ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शामिल होने को लेकर पाकिस्तान में क्यों बंटी है राय

    • Author, रौनक भैड़ा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पाकिस्तान डोनाल्ड ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शामिल हो गया है. इससे पहले पाकिस्तान ने आईएसएफ़ में शामिल होने की पेशकश भी की थी.

गुरुवार को पीएम शहबाज़ शरीफ़ दावोस में 'बोर्ड ऑफ़ पीस' के आधिकारिक समारोह में शामिल हुए, जहां फील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर भी मौजूद थे.

ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान समेत कई देशों को ग़ज़ा के 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया था. फ़िलहाल भारत सरकार इसे स्वीकार करने या ख़ारिज करने जैसे नतीजे पर नहीं पहुंची है, जबकि पाकिस्तान ने ट्रंप के न्योते को स्वीकार कर लिया.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से बुधवार को जारी बयान में कहा गया, "पाकिस्तान उम्मीद करता है कि इसके बनने से ठोस कदम उठाए जाएंगे, जैसे स्थायी युद्धविराम लागू करना, फ़लस्तीनियों के लिए मानवीय सहायता को और बढ़ाना, साथ ही ग़ज़ा का पुनर्निर्माण करना. पाकिस्तान यह भी उम्मीद करता है कि ये प्रयास फ़लस्तीन के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को साकार करने में मदद करेंगे."

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यह पहली बार नहीं है, जब पाकिस्तान ने डोनाल्ड ट्रंप के किसी फ़ैसले को खुले दिल से स्वीकार किया है. पाकिस्तान के हालिया निर्णयों को देखें तो वे अमेरिका परस्त नज़र आते हैं.

इससे पहले भी पाकिस्तान कई ऐसे फ़ैसले कर चुका, जिनमें ट्रंप की ओर उसका रुझान दिखता है. इनमें ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार देने की सिफ़ारिश करने से लेकर इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स (आईएसएफ़) में शामिल होने तक की बात है.

पाकिस्तान का बोर्ड ऑफ़ पीस में जाना क्यों चौंकाता है?

'बोर्ड ऑफ़ पीस' में जाने का फ़ैसला लेने पर पाकिस्तान सरकार की देश के अंदर काफ़ी आलोचना हो रही है. विश्लेषक मानते हैं कि पाकिस्तान अपनी पारंपरिक विदेश नीति से हट गया है. इसराइल और ग़ज़ा की लड़ाई में पाकिस्तान का रुख़ स्पष्ट तौर पर ग़ज़ा की तरफ था.

जेएनयू के साउथ एशियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज का कहना है कि पाकिस्तान के लोगों की भावनाएं ग़ज़ा की तरफ रही हैं, लेकिन यह वहां की हुक़ूमत के लिए ख़ास मायने नहीं रखता. पाकिस्तान पारंपरिक तौर पर ग़ज़ा के साथ खड़ा रहा है, फ़लस्तीनी लोगों के अधिकारों की पैरोकारी करता है. लेकिन अब उसी बोर्ड का हिस्सा बनने जा रहा है जिसमें फ़लस्तीन का धुर विरोधी देश इसराइल भी सदस्य है.

संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के राजदूत के रूप में काम कर चुकीं मलीहा लोधी ने एक्स पर लिखा, "पाकिस्तान ने एक ऐसे 'संगठन' (बोर्ड ऑफ़ पीस) में शामिल होने के लिए हस्ताक्षर किए हैं जिसे ट्रंप संयुक्त राष्ट्र के विकल्प के रूप में पेश करते हैं. यह संगठन ट्रंप से जुड़ा हुआ है और उनके कार्यकाल के बाद टिक नहीं सकता. क्या सिद्धांतों का पालन करने से ज्यादा ट्रंप को ख़ुश करना महत्वपूर्ण है?"

