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वक़्त से पहले जन्मे बच्चों के लिए वरदान साबित होगी कृत्रिम गर्भनाल
- Author, जैस्मिन फॉक्स स्केली
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
कृत्रिम गर्भनाल और गर्भाशय तय वक्त से पहले पैदा होने वाले शिशुओं के जीवन को बचा सकते हैं, लेकिन अहम प्रश्न है कि इसका मानव परीक्षण शुरू होने से पहले नैतिकता की दृष्टि से किन-किन बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए?
पढ़ने सुनने में ये किसी खराब सी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी की तरह लग सकती है जहां शिशुओं को उनकी मांओं के गर्भ से निकालकर, तरल पदार्थ से भरे गर्भ-सदृश वातावरण वाले एक कृत्रिम थैले में बड़ा किया जाता है.
लेकिन अमेरिका के पेनसिल्वेनिया में फिलाडेल्फिया के चिल्ड्रेंस हॉस्पिटल (CHOP) के वैज्ञानिकों ने समय पूर्व जन्म लेने वाले शिशुओं को जोखिम से बचाने के लिए इस तकनीक का प्रयोग करने का सुझाव दिया है.
वे नवजात शिशु के विकास के लिए ठीक गर्भाशय जैसे वातावरण को विकसित कर रहे हैं जिसे उन्होंने "कृत्रिम गर्भ" नाम दिया हैं.
क्या है इस प्रणाली का मक़सद
इसका मकसद गर्भाधान से लेकर जन्म लेने तक भ्रूण को "कृत्रिम गर्भ" में विकसित करना नहीं है क्योंकि यह असंभव है. हालांकि चिकित्सा विज्ञान को इसकी सख्त ज़रूरत है. बल्कि ये प्रणाली तो समय से बहुत ही पहले जन्मे अपरिपक्व शिशुओं की जीवन दर को बढ़ाने में मदद करती है.
गौरतलब है कि ऐसे प्री मैच्योर शिशुओं को जीवन भर कई संभावित स्वास्थ्य संबंधी खतरों से दो-चार होना पड़ता है.
देखा जाए तो एक सामान्य स्वस्थ गर्भावस्था की अवधि लगभग 40 सप्ताह होती है और 37 सप्ताह में बच्चे को पूर्ण विकसित मान लिया जाता है. हालांकि कभी-कभी गर्भावस्था में जटिलताएं पैदा हो जाती हैं जिसके चलते बच्चे को समय से पहले जन्म देने की नौबत आ जाती है.
संयोग से, पिछले कुछ दशकों में नवजात चिकित्सा में क्रान्तिकारी प्रगति देखने को मिली है जिसके चलते, अधिकांश समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चे बच जाते हैं. ऐसे बच्चों के कुछ जटिलताओं के साथ छुट्टी दे दी जाती है. नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि अगर उनकी गहन देखभाल की जाए तो 22 सप्ताह के गर्भ वाले मामलों में 30% शिशु बच भी जाते हैं.
22वें सप्ताह के आसपास जन्म लेने वाले शिशुओं को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. उन्हें चौबीसों घंटे गहन देखभाल की ज़रूरत होती है.
कैनसस सिटी के चिल्ड्रेन्स मर्सी हॉस्पिटल में काम करने वाली नवजात शिशु विशेषज्ञ, स्टेफ़नी कुकोरा कहती हैं, "अगर मैं ईमानदारी से कहूं तो 28 सप्ताह और यहां तक कि 27 सप्ताह में पैदा होने वाले बच्चे भी कुल मिलाकर बहुत ठीक हालत में होते हैं. असल चुनौती 22 से 23 सप्ताह में जन्म लेने वाले शिशुओं में गंभीर परिणामों के रूप मे सामने आती है. उन शिशुओं के जीवन की गुणवत्ता को लेकर हम निश्चित नहीं हो पाते."
वक्त से पहले पैदा हुए इन शिशुओं को अक्सर गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से दो चार होना पड़ता है. इन शिशुओं का वजन जन्म के समय 2 पाउंड (900 ग्राम) से कम होता है और हृदय, फेफड़े, पाचन अंग और मस्तिष्क जैसे महत्वपूर्ण अंग पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुए होते हैं. इसके चलते गहन चिकित्सा देखभाल के बिना ऐसे शिशु को जीवित रखना मुश्किल हो जाता है.
