो जाएगा कि हम कितने छिपे हुए काम करते हैं."
घरेलू काम से जुड़े मानसिक कार्य

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एलिसन डेमिंगर ने घरेलू ज़िम्मेदारियों से जुड़े मानसिक कार्यों के चार स्पष्ट चरणों की पहचान की है.
ये हैं- ज़रूरतों का अनुमान लगाना, विकल्पों की पहचान करना, विकल्पों में से सबसे बेहतर का चयन और परिणामों की नियमित परख करना.
डेमिंगर के शोध में पता चला कि इन सभी चार चरणों में सबसे अधिक ज़िम्मेदारी मांओं के पास थी.

सौभाग्य से विषमलैंगिंक जोड़ों की तुलना में समलैंगिक जोड़ों में घर के कामों का असमान विभाजन कम देखने को मिला क्योंकि वहां लैंगिक आधार पर काम नहीं बांटे गए थे.
वहीं यूटा यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्री डेनियल कार्लसन ने अपने एक शोध में पाया कि देखभाल करने जैसे काम को असमान बांटने से पहली बार पति पत्नी बने जोड़ों के बीच सेक्स में भी कमी आ सकती है.
कैसे करें घर के काम का बोझ कम?

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जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी की चपेट में थी और लॉकडाउन के कारण सभी घरों पर थे तो उस दौरान घर के काम में महिलाओं की भागीदारी और वहां लैंगिक समानता को लेकर काफी चर्चाएं हुईं.
उस दौर में पुरुषों को घर में ऐसे छिपे हुए कामों को नज़दीक से देखने और हाथ बंटाने का मौक़ा भी मिला ताकि अपने जीवनसाथी के घरेलू बोझ को कम किया जा सके.
तो क्या करें जिससे घर के कामों में पुरुष समान रूप से और नियमित हाथ बंटाएं.
डेमिंगर कहती हैं, "ये तो स्पष्ट है कि अधिकांश पुरुष अपने बच्चों की ज़िंदगी में जितना अधिक संभव हो शामिल होना चाहते हैं. तो उनसे जुड़े घर के काम को लेकर पति-पत्नी को आपस में यह बात स्पष्ट रूप से करनी चाहिए कि कौन क्या कर सकता है. इसमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन-कौन से काम किसे करने हैं."
अगर हम यह स्पष्ट रूप से बताएं कि बच्चों की देखभाल और घर के काम को करने के लिए कितनी योजनाएं बनानी होती हैं तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि घर में कितने छिपे हुए काम हैं.
डेमिंगर सुझाव देती हैं, "अगर बोझ साझा करना है और उसके लिए नई आदतें बनानी हैं तो सबसे पहले हमें छिपे हुए काम को दिखाई पड़ने वाला बनाना होगा."
वे कहती हैं, "घर के छिपे हुए काम को लेकर जागरूकता ही इस दिशा में सबसे पहला और अच्छा क़दम होगा."
डेमिंगर के शोध में यह देखने को मिला कि आपस में खुल कर बात करने से भी घरेलू काम का बोझ साझा किया जा सकता है.
वहीं कार्लसन कहते हैं, "घर के कामों को लेकर महिलाओं के मानसिक दबाव को कम करने का सबसे बढ़िया उपाय कम काम करना होगा. हालांकि लक्ष्य को पाना आसान नहीं होगा."
वे कहते हैं कि जैसे-जैसे महिलाएं घरों में कम काम करेंगी उनके पुरुष पार्टनर की सहभागिता बढ़ेगी, इससे वो अपनी मानसिक ऊर्जा का सर्वाधिक उपयोग अपने ऊपर कर सकेंगी.
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