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शंभू बॉर्डर पर डटे किसानों के अब क्या हैं हाल और किस तरह की है आगे की तैयारी
- Author, गुरजोत सिंह और आर्जव पारेख
- पदनाम, टीम बीबीसी, शंभू बॉर्डर से लौटकर
शंभू बॉर्डर पर पंजाब के सैकड़ों किसान दिन-रात प्रदर्शन पर बैठे हुए हैं. साढ़े तीन किलोमीटर लंबे रास्ते पर ट्रैक्टर और ट्रॉलियों का काफ़िला लगा हुआ है.
किसान संगठनों और भारत सरकार के प्रतिनिधि मंडल के बीच कई दौर की बातचीत से भी अब तक कोई समझौता नहीं हो पाया है.
बावजूद इसके 13 फ़रवरी से यहां प्रदर्शन पर बैठे किसानों के हौंसले में किसी तरह की कमी नहीं दिखती.
इसकी झलक हमें 91 साल के किसान निर्मल सिंह में दिखी.
निर्मल सिंह बताते हैं, ''पंजाब की सभी राजनीतिक पार्टियां किसानों के मुद्दों पर असफल साबित हुई हैं.''
उन्हें यह भी लगता है कि पिछली बार ही किसानों को अपनी सारी मांगें मनवानी चाहिए थीं.
वे कहते हैं, ''पिछली बार आंदोलन जल्दी ख़त्म कर दिया गया, हमें अपनी सब मांगें पिछली बार ही मनवाकर जाना चाहिए था.''
हालांकि, उन्हें अपने किसान नेता सरवन सिंह पंढेर और जगजीत सिंह डल्लेवाल की सूझबूझ पर यक़ीन है.
उन्हें लगता है कि वे इस बार अपनी मांगों को मनवाने में सफल होंगे.
पंजाब के किसानों को अलग से पैकेज देने से जुड़ी बातों पर निर्मल सिंह कहते है, ''यह लड़ाई सिर्फ़ हमारी नहीं है. हम पूरे देश के किसानों के लिए एमएसपी लेने आए हैं. अगर हम हमारे लिए पैकेज लेकर चले जाएंगे तो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश जैसे अन्य राज्यों के किसानों को क्या मुंह दिखाएंगे?''
शंभू बॉर्डर पर चल रहे इस आंदोलन के बारे में वे कहते हैं, ''इस बार यहाँ अभी कम से कम तीन हज़ार ट्रॉली आई हुई हैं. साढ़े तीन किलोमीटर लंबी लाइन दोनों तरफ़ लगी हुई हैं. अभी तो सिर्फ़ तीन चार ज़िलों के ही किसान आए हुए हैं. अभी और किसान आने बाकी हैं, अभी तो हमें हमारा राशन खोलने की भी ज़रूरत नहीं पड़ी है. हम पूरे सब्र के साथ जितना लंबा बैठना पड़ेगा, बैठेंगे.''
निर्मल सिंह ही नहीं शंभू बॉर्डर पर मौजूद कई किसान मीडिया को लेकर काफ़ी सतर्क दिखे.
मीडिया उनके प्रदर्शन के बारे में क्या कह रहा है, उसे लेकर ये लोग काफ़ी गंभीर दिखे.
निर्मल सिंह इस अविश्वास पर कहते हैं, ''अधिकांश मीडिया बिक चुका है, हमें उन पर भरोसा नहीं रहा. वो हमारी बातें तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहा है.''
'सरकार ने हमें वचन दिया था, उसका क्या हुआ?'
शंभू बॉर्डर पर ही हमें मिले सतगुर और सवर्णजीत सिंह. 32 साल के दोनों युवा एक ही स्कूल में फ़रीदकोट से पढ़े हैं और दोस्त हैं.
दोनों के पास तीन-तीन एकड़ ज़मीन हैं जिसमें वे किसानी करते हैं. लेकिन उसके अलावा उन्होंने ज़मीन ठेके पर ली हुई है. इसके बावजूद उनका खेती से गुज़ारा नहीं हो पाता.
लिहाज़ा वे कभी ड्राइवर तो कभी कंडक्टर बनकर पैसे कमाते हैं.
सतगुर सिंह कहते हैं, ''मैंने अपने बेटे का शहर के सबसे अच्छे स्कूल में दाख़िला करवाया है, ताकि उसे खेती पर निर्भर न रहना पड़े.''
वे कहते हैं, ''धान की फसल में पानी बहुत लगता है. खाद भी डालनी होती है. ठेके पर ली हुई ज़मीन का भुगतान भी करना पड़ता है. उसके बाद बहुत मामूली सी रक़म हाथ में आती है. इसलिए हम चाहते हैं कि हर किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिले जिसकी वजह से उनका जीना आसान हो सके.''