अमेरिका स्थित विल्सन सेंटर के दक्षिण एशिया संस्थान के निदेशक माइकल कुगेलमैन ने एक्स पर लिखा, "पाकिस्तान का ट्रंप के बोर्ड ऑफ़ पीस में शामिल होने का फ़ैसला आश्चर्यजनक नहीं है. वह अपना वैश्विक प्रभाव (विशेषकर मध्य पूर्व में) बढ़ाना चाहता है और ट्रंप के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करना चाहता है. पाकिस्तानी जनता का एक बड़ा हिस्सा भले ही इसराइल द्वारा समर्थित इस पहल को अस्वीकार कर दे, लेकिन इससे सत्ता में बैठे लोगों पर कोई असर नहीं पड़ेगा."

उन्होंने आगे कहा, "इसके अलावा, वे बातें जो अन्य देशों (शायद भारत सहित) को ट्रंप का निमंत्रण ठुकराने के लिए प्रेरित कर सकती हैं, जैसे- बोर्ड के औपनिवेशिक स्वरूप का डर, संयुक्त राष्ट्र को कमज़ोर करने की आशंका, पाकिस्तान के लिए उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं."

इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफ़ेयर्स में सीनियर फ़ेलो डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर रहमान कहते हैं कि पाकिस्तान ने हाल-फ़िलहाल में फ़लस्तीन को लेकर कुछ ख़ास आवाज नहीं उठाई. वह मुस्लिम वर्ल्ड से 'अप्रासंगिक' होने लगा था.

"अब ट्रंप ने बोर्ड ऑफ़ पीस में पाकिस्तान को शामिल होने का न्योता दिया, तब उसे लगा कि वह अपनी छवि को मजबूत कर सकता है. वह खुद को 'रेलेवेंट' दिखाना चाह रहा है. यही कारण है कि पाकिस्तान में आम लोगों की भावना भले ग़ज़ा के साथ हो, इसके बावजूद पाकिस्तान ने बोर्ड में शामिल होने के लिए हामी भर दी."

पाकिस्तानी अख़बार डॉन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान का यह फ़ैसला अमेरिका के साथ ग़ज़ा पर चल रही कूटनीति में उसकी बढ़ती भागीदारी को दिखाता है.

आलोचना के बीच एक सरकारी संस्था ने पत्रकारों को जानकारी दी, जिसमें इस फ़ैसले को रणनीतिक ज़रूरत बताया गया. इसमें कहा गया कि बोर्ड में शामिल होना ग़ज़ा में चल रही हिंसा को राजनीतिक तरीके से ख़त्म करने का व्यावहारिक कदम है. यह कई मुस्लिम देशों के साथ मिलकर फ़लस्तीनी हितों की रक्षा करने का प्रयास है.

इसमें कहा गया कि पाकिस्तान की वैश्विक अहमियत को मान्यता मिल रही है. पाकिस्तान बड़े देशों से अच्छे संबंध रखता है, इसलिए वह शांति के लिए पुल का काम कर सकता है. जब दुनिया में राजनीतिक मतभेद बढ़ रहे हैं, तो तटस्थ रहने का मतलब बेकार हो जाना है.

पाकिस्तान में इस फ़ैसले की आलोचना हो रही

मानवाधिकार कार्यकर्ता और पाकिस्तान के पूर्व सीनेटर मुस्तफ़ा नवाज़ ख़ोखर ने लिखा, "पाकिस्तान द्वारा बिना किसी सार्वजनिक बहस या संसद की राय लिए 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शामिल होने का निर्णय राष्ट्र के प्रति इस शासन की उपेक्षा को दर्शाता है."

उन्होंने इस निर्णय को तीन आधारों पर गलत बताया, "बोर्ड ऑफ़ पीस संयुक्त राष्ट्र के समानांतर एक प्रणाली स्थापित करने का एक औपनिवेशिक प्रयास है. इसका चार्टर ट्रंप को बिना किसी तंत्र के अपने व्यक्तिगत और अमेरिकी एजेंडे को लागू करने के लिए तानाशाही शक्तियां देता है. स्थायी सीट के लिए एक अरब डॉलर का टिकट है, दूसरे शब्दों में यह इसे एक अमीर लोगों का क्लब बनाता है. ऐसे क्लब अक्सर क्या करते हैं, इसका अंदाज़ा लगाना किसी के लिए भी मुश्किल है."

