कस्टमर जल्दी-जल्दी मोबाइल फ़ोन क्यों बदल रहे हैं?

मेट्रो स्टेशन पर बैठकर मोबाइल फ़ोन देखती दो युवतियां

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इमेज कैप्शन, सबसे ज़्यादा मोबाइल फ़ोन बनाने वाले देशों में भारत दुनिया में दूसरे नंबर पर है. (सांकेतिक तस्वीर)
    • Author, भरत शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

'यार ये फ़ोन डेढ़ साल पहले लिया था, अभी से हैंग होने लगा है.'

'गैलरी तो भरी पड़ी है, स्टोरेज का पंगा होगा.'

'पता नहीं यार, क्या करूं, रिपेयर करवा लूं?'

'सेल चल रही है यार, नया ले ले.'

'इसका क्या करूंगी?'

'घर पर दादी को दे दे या एक्सचेंज कर ले, नया वाला कुछ सस्ता पड़ जाएगा.'

दिल्ली के एक मेट्रो स्टेशन पर दो कॉलेज स्टूडेंट की ये बातचीत भारत में मोबाइल फ़ोन बाज़ार से जुड़ी कई तस्वीरें एक साथ दिखाती है.

लेकिन ये तस्वीर हमेशा ऐसी नहीं थी.

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31 जुलाई, 1995. ये वो दिन था जब भारत में पहली बार मोबाइल फ़ोन की घंटी बजी.

उस समय के कम्युनिकेशन मिनिस्टर सुखराम और पश्चिम बंगाल के चीफ़ मिनिस्टर ज्योति बसु के बीच हुई पहली कॉल से लेकर भारत की 85.5% फ़ैमिली में कम से कम एक स्मार्टफ़ोन होने तक, इस डिवाइस ने भारत में लंबा सफ़र तय किया है.

ये सिर्फ़ बात करने की डिवाइस ही नहीं रह गई है. अब ये कई लोगों का बैंक है, कैमरा है, गेमिंग कंसोल है, वीडियो कॉलर है, क्लासरूम है और टेलीविज़न भी है.

सरकार के आंकड़े बताते हैं कि सबसे ज़्यादा मोबाइल फ़ोन बनाने वाले देशों में भारत दुनिया में दूसरे नंबर पर है. और यहां 300 ऐसे कारखाने हैं, जिनमें मोबाइल फ़ोन बनते हैं.

हर साल भारत में 33 करोड़ फ़ोन बनाए जाते हैं, और बाहर से आने वाले मोबाइल फ़ोन अलग हैं. इस समय भारत में औसतन एक अरब मोबाइल फ़ोन इस्तेमाल हो रहे हैं.

215 अरब डॉलर की सेल्स के साथ भारत अब दुनिया में स्मार्टफ़ोन का तीसरा सबसे बड़ा बाज़ार है.

किफ़ायती और प्रीमियम, दोनों फ़ोन धड़ल्ले से बिक रहे हैं. भारत का मोबाइल फ़ोन एक्सपोर्ट भी 2024-25 में बढ़कर 24.1 अरब डॉलर पर पहुंच चुका है.

क्या मोबाइल फ़ोन सस्ते हो गए हैं?

ट्रेन में बैठकर मोबाइल फ़ोन देखती दो लड़कियां

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इन भारी-भरकम आंकड़ों के बीच एक सवाल और ज़ेहन में आता है कि अब कंज़्यूमर जल्दी-जल्दी मोबाइल फ़ोन क्यों बदल रहे हैं?

क्या मोबाइल फ़ोन सस्ते हो गए हैं या फिर फ़ाइनेंस के दांव ने एक्सेस बढ़ा दिया है?

क्या मोबाइल फ़ोन कम ड्यूरेबल बन रहे हैं, और पुराने जितने मज़बूत नहीं हैं?

क्या सॉफ़्टवेयर अपडेट और हार्डवेयर चेंज ने इन्हें बदलना ज़रूरी बना दिया है?

क्या कंज़्यूमर का बर्ताव ही पूरी तरह बदल गया है?

