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जम्मू में मुस्लिम का घर ढहा तो आगे आया हिंदू परिवार, मकान बनाने को दी अपनी ज़मीन
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, जम्मू से
जम्मू में ध्वस्त किया गया एक मकान आजकल काफ़ी चर्चा में है. ये मकान एक पत्रकार के परिवार का है. जब इस मकान को कुछ दिन पहले प्रशासन और पुलिस ध्वस्त करने पहुंची तो पत्रकार ने उस कार्रवाई की लाइव रिपोर्टिंग की थी.
यह मकान और यह घटना इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि अरफ़ाज़ अहमद डैंग नाम के पत्रकार का घर गिराए जाने से दुखी एक स्थानीय व्यक्ति ने उन्हें अपनी ज़मीन गिफ़्ट कर दी. यह व्यक्ति हिंदू समुदाय से ताल्लुक रखते हैं
उधर इस घटना पर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने भी सवाल उठाया और कहा कि उनकी निर्वाचित सरकार के बजाय जेडीए के अधिकारी उपराज्यपाल के आदेश पर काम कर रहे हैं. बीजेपी ने राज्यपाल का बचाव करते हुए एलजी के आदेश पर यह कार्रवाई किए जाने से इनकार किया है.
वहीं जम्मू डेवलपमेंट अथॉरिटी (जेडीए) का कहना है कि ये सरकारी ज़मीन पर बनाया गया मकान था और इसे गिराने के लिए उचित प्रक्रिया का पालन किया गया है.
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जिस पत्रकार का मकान गिराया गया, उनका कहना है कि उन्हें इस मामले में कोई नोटिस तक नहीं मिला था और सीधे आकर मकान को ज़मींदोज़ कर दिया गया. उन्हें सामान निकालने तक का मौक़ा नहीं मिला.
'पत्रकारिता का सिला मिला'
जिस मकान को ध्वस्त किया गया वह पत्रकार अरफ़ाज़ अहमद डैंग के परिवार का घर था.
अरफ़ाज़ अहमद अपना 'सहर न्यूज़ इंडिया' नाम से सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल चलाते हैं. उनका कहना है कि यह ज़मीन को लेकर लड़ाई नहीं है. उनका मकान इसलिए गिराया गया क्योंकि वह एक पत्रकार हैं जो आम लोगों की आवाज़ बनता है.
वह कहते हैं, "हम बीते चालीस साल से यहां रह रहे हैं. कैसे नोटिस के बगै़र सिविल प्रशासन, जेडीए और पुलिस के लोग तामझाम के साथ यहां पहुंच जाते हैं और मकान को ध्वस्त करना शुरू कर देते हैं. मैं उनके सामने गिड़गिड़ाया और कहा कि उन्हें कोई नोटिस या ऑर्डर दिखाया जाए, लेकिन अधिकारियों का कहना था कि उन्हें ऊपर से मौखिक आदेश हैं कि मकान को गिराया जाए."
कुछ दिन पहले जेडीए ने अरफ़ाज़ आहमद डैंग के नाम का एक नोटिस भेजा था, जिसका जवाब वह दे चुके थे कि यह उनका नहीं बल्कि उनके पिता का मकान है.
वह कहते हैं, "नोटिस मेरे नाम आया था लेकिन प्रॉपर्टी मेरी नहीं है. मैंने उसका जवाब भी दिया था कि यह मेरी प्रॉपर्टी नहीं है. अगर किसी को नोटिस भेजना होता है तो जिसकी प्रॉपर्टी होती है, उसको नोटिस भेजना होता है. जो भी कुछ हुआ है वह मेरे काम से, स्टोरीज़ से संबंधित है."
अरफ़ाज़ के मुताबिक़, उनके पिता को कोई नया नोटिस नहीं मिला था. उनका कहना है कि तीन साल पहले भी जम्मू के बथंडी में उनका मकान गिराया जा चुका है. अपने ऊपर दर्ज कई मामलों को लेकर वह बताते हैं कि सभी मामले उनके काम को लेकर दर्ज किए गए हैं.
'क्या सिर्फ़ मेरा क़ब्ज़ा था?'