पाकिस्तान के सीनेटर मजलिस वहदत-ए-मुस्लिमीन (एमडब्ल्यूएम) के प्रमुख अल्लामा राजा नासिर अब्बास जाफ़री ने लिखा, "मैं सरकार के उस फ़ैसले की निंदा करता हूं जिसमें वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शामिल होने जा रही है. यह फ़ैसला नैतिक रूप से ग़लत है और इसे किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता- न सिद्धांत के आधार पर, न नीति के आधार पर. यह योजना शुरू से ही गलत थी. इसे युद्ध के बाद ग़ज़ा के लिए बाहर से चलाई जाने वाली व्यवस्था के रूप में बनाया गया था. इससे फ़लस्तीनी लोगों का अपना शासन चलाने का अधिकार छीन लिया जा रहा है."

उन्होंने लिखा, "पाकिस्तान के नाम से इस कोशिश में शामिल होने से ऐसा लगता है कि पाकिस्तान एक ऐसी व्यवस्था का समर्थन कर रहा है जो संयुक्त राष्ट्र को किनारे कर देती है और अंतरराष्ट्रीय कानून की जगह एक व्यक्ति-केंद्रित राजनीतिक मंच ला देती है. यह इस्लामाबाद की अपनी नीति से मेल नहीं खाता, क्योंकि पाकिस्तान खुद कश्मीर जैसे मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र और बहुपक्षीय मंचों पर भरोसा करता है और अंतरराष्ट्रीय कानून को सबसे ऊपर रखने की बात करता है. बोर्ड ऑफ़ पीस में जाना एक ऐसा फ़ैसला है जिस पर पाकिस्तान को बाद में पछताना पड़ेगा."

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के नेता और विपक्ष के पूर्व नेता उमर अयूब ख़ान ने लिखा, "मेरी निजी राय में, शहबाज़ शरीफ़ की ज़बरन सत्ता में आई सरकार को ग़ज़ा में 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शामिल होने का फ़ैसला जनता की ओर से लेने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. इस फ़ैसले पर संसद में बहस नहीं हुई है. पाकिस्तान की अधिकांश जनता इसके ख़िलाफ़ है."

हालांकि, कुछ विश्लेषक शांति बोर्ड में पाकिस्तान की भागीदारी को एक अच्छा निर्णय मानते हैं.

अमेरिका स्थित विश्लेषक कामरान बुखारी, जो अमेरिकी नीति और मध्य पूर्व मामलों पर बारीकी नज़र रखते हैं, कहते हैं, "अच्छी बात यह है कि पाकिस्तान इस बोर्ड में एक हितधारक बन गया है."

कामरान बुखारी का मानना ​​है कि 'बोर्ड में शामिल होने के बाद, आप एक हितधारक बन जाते हैं, आपको राजनीतिक चर्चा में शामिल होने का अवसर मिलता है और यह एक सकारात्मक बात है.'

आईएसएफ़ में शामिल होने पर भी आलोचना

इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स (आईएसएफ़) ग़ज़ा में शांति और सुरक्षा स्थापित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा अनिवार्य एक बहुराष्ट्रीय बल है. इसे ग़ज़ा पीस प्लान के तहत तैनात किया जा रहा है. पाकिस्तान के डॉन अखबार ने राजनयिक सूत्रों के हवाले से बताया है कि पाकिस्तान आईएसएफ़ के हिस्से के रूप में 3,500 सैनिकों की तैनाती पर विचार कर रहा था.

तब पाकिस्तान की पूर्व राजनयिक मलीहा लोधी ने एक ओपिनियन पीस में लिखा, "आईएसएफ़ का काम हमास पर पुलिसिंग करने का हो, तो पाकिस्तान को इसमें शामिल होना नहीं चाहिए. इससे पाकिस्तानी सैनिक हमास से सीधे टकराव में आ जाएंगे. फिर यह दावा कोई नहीं मानेगा कि पाकिस्तानी सैनिक फ़लस्तीनियों की रक्षा के लिए हैं. तैनाती में इसराइल के साथ करीबी सहयोग होगा, जो बिल्कुल भरोसेमंद नहीं है. अगर इसराइली सेना आईएसएफ़ के पाकिस्तानी हिस्से पर गोली चलाए तो क्या होगा? साथ ही इसराइल के साथ सहयोग का मतलब इसराइल को अप्रत्यक्ष मान्यता देना होगा. यह पाकिस्तान की लंबे समय से चली आ रही नीति के ख़िलाफ़ होगा."

