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जम्मू-कश्मीर: मस्जिदों की प्रोफाइलिंग और इसकी ख़बर देने वाले पत्रकारों को थाने बुलाए जाने पर उमर अब्दुल्लाह क्या बोले?
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
कश्मीर में पुलिस के मस्जिदों, इमामों, मदरसों और ट्रस्ट्स की प्रोफाइलिंग करने के मामले पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने प्रतिक्रिया दी है. इन मामलों की रिपोर्टिंग करने पर पुलिस ने कई पत्रकारों को थानों में तलब भी किया है.
उमर अब्दुल्लाह ने बीबीसी से कहा, "मुझे लगता है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पत्रकारों को एक सही कहानी रिपोर्ट करने और अपना काम करने के लिए इस तरह परेशान किया जा रहा है. अगर पुलिस को लगता है कि मस्जिदों और इमामों की प्रोफाइलिंग करना ज़रूरी है, तो उन्हें अपने काम के बारे में समझाना चाहिए और यह बताना चाहिए कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं."
बीबीसी ने पुलिस के इंस्पेक्टर जनरल (कश्मीर ज़ोन) विधि कुमार बिरदी से इस मुद्दे पर फ़ोन से बात करने की कोशिश की, लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई. पुलिस का पक्ष मिलने पर उसे इस लेख में शामिल किया जाएगा.
वहीं बीजेपी की नेता और जम्मू-कश्मीर वक़्फ़ बोर्ड की चेयरपर्सन डॉक्टर दरक्शां अंद्राबी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा कि ये एक सामान्य प्रक्रिया है.
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जबकि उमर अब्दुल्लाह का कहना है, "यह पहले से ही काफ़ी बुरा है कि वे मुस्लिम धार्मिक स्थलों की प्रोफाइलिंग कर रहे हैं, लेकिन पत्रकारों को परेशान करके वे इसे और भी बुरा बना रहे हैं."
उन्होंने कहा, "दु:ख की बात है कि जिन अख़बारों के लिए ये पत्रकार काम करते हैं, उनका रिएक्शन भी बहुत धीमा रहा है. मुझे उम्मीद थी कि उनके एडिटर तुरंत रिएक्ट करेंगे और अपने रिपोर्टरों का साथ देंगे."
पत्रकारों को थाने पर बुलाया जाना
कश्मीर में पुलिस की तरफ से मस्जिदों, मदरसों, इमामों और ट्रस्टों की प्रोफाइलिंग की ख़बरें सामने आने के बाद श्रीनगर में कई पत्रकारों को थानों पर तलब किया गया है.
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने 21 जनवरी 2026 को जानकारी दी कि श्रीनगर में काम करने वाले उनके संवाददाता बशारत मसूद को पुलिस ने थाने पर तलब किया था और उनसे ज़िला मजिस्ट्रेट के दफ़्तर ले जाकर बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने को कहा गया था.
इंडियन एक्सप्रेस ने कुछ दिन पहले कश्मीर में मस्जिदों की प्रोफाइलिंग करने के मामले पर रिपोर्ट की थी. बीबीसी ने ऐसे तीन पत्रकारों से बात की है जिन्हें पुलिस ने फ़ोन करके थाने पर बुलाया.
एक राष्ट्रीय मीडिया संस्थान के साथ काम करने वाले रिपोर्टर ने नाम न लिखने की शर्त पर बताया, "मुझे श्रीनगर के साइबर पुलिस स्टेशन से बीते मंगलवार को फ़ोन कॉल आया और थाने पर आने के लिए कहा गया. मैं थाने पर चला गया. क़रीब एक घंटे तक वहां बैठा. वहां अधिकारियों ने मुझसे रिपोर्टिंग के बारे में पूछा."
"मुझे कहा गया कि मैंने मस्जिद प्रोफाइलिंग की रिपोर्टिंग करके व्हाट्सऐप ग्रुप में शेयर की है. मैंने ऐसा नहीं किया था. मैंने मस्जिदों के मामले पर रिपोर्टिंग नहीं की थी. एक घंटे की पूछताछ के बाद मुझे जाने दिया गया और मैं वापस घर आ गया."
एक दूसरे पत्रकार ने नाम न लिखने की शर्त पर बीबीसी को बताया, "बीते सोमवार को मुझे श्रीनगर के साइबर पुलिस स्टेशन में बुलाया गया था. मैं अभी तक वहां नहीं गया. मैंने मस्जिदों की प्रोफाइलिंग की रिपोर्ट की थी, जो रिएक्शंस पर आधारित थी."