इनमें थोड़े समय के लिए होने वाली जटिलता जो अक्सर देखने में आती हैं वह है नेक्रोटाइज़िंग एंटरोकोलाइटिस (एनईसी). यह एक गंभीर बीमारी है जिसमें आंत में ऊतकों में सूजन आ जाती हैं और वे ऊतक तेजी से मरने लगते हैं.
इस उम्र के शिशुओं को संक्रमण, सेप्सिस और सेप्टिक शॉक का भी बहुत खतरा होता है- रक्तचाप में एक जानलेवा गिरावट आ जाती है जिससे उनके फेफड़ों, गुर्दे, यकृत और अन्य अंगों को नुकसान पहुंच सकता है.
भ्रूण को कैसे माहौल की जरूरत
इसी तरह निर्धारित समय से बहुत पहले जन्मे शिशुओं को प्रभावित करने वाली दीर्घकालिक समस्याओं में सेरेब्रल पाल्सी, सीखने में कठिनाई, दृष्टि और सुनने की समस्याएं और अस्थमा जैसे रोग शामिल हैं.
ऐसे में कृत्रिम गर्भाशय और गर्भनाल का मकसद फेफड़ों की समस्या से पूरी तरह से निज़ात दिलाना है. यहां तक कि नवजात शिशुओं के जीवन को बचाने के लिए इस्तेमाल की जा रही ऑक्सीजन सपोर्ट और वेंटिलेशन जैसी तकनीक भी उनके नाजुक फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकती है.
इस विषय में मिशिगन विश्वविद्यालय के सीएस मॉट चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल में सर्जरी और प्रसूति व स्त्री रोग प्रोफेसर, जॉर्ज बी. मायचलिस्का का कहना है , "गर्भावस्था की इस प्रारंभिक अवस्था में फेफड़े अभी भी विकसित होने की अवस्था में होते हैं और उनके अंदर तरल पदार्थ भरा होना चाहिए."
"लेकिन जब शिशु समय से पहले पैदा होते हैं, तो हम उनकी श्वासनली में एक एन्डोट्रेकियल ट्यूब डालते हैं. इसके माध्यम से हम उच्च तनाव और दबाव के साथ हवा और ऑक्सीजन को उनके फेफड़ों में डालते हैं लेकिन इस प्रक्रिया में उन्हें अंदरूनी चोट लग सकती है.
गुजरते वक़्त के साथ इन चोटों के कारण फेफड़ों में निशान पड़ जाते हैं और ये ब्रोंकोपल्मोनरी डिस्प्लेसिया या गंभीर फेफड़ों की बीमारी के रूप में सामने आती है.
बच्चे जब अस्पताल से बाहर आते हैं तो उन्हें लंबे समय तक ऑक्सीजन सपोर्ट की ज़रूरत होती है और उन्हें अपना बाकी जीवन मैकेनिकल वेंटिलेशन के सहारे गुजारना होता है. वेंटिलेशन से अंधेपन का खतरा भी बढ़ सकता है.
आंख के रेटिना को पोषण देने वाली रक्त वाहिकाएं जन्म का समय नजदीक होने तक भी पूरी तरह से बनी नहीं होती हैं. बहुत अधिक ऑक्सीजन नई असामान्य रक्त वाहिकाओं के विकास को उत्तेजित कर सकती है. और यह बाद में रेटिना के अपने आसपास के ऊतकों से अलग होने का सबब बन सकती है.
इन सबको देखते हुए कृत्रिम गर्भाशय और गर्भनाल का उद्देश्य फेफड़ों से ध्यान हटाकर भ्रूण को एक ऐसा माहौल देना है जिससे उसको सुरक्षित वातावरण में विकसित होने का वक्त मिल सके. ऐसा तब तक करना होता है जब तक कि बच्चा अपनी पहली सांस लेने के लिए तैयार न हो जाए.
कृत्रिम गर्भाधान से जुड़े प्रयोग
मिलता जुलता नकली गर्भनाल बनाकर उनके अल्प विकसित फेफड़ों को चिकित्सीय उपकरणों से होने वाली हानि को रोक सकते हैं
इस तकनीक पर तीन मुख्य टीम काम कर रही हैं. तीनों ही एक्स्ट्राकॉर्पोरियल मेम्ब्रेन ऑक्सीजनेशन (Ecmo) नामक मौजूदा थेरेपी पर आधारित हैं. यह एक प्रकार का कृत्रिम लाइफ सपोर्ट है जो किसी व्यक्ति के फेफड़े और हृदय ठीक से काम न करने की दशा में उसकी मदद करता है.
