ग़ज़ा पर इसराइली बमबारी: 'मेरी बेटी को लगता है मिसाइल हर शख़्स का पीछा कर रही है'

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- Author, दियाला अल इज़्ज़ह
- पदनाम, बीबीसी अरबी
एक ऐसे क्षेत्र में जहां लगभग बीस लाख लोगों की आबादी का आधे से अधिक हिस्सा बच्चे हैं, वहां युद्ध के प्रभाव सबसे अधिक गंभीर होते हैं.
इसकी वजह यह है कि बच्चों पर इसके कई साल तक बेहद बुरे प्रभाव पड़ सकते हैं. कुछ लोगों के मन में यह सवाल आएगा कि माता-पिता अपने बच्चों को युद्ध के बुरे प्रभावों से कैसे बचा सकते हैं.
और क्या इस दौरान मनोवैज्ञानिक देखभाल का कोई तरीक़ा उपलब्ध है?
इस रिपोर्ट में हमने ग़ज़ा में इसराइली बमबारी के साये में रहने वाले ऐसे परिवारों की कहानी बयान की है जिन्होंने ग़ज़ा की पट्टी में बार-बार युद्ध देखे हैं लेकिन वर्तमान युद्ध को वह पहले के युद्धों से 'अलग' बताते हैं.
पत्रकार हन्नान अबू दग़ीम ने मुझसे व्हाट्सऐप के ज़रिए की गई संक्षिप्त बातचीत में कहा कि उन्होंने अपने बच्चों के साथ रहने के लिए इन परिस्थितियों में अपना पेशा त्याग दिया.
उनका कहना था, "अल रमल मोहल्ले में मेरे घर को काफ़ी नुक़सान पहुंचा. कुछ दिन पहले मैं वहां से अपने भाई के घर चली आई, जहां तीन परिवारों ने एक साथ रात बिताई. जब बमबारी में तेज़ी आती है तो बच्चे विर्द करना (दुआ पढ़ना) शुरू कर देते हैं. जब बमबारी तेज़ होती है तो मैं बच्चों को इकट्ठा करती हूं और उनके साथ खेल कर उनका ध्यान हटाने की कोशिश करती हूं हालांकि मुझे अपने मन को शांत करने के लिए किसी की ज़रूरत होती है. लेकिन मैं उन्हें कहती हूं कि यह एक संकट है और यह गुज़र जाएगा, और यह कि ख़ुदा हमारे साथ है."
हन्नान, जो इन हालात में पत्रकार की भूमिका भी अदा निभा रही हैं, कहती हैं कि वह इस बात पर विश्वास रखती हैं कि उनके परिवार की सुरक्षा एक प्राथमिकता है.
वह कहती हैं, "मैं आपको विश्वास दिलाती हूं कि ग़ज़ा की पट्टी के लोग एक बात पर एकमत हैं और वह यह कि अपने तमाम बच्चों के साथ एक ही कमरे में सोना ताकि अगर कोई गोला घर पर गिरे तो सब मर जाएं."
यह इसलिए ताकि परिवार एक साथ रहे और कोई जीवित न रहे और न ही किसी को मरने वालों का मातम करना पड़े.

'जब बमबारी ख़त्म होगी मैं तुम्हें एक अच्छा तोहफ़ा दूंगी'
ग़ज़ा की पट्टी के दक्षिण में ख़ान यूनुस में रहने वाली सहर कमाल नाम की एक और मां के दो बच्चे हैं. जब बमबारी में तेज़ी आती है तो उनकी चार साल की बेटी रेतल बमबारी की डरावनी आवाज़ की शिकायत करने लगती हैं.
इसलिए सहर को उनसे वादा करना पड़ता है कि हालात बेहतर होते ही वह उन्हें ख़ूबसूरत तोहफ़ा लेकर देंगी, अगर वह उन्हें तंग नहीं करेंगी.