"कुछ धार्मिक और राजनीतिक संगठनों ने इस पर रिएक्ट किया था जिसको मैंने रिपोर्ट किया."
एक तीसरे पत्रकार ने भी नाम न लिखने की शर्त पर बताया, "कुछ दिन पहले श्रीनगर के साइबर पुलिस स्टेशन से मुझे फ़ोन कॉल आया और पुलिस स्टेशन पर आने को कहा गया."
"मैंने उनसे कहा कि मैं लीव पर हूं और कुछ दिनों के बाद वापस आऊंगा. उसके बाद आपके पास आ सकता हूं. मैंने भी मस्जिदों की प्रोफाइलिंग को रिपोर्ट किया था."
कश्मीर में ऐसा पहली बार नहीं है कि पत्रकारों को थानों पर तलब किया गया हो. इससे पहले भी पत्रकारों को उनकी रिपोर्टिंग के लिए उन्हें थाने पर बुलाया गया है.
पुलिस की 'प्रोफाइलिंग' में क्या है?
ऐसे ख़बरें हैं कि पुलिस ने पांच पन्नों का एक फॉर्म बीते कई दिनों से बांटना शुरू किया. बताया जा रहा है कि यह फॉर्म गाँव के लम्बरदारों के ज़रिए इमामों और मदरसों को दिए जा रहे हैं.
इस फॉर्म में इमामों की निजी जानकारी मांगी गई है. इन जानकारियों में आधार कार्ड नंबर, पैन कार्ड नंबर, मोबाइल का आईएमईआई, गाड़ियों की जानकारी, बैंक खातों की डिटेल्स, परिवार की संपत्ति जैसी बातें शामिल हैं.
इसके अलावा, यह प्रोफाइलिंग मदरसों पर भी लागू होती है. रिकॉर्ड में यह शामिल होता है कि कोई संस्थान किसी दूसरे संगठन से जुड़ा है या नहीं.
इसके साथ ही मदरसों में पढ़ाए जाने वाले कोर्स के प्रकार और हाफ़िज़, क़ारी, इमाम, मौलवी या मुफ़्ती, छात्रों के एडमिशन के आंकड़े, हॉस्टल की क्षमता और डे स्कॉलर्स की संख्या की जानकारी भी मांगी जा रही है.
आधार, पैन और राशन कार्ड नंबर के अलावा, फॉर्म में लंबाई, वैवाहिक स्थिति, ट्रैवल हिस्ट्री, पासपोर्ट डिटेल्स और विदेश में रहने वाले रिश्तेदारों के बारे में जानकारी रिकॉर्ड की जाती है.
फाइनेंशियल जांच में क्रेडिट कार्ड की जानकारी, मासिक ख़र्च और मालिकाना ज़मीन या घरों की अनुमानित कीमत शामिल है.
हालांकि, पुलिस ने अभी तक इसकी न तो आधिकारिक रूप से पुष्टि की है और न ही इससे इनकार किया है. कश्मीर में ऐसा पहली बार हो रहा है जब मस्जिदों और इमामों की प्रोफाइलिंग इतने बड़े पैमाने पर शुरू की गई है.
मस्जिद के इमामों और धार्मिक संगठनों ने क्या बताया?
श्रीनगर की एक मस्जिद के इमाम ने बीबीसी को नाम न बताने की शर्त पर कहा, "जिस तरह से प्रोफाइलिंग करने का क़दम उठाया गया है, वो मामला चिंताजनक है."
उन्होंने कहा, "साल 2019 के बाद कश्मीर में पहले से ही चीज़ें बदल गई हैं. हम पर वैसे भी सरकार की कड़ी निगाह रहती है. अब प्रोफाइलिंग का मसला सामने आया है."
"इस तरह प्रोफाइलिंग करना निजी ज़िन्दगी में दख़ल देने के बराबर है. हमारी निजी ज़िन्दगी का हर रिकॉर्ड अब पुलिस के पास रहेगा. जो किसी भी इंसान के लिए अच्छी बात नहीं है. कौन चाहेगा कि इस तरह से उनके निजी जीवन का एक-एक मामले का रिकॉर्ड पुलिस अपने पास रखें."
उन्होंने कहा, "ये सब कुछ हमें तंग करने की कोशिश है. निजी ज़िन्दगी के मामले इस तरह की प्रोफाइलिंग से ख़राब हो जाते हैं. हमारा इस्लाम भी निजी मामलों के बारे में कहता है कि निजी मालूमात सब तक न पहुंचे. ऐसा करना दूसरे के धर्म के मामले में दख़ल देना है. मस्जिदों में खुतबा देने पर जब सरकार का दख़ल हो तो ये धार्मिक मामलों में दख़ल नहीं तो और क्या है?"