इस थेरेपी में रोगी के शरीर से रक्त को एक मशीन में पंप किया जाता है जो कार्बन डाइऑक्साइड को हटाती है और ऑक्सीजन का प्रवाह करती है. इस प्रकिया में ऑक्सीजन युक्त रक्त को फिर से ऊतकों में वापस भेजा जाता है.
यह विधि रक्त को हृदय और फेफड़ों से “बचकर निकलने" का मौका देती है, जिससे इन अंगों को न केवल आराम मिलता है बल्कि इन्हें ठीक होने का अवसर भी मिलता है.
हालांकि एक्स्ट्राकॉर्पोरियल मेम्ब्रेन ऑक्सीजनेशन को हम बड़े बच्चों के लिए प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन यह समय से बहुत पहले पहले जन्मे शिशुओं के लिए ठीक नहीं है. तीनों टीमें इस तकनीक को और सरल व नवजात शिशुओं के अनुकूल बनाने के प्रयास में जुटी हैं. हालांकि विकास के क्रम में विभिन्न उपकरणों के बीच सूक्ष्म अंतर हैं.
भ्रूण सर्जन, एलन फ़्लेक के नेतृत्व में सीएचओपी के वैज्ञानिक समय से पहले जन्मे बच्चों को गर्भ के एमनियोटिक द्रव की तर्ज पर डिज़ाइन किए गए द्रव से भरे कृत्रिम थैले में डुबा कर रखने की योजना बना रहे हैं.
इसमें रखने के बाद सर्जन बच्चे की गर्भनाल की छोटी रक्त वाहिकाओं को एक इसीएमओ जैसे यंत्र से जोड़ेंगे. रक्त को भ्रूण के हृदय का उपयोग करके पूरे सिस्टम में पंप किया जाता है. ये प्रक्रिया काफी हद तक सामान्य प्रकृति की होती है.
प्रयोग के दैरान फ़्लेक और उनके सहयोगियों ने 2017 में 23 से 24 सप्ताह अवधि के मानव भ्रूण के बराबर गर्भावधि वाले, समय से पहले जन्मे, आठ मेमनों को लिया. उन्होंने उन मेमनों को कृत्रिम गर्भाशय में चार सप्ताह तक जीवित रखा. इस दौरान मेमनों का विकास स्वाभाविक रूप से हुआ, यहां तक कि उनके बाल भी उगने लगे थे.
कृत्रिम गर्भाशय कितनी बड़ी उपलब्धि
दूसरी ओर, मिशिगन विश्वविद्यालय में जॉर्ज मायचलिस्का की टीम एक कृत्रिम प्लेसेंटा यानी गर्भनाल विकसित कर रही है.
इसमें वे शिशु के पूरे भ्रूण को तरल पदार्थ में डुबाने की जगह उसके फेफड़ों को विशेष रूप से तैयार तरल पदार्थ से भरने के लिए श्वास नलियों का उपयोग करने की योजना बना रहे हैं. उनकी प्रणाली पारंपरिक एक्मो मशीनों के समान, जुगुलर नस के माध्यम से हृदय से रक्त लेती है, लेकिन गर्भनाल नस के माध्यम से ऑक्सीजन युक्त रक्त लौटाती है.
समय से पहले जन्मे मेमनों को यांत्रिक वेंटिलेशन में सुरक्षित स्थानांतरित किए जाने से पहले 16 दिनों तक कृत्रिम गर्भाशय में जीवित रखा गया.
मायचलिस्का का कहना, "मैं एक ऐसा मंच चाहती थी जो अधिकांश शिशुओं को सहज मुहैया हो, और जिसका उपयोग मौजूदा इंटेंसिव केयर यूनिट में किया जा सके."
"इस तकनीक का मकसद नाल द्वारा किये जाने वाले असंख्य कामों की जगह लेना नहीं है. इसे गैस विनिमय, रक्तचाप, हृदय गति और भ्रूण परिसंचरण को बनाए रखने पर फोकस किया गया है. इसके जरिए समय से पहले जन्मे अंगों की रक्षा की जाती है और उन्हें सहज रूप से विकसित होने दिया जाता है."
