'शिफ़्टों से फ़ुर्सत नहीं, सब कोल्हू के बैल' कनाडा में ख़ालिस्तान आंदोलन को कितना समर्थन? ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, खुशहाल लाली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, ब्रैम्पटन
"हमें तो शिफ्टों से फुर्सत ही नहीं मिलती, ख़ालिस्तान की बात कब करेंगे? यह सिर्फ़ मेरा हाल नहीं है, मेरे आस-पास जितना भी सर्किल है, सभी एक जैसे कोल्हू के बैल हैं."
ये शब्द ब्रैम्पटन के 30 वर्षीय टैक्सी ड्राइवर गुरजीत सिंह के हैं, जो पिछले 4 साल से यहाँ रह रहे हैं.
भारत और कनाडा के बीच राजनयिक विवाद के बाद कनाडा में जिस कथित ख़ालिस्तान समर्थक आंदोलन की चर्चा हो रही है, उसकी ज़मीनी स्थिति का पता लगाने के लिए ब्रैम्पटन में मैंने जिन लोगों से बात की, गुरजीत सिंह उनमें से एक हैं.
कथित ख़ालिस्तान समर्थक आंदोलन में आम लोगों की भागीदारी के बारे में गुरजीत सिंह कहते हैं, "हम उस समाज में रहते हैं जिसे 'वीकेंड सोसायटी' कहा जाता है. हमारे जन्मदिन और दूसरे कार्यक्रम भी वीकेंड पर ही आयोजित होते हैं."

कनाडा का 'ख़ालिस्तानी रंग' कितना गाढ़ा?

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पिछले साल जून में अलगाववादी सिख नेता हरदीप सिंह निज्जर की सरे में हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद जस्टिन ट्रूडो ने इसके पीछे भारतीय एजेंटों का हाथ होने का आरोप लगाया था.
तब से भारत और कनाडा के रिश्ते अपने सबसे निचले स्तर पर हैं. दोनों देशों ने अलग-अलग मौकों पर एक-दूसरे के राजनयिक कर्मचारियों को देश छोड़ने के लिए भी कहा है.
अक्तूबर के तीसरे सप्ताह के दौरान, जब दोनों देशों के बीच तनाव अपने चरम पर था, तब मैंने ओंटारियो प्रांत में दर्जनों लोगों से बात की, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उनमें से अधिकांश कैमरे पर बात करने के लिए तैयार नहीं थे.
जिनसे मैंने बात की, उनमें से कोई भी नियमित रूप से ख़ालिस्तानी कार्यकर्ता के रूप में किसी गतिविधि में शामिल नहीं था.
हां, वो सभी गुरुद्वारे जाते हैं, नगर कीर्तन और समारोहों में भाग लेते हैं, और यहां होने वाले अलगाववादी नेताओं के भाषण भी सुनते हैं.
भारत में जिस तरह कनाडा के ख़ालिस्तानी आंदोलन को दिखाया जा रहा है, मैंने व्यक्तिगत तौर पर वैसा कुछ नहीं देखा.
कई गुरुद्वारों के बाहर लटके ख़ालिस्तानी झंडे या लंगर हॉल में पंजाब के 1980 के दशक के सशस्त्र आंदोलन के उग्रवादियों की तस्वीरों के अलावा और कुछ नहीं दिखाई दिया.
ऐसी तस्वीरें और नारे मैंने पंजाब में भी आम तौर पर देखे और सुने हैं.
कनाडा के गुरुद्वारों में आयोजित कार्यक्रमों के दौरान साल 1984 के सिख नरसंहार के दोषियों को सज़ा न मिलना, जून 1984 में अकाल तख़्त साहिब पर भारतीय सेना की कार्रवाई, और लंबे समय से जेल में बंद सिख क़ैदियों की रिहाई जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया जाता है.
गुरुद्वारों के नगर कीर्तन, गुरुपर्व और अन्य त्योहारों पर भी इन मुद्दों का असर साफ़ देखा जा सकता है.
