कनाडा के प्रधानमंत्री ने जैसा कहा, भारत वैसा कहने से क्यों बच रहा है?

    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के दिए भाषण को अमेरिकी दबदबे वाले वर्ल्ड ऑर्डर को आईना दिखाने रूप में देखा जा रहा है.

कहा जा रहा है कि दुनिया के लगभग हर देश ट्रंप की नीतियों से परेशान हैं लेकिन इस तरह बोलने का जोखिम मार्क कार्नी ने उठाया.

मंगलवार को स्विटज़रलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम को संबोधित करते हुए मार्क कार्नी ने कहा कि ताक़तकवर देशों की प्रतिद्वंद्विता में मिडिल पावर वाले देशों के सामने दो विकल्प हैं- या तो समर्थन पाने के लिए आपस में होड़ करें या साहस के साथ एक तीसरा रास्ता बनाने के लिए साथ आएं.

भारत समेत दुनिया के बाक़ी देशों को लग रहा है कि अभी चुप रहना ज़्यादा बेहतर है. दूसरी तरफ़ कनाडा के प्रधानमंत्री को लग रहा है कि मौजूदा विश्व व्यवस्था में कोई संक्रमण नहीं बल्कि विध्वंस की स्थिति है और झूठ का पर्दा हट रहा है.

मार्क कार्नी खुलेआम कह रहे हैं कि पुरानी व्यवस्था वापस नहीं आएगी और इसका शोक नहीं मनाना चाहिए बल्कि नई और इंसाफ़ सुनिश्चित करने वाली वैश्विक व्यवस्था के लिए काम शुरू कर देना चाहिए.

कार्नी कह रहे हैं कि मध्यम शक्ति वाले देशों को भ्रम की दुनिया से बाहर आना चाहिए.

कार्नी को पता है कि ट्रंप की नीतियों की आलोचना करने का जोखिम भी है. कनाडा की अर्थव्यवस्था बहुत हद तक व्यापार पर निर्भर है और 2024 में कनाडा के कुल निर्यात का 75 प्रतिशत अमेरिका में हुआ था.

ट्रंप का जवाब

बुधवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी दावोस पहुँचे और उन्होंने मार्क कार्नी को जवाब दिया.

ट्रंप ने अमेरिका के प्रति कृतज्ञता न दिखाने का आरोप लगाते हुए मार्क कार्नी की आलोचना की. ट्रंप ने कहा, "वैसे कनाडा हमसे बहुत-सी मुफ़्त सुविधाएँ पाता है. उन्हें आभार व्यक्त करना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं कर रहे हैं. मैंने मंगलवार को मार्क कार्नी को देखा. वह ज़्यादा कृतज्ञ नहीं थे. कनाडा अमेरिका की वजह से ही अस्तित्व में है. अगली बार जब मार्क बयान देंगे तो उन्हें यह बात याद रखनी चाहिए."

इससे पहले ट्रंप कनाडा को अमेरिका का 51वाँ राज्य बनाने की बात कह चुके हैं. इतनी धमकियों और दबाव के बावजूद कनाडा ने ट्रंप को जवाब दिया. ऐसे में यह सवाल पूछा जा रहा है कि ट्रंप की नीतियां भारत के हितों को चोट पहुँचा रही है, तब भी कनाडा की तरह क्यों नहीं बोल रहा है?

ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में भारत को ईरान से तेल ख़रीदने से रोक दिया. दूसरे कार्यकाल में ईरान में चाबहार पोर्ट पर काम आगे नहीं बढ़ने दिया. रूस से तेल आयात बंद करने का दबाव डाला और भारत इसमें कटौती शुरू कर चुका है. अमेरिका ने वेनेज़ुएला में सत्ता परिवर्तन किया तब भी भारत ने निंदा नहीं की. ग़ज़ा में इसराइल ने सैन्य कार्रवाई की तो भारत ने निंदा नहीं की और यूक्रेन पर रूस ने हमला किया, तब भी भारत ने निंदा नहीं की.

दूसरी तरफ़ भारत रणनीतिक स्वायत्तता की बात करता है. भारत कनाडा की तरह ट्रंप की नीतियों पर क्यों नहीं बोल पा रहा है?