कृत्रिम गर्भनाल पर हाल ही में किए गए एक परीक्षण में सामने आया कि समय से पहले जन्मे मेमनों को सुरक्षित रूप से यांत्रिक वेंटिलेशन में स्थानांतरित करने से पहले 16 दिनों तक जीवित रखा गया. इस दौरान उनके फेफड़े, मस्तिष्क और अन्य अंग अच्छी तरह से विकसित होते रहे.
अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी बच्चों को लंबे समय तक ऑक्सीजन सपोर्ट की ज़रूरत पड़ सकती है. और उन्हें जीवन भर यांत्रिक वेंटिलेशन पर रहना पड़ सकता है
तीसरा समूह, ऑस्ट्रेलिया और जापान की एक टीम है. यह टीम एक्स विवो यूटेराइन एनवायरनमेंट (ईव) थेरेपी नाम से एक कृत्रिम गर्भाशय विकसित कर रही है. इसका उद्देश्य अन्य दो समूहों की तुलना में समय से बहुत ही पहले जन्मे और बीमार भ्रूणों का इलाज करना है.
ईव का नेतृत्व कर रहे नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में प्रसूति एवं स्त्री रोग के प्रोफेसर मैट केम्प कहते हैं, "अब हम उस स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां हम 500 ग्राम वजन [भेड़ के बच्चे] के भ्रूण को दो सप्ताह तक सामान्य शारीरिक अवस्था में रख सकते हैं. "
"यह हमारे लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है, लेकिन दूसरी ओर इन भ्रूणों का विकास सामान्य नहीं है."
कृत्रिम नाल/गर्भाशय के उपयोग से संबंधित अधिकांश परीक्षण मेमने के भ्रूणों पर किए गए हैं.
और अगर इन मेमनों को छेड़ा न जाए तो वे लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं. समस्या यह है कि समय से बहुत पहले जन्मे बच्चे अक्सर मां या भ्रूण में आने वाली स्वास्थ्य जटिलताओं के कारण पैदा हो जाते हैं. इसलिए उनका इलाज करना अधिक मुश्किल होता है.
अस्पतालों में कृत्रिम गर्भनाल और गर्भाशय कब तक देख पाएंगे?
केम्प कहते हैं, "हमने जो प्रयोग बेहद कमज़ोर भ्रूणों के साथ किया था, उन जानवरों को संभालना बेहद कठिन था."
हमारा मानना है कि यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि एक बहुत छोटे भ्रूण में सामान्य तरीके से अपने विकास का दिशा निर्धारण करने की क्षमता नहीं होती है."
"उनका विकास बहुत खराब होता है, और उनके रक्तचाप और रक्त प्रवाह को सामान्य बनाए रखना बहुत मुश्किल होता है. इसलिए, यह एक ऐसा मामला है जहां हम कुछ अच्छी प्रगति तो कर रहे हैं, लेकिन हमें बहुत सारी चीज़ों को समझने की भी ज़रूरत है."
सवाल उठता है कि हम अस्पतालों में कृत्रिम गर्भनाल और गर्भाशय कब तक देख पाएंगे? सीएचओपी शायद विकास की इस दौड़ में सबसे आगे है. टीम ने हाल ही में फेडरल ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) को अपने परीक्षण को मानव तक विस्तारित करने की अनुमति के लिए आवेदन किया है. वहीं मायचलिस्का को उम्मीद है कि तीन या चार वर्षों में वे मानव नैदानिक परीक्षणों की ओर बढ़ जाएंगे, जब उनकी टीम मानव नवजात शिशु की छोटी रक्त वाहिकाओं से निपटने के लिए अपनी प्रणाली को और अधिक छोटा कर लेगी.
हालांकि, केम्प को अब भी लगता है कि कृत्रिम गर्भ में भ्रूण कैसे विकसित होते हैं, इस बारे में हमारे ज्ञान में बुनियादी बातों का अभाव हैं. इन कमियों को परीक्षणों में जाने से पहले दूर करने की ज़रूरत है.
केम्प कहते हैं, "यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि एक बहुत छोटे भ्रूण में अपने विकास को सामान्य तरीके से निर्देशित करने की क्षमता नहीं होती है, और जब वह बीमार होता है तो यह स्थिति और बदतर हो जाती है."