ख़ालिस्तान समर्थक नेता गरम लहज़े में भाषण देते और नारे लगाते हैं, लेकिन इन्हें उतना ही समर्थन मिलता है, जितना पंजाब में दिखाई देता है.
एक पहलू यह भी है कि जिस तरह ख़ालिस्तान आंदोलन को अधिक समर्थन नहीं मिलता, उसी तरह इसका विरोध भी नहीं दिखता.
ख़ालिस्तान समर्थक लोग ही गुरुद्वारों के बड़े आयोजनों में दिखाई देते हैं और यही लोग राजनीतिक सभाओं में भी मौजूद रहते हैं, जिससे वे सुर्खियों में बने रहते हैं.
ख़ालिस्तान समर्थक संगठन सिख्स फॉर जस्टिस, जिसे भारत में एक आतंकवादी संगठन घोषित किया गया है, अपने निजी जनमत संग्रह में लोगों की कुछ हद तक भागीदारी गुरुद्वारों के माध्यम से प्रचार के कारण पाता है.
संगठन के नेता और अमेरिका ने भारत पर आरोप लगाया है कि उसने सिख अलगाववादी नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश रची थी, जिसके लिए अमेरिकी न्याय विभाग ने भारतीय नागरिक विकास यादव के ख़िलाफ़ मामला भी दर्ज़ किया है.
इससे अधिक प्रभाव पंजाब में पूर्व सांसद सिमरनजीत सिंह मान और मौजूदा सांसद अमृतपाल सिंह का है, जो खुलेआम ख़ालिस्तान का समर्थन करते हैं.
ख़ालिस्तानी से जुड़े सवाल और उनके जवाब

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दरअसल, दोनों देशों के बीच तनाव के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना कनाडा का ख़ालिस्तान आंदोलन और वहां के चरमपंथी ख़ालिस्तानी नेता.
इसका मुख्य कारण यह है कि भारत ने कनाडा में सक्रिय ख़ालिस्तान समर्थक संगठनों पर भारत में हिंसक घटनाओं को अंजाम देने का आरोप लगाया है.
बीबीसी ने कनाडा के सबसे बड़े सिख आबादी वाले प्रांत ओंटारियो में इस आंदोलन से जुड़े कई लोगों, वरिष्ठ पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से बात की.
इस बातचीत में हमने यह समझने की कोशिश की कि भारत सरकार और भारतीय मीडिया में कनाडा के ख़ालिस्तानी नेताओं की जो छवि पेश की जा रही है, उसकी हक़ीक़त क्या है.
ख़ालिस्तानी नेताओं की संख्या कितनी बड़ी है, और कनाडा की राजनीति पर इसका क्या प्रभाव है?
क्या उनका प्रभाव इतना अधिक है कि जस्टिन ट्रूडो जैसे नेता उनके समर्थन के लिए भारत जैसे बड़े देश के साथ राजनयिक संबंधों से जुड़ा जोखिम उठा सकते हैं?
कनाडा में ख़ालिस्तान समर्थकों का प्रभाव

जब कनाडा में अलगाववादी सिख आंदोलन की बात आती है, तो इसके बारे में अलग-अलग नज़रिया सामने आता है. ओंटारियो गुरुद्वारा कमेटी, यहाँ के 19 प्रमुख गुरुद्वारों की समितियों का एक संयुक्त संगठन है.
हमने इसके प्रवक्ता अमरजीत सिंह मान से पूछा कि ख़ालिस्तानी आंदोलन का कनाडा की मुख्यधारा की राजनीति पर कितना प्रभाव है.
अमरजीत सिंह मान कहते हैं, "अगर भारतीय सिस्टम या मीडिया कहता है कि ख़ालिस्तानी सिर्फ़ एक मुट्ठी भर लोग हैं और फिर यह भी कहता है कि ट्रूडो सरकार ख़ालिस्तानी वोटों के लिए भारत के साथ विवाद कर रही है, तो उनका पहला बयान खुद ही बेअसर हो जाता है."