या फिर ये चारों बातें सच हैं!

टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट मोहम्मद फ़ैसल अली कवूसा इसे बड़े बदलाव से जोड़ते हैं. उनके मुताबिक अगर आप कंज़्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स को लेकर ग्राहकों का व्यवहार देखें तो उसमें भी काफ़ी बदलाव आया है. एक समय था जब टीवी को लेकर लोगों का मत रहता था कि ये कई पीढ़ियों के लिए घर में आ रहा है. पिता या कुछ मामलों में दादा ख़रीदते थे और बेटा-पोता बरता करते थे. लेकिन अब आप देखेंगे कि एक ही पीढ़ी में कई सारे टीवी आ जाते हैं. ये एक जेनेरिक चेंज है कि अपडेट रहें. और वो लोग इसका खर्च भी उठा सकते हैं.

बार-बार मोबाइल फ़ोन क्यों बदलने पड़ते हैं?

मेट्रो में फ़ोन देखती एक युवती

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इमेज कैप्शन, सेल्युलर टेक्नोलॉजी बदलने के कारण मोबाइल फ़ोन बदलना बड़ी वजह है.

इस पर कवूसा ने बीबीसी से कहा, ''जहां तक स्मार्टफ़ोन की बात है तो एक तो सेल्युलर टेक्नोलॉजी बदलती रही है. 3जी, 4जी, 5जी आते रहे हैं, कुछ साल बाद 6जी आएगा. ये मोबाइल फ़ोन रिप्लेस करने की बड़ी वजह बन जाता है. इसके अलावा कभी फ़ोन में लैग लगता है, कभी बैटरी चार्ज ठीक नहीं होता. इन वजहों से कस्टमर चेंज के बारे में सोचने लगता है.''

लेकिन ये लैग आता क्यों है? कहीं ऐसा तो नहीं कि मोबाइल फ़ोन का यूज़ इतना बढ़ गया है कि वो जल्दी हांफ़ने लगे हैं.

ग्लोबल टेक्नोलॉजी मार्केट रिसर्च कंपनी काउंटरपॉइंट रिसर्च में रिसर्च डायरेक्टर तरुण पाठक इसी ओर ध्यान दिलाते हैं. वो कहते हैं कि पहले फ़ीचर फोन होते थे, जिनसे हम कॉल करते थे, थोड़ी-बहुत गेम खेलते थे. एवरेज की बात करें तो दिन में दो घंटे फोन इस्तेमाल करते थे. लेकिन अब भारत में मोबाइल फोन का डेली एवरेज यूज छह-साढ़े छह घंटे का है. इसमें तीन गुना इज़ाफ़ा हुआ है. दिन का एक-चौथाई समय लोग फोन पर गुज़ार रहे हैं. ऐसे में उन्हें नुकसान पहुंचने का ख़तरा भी ज़्यादा है.

कवूसा का भी कहना है कि स्मार्टफोन हमेशा इस्तेमाल होने वाला डिवाइस है. ये हाथ में रहता है, गिरता है, इसलिए डैमेज होने का ख़तरा रहता है. 19-20 का भी फ़र्क आ जाता है तो आप बोलने लगते हैं कि दिक्कत आ रही है.

स्मार्टफोन मार्केट का पीक साल 2017 में आया था, जब दुनिया में 1.4-1.5 अरब फोन बिके थे. ये बाज़ार स्टैबलाइज़ हुआ, और फिर नीचे आना शुरू हुआ. अब स्मार्टफोन इंडस्ट्री वर्ल्डवाइड 1.2 अरब पर है.

तरुण पाठक ने बीबीसी से कहा, ''इसका मतलब ये है कि लोग फोन को ज़्यादा समय तक रख रहे हैं. तो अगर हम डेटा की बात करेंगे तो इस हाइपोथिसिस को सपोर्ट नहीं मिलता है कि लोग दो साल में फ़ोन बदल देते हैं.''

हालांकि, जानकार इस बात से इत्तेफ़ाक रखते हैं कि कस्टमर के सामने मोबाइल फ़ोन बदलने के कई कारण भी हैं.

