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किसान आंदोलन: शंभू बॉर्डर पर स्थानीय लोग कैसे कर रहे हैं किसानों का समर्थन
- Author, गगनदीप सिंह जस्सोवाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
किसान संगठनों की अपील पर 'दिल्ली चलो' आंदोलन का हिस्सा बनने आए बचितर सिंह 13 फरवरी से पंजाब-हरियाणा सीमा के शंभू बॉर्डर पर रह रहे हैं.
उनका गांव पंजाब के तरनतारन जिले में पड़ता है.
उनका कहना है कि वे अपने साथ पर्याप्त राशन लाए थे, लेकिन शंभू बार्डर पर कई रातें बिताने के बाद, उन्हें अपने राशन का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं पड़ी.
उनका कहना है कि शंभू बार्डर के आसपास गांव के लोग ही उनके लिए खाने-पीने का इंतजाम कर रहे हैं, जिसके लिए वे उनके आभारी हैं.
आसपास गांवों के लोग, विशेषकर महिलाएं, बचितर सिंह जैसे हजारों किसान प्रदर्शनकारियों के लिए हर रोज़ भोजन की व्यवस्था करती हैं.
पटियाला और मोहाली जिलों में शंभू बॉर्डर के आसपास के स्थानीय ग्रामीण और कुछ धार्मिक संगठन न केवल वहां मौजूद रहकर बल्कि भोजन और अन्य जरूरी सामान भेजकर भी किसानों के आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं.
क्या मांग रहे हैं आंदोलनकारी किसान
किसान मजदूर संघर्ष समिति और भारतीय किसान यूनियन (सिद्धूपुर) के नेतृत्व में पंजाब के किसान संगठनों के एक गुट ने केंद्र सरकार के खिलाफ 'दिल्ली चलो' का आह्वान किया है.
किसानों की मांगों में फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी, स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करना और भाजपा नेता द्वारा कथित तौर पर मारे गए चार सिख किसानों को न्याय देना और अन्य मांगें शामिल हैं.
'दिल्ली चलो' की अपील के बाद 13 फरवरी को बड़ी संख्या में किसान शंभू और खानुरी सीमा पर पहुंच गए थे. वहां से उन्हें हरियाणा प्रशासन आगे जाने से रोक रहा है.
हरियाणा सरकार ने सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के साथ-साथ बड़े पैमाने पर पाबंदियां भी लगा दी हैं, जिससे सड़क यातायात भी ठप हो गया है.
किसानों और सुरक्षा बलों के बीच दो दिन तक तनाव भी देखा गया. किसान संगठनों का कहना है कि सुरक्षा बलों द्वारा छोड़े गए आंसू गैस के गोलों से कई किसान घायल हो गए हैं.
केंद्रीय कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा ने किसानों से बातचीत के बाद कहा कि वे उनकी मांगों का सौहार्दपूर्ण समाधान निकालना चाहते हैं. पीयूष गोयल के नेतृत्व में तीन केंद्रीय मंत्री किसान नेताओं से बातचीत कर रहे हैं.
आंदोलनकारी किसानों के लिए खाना बना रही हैं महिलाएं
बीबीसी न्यूज़ पंजाबी ने पटियाला जिले के सूरजगढ़ गांव का दौरा कर यह जानने की कोशिश की कि स्थानीय ग्रामीण किसानों के आंदोलन में कैसे मदद कर रहे हैं.
पटियाला जिले के सूरजगढ़ गांव की हरजिंदर कौर भी किसानों के लिए भोजन की व्यवस्था करने वाली महिलाओं में से एक हैं.
हरजिंदर कौर कहती हैं, ''हम गुरुद्वारे में लंगर (खाना) बनाने आए हैं ताकि शंभू बॉर्डर पर कोई किसान भूख से न मरें. जब वे भूखे होंगे तो वे अपने अधिकारों के लिए कैसे लड़ सकते हैं? उन्हें अपना संघर्ष जारी रखने के लिए पोषण और ताकत की जरूरत है.''
किसान आंदोलन के स्थल पर स्थानीय ग्रामीणों ने कई लंगर लगाए हैं, जहां वे मुख्य रूप से किसान प्रदर्शनकारियों को भोजन वितरित करने के लिए सुबह 11 बजे पहुंचते हैं, जबकि कुछ लंगर दोपहर में पहुंचते हैं और देर रात तक चलते हैं.
दोहरी जिम्मेदारियां निभातीं महिलाएं
इन संयुक्त प्रयासों के लिए, बसंत कौर जैसी काफी महिलाएं दोहरी ज़िम्मेदारियां निभा रही हैं.
वे अपने परिवार के साथ सुबह-सुबह उठकर प्रदर्शनकारी किसानों के लिए लंगर (खाना) भी तैयार कर रही हैं. बसंत कौर 13 फरवरी से रोजाना सूरजगढ़ गांव के गुरुद्वारा साहिब में किसानों के लिए खाना बनाने आ रही हैं.