वहीं, सवर्णजीत सिंह कहते हैं, ''सरकार ने तो हमारी मांगें मान ली थीं और वादा भी किया था. चार साल के बाद भी उन्होंने कुछ नहीं किया, इसी वजह से हम यहां 13 फरवरी से बैठे हैं.''
वे कहते है, ''यहाँ ज़्यादातर टाइम इंटरनेट नहीं चलता है. समय बिताना बहुत मुश्किल है. लेकिन सबका उद्देश्य एक है, और इस वजह से सब अपना काम छोड़कर अपनी लड़ाई लड़ने के लिए यहाँ बैठे हैं.''
सतगुर सिंह कहते है, ''एक ट्रॉली मेरी अपनी है, और दूसरी ट्रॉली किराये पर लेकर आया हूँ. हमसे जितना हो सकेगा उतना ख़र्च हम आंदोलन में करेंगे, यह हम सब की साझी लड़ाई है.''
पंजाब के किसानों के बारे में आम धारणा ये भी है कि वे महज़ गेहूं और धान की खेती करते हैं.
सतगुर सिंह बताते हैं कि उन्होंने एक बार गोभी की फसल भी उगाई थी लेकिन उनकी फसल पांच रुपए प्रति किलो से भी कम में बिकी. इसके बाद उन्होंने हताश होकर गेहूं और धान उगाने ही शुरू कर दिए.
इस आंदोलन में देशभर से अन्य किसान क्यों नहीं शामिल हो रहे हैं, पूछे जाने पर सवर्णजीत सिंह कहते हैं, ''दूसरी जगहों पर यूनियन ख़त्म हो गए हैं और सरकार की तरफ से बहुत सख्ती है. लेकिन हम अपने उन किसान भाइयों की आवाज़ को भी बुलंद करते रहेंगे.''
पांच फसलों पर पांच सालों तक एमएसपी की गारंटी के सरकार के प्रस्ताव को किसान नेताओं के द्वारा ठुकराने को वो सही ठहराते हैं. वे इसे एक छलावा मात्र बताते हैं.
बॉर्डर पर पहरा दे रहे यूनियन के बुज़ुर्ग किसान
जहाँ किसानों को हरियाणा में प्रवेश करते हुए रोकने के लिए हरियाणा पुलिस और अन्य सुरक्षाबलों ने बैरिकेडिंग की हुई हैं.
वहीं से महज़ 100 मीटर की दूरी पर किसान यूनियनों के बुज़ुर्ग किसान पहरा दे रहे हैं.
इन किसानों की यहाँ रात की ड्यूटी लगाई गई थी और वे सुबह सात बजे तक वहाँ पहरा देते हैं.
पहरा देने वाले एक बुज़ुर्ग किसान ने बताया, ''हमें भी एहतियात बरतने की ज़रूरत है. यहाँ हमारी ड्यूटी इसलिए लगाई है कि हम यहां ध्यान रखें कि कोई युवा किसान आक्रोश में आकर बॉर्डर की तरफ़ न चला जाए. हम नहीं चाहते कि हमारी चूक की वजह से कोई अवांछित घटना घटे और माहौल ख़राब हो जाए.''
वे कहते हैं, ''यहां इस रास्ते पर गाड़ियाँ भी कभी-कभार आ जाती हैं. आस-पास के गांवों में मज़दूरी करते लोग भी इस रास्ते पर आ जाते हैं. इसलिए हमें उनका भी ध्यान रखना होता है. हमारी ड्यूटी इसलिए भी लगाई जाती है ताकि लोगों को लगे कि उन्हें काम भी मिला है. उनको लगे कि हमारी भी आंदोलन को ज़रूरत है.''
रात को भी आते हैं दूर-दूर से किसान
रात के लगभग साढ़े दस बजने वाले थे. आंदोलन में शामिल 30 साल के एक नौजवान किसान को पथरी की वजह से बहुत दर्द हो रहा था, खड़े रहने में भी तकलीफ़ हो रही थी.
तुरंत दूसरे किसानों ने उसे पास में ही लगे टेंट में ले जाकर दवाइयां दीं. शंभू बॉर्डर पर अनेक एनजीओ ने अपने टेंट लगाए हुए हैं, और उनके पास प्राथमिक इलाज की सुविधाए हैं.
युवा किसान मनजीत सिंह किसानों के किसी भी संगठन का हिस्सा नहीं हैं, वो अपने आप इस आंदोलन में आए हैं.
सिंघू बॉर्डर पर चले आंदोलन से उनके कई दोस्त बने हैं और वे अभी उनके साथ ही शंभू बॉर्डर पर रहते हैं.