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टेक रिव्यूअर और सीएनबीसी-टीवी 18 में एंकर शिबानी घरात का कहना है कि मोबाइल फ़ोन ज़्यादातर सॉफ़्टवेयर अपडेट, बैटरी कमज़ोर पड़ने और हार्डवेयर लिमिटेशन की वजह से 'बेकार' हो जाते हैं. ऐप्स और ऑपरेटिंग सिस्टम समय के साथ-साथ ज़्यादा प्रोसेसिंग पावर और मेमोरी की मांग करते हैं, ऐसे में पुराने मॉडल ज़्यादा समय तक चल नहीं पाते.

शिबानी के मुताबिक रिप्लेसमेंट पुश या चेंज साइकिल, पूरी तरह नेचुरल नहीं है, बल्कि आंशिक रूप से डिजाइन को लेकर पसंद इसके लिए ज़िम्मेदार है, जो लॉन्जेविटी के बजाय इनोवेशन स्पीड और कंज़्यूमर टर्नओवर को तरजीह देता है.

वॉशिंग मशीन या माइक्रोवेव जहां दशक में एक बार ख़रीदा जाता है, वहीं फ़ोन ऐसी प्रोडक्ट कैटेगरी बन गया है, जहां सुनियोजित अपग्रेड साइकिल, मुनाफ़े का फ़्लो बनाए रखते हैं.

शिबानी ने बीबीसी से कहा, ''फिजिकल डिवाइस भले काम करना जारी रखें, लेकिन अपडेट रुकने के बाद वो काम के नहीं रहते. कुछ कंपनियां छह साल के सॉफ्टवेयर अपडेट और सिक्योरिटी पैच ऑफ़र करती हैं, लेकिन इनकी संख्या बेहद कम है. कई लोग ऐसे हैं जो अब भी फोन तीन से पांच साल तक रख रहे हैं. लेकिन जैसे पुराने दौर में फोन को बिग टिकट परचेज़ समझा जाता था, अब वो बात नहीं रही है.''

शिबानी की बात से तरुण पाठक भी सहमत दिखते हैं. वो कहते हैं, ''एक बात सही है कि फोन में काफ़ी कुछ चेंज हुआ है, जैसे बैटरी. फास्ट चार्जिंग आ गई है. बैटरी का चार्ज साइकिल बदल गया है. तीन-चार साल के बाद बैटरी हेल्थ कम हो जाती है. लोगों को तीन-चार साल के बाद फोन बदलना ही पड़ता है. ऐसे बहुत कम ब्रांड हैं कि जो सॉफ्टवेयर या सिक्योरिटी अपडेट पांच-छह साल के लिए देते हैं. इंफ़ॉर्मेशन ओवरलोड इतना ज़्यादा है कि फोन आउट ऑफ स्टोरेज हो जाता है. बैटरी, रोम की तरह मेमोरी के भी साइकिल होते हैं. ये कम्पोनेंट अपनी शेल्फ़ लाइफ़ के साथ आते हैं.''

मोबाइल फ़ोन की रिपेयर कॉस्ट इतनी ज़्यादा क्यों है?

मोबाइल की मरम्मत करता एक व्यक्ति

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इमेज कैप्शन, मोबाइल को ड्यूरेबल बनाने के लिए इसे यूनिबॉडी बनाया जा रहा है और इसके कारण इसका रिपेयर मुश्किल हो रहा है.

कई लोगों का कहना है कि जब कोई कस्टमर कंपनी के स्टोर पर फ़ोन रिपेयर कराने जाता है तो कॉस्ट सुनकर वो उसे ठीक कराने के बजाय नया फ़ोन ख़रीदने के बारे में सोचने लगता है. क्या इस बात में कोई दम है?

