ममता की टीएमसी और मोदी की बीजेपी के लिए पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव नतीजों के क्या संकेत?

प्रभाकर मणि तिवारी

कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए

ममता बनर्जी

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बड़े पैमाने पर हुई हिंसा, रिकार्ड संख्या में अदालती मामलों, केंद्रीय बलों की तैनाती और फर्जी मतदान के तमाम आरोपों के बावजूद सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने पंचायत चुनाव में विपक्ष को काफी अंतर से पछाड़ कर ग्रामीण इलाकों में एक बार फिर अपना दबाव साबित किया.

त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था के तहत जिला परिषद, पंचायत समिति और ग्राम पंचायत-तीनों में टीएमसी ने प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा को काफी पीछे छोड़ दिया है.

भाजपा दूसरे स्थान पर जरूर रही है लेकिन टीएमसी और उसके बीच लंबा फासला है.

राजनीतिक विश्लेषकों की राय कि पंचायत चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने वाली पार्टी अगले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भी बेहतर प्रदर्शन करती रही है.

हालांकि वर्ष 2018 को अपवाद माना जा सकता है. उस साल 34.2 फ़ीसदी सीटों पर निर्विरोध जीतने और कुल सीटों में से करीब 90 फ़ीसदी पर जीत के बावजूद वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के हाथों से 12 सीटें निकल गई थीं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे को आगे कर 2019 के लोकसभा चुनाव में उतरी बीजेपी को पश्चिम बंगाल में बड़ा फायदा हुआ था. इस बार ममता बनर्जी खोई ज़मीन वापस पाने के इरादे में हैं.

टीएमसी कार्यकर्ता

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टीएमसी का बढ़ा जोश, बीजेपी को झटका

पंचायत चुनाव के नतीजे जहां तृणमूल कांग्रेस के लिए उत्साहजनक कहे जा सकते हैं, वहीं इस बार बेहतर प्रदर्शन का सपना पालने वाली भाजपा को इससे झटका लगा है.

वर्ष 2019 के लोकसभा और 2021 के विधानसभा चुनाव में प्रदर्शन को पैमाना मानें तो पार्टी को इस बार सीटों की संख्या में काफी वृद्धि की उम्मीद थी लेकिन हुआ है इसके उलट.

पूर्व मेदिनीपुर, कूचबिहार,उत्तर 24-परगना के मतुआ बहुल इलाकों और पूर्व मेदिनीपुर में नंदीग्राम छोड़ कर हर जगह उसके प्रदर्शन में काफी गिरावट आई है.

दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र की एकमात्र लोकसभा सीट पर भाजपा का लंबे समय से कब्जा रहा है लेकिन इलाके में स्थानीय भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा ने भाजपा की अगुवाई वाले गठबंधन को काफी पीछे छोड़ दिया है.

बीजेपी के नेता

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बीजेपी के मुद्दे पिटे, महिलाएं ममता के साथ

इन नतीजों ने साबित कर दिया है कि राज्य के ग्रामीण इलाकों के वोटरों पर भ्रष्टाचार, हिंसा और शिक्षक भर्ती घोटाला जैसे मुद्दे बेअसर रहे हैं.

ऐसा होता तो करीब 81 फीसदी मतदान नहीं हुआ होता. इससे यह भी साबित हुआ है कि महिला वोटरों पर ममता बनर्जी की पकड़ उतनी ही मजबूत है जितनी वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव के समय थी. जहां भी महिलाओं का वोट प्रतिशत ज्यादा रहा है, वहां पार्टी के उम्मीदवारों की बड़े अंतर से जीत हुई है.

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में 'लक्ष्मी भंडार' जैसी महिला सशक्तिकरण योजना ने महिला वोटरों को पार्टी से बांधे रखने में अहम भूमिका निभाई है.

टीएमसी कार्यकर्ता

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कांग्रेस के लिए निराशा

इसके अलावा इस चुनाव में बहुचर्चित मुर्शिदाबाद मॉडल भी फेल रहा है.

बीते मार्च में सागरदीघी उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार की जीत के बाद इस मॉडल की काफी चर्चा हो रही थी.

इसी मॉडल के आधार पर कांग्रेस और लेफ्ट के नेताओं को इस बार बेहतर प्रदर्शन करते हुए भाजपा को पछाड़कर दूसरे स्थान पर पहुंचने की उम्मीद थी. लेकिन पिछली बार के मुकाबले प्रदर्शन में सुधार के बावजूद उसे तीसरे स्थान से ही संतोष करना पड़ा है.

टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी

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टीएमसी ने क्या कहा?

चुनाव नतीजों के बाद मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने जहां समर्थन के लिए ग्रामीण इलाकों के लोगों के प्रति आभार जताया है, वहीं पार्टी के सांसद अभिषेक बनर्जी ने अपने ट्वीट में संकेत दिया है कि पंचायत चुनाव की कामयाबी पार्टी को अगले साल लोकसभा चुनाव में पार्टी के बेहतर प्रदर्शन का रास्ता साफ कर देगी.