अमरजीत सिंह मान का कहना है, "अगर कनाडा में ख़ालिस्तानी गिनती के ही हैं, तो ट्रूडो को इतनी कोशिश करने की क्या ज़रूरत है? यह आरोप तभी सही होगा, जब हमारी संख्या ज़्यादा होगी."
कनाडा की वोट राजनीति पर ख़ालिस्तानियों के असर पर उन्होंने कहा, "हमारा बहुत प्रभाव है, और हमारी संख्या पहले से बढ़ी है."
उन्होंने कहा, "लेकिन हम किसी एक पार्टी के साथ नहीं हैं. जगमीत सिंह की एनडीपी से हमारे अच्छे संबंध हैं, और हम पोलिवार की कंज़र्वेटिव पार्टी के साथ भी बैठकें करते हैं."
ख़ालिस्तानियों के आधार का दूसरा पक्ष

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कनाडा में ख़ालिस्तानी इतने मजबूत हैं कि ट्रूडो अपने राजनीतिक फायदे के लिए उन्हें खुश करने के लिए भारत पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं.
इस सवाल पर ख़ालिस्तानी आंदोलन से जुड़े एक अन्य नेता भगत सिंह बराड़ आंकड़ों से जवाब देते हैं.
भगत सिंह बराड़ जरनैल सिंह भिंडरावाले के बड़े भाई जागीर सिंह के पोते हैं और ख़ालिस्तानी नेता लखबीर सिंह रोडे के बेटे हैं. जागीर सिंह की ऑपरेशन ब्लू स्टार में मौत हो गई थी.
ब्रैम्पटन में कार सर्विस एजेंसी चलाने वाले भगत सिंह बराड़ कहते हैं, "कनाडा में सिखों की आबादी 7.71 लाख है, जो कुल जनसंख्या का 2% है. अगर भारत की मानें कि उनमें से केवल 1% ख़ालिस्तानी होंगे, तो क्या ट्रूडो इतनी कम संख्या के लिए दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी ताक़त से पंगा लेंगे?"
बराड़ आगे कहते हैं, “कनाडा के सभी ख़ालिस्तानी समर्थक ट्रूडो के साथ नहीं हैं. एनडीपी, कंज़र्वेटिव और लिबरल तीनों पार्टियां हैं, और कई सिख दूसरे रास्तों पर भी जाते हैं. यहां तक कि लिबरल में भी सभी ट्रूडो के समर्थक नहीं हैं.”
भगत सिंह बराड़ का कहना है, "भारत यह नहीं देख पा रहा कि कनाडा एक लोकतांत्रिक देश है, जहाँ कानून का शासन है, और जहाँ हरदीप सिंह निज्जर जैसे नागरिक की हत्या उसकी अपनी धरती पर की गई है. कनाडा का दायित्व है कि वह अपने नागरिकों की सुरक्षा करे, और यही वह कर रहा है.''
बराड़ कहते हैं, "ट्रूडो सरकार किसी ख़ालिस्तान का समर्थन नहीं कर रही. ट्रूडो ने हाल ही में कहा है कि उन्हें संयुक्त भारत पर विश्वास है. मैं ट्रूडो का बचाव नहीं कर रहा, मुझे उनसे कई आपत्तियां हो सकती हैं, लेकिन उन्होंने यह कदम केवल कनाडाई नागरिकों की सुरक्षा के लिए उठाया है."
संख्या से ज़्यादा राजनीतिक प्रभाव का महत्व?

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बलराज देओल कनाडा में रहने वाले पंजाबी मूल के पत्रकार और ख़ालिस्तानी आंदोलन के आलोचक के रूप में जाने जाते हैं.
बलराज कहते हैं, "कनाडा में ख़ालिस्तानी आंदोलन ने अपने लिए मज़बूत जगह बना ली है, चाहे वह स्थानीय निकाय, प्रांतीय, संघीय राजनीति हो, या खुफ़िया, सिविल सेवा और इमिग्रेशन एजेंसियां हों."
