औरत की ज़िंदगी क्या पति से शुरू और पति पर ही ख़त्म है? - नज़रिया

इमेज स्रोत, RASHTRAPATIBHVN
- Author, नासिरुद्दीन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
पिछले दिनों एक ‘बहू’ सुर्खियों में रही हैं. उनके सास-ससुर ने उन पर कुछ आरोप लगाए हैं.
वे सेना के कैप्टन अंशुमान सिंह की पत्नी हैं. अंशुमान सिंह को हाल में ही मरणोपरांत कीर्ति चक्र मिला है.
यह सम्मान राष्ट्रपति ने उनकी पत्नी स्मृति सिंह और माँ मंजू सिंह को दिया. इसी के बाद मीडिया में कई तरह की बातें उनके सास-ससुर के हवाले से आ रही है. वह बातें कुछ इस प्रकार हैं...
- बहू सब कुछ लेकर चली गई.
- हमारे पास बेटे की तस्वीर के अलावा कुछ नहीं बचा.
- हम तो बहू को बेटी की तरह रखते.
- वह शादी करना चाहती तो नहीं रोकते.
- हम तो अपने छोटे बेटे से उसकी शादी करा देते.
- सेना की नीति में परिवार की परिभाषा में बदलाव हो.
- उसे प्यार नहीं था.
- वह देश छोड़कर चली जाएँगी.
यह सब पढ़-सुन कर ऐसा लग रहा है कि वे अपनी बहू के बारे में नहीं किसी मुजरिम के बारे में बात कर रहे हैं.

अगर वे इन बातों के ज़रिए किसी तरह के वास्तविक मुद्दों पर ध्यान दिलाना चाहते हैं तो उसका तरीक़ा यह नहीं है, जो इन्होंने अपनाया है.
मीडिया का नज़रिया भी रेखांकित करने वाला है. वह आमतौर पर ऐसे मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है. इन सबके केन्द्र में एक स्त्री है तो इसे पेश करने का अंदाज़ और अलग हो जाता है.
हालाँकि, इस पूरे विवाद के केन्द्र में जो व्यक्ति है, उसकी बात अब तक सुनाई नहीं दी है. इन सब पर सार्वजनिक तौर पर इतनी चर्चा हो रही है कि अब यह मुद्दा निजी दायरे से बाहर निकल चुका है. इसलिए इससे निकलने वाले मुद्दों पर चर्चा करना ग़लत नहीं होगा.
स्त्री के जीवन के बारे में कौन फ़ैसला लेगा?

इमेज स्रोत, ANI
तो क्या एक स्त्री का अपने बारे में फ़ैसला लेना अपराध है? क्या एक स्त्री का अपने मृत पति से जुड़ी चीज़ों पर हक़ जताना ग़लत है? उसका कोई हक़ है भी या नहीं?
क्या स्त्री का जीवन महज़ पति और पति के परिवार से ही जुड़ा है? स्त्री के होने में पति के होने की भूमिका कितनी है?
क्या पति की मृत्यु के बाद भी वह उस जुड़ाव के लिए बाध्य है? क्या किसी स्त्री के जीवन में पति का न होना, उसकी ज़िंदगी से हर तरह की रंगत का दूर हो जाना है?
वह चाहे तो क्या अपना नया वैवाहिक जीवन शुरू नहीं कर सकती है? अगर उसे नया वैवाहिक जीवन शुरू करना है तो उसका विकल्प भी क्या वह घर ही है? लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि किसी स्त्री का स्वतंत्र अस्तित्व है या नहीं? या स्त्री का जीवन पति से ही शुरू होता है और पति पर ही ख़त्म होता है?
शादी के बाद पति का न रहना क्या स्त्री की ज़िंदगी का भी अंत माना जाएगा? क्या शादी के बाद उसकी स्वतंत्र पहचान भी ख़त्म हो जाती है? या उसकी अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी और शख़्सियत ही ख़त्म समझ ली जाए?
सबका दुख, दुख ही है