सहर अपने दो साल के बच्चे को भी हंसाने के लिए हंसी ठिठोली की आवाज़ निकालने की कोशिश करती हैं.
पांच बच्चों की 30 वर्षीय मां लैला मोहम्मद कहती हैं कि वह एक मां के तौर पर अपने बच्चों के लिए बहुत डरी हुई रहती हैं और उनकी सुरक्षा की कोशिश करती हैं क्योंकि वह बाहर जाना और बेघर होने को 'बहुत मुश्किल' समझती हैं.
वह कहती है कि इस युद्ध में कोई भी जगह सुरक्षित नहीं है और अतीत के युद्धों में दूसरी जगह जाने के अनुभव के बाद "मेरी बेटी सलमा को वह लम्हे अब भी याद हैं और हर दिन वह मुझसे कहती है मैं घर छोड़ना नहीं चाहती, मैं जाना नहीं चाहती."
"वह महसूस करती है कि मिसाइल गली में चलने वाले हर व्यक्ति का पीछा कर रहे हैं क्योंकि हम पहले भी उन लम्हों से गुज़र चुके हैं और वह उससे डरती है."
मुनाल सालिम के लिए स्थिति कुछ ख़ास अलग नज़र नहीं आती. उनका कहना है कि वह अपने बच्चों के साथ कमरे में बैठती हैं और खिलौने का बंदोबस्त करने लगती हैं ताकि बच्चे बम धमाके की आवाज़ पर ध्यान न दें.
उनका कहना था, "मेरा बेटा फ़ारस, जो 8 साल का है, बहुत अधिक बाथरूम जाता है और कई बार बहुत डर की वजह से अपने ऊपर पेशाब कर देता है"
"उसे हवाई जहाज़ों की आवाज़ से नफ़रत है. मैं चाहती हूं कि अपने बच्चों के इलाज के लिए मनोवैज्ञानिक के पास जाऊं और इस स्थिति से निकल सकूं."

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'बच्चों की नज़्में मिसाइलों की आवाज़ से तेज़ थीं'
ईमान बशीर इस युद्ध को पिछले युद्धों से अलग मानती हैं. वह तीन बच्चों की मां हैं और उनसे मैंने 2021 में ग़ज़ा पर पिछले युद्ध के दौरान बात की थी. उस समय उन्होंने मुझे अपने बच्चों को युद्ध के प्रभाव से निपटने के लिए मनोवैज्ञानिक तौर पर मदद करने के लिए कुछ व्यक्तिगत कोशिशों के बारे में बताया था.
जैसे कि बमबारी के दौरान कहानी पढ़ना और अगर बमबारी ऊंची आवाज़ में हो तो ऊंची आवाज़ में गाने स्पीकर पर चला देना ताकि बच्चे बाहर मिसाइलों की आवाज़ न सुन सकें.
लेकिन अब सात अक्टूबर की सुबह शुरू होने वाले इस युद्ध के दौरान ईमान व्हाट्सएप के ज़रिए एक बहुत ही संक्षिप्त संदेश में कहती हैं, "इस बार का युद्ध अलग है, स्थितियां बहुत बुरी हैं. मैं नहीं जानती कि क्या करूं, क्योंकि मेरे पति देश से बाहर हैं और मेरे तीन बच्चे हैं. और हालात इसलिए भी अधिक ख़राब होते जा रहे हैं कि बिजली कटी हुई है, इसलिए मुझे नहीं मालूम कि क्या करूं. बस, हमारे लिए दुआ करें."
ईमान ने एक्स (ट्विटर) पर युद्ध के दौरान ग़ज़ा की पट्टी में जो कुछ हो रहा है उसका विवरण साझा किया है. उनमें से कुछ विवरण उनके लिए बयान करना दुख भरा है जिसमें उस मोहल्ले पर बमबारी भी शामिल है जहां उनके परिवार वाले कुछ दिन पहले रहते थे.