टीएमसी सांसद और महासचिव अभिषेक बनर्जी का कहना है, "अब तक आए नतीजों और रुझानों से विपक्ष की सांगठनिक कमजोरी जाहिर हो गई है. भाजपा, सीपीएम और कांग्रेस कोई वैकल्पिक योजना पेश करने में नाकाम रही हैं. नतीजों से साफ है कि ग्रामीण इलाके के लोगों ने एक बार फिर ममता बनर्जी पर ही भरोसा जताया है."

वोटर

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विपक्ष ने क्या कहा?

सीपीएम के प्रदेश सचिव मोहम्मद सलीम कहते हैं कि इस नतीजे में लोगों का असली जनादेश नहीं झलकता क्योंकि चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है.

मतदान के दिन बड़े पैमाने पर हिंसा हुई और केंद्रीय बल के जवान कहीं नजर नहीं आए. कांग्रेस के अधीर चौधरी और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने इस चुनाव को महज एक तमाशा करार दिया है.

यह तो पहले से ही कहा जा रहा था कि पंचायत चुनाव तमाम दलों के लिए लोकसभा चुनाव से पहले अपनी ताकत मापने का अंतिम पैमाना साबित होगा.

टीएमसी कार्यकर्ता

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लोकसभा चुनाव के पहले बदलेगी तस्वीर?

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राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस इस परीक्षा में खरी उतरी है. लेकिन पंचायत और लोकसभा चुनाव अलग-अलग मुद्दों पर लड़े जाते हैं और लोकसभा चुनाव से पहले तस्वीर बदल भी सकती है.

राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर समीरन पाल कहते हैं, "ग्रामीण इलाकों में तृणमूल कांग्रेस की मजबूत पकड़ से साफ हो गया है कि इलाके के वोटरों और खासकर महिलाओं के लिए भर्ती घोटाला, भ्रष्टाचार, केंद्रीय एजेंसियों की जांच जैसे मुद्दे कोई अहमियत नहीं रखते. उनके लिए ममता बनर्जी सरकार की ओर से शुरू की गई योजनाएं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं."

मेदिनीपुर स्थित विद्यासागर विश्वविद्यालय में सोशल साइंस के प्रोफेसर शिवाजी प्रतिम बसु ने बांग्ला दैनिक आनंद बाजार पत्रिका में छपे अपने संपादकीय लेख में लिखा है, "कुछ अपवादों को छोड़ दें तो ग्रामीण इलाकों में तृणमूल कांग्रेस की बादशाहत कायम रहने के संकेत तो चुनाव से पहले ही मिलने लगे थे. लेकिन यह सवाल उठ सकता है कि आखिर इतनी हिंसा क्यों हुई."

उन्होंने आगे लिखा है, "इसका जवाब यह है कि वर्ष 2018 के 34.2 फीसदी के मुकाबले इस बार महज 12 फीसदी सीटों पर ही पार्टी के उम्मीदवार निर्विरोध जीते थे. यानी 88 फीसदी सीटों पर तिकोनी लड़ाई हुई है. इसके अलावा कई सीटों पर निर्दलीयों, इंडियन सेक्युलर फ्रंट औऱ एसय़ूसीआई ने जड़ाई को बहुकोणीय बना दिया था."

पश्चिम बंगाल कार्यकर्ता

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ममता होंगी मजबूत?

विश्लेषकों का कहना है कि उम्मीदवारों की संख्या ज्यादा होने के कारण 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' की तर्ज पर ज्यादातर इलाकों में हिंसा हुई है. इसके साथ ही इस नतीजे ने मुर्शिदाबाद मॉडल को नाकाम साबित कर दिया है.

प्रोफेसर पाल कहते हैं, "भाजपा के लिए यह नतीजे चिंताजनक हैं. इससे अगले चुनाव में अपनी 18 सीटें बचाना उसके लिए भारी साबित हो सकता है. कांग्रेस-लेफ्ट गठजोड़ को भले उम्मीदों के मुताबिक कामयाबी नहीं मिली हो, कई इलाकों में उसने भाजपा को कड़ी टक्कर दी है."

उनका कहना है कि अब तक मिले वोटों के प्रतिशत को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि बीते लोकसभा और विधानसभा चुनाव में लेफ्ट और कांग्रेस के जो वोटर भाजपा के पाले में चले गए थे, वे धीरे-धीरे ही सही दोबारा लौट रहे हैं. हालांकि अभी इस आधार पर कोई पूर्वानुमान लगाना जल्दबाजी होगी. लेकिन संकेत भाजपा के अनुकूल तो नहीं ही हैं.

तो क्या इससे अगले आम चुनाव से पहले भाजपा के खिलाफ विपक्ष के प्रस्तावित महागठबंधन में ममता बनर्जी की स्थिति मजबूत होगी.

इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं, "फिलहाल इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहना उचित नहीं होगा. इतिहास तो बदलता भी रहता है. वर्ष 2008 के पंचायत चुनाव के बाद होने वाले आम चुनाव इसका सबूत हैं. यह जरूर है कि ममता इस महीने महागठबंधन के सिलसिले में होने वाली अगली बैठक में एक मजबूत छवि और संदेश के साथ हिस्सा लेंगी. नतीजों ने ग्रामीण इलाको में उनकी पार्टी की मजबूत पकड़ का संदेश तो दे ही दिया है और बंगाल में चुनावी इतिहास गवाह है कि सत्ता का रास्ता ग्रामीण इलाकों से ही निकलता है."

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