उन्होंने बताया कि पिछले वर्षों में ख़ालिस्तानी समर्थकों ने सिस्टम में अपनी पकड़ बना ली है, जो अब दोनों देशों के संबंधों में खटास का कारण बन रहा है.
बलराज देओल ख़ालिस्तानियों के "मुट्ठी भर" होने के तर्क की तुलना में उनके राजनीतिक प्रभाव को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं.
उनका कहना है, ''ख़ालिस्तानी, सिख समुदाय में लॉबिंग करके वोट की राजनीति में नतीजों को प्रभावित करने का असर रखते हैं."
वो कहते हैं, "1990 के दशक से लिबरल पार्टी में, जॉन क्रिश्चियन से लेकर जस्टिन ट्रूडो तक, ख़ालिस्तानियों ने सिख समुदाय के प्रतिनिधियों को पार्टी नेताओं के रूप में आगे लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है."
"इसी तरह, एनडीपी में जगमीत सिंह को पार्टी अध्यक्ष बनाने में ख़ालिस्तानियों की भूमिका रही है."
उन्होंने कहा, ''जगमीत सिंह तो ख़ालिस्तान लॉबी के सहारे ही पार्टी अध्यक्ष बने हैं, तब इस बात का बहुत शोर भी मचा था कि उन्हें वहीं ज़्यादा वोट मिले जहां सिखों की आबादी ज़्यादा थी. जैसे ब्रैम्पटन, माल्टन और सरे जैसे क्षेत्र."
ख़ालिस्तानियों के अल्पसंख्यक होने के तर्क पर पूछे गए सवाल के जवाब में बलराज देओल कहते हैं, "वोट की गिनती का तर्क ग़लत है; लोकतंत्र में वही मतदाता होता है जो वोट देने निकलता है. चाहे राजनीतिक सक्रियता हो या समाज सेवा, सबसे आगे ख़ालिस्तानी ही दिखाई देते हैं."
बलराज देओल ने यह भी कहा कि सिख समुदाय की बड़ी संस्थाएं, जैसे गुरुद्वारे, ख़ालिस्तानियों के नियंत्रण में हैं.
वो कहते हैं, "बड़े आयोजनों में, जैसे बैसाखी परेड और नगर कीर्तन, जब कनाडा की मुख्यधारा के नेता आते हैं, तो उन्हें ख़ालिस्तान समर्थक ही पूरे सिख समुदाय का चेहरा दिखते हैं."
उन्होंने बताया, ''जब वे नेता दिखते हैं तो प्रभाव भी उनका ही होता है. कार्यक्रम के अंदर बैठे लोगों को कौन पूछता है?''
बलराज ने स्पष्ट किया, "मैं नहीं कहता कि ख़ालिस्तानियों की संख्या बहुत अधिक है, परंतु वे प्रभावशाली हैं. ख़ालिस्तान का खुलकर विरोध करने वाला सिख शायद ही मिलेगा, और जो ख़ालिस्तान समर्थक नहीं हैं, वे भी चुप रहते हैं."
आरोपों पर क्या कहते हैं ख़ालिस्तान समर्थक

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जब भारत सरकार द्वारा कनाडा के ख़ालिस्तानी संगठनों पर भारत में हिंसा करवाने के आरोपों पर अमरजीत सिंह मान से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा, "जिन संगठनों का नाम लिया जा रहा है, उनके बारे में हमने कभी नहीं सुना."
उनका कहना है कि वे लोकतांत्रिक तरीकों से कनाडा के कानून के तहत ख़ालिस्तान के लिए संघर्ष करते हैं.
नगर कीर्तन में ख़ालिस्तानी उग्रपंथियों और इंदिरा गांधी की हत्या जैसी घटनाओं की तस्वीरों से भावनाएं भड़काने के बारे में उन्होंने कहा, "यह लंबे समय से हो रहा है. पहले यह अमेरिका में भी देखा गया है."