'सेव दी चिल्ड्रेन' ने पिछले साल एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें हाल के वर्षों में ग़ज़ा की पट्टी में बच्चों की मनोवैज्ञानिक स्थिति की तुलना पेश की गई थी. और यह बताया गया था कि 2022 में लगभग 88 प्रतिशत बच्चे मनोवैज्ञानिक समस्याओं का शिकार हुए जबकि इससे पहले के वर्षों में यह दर 55 प्रतिशत थी.
रिपोर्ट के अनुसार बच्चों को जिन मनोवैज्ञानिक परेशानियों का सामना है, उनमें से जिनकी दर बढ़ रही है, उनमें डर, बेचैनी और अत्यंत उदासी शामिल हैं.
ग़ज़ा की पट्टी दुनिया के सबसे अधिक घनी आबादी वाले क्षेत्रों में से एक है. लगभग 23 लाख फ़लस्तीनी 41 किलोमीटर लंबे और 10 किलोमीटर चौड़े क्षेत्र में रहते हैं. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार ग़ज़ा की 80 प्रतिशत आबादी अंतरराष्ट्रीय सहायता पर निर्भर है और लगभग 10 लाख लोग हर दिन भोजन के लिए भी मदद पर निर्भर रहते हैं.
हर युद्ध के साथ या उसके बाद राहत पहुंचाने वाले कार्यकर्ता और गैर सरकारी संगठन बच्चों को उन सदमों से निकाल पाने में मदद करने की कोशिश करते हैं जिनका वह अनुभव करते हैं. उनमें अहमद हिजाज़ी नाम के एक युवा कार्यकर्ता भी हैं, जो सोशल मीडिया मंचों पर अपने एकाउंट्स के ज़रिए कुछ आसान और उद्देश्यपूर्ण गतिविधियां करते हैं जिसका मक़सद है, 'ग़ज़ा के बच्चों को ख़ुश करना.'
लेकिन युवा अहमद हिजाज़ी ने जो कुछ पेश किया वह युद्ध शुरू होते ही बदल गया. उन्होंने ग़ज़ा की पट्टी में बच्चों के स्वास्थ्य की स्थिति को डॉक्यूमेंट्री की शक्ल देनी शुरू कर दी. यह ऐसे बच्चों का दस्तावेज़ है जो ख़ुद बमबारी का शिकार हुए हों या उन दिनों उनके क्या अनुभव रहे हैं.
जो बात मनोवैज्ञानिक संकट की गंभीरता को बढ़ाती है वह यह है कि उनमें से अधिकतर बच्चे ग़ज़ा में उस घेराबंदी में रहते हैं जिसकी शुरुआत सोलह साल पहले हुई थी यानी वह नहीं जानते कि पांच युद्धों के अलावा ग़ज़ा कैसा था.

मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना कितना मुश्किल है?
यह सवाल युद्ध की स्थिति में रहने वालों या उन लोगों के लिए भी हो सकता है जो दूर से युद्ध को देख रहे हैं.
ग़ज़ा में सुरक्षित जगह की कमी और सड़कों के नेटवर्क में रुकावट के साथ-साथ बिजली और पानी भी बंद है. ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना एक कम महत्वपूर्ण बात लगती है लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार मनोवैज्ञानिक प्राथमिक उपचार लंबे समय में लाभ पहुंचाने वाला होता है.
उदाहरण के लिए विशेषज्ञों के अनुसार, "बच्चों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने से नुक़सान पर क़ाबू पाने में मदद मिलती है."
ग़ज़ा मेंटल हेल्थ प्रोग्राम के डायरेक्टर डॉक्टर यासिर अबू जामिया कहते हैं, "बच्चों की शैक्षणिक योग्यताएं बड़ों की तरह नहीं होतीं लेकिन वह ख़तरों को साफ़तौर पर महसूस करते हैं. वह ऐसा केवल अपने घर वालों की आंखों में डर देखकर महसूस कर लेते हैं या जब उन्हें अपने बड़े तनाव की स्थिति में नज़र आते हैं. और निश्चित रूप से जब वह बमबारी और धमाकों की आवाज़ सुनते हैं."