भारत की चुप्पी

इस सवाल के जवाब में अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू के दिल्ली में स्थानीय संपादक वर्गीज के जॉर्ज कहते हैं, ''भारत अभी चुप है लेकिन जब बोल रहा था तो ख़ुद को ऐसे पेश कर रहा था, मानो महाशक्ति बनने की रेस में आ चुका है. भारत ख़ुद को एक बड़ी शक्ति के रूप में पेश कर रहा था जबकि ऐसा अभी हो नहीं पाया है. इस मामले में हमें चीन से सीखना चाहिए कि जो बोलता कम है और करता ज़्यादा है.''

वर्गीज के जॉर्ज कहते हैं, ''अब जब भारत चुप है तो हमें यह सोचना चाहिए कि डिप्लोमैसी में कब और कहाँ बोलना चाहिए. कनाडा के प्रधानमंत्री ने कहा कि ताक़तवर देशों की आपसी लड़ाई में फँसकर मिडिल पावर वाले या विकासशील देशों को अपना नुक़सान नहीं करना चाहिए. कार्नी ने यह भी कहा कि मिडिल पावर वाले देशों को आपसी सहयोग बढ़ाना चाहिए. ये कोई नया सिद्धांत नहीं है. भारत में नेहरू से लेकर वाजपेयी तक ने इसी सिद्धांत का पालन किया.''

''लेकिन परमाणु क़रार के बाद से भारत ने यह फ़ैसला किया कि अमेरिका उसका रणनीतिक साझेदार है. इसके बाद से अमेरिका और भारत के संबंध गहरे होते गए. जब तक अमेरिका का साथ रहा, तब तक भारत की रणनीतिक स्वायत्तता सुरक्षित रही.''

''नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद भारत ने बिल्कुल अलग रुख़ अपनाया. भारत ने ख़ुद को मिडिल पावर से ज़्यादा की हैसियत में पेश करना शुरू किया. इस चक्कर में भारत ने कई सारे बयान दिए और ये बयान ही अब भारत को उलटा पड़ रहे हैं.''

थिंक टैंक अमेरिकन एन्टरप्राइज इंस्टिच्यूट के फेलो सदानंद धुमे को भी लगता है कि ''पिछले 10-12 सालों में भारत की विदेश नीति को लेकर यह दिखाने की कोशिश रही है कि भारत बहुत ताक़तवर बन चुका है. लेकिन बीते एक साल में जो घटनाएं हुईं, उनसे साफ़ हो गया कि भारत की आर्थिक, तकनीकी और सैन्य ताक़त की अपनी सीमाएं हैं.''

धुमे ने लिखा है, ''हर पाँच मिनट में ज़ोर-ज़ोर से चार ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का ढिंढोरा पीटना तब ज़्यादा मायने नहीं रखता, जब आपके दरवाज़े पर (चीन) 20 ट्रिलियन डॉलर की एक शत्रुतापूर्ण अर्थव्यवस्था खड़ी हो और सामने 30 ट्रिलियन डॉलर की एक महाशक्ति (अमेरिका) हो, जिसके पास केवल एक सवाल है, "हाल में तुमने मेरे लिए क्या किया है?"

धुमे कहते हैं, ''व्यक्तिगत रूप से, मुझे नहीं लगता कि इस घमंड को कम किया जा सकता है. यह घरेलू राजनीति के साथ इतनी गहराई से जुड़ चुका है कि इससे पीछे हटना आसान नहीं है. कोई भी यह कहकर चुनाव नहीं जीतने वाला कि, "असल में क्या है, कोई हमें विश्वगुरु नहीं मानता. भारत एक कठिन पड़ोस में स्थित एक मध्यम शक्ति है और कुछ मामलों में वह तीन दशक पहले की तुलना में कम सुरक्षित है."

चुप्पी से हासिल क्या हुआ?

वर्गीज के जॉर्ज कहते हैं, ''कार्नी ने जो बात कही कि ताक़तवर देशों की प्रतिद्वंद्विता में फँसकर अपने हितों को चोट नहीं पहुँचाना चाहिए, यह भारत के लिए बहुत अहम है और इस पर फिर से सोचना होगा. मिसाल के तौर पर यूक्रेन को देखिए जो रूस और यूरोप की प्रतिद्वंद्विता में फँसा हुआ है और उसकी भारी क़ीमत चुका रहा है. भारत को अब सोचना होगा कि चीन और अमेरिका की प्रतिद्वंद्विता में वह फँसकर क्या हासिल कर पाएगा?''

भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को नेहरू की गुटनिरपेक्षता के आईने में देखा जाता है. अमिताव आचार्य ने अपनी किताब 'ईस्ट ऑफ इंडिया और साउथ ऑफ चाइना' में लिखा है कि यह नीति संकट के समय देश को अप्रासंगिक बना देती है. अभी भारत एक ऐसी विश्व व्यवस्था का सामना कर रहा है जो लगातार ध्रुवीकृत होती जा रही है. ऐसी स्थिति में देशों के लिए बीच में बैठने की गुंजाइश बहुत सीमित रह गई है.

अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकार और विश्लेषक निरूपमा सुब्रमण्यम कहती हैं कि ट्रंप की हर मनमानी पर चुप रह जाना, भारत की रणनीतिक स्वायत्तता नहीं बल्कि डर के कारण है.

निरूपमा सुब्रमण्यम कहती हैं, ''इस चुप्पी का फ़ायदा क्या मिल रहा है? भारत के ख़िलाफ़ अमेरिका ने 50 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाया है. ईरान से व्यापार करने पर अमेरिका 25 फ़ीसदी अतिरिक्त टैरिफ़ लगाएगा. दुनिया के किसी भी देश को अमेरिका में भारत जितना टैरिफ़ नहीं देना पड़ रहा है. क्या यही रणनीतिक स्वायत्तता है?''

निरूपमा सुब्रमण्यम कहती हैं, ''हम हर मुद्दे पर चुप हैं, इसके बावजूद भारत अमेरिका का भरोसा नहीं जीत पा रहा है. संभव है कि भारत को लगता हो कि बोलने से ट्रंप के बैडबुक में ना आ जाएं. यानी एक तरह से भारत आशंकित है. प्रधानमंत्री ने घर में ऐसा इम्प्रेशन दिया कि दुनिया भर में भारत की इज़्ज़त बढ़ा दी है. लेकिन अब सरकार को जवाब देते नहीं बन रहा है. जयशंकर ने अपनी एक किताब में लिखा है कि तरह-तरह के जो टकराव होते हैं, उनमें अवसर देखने चाहिए. लेकिन ये सारी रणनीति काम नहीं आई. हमें अपनी विदेश नीति पर फिर से सोचने की ज़रूरत है.''

भारत की चुप्पी पर जब भी सवाल उठता है तो एक तर्क दिया जाता है कि नेहरू की नीति भी ऐसी ही थी. हंगरी में सोवियत यूनियन के हस्तक्षेप के एक साल बाद 1957 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में बताया था कि भारत ने क्यों इस मामले में यूएसएसआर की निंदा नहीं की.

वाजपेयी का इनकार

नेहरू ने कहा था, "दुनिया में साल दर साल और दिन ब दिन कई चीज़ें घटित होती रहती हैं, जिन्हें हम व्यापक रूप से नापसंद करते हैं. लेकिन हमने इनकी निंदा नहीं की है क्योंकि जब कोई समस्या का समाधान खोज रहा होता है तो उसमें निंदा से कोई मदद नहीं मिलती है."

लेकिन निरूपमा सुब्रमण्यम वर्तमान में भारत की चुप्पी को सही ठहराने के लिए नेहरू के इस उदाहरण को सही नहीं मानती हैं. वह एक दूसरी मिसाल 2003 में वाजपेयी सरकार की देती हैं.

निरूपमा सुब्रमण्यम कहती हैं, ''भारत के लिए यह कोई नई स्थिति नहीं है. मार्च 2003 में जब अमेरिका और ब्रिटेन ने इराक़ पर हमला किया, तब भारत के सामने भी अमेरिकी दबाव था कि वह सैनिक सहायता दे. उस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्पष्ट अनुमति नहीं थी और इस युद्ध को हमला कहा गया था.''

''उस दौर में अमेरिका ने कई देशों से समर्थन मांगा था. कुछ देशों ने सैनिक भेजे, कुछ ने लॉजिस्टिक और अन्य सहायता दी. भारत से भी अपेक्षा की गई थी कि वह सैनिक भेजे लेकिन तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने इस मांग को ठुकरा दिया.''