"पाकिस्तान को यह सोचना चाहिए कि ग़ज़ा पीस प्लान को लागू करने में इतनी स्पष्ट मुश्किलें हैं और अनिश्चित मामला बन सकता है, तो क्या हमारे सैनिकों को ख़तरे में डालना चाहिए. फ़ैसला पूरी पारदर्शिता से होना चाहिए और पाकिस्तान के राष्ट्रीय हित सबसे ऊपर होने चाहिएं."

क्या पाकिस्तान ट्रंप को ख़ुश करने में जुटा है?

पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ख़ुश करने के क्रम में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार देने की सिफ़ारिश भी की थी. पाकिस्तान ने कहा था कि डोनाल्ड ट्रंप को भारत और पाकिस्तान युद्धविराम में भूमिका निभाने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया जाए.

तब मलीहा लोधी ने कहा था, "ख़ुशामद नीति का आधार नहीं बन सकती. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित कर रही है. एक ऐसा व्यक्ति जिसने ग़ज़ा में इसराइल के नरसंहार का समर्थन किया और ईरान पर इसराइल के हमले को 'एक्सीलेंट' बताया. यह कदम पाकिस्तान की आवाम के विचारों को प्रदर्शित नहीं करता."

बीते साल सितंबर में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने भारत-पाकिस्तान के बीच जंग रुकवाने का श्रेय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दिया. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए कहा, "यदि राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान और भारत के बीच तनाव में दख़ल नहीं दिया होता तो युद्ध के परिणाम विनाशकारी हो सकते थे."

पाकिस्तान अपनी पुरानी विदेश नीति से हटकर भी डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में क्यों खड़ा हो रहा है? इसके जवाब में प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज ने कहा, "इमरान ख़ान की सरकार के दौरान पाकिस्तान के रूस और चीन से संबंध अच्छे हुए थे, इससे अमेरिका की पाकिस्तान पर पकड़ कमजोर हो गई थी. लेकिन फिर सत्ता परिवर्तन हुआ, जिसमें जनरल आसिम मुनीर की अहम भूमिका निभाई. नई सत्ता अमेरिका से नज़दीकियां बढ़ाने के तमाम मौके खोजती रही है."

"अमेरिका से पाकिस्तान को कुछ फ़ायदे हैं. पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति, टीटीपी से जुड़ा सुरक्षा का मुद्दा और आर्थिक मदद के लिए वर्तमान शासन को पश्चिमी देश (अमेरिका) पर निर्भर होना पड़ रहा है. इंटरनेशनल मॉनीटरी फंड (आईएमएफ़) से लेकर फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स तक में पाकिस्तान को अमेरिकी समर्थन की ज़रूरत रहती है. अमेरिका से नज़दीकी बढ़ाने के चलते पाकिस्तान के ईरान से भी हालिया रिश्ते कमज़ोर हुए हैं."

डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर रहमान कहते हैं कि अमेरिका दुनिया का सबसे ताक़तवर मुल्क है, उससे कौन दोस्ती नहीं करना चाहेगा. भले अमेरिका को पाकिस्तान की ज़रूरत हो या न हो, लेकिन पाकिस्तान को अमेरिका की ज़रूरत है. इमरान ख़ान अमेरिका की गुड लिस्ट में नहीं थे, इस कारण उनका यह हश्र हुआ.

वह कहते हैं, "शहबाज़ सरकार को अमेरिका के समर्थन की आवश्यकता है. पाकिस्तान हर वह मौक़ा भुनाने की कोशिश करता है, जिससे वह भारत से आगे निकल सके. हालांकि, पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्ते 'ज़िग-ज़ैग' वाले रहे हैं. ज़रूरी नहीं कि आज रिश्ते अच्छे हैं तो कल भी ऐसे ही रहेंगे."

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