शिबानी इस सवाल के जवाब में कहती हैं, ''स्क्रीन टूट जाए तो उसे ठीक करने में नए फोन ख़रीदने का आधा पैसा लग जाता है, ऐसे में ग्राहक समझता है कि क्यों ना नया ही ख़रीद लिया जाए. लेकिन हम लकी हैं क्योंकि भारत में ऐसी दुकानें भी हैं, जो कंपनी स्टोर की तुलना में दस फ़ीसदी दाम में ये काम कर देती हैं. लेकिन डिवाइस पर डेढ़ लाख खर्च करने वाला आदमी ऐसी जगह फोन को नहीं ले जाता. कई बार रिपेयर इसलिए महंगा होता क्योंकि रिपेयर इकोसिस्टम बंद हैं.''

रिपेयर कॉस्ट के बारे में तरुण पाठक की दलील कम्पोनेंट के महंगा होने की ओर इशारा करती है. वो कहते हैं, ''रिपेयर महंगा क्यों है? इसलिए क्योंकि सेमीकंडक्टर महंगा हुआ है. पहले मोबाइल फ़ोन में एलसीडी स्क्रीन आती थीं, लेकिन अब 60-70 फ़ीसदी फ़ोन में ओलेड स्क्रीन होती हैं, जो महंगी आती हैं. मोबाइल फ़ोन के कम्पोनेंट महंगे हुए हैं और पावरफुल हुए हैं. प्रोसेसर, कैमरे के बारे में ये बात सटीक है. कॉस्ट पॉइंट ऑफ व्यू से देखें तो ट्रेंड ऊपर की तरफ़ है.''

पाठक कहते हैं कि कई सारी सीमाएं भी हैं. फोन के हार्डवेयर में इनोवेशन कम हुई हैं. कैमरे वैसे ही हैं. साइज़, डिजाइन जैसे कुछ चेंज ज़रूर आते हैं.

एक बड़ा बदलाव है कि फोन का यूनिबॉडी डिजाइन आया है. रिपेयरबिलिटी और ड्यूरेबलिटी, दोनों बातें अलग-अलग हैं.

फोन को ड्यूरेबल बनाने के लिए यूनिबॉडी बनाएंगे, तो रिपेयर और मुश्किल होगा.

BBC

उन्होंने कहा, ''लोग पहले फोन आसानी से खोल लेते थे, बैटरी निकल जाती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है, कम्पोनेंट अलग-अलग नहीं बल्कि इंटीग्रेटेड हैं. कंपनियां ड्यूरेबल बनाती हैं कि फ़ोन ज़्यादा दिन चले और कार्बन फुटप्रिंट कम हो. लेकिन अगर रिपेयर बढ़ेंगे तो इलेक्ट्रॉनिक वेस्टेज भी बढ़ेगा. इसलिए रिपेयरेबिलिटी बनाम ड्यूरेबिलिटी अलग बहस है. अगर हम ये कहेंगे कि कंपनियां कम्पोनेंट के हिसाब से उनकी शेल्फ़ लाइफ़ कम कर रही हैं तो ये कहना गलत होगा.''

कवूसा इसे लैपटॉप के उदाहरण से समझाते हैं. उनके मुताबिक लैपटॉप में से पहले रैम, स्टोरेज डिटेच हो जाते थे.

रैम, हार्ड ड्राइव ख़राब हो जाती थी, तो बदल जाती थी. लेकिन अब ये मदरबोर्ड के साथ इंटीग्रेटेड आने लगी हैं.

एक चीज़ ख़राब हुई तो पूरा बदलना होगा. डिजाइन के लेवल पर रिपेयर के बजाय रिप्लेसमेंट की तरफ़ झुकाव दिखने लगा है.

सेकेंड हैंड मोबाइल फ़ोन मार्केट की रफ़्तार

सेकेंड हैंड मोबाइल फ़ोन

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इमेज कैप्शन, भारत अब दुनिया भर में सेकेंड-हैंड स्मार्टफ़ोन का तीसरा सबसे बड़ा बाज़ार बन गया है.

जानकारों का कहना है कि लोगों की आदत बदली है, और वो जल्दी-जल्दी मोबाइल फ़ोन बदल रहे हैं, ये बात सही है. लेकिन ये मतलब नहीं है कि फ़ोन की लाइफ़ कम हो रही है.