अरफ़ाज़ अहमद के पिता ग़ुलाम क़ादिर डैंग कहते हैं, "अगर नोटिस होता तो मुझे पता होता कि कोई विभाग, पुलिस या कोई और आ रहा है. अगर मुझे मालूम होता कि जेडीए यहां आ रही है तो शायद मैं नौ बजे काम पर नहीं निकलता. मैं पूछता हूं कि अब सरकार कहां है? उमर अब्दुल्ला साहब भी इनकार कर रहे हैं और गवर्नर साहब भी इनकार कर रहे हैं... तो फिर आख़िर यह सब करवाया किसने है? इसकी जांच की जाए."
ग़ुलाम क़ादिर कहते हैं कि उनके इलाक़े में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था और ऐसा लगा कि किसी बड़े अपराधी या चरमपंथी को पकड़ना था. इतनी सारी तैयारी के साथ आने का मक़सद सिर्फ यह था कि एक गरीब का घर गिराना था और उनके बेटे को डराना था. घर का सारा सामान भी मकान के मलबे के साथ दब गया है.
अब्दुल क़ादिर बताते हैं कि वह चालीस साल पहले जम्मू शिफ्ट हो गए थे और यहां की फल मंडी में मज़दूरी करके परिवार को चलाते हैं. उनका मकान 675 स्क्वायर फ़ीट ज़मीन पर बना था. वह कहते हैं कि जब उनका मकान गिराया गया तब आस-पास में किसी भी तरह की डेमोलेशन की कार्रवाई नहीं चल रही थी. वह पूछते हैं कि क्या सिर्फ़ उन्होंने ही जेडीए की ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया था?
जेडीए के अधिकारियों ने इस संबंध में आधिकारिक रूप से कुछ भी कहने से इनकार किया. हालांकि जेडीए के एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि मकान को ध्वस्त करने के लिए उचित प्रक्रिया का पालन किया गया था.
'सरकार के ख़िलाफ़ साज़िश'
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मकान को ध्वस्त करने के बाद मीडिया के साथ बातचीत में आरोप लगाया कि उनकी सरकार को बदनाम करने की साज़िश के तहत यह कार्रवाई की गई.
उन्होंने कहा, "चुनी गई सरकार की इजाज़त लिए बिना, संबंधित मंत्रालय से सलाह किए बिना राजभवन से नियुक्त अफ़सर अपनी मर्ज़ी से बुलडोज़र का इस्तेमाल करते हैं. इसका सीधा-सीधा मतलब यह निकाला जाएगा कि चुनी हुई सरकार को बदनाम और ज़लील करने की एक साज़िश रची जा रही है. इसलिए हम बार-बार कहते हैं कि हमारे विभाग में जो फ़ील्ड स्टाफ़ है, उन्हें नियुक्त करने की इजाज़त हमें होनी चाहिए."
मुख्यमंत्री ने कहा, "मैंने अब जेडीए की पूरी लिस्ट मांगी है कि कहां-कहां जेडीए की प्रॉपर्टी पर लोगों का नाजायज़ क़ब्ज़ा है. मैं भी देखना चाहता हूं कि इस एक शख़्स को जेडीए के अफ़सरों ने टार्गेट क्यों किया? कहीं इसका मज़हब तो इसके पीछे नहीं है? ऐसा हो ही नहीं सकता कि जेडीए की ज़मीनों पर सिर्फ़ एक नाजायज़ क़ब्ज़ा हो. हमें कहा जाता है कि हमारे कामकाज में दख़ल नहीं दिया जाता है लेकिन यह तो सीधा-सीधा दख़ल है. कोई दिखाए मुझे फ़ाइल जहां मिनिस्टर को इन चीज़ों के बारे में बाख़बर किया गया हो."
बता दें कि जम्मू-कश्मीर का आवास और शहरी विकास मंत्रालय मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के पास है.
भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि मकान गिराने के आदेश एलजी प्रशासन ने नहीं दिए.
जम्मू-कश्मीर बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और पार्टी के वरिष्ठ नेता रविंद्र रैना मकान को गिराए जाने के अगले दिन परिवार से मिलने पहुंचे थे. उसके बाद उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी भी मकान के मलबे पर परिवार से मिलने गए थे. कांग्रेस और पीडीपी के नेता भी परिवार से मिलने पहुंचे.
मौके़ पर जाकर रैना ने मीडिया से कहा, "यहां जम्मू-कश्मीर की सरकार किसकी है? चुनी हुई सरकार है. बुलडोज़र तो गवर्नर साहब ने नहीं लगाया. मैंने गवर्नर साहब से बात की है उन्होंने कहा कि उनकी तरफ़ से बुलडोज़र भेजने का ऑर्डर नहीं दिया गया. अब यह कहां से आया है?"