बसंत कौर के दोनों बेटे भारतीय सेना में कार्यरत हैं.
बसंत कौर कहती हैं, ''मैं शंभू में धरने पर बैठे किसानों के लिए खाना बनाने के लिए सुबह 4:30 बजे उठ जाती हूं.''
गांव की महिलाएं घरेलू कामकाज के साथ-साथ खाना बनाने की सेवा भी कर रही हैं. उनका कहना है कि उनके लिए दोनों कार्य समान रूप से महत्वपूर्ण हैं.
बसंत कौर कहती हैं, ''सरकार को किसानों की मांगें मान लेनी चाहिए.''
बसंत कौर का कहना है कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए वे भी प्रदर्शन में शामिल होने को तैयार हैं.
बसंत कौर की तरह, निर्मल कौर कहती हैं, "वह चाहती हैं कि किसानों की मांगों का जल्द से जल्द समाधान हो ताकि वे जल्दी से जल्दी सुरक्षित अपने घर में वापस जाएं."
हरजिंदर कौर कहती हैं कि वो तो डबल ड्यूटी कर रही हैं, जिसमें शंभू बॉर्डर पर किसानों के लिए खाना बनाना भी शामिल है, फिर हमें अपने घर और बच्चों की देखभाल भी करनी है.
दोनों जिम्मेदारियां निभाना आसान नहीं था, लेकिन फिर भी हम हैं.
गुरुद्वारे में कैसे बनता है लंगर
शनिवार सुबह पटियाला जिले के सूरजगढ़ गांव के गुरुद्वारा साहिब में ग्रंथी 'नितनेम' का पाठ कर रहे थे और श्रद्धालु गुरुद्वारा में नतमस्तक हो रहे थे.
सुबह करीब 5 बजे करीब 15 बुजुर्गों और महिलाओं के अलावा कुछ युवा भी शंभू बॉर्डर पर प्रदर्शनकारी किसानों के लिए खाना बनाने में लग थे.
सूरजगढ़ गांव के निवासी 13 फरवरी से प्रदर्शनकारी किसानों को खाना भेज रहे हैं.
सूरजगढ़ के जरनैल सिंह बताते हैं, "हमारे गांव की महिलाएं देर शाम को गाजर, फूलगोभी आदि सब्जियां काटना शुरू कर देती हैं."
वह आगे कहते हैं, ''हम गुरुद्वारा साहिब में सुबह करीब 4 बजे खाना बनाना शुरू करते हैं और करीब एक दर्जन महिलाएं सुबह करीब 7 बजे रोटियां बनाना शुरू कर देती हैं.''
ग्रामीण सुबह 9 बजे के आसपास लंगर बनाने की प्रक्रिया पूरी करते हैं, फिर वे तैयार लंगर और दूध को ट्रैक्टर ट्रॉली में लोड करते हैं.
किसान आंदोलन में करीब 5 ग्रामीण लंगर ले जाते हैं, वे वहां एक बेंच लगाकर किसानों में 'लंगर' बांटना शुरू करते हैं.
जरनैल सिंह का कहना है कि पिछले किसान आंदोलन के दौरान भी उनके गांव ने लगातार दिल्ली में लंगर भेजा था.
उन्होंने आगे कहा, "हम पूरे गांव से योगदान इकट्ठा करते हैं जबकि कई दानी सज्जन खुद भी गुरुद्वारा साहिब में राशन दान करते हैं."
उन्होंने कहा कि हमारी लड़ाई सिर्फ किसानों की मांगों के लिए है और इसका किसी राजनीतिक दल से कोई लेना-देना नहीं है.
'हम नहीं चाहते कि किसान अपना राशन इस्तेमाल करें'
एक अन्य निवासी गुरसेवक सिंह कहते हैं, ''हम किसी के साथ भेदभाव नहीं करते हैं. प्रदर्शनकारी किसान हमारे भाई हैं और उनके पास राशन है, लेकिन हम नहीं चाहते कि वे इसका इस्तेमाल करें क्योंकि अगर आंदोलन आगे बढ़ता है तो वह राशन काम आ सकता है.''
गुरसेवक कहते हैं, ''हमारे गांव के लोग स्वेच्छा से हमारे गुरुद्वारे में सेवा कर रहे हैं.
इसी तरह, हरविंदर सिंह कहते हैं, ''भोजन परोसना और अपने किसानों की मदद करना हमारा नैतिक कर्तव्य है. पुलिस किसानों पर आंसू गैस या गोलियां चला रही है, इसलिए हमें बहुत दुख हो रहा है.''
पटियाला जिले के मर्दानपुर गांव के निवासियों ने भी आंदोलन स्थल पर एक 'लंगर' स्थापित किया है. वहां वे रोजाना खाना पकाते हैं. इस बीच कई लोग निजी तौर पर किसानों को जरूरी सामान दान कर रहे हैं.
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी जैसे धार्मिक संगठन ने भी किसानों के लिए लंगर की व्यवस्था की है.
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