जम्मू-कश्मीर में इस्लामिक धार्मिक संगठनों के एक ग्रुप मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा (एमएमयू ) के प्रवक्ता ने पुलिस की प्रोफाइलिंग को 'घुसपैठ' बताया.
मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा की अगुवाई करने वाले कश्मीर के मुख्य धर्मगुरु मीरवाइज उमर फारूक ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, "पहले जम्मू-कश्मीर में अधिकारी मस्जिदों, इमामों और मदरसों की मनमानी और दख़ल देने वाली प्रोफाइलिंग कर रहे हैं और फिर इस पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है और परेशान किया जा रहा है."
उनका कहना है, "पुलिस स्टेशनों में रिपोर्टरों को हलफनामे, अंडरटेकिंग और बॉन्ड देने के लिए मजबूर करना निंदनीय है.. सच बताना कोई अपराध है. मीडिया हाउस को अपने रिपोर्टरों के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए. आज़ाद प्रेस की रक्षा की जानी चाहिए."
श्रीनगर की एक मस्जिद के इमाम ने हमें पुलिस की इस प्रोफाइलिंग पर बताया, "मस्जिदों, मदरसों और इमामों से मालूमात हासिल करने की प्रक्रिया हमें शक की निगाह से देखना है कि हमारे पास पैसा कहाँ से आता है? हमारी कोई फंडिंग तो नहीं कर रहा है? हमारी हर बात और हर चीज़ पर नज़र रखना हमारे निजी मामलों में दख़ल दिया जा रहा है."
राजनीतिक दलों का क्या कहना है?
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी की प्रमुख महबूबा मुफ़्ती ने मस्जिदों और इमामों की प्रोफाइलिंग पर सरकार की सख़्त आलोचना की.
उन्होंने कहा है कि मस्जिदों को "क्राइम सीन" बनाया गया है.
महबूबा मुफ़्ती ने बीते दिनों एक प्रेस कांफ्रेंस में प्रोफाइलिंग फॉर्म के पन्नों को दिखाया था और बताया था कि ये प्रोफाइलिंग फॉर्म पांच पन्नों का है.
उन्होंने कहा, "अगर इनको ऐसा करना है तो शुरुआत दूसरे धर्मों से करें. वो पता करें कि कौन से मंदिर में कौन सा पुजारी है? मस्जिदों का पुलिस के पास पहले से डेटा मौजूद है, लेकिन दोबारा अब ऐसा करना यहाँ के लोगों से धर्म से दूर रखने की कोशिश है. क्या गुरुद्वारों के साथ आप ऐसा करेंगे. क्या चर्च के साथ आप ऐसा करेंगे? ऐसा तो देश में कहीं नहीं है, जो यहां हो रहा है."
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सिस्ट) मोहम्मद यूसफ़ तारिगामी ने पत्रकारों को थानों पर तलबी को लेकर एक्स पर लिखा है, "रिपोर्टर्स को बुलाना और उनसे बॉन्ड साइन करवाना, उन्हें डरा-धमकाकर चुप कराने की एक नई कोशिश है. यह पत्रकारों को डराने-धमकाने के एक बड़े पैटर्न को दिखाता है, जिसका मक़सद आज़ाद आवाज़ों को चुप कराना है."
बीजेपी की नेता और जम्मू-कश्मीर वक़्फ़ बोर्ड की चेयरपर्सन डॉक्टर दरक्शां अंद्राबी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से मस्जिदों को प्रोफाइलिंग के मामले पर बात की.
उन्होंने कहा कि ये एक सामान्य प्रक्रिया है, जिसे अपडेट किया जा रहा है.
उनका ये भी कहना था कि जिस तरह से पूरे भारत में धार्मिक स्थलों का रजिस्ट्रेशन किया जा रहा है, उसी तरह यहां भी किया जा रहा है.
उन्होंने कहा, "राजनीतिक दल इमामों को गुमराह कर रहे हैं. इसमें किसी भी तरह का कोई एजेंडा नहीं है. जैसे पूरे देश में वक़्फ़ प्रॉपर्टीज को रेजिस्ट्रेड करके सरकार के 'उमेद पोर्टल' पर दर्ज किया गया, उसी तरह यहाँ भी किया जा रहा है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.