इमेज स्रोत, SOCIALMEDIA
दुखों की तुलना बेमानी है. दुख तराज़ू पर तौले जाने वाली चीज़ नहीं है. ऐसा करना दुखी लोगों के दुख को कमतर करना है.
ख़बरों के मुताबिक़, अंशुमान और स्मृति की आपसी पसंद की शादी थी. वे दोनों काफ़ी समय से एक-दूसरे को जानते थे. ज़ाहिर है, अंशुमान का न रहना, स्मृति की ज़िंदगी में भी बड़ा ख़ालीपन पैदा कर गया होगा.
दुख का पहाड़ सिर्फ़ माँ-बाप पर नहीं गिरा है. स्मृति पर भी दुख का पहाड़ है. उनका वैवाहिक जीवन तो अभी शुरू ही हुआ था. उस पर एक झटके में विराम लग गया. उसने अपना साथी खोया है.
किसी स्त्री का अपने साथी को खोना क्या होता है, यह हमें समझना होगा. ऐसी हालत में उनके सामने लम्बी ज़िंदगी पड़ी है. इसीलिए यह ज़रूरी है कि जब हम इन मुद्दों पर बात करें तो इस बात का ख़्याल रखें. मीडिया के ज़रिए व्यक्तिगत ज़िंदगियों की पड़ताल न करें.
स्त्री का जीवन और सात जन्मों का बंधन

इमेज स्रोत, RASHTRAPATIBHVN
अभी हाल ही में एक शादी की धूम रही है. उस शादी में कन्यादान की महिमा का बखान हुआ. यही नहीं कहा गया कि शादी तो सात जन्म का साथ है. सात जन्म के साथ का विचार ही स्त्री को हमेशा से बाँधते आया है.
पुरुष को इस विचार से कभी बँधा नहीं पाया गया. तब ही तो हमारे समाज में सती जैसी प्रथा थी. स्त्रियाँ मृत पति के साथ ख़ुद का अंत कर लेती थीं. पुरुष मृत पत्नी के साथ ख़ुद का अंत करता हो, ऐसे तथ्य नहीं मिलते.
आज भले ही सती का अंत हो चुका हो लेकिन हमारी ख़्वाहिश स्त्री से कुछ ऐसे ही समर्पण की है. हम स्त्री से यही अपेक्षा करते हैं कि वह पूरी तरह से अपने पति से बंधी रहे. किसी भी सूरत में वह उससे अलग अपने अस्तित्व के बारे में न सोचे.
पति की मृत्यु के बाद भी उसका समर्पण ख़त्म न हो. यह अपेक्षा पतियों से नहीं दिखती यानी यह एकतरफ़ा अपेक्षा है. स्त्री से यह अपेक्षा सभी समुदायों में है. कहीं यह मज़हब के नाम पर है तो कहीं रिवाज के नाम पर.
जिसका जीवन है, वह ख़ुद तय करेगा