मान ने कहा, "हम काल्पनिक कुछ भी नहीं दिखाते, जो हुआ वही दिखाते हैं. यह हमारा इतिहास है, और उग्रवादी हमारे नायक हैं."
भगत सिंह बराड़ ने भी ऐसे सभी आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहा कि अगर भारत सरकार के पास सबूत हैं, तो उन्हें कनाडा सरकार को सौंपकर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करवानी चाहिए.
भारत वापस आए उच्चायुक्त संजय वर्मा ने कनाडाई चैनल सी-टीवी पर बताया था कि भारत ने 26 लोगों को सौंपने के लिए कनाडा को डोजियर सौंपे हैं, लेकिन कनाडा इस पर विचार नहीं कर रहा है.
बलराज देओल कहते हैं, "कनाडा में बैठकर भारत में हिंसा का सबसे बड़ा उदाहरण पॉप स्टार सिद्धू मूसेवाला की हत्या है, जिसके लिए लॉरेंस बिश्नोई गिरोह का सरगना गोल्डी बराड़ कनाडा में बैठा है."
बलराज देओल सवाल करते हैं कि एक तरफ कनाडा कह रहा है कि लॉरेंस बिश्नोई गिरोह यहां अपराध कर रहा है, वहीं जब भारत गोल्डी बराड़ और अन्य लोगों की हिरासत मांगता है, तो उन्हें भारत को क्यों नहीं सौंपा जाता है?
ख़ालिस्तानी संगठनों से जुड़े अपराधों पर बलराज देओल कहते हैं, "जब कोई आंदोलन होता है, तो अक्सर ऐसे लोग घुसपैठ कर लेते हैं जो अपने हितों के लिए घटनाओं को अंजाम देते हैं."
उनका मानना है कि ऐसे कई गैंग आज भी ख़ालिस्तानी संगठनों से जुड़े हुए हैं.
ख़ालिस्तान पर कनाडा का आधिकारिक रुख़

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कनाडा में "सिख चरमपंथ" को लेकर भारत की चिंता कोई नई बात नहीं है, न ही कनाडा की प्रतिक्रिया नई है.
सीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब साल 2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर भारत दौरे पर गए थे, तो भारतीय विदेश मंत्री ने "कनाडा में बढ़ती भारत विरोधी बयानबाजी" का मुद्दा उठाया था.
हार्पर ने अखंड भारत का समर्थन किया था, लेकिन लोकतांत्रिक ख़ालिस्तानी आंदोलनों पर किसी कार्रवाई से इनकार किया था.
जी-20 शिखर सम्मेलन 2023 में जब जस्टिन ट्रूडो से कनाडा में सिख चरमपंथ पर सवाल किया गया, तो उन्होंने भी हार्पर का रुख दोहराया.
प्रधानमंत्री ने कहा, "हम हिंसा रोकने और नफरत के एजेंडे के ख़िलाफ़ काम करने के लिए हमेशा तैयार हैं."
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ लोगों की कार्रवाइयों को पूरे सिख समुदाय के साथ नहीं जोड़ा जा सकता.
विशेषज्ञों का मानना है कि कनाडा में सिख आबादी अमेरिका, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया से अधिक है, लेकिन ख़ालिस्तान के मुद्दे पर समुदाय एकमत नहीं है.
पिछले तीन दशकों से कनाडा में रह रहे मशहूर पंजाबी वकील हरमिंदर ढिल्लों कहते हैं, ''भारत में बैठे लोगों को ये भ्रम हो सकता है कि पता नहीं कि यहां कितनी बड़ी लॉबी होगी. ब्रैम्पटन की 2-4 सीटों पर ख़ालिस्तानी नेताओं का प्रभाव हो सकता है, लेकिन कनाडा जैसे बड़े देश में यह संभव नहीं कि ट्रूडो ख़ालिस्तान समर्थकों को खुश करके चुनाव में अपनी हार को जीत में बदल सकें."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