''भारत का रुख़ यह था कि बिना संयुक्त राष्ट्र के स्पष्ट प्रस्ताव के किसी देश पर हमला मंज़ूर नहीं है. यह फ़ैसला भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और गुटनिरपेक्ष परंपरा के अनुरूप था. इराक़ युद्ध के समय भारत ने सैनिक भेजने से इनकार कर दिया था, बावजूद इसके कि अमेरिका के साथ रिश्ते उस समय बेहतर हो रहे थे. भारत ने यह स्पष्ट किया था कि वह क्षेत्रीय स्थिरता, सुरक्षा और पुनर्निर्माण का समर्थन करता है, लेकिन सैन्य हस्तक्षेप के ज़रिये नहीं.''

''ट्रंप का दृष्टिकोण जॉर्ज बुश से भी अधिक आक्रामक और एकतरफ़ा माना जा रहा है. ऐसे में भारत के सामने चुनौती और भी बड़ी है. इतिहास बताता है कि भारत ने कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया है. सवाल यह है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में क्या भारत वही रुख़ दोहराएगा या किसी नए रास्ते का चयन करेगा.''

भारत अभी एक धर्मसंकट की स्थिति में है. ट्रंप ने भारत को ग़ज़ा पर 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है. कई देशों ने इसे स्वीकार किया और कई देशों ने नकार दिया.

लेकिन भारत अभी तक कोई फ़ैसला नहीं कर पाया है. कहा जा रहा है कि ट्रंप का 'बोर्ड ऑफ पीस' यूएन की सत्ता को चुनौती देता है. इसकी कोई समय सीमा नहीं तय की गई है. बोर्ड ऑफ पीस की स्थायी सदस्यता के लिए एक अरब डॉलर का भुगतान करना है. कनाडा ने यह रकम देने से इनकार कर दिया है लेकिन भारत अनिर्णय की स्थिति में है.

कार्नी के भाषण में भारत

मार्क कार्नी ने अपने भाषण में भारत का भी नाम लिया था. कार्नी ने कहा था, "कनाडा जैसे मिडिल पावर के लिए सवाल यह नहीं है कि हम नई वास्तविकता के अनुरूप ढलें या नहीं, हमें ढलना ही होगा. सवाल यह है कि क्या हम सिर्फ़ ऊँची दीवारें खड़ी करके ढलेंगे या कुछ अधिक महत्वाकांक्षी करेंगे. पिछले कुछ दिनों में हमने चीन और क़तर के साथ नई रणनीतिक साझेदारियाँ तय की हैं. हम भारत, आसियान, थाईलैंड, फ़िलीपींस और मर्कोसुर के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रहे हैं."

पश्चिम में भारत की अहमियत को चीन से काउंटर करने के तौर पर देखा जाता है. वर्गीज के जॉर्ज मानते हैं कि यह नज़रिया या भारत की यह अहमियत उसके लिए ख़तरनाक है.

जॉर्ज कहते हैं, ''यह भारत के हक़ में नहीं है. भारत को इस नैरेटिव से बाहर निकलना होगा. मेरा मानना है कि दुनिया में कोई भी वैकल्पिक या नया वर्ल्ड ऑर्डर बनेगा तो यह भारत की सक्रिय भागीदारी के बिना नहीं होगा.''

निरूपमा सुब्रमण्यम कहती हैं, ''मेरा मानना है कि ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच सहमति बन जाती है तो अमेरिका के लिए भारत की कोई उपयोगिता नहीं रहेगी.''

मार्क कार्नी ने अपने भाषण में कहा था, ''शक्तिशाली देशों के पास उनकी शक्ति है. लेकिन हमारे पास भी कुछ है: दिखावा बंद करने की क्षमता, वास्तविकताओं को नाम देने की क्षमता, अपने घर में अपनी ताक़त बनाने की क्षमता और मिलकर कार्रवाई करने की क्षमता. यही कनाडा का रास्ता है. हम इसे खुले और आत्मविश्वास के साथ चुनते हैं और यह रास्ता हर उस देश के लिए खुला है जो हमारे साथ अपनाने को तैयार हैं.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.