तरुण पाठक का कहना है, ''अब लोग सेकेंड हैंड फोन ख़रीद रहे हैं और ये बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है. इसके अलावा लोग इस्तेमाल करने के बाद फ़ोन घर में किसी को दे देते हैं, बेच देते हैं, रिप्लेसमेंट में दे देते हैं. ऐसे में फोन का लाइफ़साइकिल बढ़ा है. पहले फ़ोन प्राइमरी ग्राहक के पास रहा, फिर सेकेंड्री में भी दो साल यूज़ हुआ. यूज़र बिहेवियर बदला है, लेकिन फोन की लाइफ़ बढ़ रही है.''

5जी आने के बाद भारत के सेकेंड हैंड मोबाइल फ़ोन बाज़ार में गज़ब का उछाल आया था और आज भी ये रफ़्तार बनी हुई है.

सीसीएस इनसाइट पर एकता मित्तल ने लिखा है कि भारत अब दुनिया भर में सेकेंड-हैंड स्मार्टफ़ोन का तीसरा सबसे बड़ा बाज़ार बन गया है. भारत से आगे सिर्फ़ चीन और अमेरिका हैं. साल 2024 में ये बाज़ार 10 फ़ीसदी की दर से बढ़ा और 57 लाख डिवाइस शिप किए गए. प्राइमरी मार्केट ने जहां इस साल धीमी स्पीड देखी, वहीं सेकेंड हैंड मोबाइल सेट बाज़ार सेहतमंद दिखा था.

कवूसा का कहना है कि रिपेयर कॉस्ट ज़्यादा है, ये बात सही है, लेकिन साथ ही साथ वो इस ट्रेंड को कंज़्यूमर बिहेवियर से जोड़ते हैं.

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क्या सेल के नाम पर चंद महीनों या साल में लॉन्च होने वाले नए-नए मोबाइल फ़ोन अपने साथ टेक्नोलॉजी के लेवल पर बहुत सारे बदलाव लेकर आते हैं?

शिबानी इसके जवाब में कहती हैं, ''कैमरा क्वालिटी, डिस्प्ले, एआई फीचर, बैटरी एफ़िशिएंसी को लेकर बीते कुछ साल में काफ़ी बदलाव आए हैं, लेकिन हर साल रिलीज़ होने वाले मॉडल किसी ऊंची छलांग का सूचक नहीं हैं.''

तरुण पाठक कहते हैं कि बटन से टच, मोबाइल फ़ोन की दुनिया का सबसे बड़ा बदलाव कहा जा सकता है. लेकिन अब टेक्नोलॉजी चेंज नहीं हो रही है, डिजाइन चेंज हो रहे हैं. फ़ोन स्लिम, कॉम्पैक्ट, कलरफ़ुल, फोल्डेबल आ रहे हैं. साल दर साल देखेंगे तो तीन साल पहले का कैमरा भी आज के फ़ोन को ठीकठाक टक्कर दे जाएगा. सॉफ़्टवेयर की बात करें तो एआई आया है, वो चेंज है और यूआई लेवल पर कुछ बदलाव आए हैं.

लौटते हैं वहीं, जहां से कहानी शुरू हुई थी. काउंटरपॉइंट की इंडिया स्मार्टफ़ोन ड्यूरेबिलिटी कंज़्यूमर स्टडी के मुताबिक 79% यूज़र का मानना है कि फ़ोन की ड्यूरेबिलिटी बहुत ज़रूरी है. ओवरहीटिंग (41%) बैटरी ड्रेन (32%) और एक्सिडेंटल डैमेज (32%) उनकी प्रमुख चिंताएं हैं और हर तीन में से एक आदमी स्मार्टफोन रिपेयर पर 5,000 रुपए से ज़्यादा खर्च करता है. 89% लोगों को फोन काम बंद करता है तो पर्सनल डेटा की फिक्र सबसे ज़्यादा होती है, क्योंकि फ़ैमिली फोटो और बैंकिंग क्रेडेंशियल इसी फ़ोन में कैद होने का ख़तरा रहता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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