डॉक्टर अबू जामिया ग़ज़ा के लोगों को राय देते हैं कि वह मानसिक तनाव और परेशानी को बड़ों से बच्चों तक पहुंचने को कम करने के लिए कुछ आदतों को कम करने की कोशिश करें. उदाहरण के लिए "माता-पिता को चाहिए कि वह खिड़कियों से देखना कम करें, हर समय ख़बरों पर नज़र न रखें और बच्चों को योजना बनाने में शामिल करें. जैसे घर में सुरक्षित जगह के लिए या किसी रिश्तेदार के घर जाने की योजना बनाने में. इस फ़ैसले में बच्चों को शामिल करने से वह सहज महसूस करते हैं, विशेष तौर पर जब वह धमाकों की आवाज़ सुनते हैं."
डॉक्टर अबू जामिया कहते हैं कि माता-पिता को कोशिश करनी चाहिए कि "उन तरीक़ों पर चलें जो उनके बच्चों को परेशानी से दूर करने में सहायक साबित हों. जैसे कि उन्हें अपने डर के बारे में बात करने की प्रेरणा देना लेकिन उन्हें झूठी ख़बरें बताए या उनसे झूठे वादे किए बिना यह अधिक उचित है. डर के बारे में बात करें और उनके साथ रोज़मर्रा की गतिविधियों में हिस्सा लेते रहें."

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स्कूल शरणस्थली के रूप में
स्कूल आमतौर पर बच्चों के लिए दोस्तों से मिलने, पढ़ने और मैदान में खेलने के लिए एक जगह होती है लेकिन ग़ज़ा की पट्टी में स्कूलों ने बेघर परिवारों के लिए अपने दरवाज़े खोल दिए हैं.
संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनडब्ल्यूआरए (यूनाइटेड नेशंस रिलीफ़ एंड वर्क्स एजेंसी) की ओर से जारी किए ताज़ा आंकड़े के अनुसार युद्ध के छठे दिन गुरुवार तक ग़ज़ा के दो लाख 80 हज़ार से अधिक नागरिक ग़ज़ा की पट्टी में 92 से अधिक स्कूलों और उससे संबंधित जगहों में शरण लिए हुए हैं.
शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र की रिलीफ़ एंड वर्क एजेंसी ने कहा कि जिन स्कूलों में लोगों ने शरण ली है वहां बहुत अधिक लोग मौजूद हैं और वहां भोजन और पानी की उपलब्धता सीमित है.

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'मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरा पूरा बदन दर्द कर रहा है'
दक्षिणी ग़ज़ा की पट्टी के जबालिया कैंप से संबंध रखने वालीं 30 साल की सऊद जबर रहती हैं कि माएं युद्ध में मुश्किल हालात में जीवन बिता रही हैं और इसलिए उन्हें बच्चों के सामने मज़बूत होना चाहिए.
वह कहती हैं, "मुझे ऐसा लगता है कि मेरे बच्चों से दुख छिपाने और न रोने की वजह से मेरा पूरा बदन दर्द कर रहा है. मुझे लगता है कि नकारात्मक ऊर्जा मेरे शरीर के पुट्ठों में खिंचाव पैदा कर रही है और मेरे बदन के हिस्से को नुक़सान पहुंचा रही है. लेकिन फिर भी मैं अपने बच्चों के सामने मज़बूत होने की कोशिश करती हूं."
हर मां ज़रूरी काग़ज़ात रखने के लिए एक बैग तैयार करने की कोशिश करती है ताकि बमबारी के दौरान वह और बच्चे जल्दी से बाहर निकल सकें.
ऐसा ही सऊद जबर के साथ हुआ जो अलसीका के क्षेत्र में बमबारी के बाद अपना घर छोड़कर वापस चली गईं क्योंकि वहां "कोई सुरक्षित जगह नहीं है."
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