हालांकि एलजी प्रशासन कार्यालय की तरफ़ से अभी तक इस संबंध में कोई बयान नहीं आया है.
पूर्व सैनिक ने की अरफ़ाज़ को ज़मीन गिफ़्ट
इस बीच जम्मू शहर के रहने वाले एक हिंदू परिवार ने अरफ़ाज़ अहमद डैंग को ज़मीन का एक प्लॉट तोहफ़े में पेश किया है.
इस व्यक्ति का नाम कुलदीप शर्मा है जो एक पूर्व सैनिक हैं.
ज़मीन का प्लॉट मुस्लिम परिवार को देने पर वह कहते हैं, "जब मैंने यह मंज़र देखा कि एक भाई का मकान ज़मींदोज़ किया गया... छोटा सा बच्चा रो रहा था, मां-बाप भी सड़कों पर आ गए थे. मुझे अपने मां-बाप याद आ गए और मैं फूट-फूट कर रोया. मैं अपनी छोटी बेटी के साथ यह देख रहा था. वह गले लग के रोने लगी और कहने लगी कि चाहे कुछ भी हो जाए, भैया की पीठ नहीं लगने देनी है."
"मेरे मन में आया कि यह मेरा मुस्लिम भाई नहीं है, बल्कि हिन्दू भाई है, इंसानियत का भाई है. तो रहा नहीं गया. उसी वक्त अपनी ज़मीन की रजिस्ट्री के काग़ज़ निकाले. यह मेरी जमा पूंजी थी. मैं वह लेकर चला गया और अरफ़ाज़ को थमा दिए."
शर्मा का कहना है कि जब उन्होंने ज़मीन का प्लॉट अरफ़ाज़ को दिया तो अगले दिन कश्मीर से उन्हें फ़ोन आया और किसी कश्मीरी व्यक्ति ने उन्हें ज़मीन के प्लॉट की पेशकश की. उनका कहना था कि उस कश्मीरी व्यक्ति ने उन्हें कहा कि वो उनका जज़्बा देखकर काफ़ी भावुक हो गया था.
वह कहते हैं कि उन्हें कोई लालच नहीं हैं और उन्होंने इंसानियत के तौर पर यह सब कुछ किया.
कुलदीप शर्मा की बेटी तनाया शर्मा ने जम्मू में अपने घर पर हमें बताया, "मुझे थोड़ा अफ़सोस भी हो रहा है कि लोग कह रहे हैं कि हिन्दू भाई ने ज़मीन गिफ्ट की. मुझे ये अच्छा नहीं लगा. इंसानियत ही सबसे बड़ी बात है. इंसानियत की कोई सरहद नहीं है, इसमें कोई हिन्दू नहीं, कोई मुस्लिम नहीं, कोई सिख नहीं, ईसाई नहीं. जैसे ही पापा ने वीडियो देखा तो हमसे इस संबंध में बात की और हम सबने उनका साथ दिया. हमने कभी नहीं सोचा कि हमें बदले में क्या मिलेगा."
'सबसे अच्छा मैसेज भाईचारे का'
मकान ध्वस्त होने के बाद अब परिवार फ़िलहाल खुली छत के नीचे गुज़र-बसर कर रहा है. परिवार में कई महिलाएं और छोटे बच्चे भी शामिल हैं.
अरफ़ाज़ की मां बार-बार अपने ध्वस्त मकान को देख रही हैं और एकदम ख़ामोश हैं.
कई लोग खाना लेकर सुबह और शाम को पहुंच जाते हैं और परिवार को खाना खिलाते हैं.
मकान के गिराए जाने के बाद एक हिन्दू परिवार की ओर से ज़मीन देने पर अरफ़ाज़ कहते हैं, "एक मुस्लिम परिवार का घर टूटा है और एक हिन्दू परिवार से एक व्यक्ति आता है और कहता है कि मैं पांच मार्के अपनी मिलकियत ज़मीन अरफ़ाज़ डैंग को दे रहा हूं, इससे बढ़कर और क्या संदेश हो सकता है... हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई आपस मैं हम भाई-भाई... तो इससे अच्छा और क्या मैसेज है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.