इमेज स्रोत, RASHTRAPATIBHVN
कोई भी स्त्री अपनी आगे की ज़िंदगी कैसे गुज़ारेगी, यह तय करना उनका हक़ है. पति के न रहने पर वह कैसे और कहाँ रहेगी, यह भी उसे ही तय करने देना चाहिए.
उस पर किसी तरह का विचार थोपना, उसके उस हक़ को ख़त्म करना है. यही नहीं, उसे दिमाग़ी तौर पर किसी ख़ास दिशा में सोचने पर मजबूर नहीं करना चाहिए. उसे अपने बारे में फैसला लेने का पूरा मौक़ा मिलना चाहिए.
यह विचार कहाँ से आता है कि वे चाहें तो वे अपने छोटे देवर से ब्याह कर लें. इसमें दो चीज़ें हैं. पहला, स्त्री के लिए ब्याह ही ज़िंदगी जीने का एकमात्र विकल्प है. ये मान लिया जाता है कि उसे अगर एक पति मिल गया तो उसका जीवन धन्य हो गया.
दूसरा, वह अपने को उसी घेरे में रखे, जिस घेरे में वह थी. यानी वह पति के परिवार के साथ ही अपना भविष्य देखे. स्मृति या किसी भी स्त्री को इस दुविधा में क्यों डालना? या स्त्री की ‘सुरक्षा’ शादी ही है और वह शादी मृत पति के घर में ही हो?
ऐसे विचार उस नज़रिए की देन है, जो स्त्री को आज़ाद व्यक्तित्व नहीं मानता. यही नहीं स्त्री को जब बुरा साबित करना होता है तो उस पर कई तरह के आरोप लगाए जाते हैं. इन आरोपों में दम हो न हो, समाज की नज़र में उसे बुरा तो बना ही देते हैं.
यहाँ यह सवाल पूछना बेमानी नहीं होगा कि कितने ससुराल वाले बेटे के न रहने पर अपनी बहू को सम्मान के साथ बराबरी का परिवारीजन मानते हुए रखते हैं? ऐसी बहुओं की ज़िंदगी कितनी मुश्किल होती है, हम अपने समाज में देख सकते हैं.
स्मृति बन जाइए और फिर सोचिए
असल में जब तक उस स्त्री के तौर पर हम नहीं सोचेंगे जिसने अपने साथी को खोया है, तब तक हमें उस दिमाग़ी हालत का अंदाज़ा नहीं लगेगा जिससे स्मृति गुज़री हैं या गुज़र रही हैं.
हमें उनकी दिमागी हालत का पता नहीं. हमें उनकी बातें भी नहीं पता. हमें सारी बातें एक तरफ़ से पता चल रही हैं… और मीडिया के ज़रिए जो पता चल रहा है, वह स्मृति को ‘अच्छी स्त्री’, ‘अच्छी या संस्कारी बहू’ के रूप में नहीं पेश करता.
सारी कथा इसके इर्द-गिर्द है कि वह चली गई. क्यों गई? क्या उसे नहीं जाना चाहिए? क्या उसे न चाहते हुए भी ख़ुद को बांध देना चाहिए?
स्त्री का स्वतंत्र अस्तित्व
बात घूम-फिरकर मूल मुद्दे पर आती है. यानी स्त्री का आज़ाद वजूद है या नहीं? स्त्री की अपनी ज़िंदगी है. स्मृति के पास तो लम्बी ज़िंदगी है. उस ज़िंदगी का वह क्या करेंगी, कैसे गुज़ारेंगी, किसके साथ गुज़ारेंगी- यह सिर्फ़ और सिर्फ़ उनका निजी मामला है.
यह किसी भी स्त्री का अपना फै़सला होना चाहिए. अगर वह नहीं चाहती है तो उसमें दख़ल देने का किसी को भी हक़ नहीं है. चाहे वह कोई भी क्यों न हो.
थोड़ी देर के लिए हम सोचकर देखते हैं कि स्त्री की जगह पुरुष होता… तो क्या उसके बारे में भी ऐसी ही चर्चा होती या उसे भी ऐसी ही सलाह दी जाती?
इस समाज के तराजू़ का एक पलड़ा पुरुषों की तरफ़ झुका है. वह उन्हें जितनी आज़ादी देता है, स्त्रियों को उतना ही बाँधता है. जो हो रहा है, वह एक स्त्री को बाँधने की कोशिश है.
ये सब यह भी बताता है कि बतौर समाज हम स्त्री के साथ कैसा बर्ताव करते हैं. यह प्रकरण बता रहा है कि हमारे समाज में स्त्री होना कितना चुनौती भरा है. समाज हमेशा और हर रूप में उसे अपने ख़ास तरह के खाँचे में ढला देखना चाहता है. उस खाँचे से इतर स्त्री ने कुछ भी किया तो उसे नकार दिया जाता है. बुरी स्त्री बना दिया जाता है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)


