मनजीत सिंह कहते हैं, ''कई लोग यहाँ समर्थन देने के लिए देर रात से आते हैं, ट्रेन से आते हुए उन्हें देर हो जाती है. मैं उनके लिए रात को लंगर का प्रबंध करता हूँ. कई युवा किसान मेरे यहाँ आकर रात को कॉफी पीते हैं. उनसे आंदोलन के बारे में बहुत सारी बातें पता चलती हैं.''
शंभू बॉर्डर पर सुबह का माहौल
सूर्य की किरणें निकलने से पहले ही जैसे पूरा गाँव उठ जाता है, वैसे ही शंभू बॉर्डर पर लगभग साढ़े तीन किलोमीटर तक फैले हुए किसानों के इस अस्थायी गाँव में चहल-पहल शुरू हो जाती है.
पाँच बजने से पहले ही जगह-जगह पर बड़े बड़े पतीलों में चाय का उबलना शुरू हो जाता है. नाश्ते के लंगर की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं.
कई जगह पर लकड़ियों के ढेर लगे हुए थे. पानी गरम किया जा रहा था. किसानों के मुताबिक यहाँ नहाने में सबसे ज्यादा दिक्कतें आती हैं, क्योंकि पानी का इस्तेमाल भी नियत मात्रा में करना होता है, और अभी ठंड भी है.
इस बार प्रदर्शन में शामिल महिला किसानों की संख्या बहुत ज़्यादा नहीं है, इसलिए यह बड़ी समस्या नज़र नहीं आती है, लेकिन सुबह के कुछ घंटे तक अफ़रा-तफ़री दिखाई देती है. शंभू बॉर्डर के आसपास दूर तक फैले खेतों में जाकर ये किसान शौच से निपटते हैं, वहीं कुछ किसान आसपास बने रेस्टोरेंट में बने शौचालयों का इस्तेमाल भी करते दिखाई देते हैं.
जैसे-जैसे दिन चढ़ता जाता है, किसान दैनिक क्रियाएं निपटाकर अपने अपने काम पर लग जाते हैं. कहीं पर चारपाई पर बैठकर बुज़ुर्ग किसान धार्मिक भजन सुन रहे थे तो कहीं पर किसान ताश के पत्तों से खेल रहे थे, कोई दोपहर के लंगर की तैयारी कर रहा था तो कोई किसानों को ताजा गन्ने का रस पिला रहा था.
इंटरनेट और अन्य सुविधाओं के अभाव में किसानों का दिन तो ज़्यादातर अपने लिए खाना बनाने और अन्य काम निपटाने में ही बीत जाता है लेकिन इनके लिए दिन बिताना इतना आसान भी नहीं दिखता.
लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि पंजाब के बाहर सिंधु बॉर्डर पर लगभग एक साल तक चले उस आंदोलन का अनुभव किसानों के काम आ रहा है.
किसानों के मुताबिक वो इस बार और पक्की तैयारी के साथ आए हैं. वे अपनी मांगों को मनवाकर ही जाएंगे. तो दूसरी तरफ़ सरकार ने किसानों को सीमा पर रोकने के इंतज़ाम के साथ उनसे बातचीत के रास्ते भी खुले रखे हैं.
सिंधु बॉर्डर पर किसान दूसरे क्षेत्र के गाँव में अपना जमावड़ा लगाए हुए थे लेकिन शंभू बॉर्डर पर वे अपने राज्य पंजाब में ही हैं, और अपने गांवों में आवाजाही कर सकते हैं.
इतना ही नहीं शंभू बॉर्डर पर अभी इतने पक्के इंतजाम नहीं दिखते हैं, क्योंकि किसानों के मुताबिक अभी आंदोलन के आगे के स्वरूप को लेकर अनिश्चितताएं हैं.
हालांकि रविवार को आंदोलन में मृत किसान शुभकरण सिंह के अंतिम अरदास कार्यक्रम में शामिल हुए किसान संगठनों ने फ़ैसला लिया है कि छह मार्च को दिल्ली की तरफ़ कूच करेंगे.
दिल्ली पहुंचने और एमएसपी की अपनी मांगों को लेकर शंभू बॉर्डर पर मौजूद किसानों में एक दृढ़ता दिखाई देती है, लेकिन किसानों में एक मायूसी भी है.
इस मायूसी को एक किसान के शब्दों में समझा जा सकता है, ''हमें यह उम्मीद नहीं थी की सरकार हमारे साथ इतना बुरा बर्ताव करेगी. हमारे ऊपर गोलियां चलाएगी. वे अपने ही देश के किसानों के साथ पराया बर्ताव करेंगे, ऐसी हमें उम्मीद नहीं थी.''
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