नैतिक प्रश्न भी शामिल
नवीनतम आंकड़ों से पता है कि यदि भ्रूण की गहन देखभाल की जाए तो 22 सप्ताह की गर्भावस्था वाले मामलों में 30% नवजात ही जीवित रहते हैं
“इसलिए हम उन सामान्य विकास प्रक्रियाओं को संचालित करने में गर्भनाल की भागीदारी को समझने की कोशिश कर रहे हैं. अभी हमारी कोशिशें यहीं तक पहुंची हैं. देखा जाए तो यह एक बहुत बड़ा काम है." इसमें कई नैतिक प्रश्न भी शामिल हैं.
हाल ही में लिखे एक लेख में स्टेफ़नी कुकोरा ने तर्क दिया है कि अलग-अलग तकनीकों के बीच बेहद बारीक अंतर है और ये अंतर अनोखी नैतिक चुनौतियों को पैदा करते हैं.
उदाहरण के लिए, चूंकि इव और सीएचओपी दोनों ही टीमों के कृत्रिम गर्भ में, गर्भनाल में एक कैनुला फिट करने की ज़रूरत होती है. इस वजह से शिशुओं को तुरंत मां के गर्भ से यंत्र में स्थानांतरित करने किया जाता है, क्योंकि जन्म के बाद गर्भनाल धमनी जल्दी बंद हो जाती है. इसलिए जिन मांओं का प्रसव योनि से हो सकता था, उन्हें जल्दी से सिजेरियन सेक्शन करवाना पड़ेगा.
कुकोरा कहते हैं, "जब आप इतनी जल्द सिजेरियन सेक्शन करवाते हैं, तो वे इसे उस तरह से नहीं किया जा सकता जैसे कि सामान्य तौर पर होता है."
"इसमें गर्भाशय से गुजरने वाली मांसपेशीय परत में एक लंबा चीरा लगाया जाता है, इसका प्रभाव भविष्य में होनेवाले गर्भधारण पर पड़ सकता है. ऐसे में फैसला करना मुश्किल होता है कि सिजेरियन सेक्शन कराया जाए या बच्चा को योनि से ही प्रसव कराया जाए."
प्राकृतिक रूप से जन्म की तुलना में इस प्रक्रिया में अधिक ज़ोखिम हैं, जिसमें सहमति से संबंधित मुद्दे उठते हैं.
कुकोरा कहते हैं, “ मेरे ख्याल से हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम इस परीक्षण के बारे में भावी माता-पिता से कैसे संपर्क करेंगे."
"आप एक ऐसे माता-पिता की कल्पना कीजिए जो इस दुखद स्थिति का सामना कर रहे हों, जिन्हें 22 सप्ताह के भीतर ही भ्रूण के खराब परिणामों के बारे में परामर्श दिया गया है. ऐसी दशा में वे किसी भी नई चीज़ के लिए बहुत उत्साहित हो सकते हैं, भले ही उसका परीक्षण न किया गया हो. माता-पिता अपने नवजात बच्चे के लिए कुछ भी कर सकते हैं."
जिन शिशुओं का पारंपरिक उपचार से इलाज हो जाता था, उनका इलाज नई तकनीक से कर सकते हैं भले ही उसका अभी तक परीक्षण नहीं हुआ है, इसमें ज़ोखिम का प्रतिशत बहुत कम है
जोखिम क्या हैं?
एक बच्चे को तुरंत विस्तारित व्यवस्था पर स्थानांतरित करने में एक और समस्या यह है कि इस बात का आकलन करने का कोई अवसर नहीं मिल पाता है कि पारंपरिक चिकित्सा का रास्ता अपनाने पर उस बच्चे का क्या होगा.
मायचलिस्का कहती हैं, "आपके पास गर्भावधि उम्र के अलावा कोई और आंकड़ा नहीं होता है जिससे यह तय किया जा सके कि कौन विस्तारित व्यवस्था पर जाएगा - क्योंकि बच्चे ने अभी जन्म नहीं लिया है, इसलिए आपको नहीं पता कि वह स्वास्थ्य संबंधी किन हालात का सामना कर रहा है."
इसका मतलब यह हो सकता है कि जिन शिशुओं में पारंपरिक उपचारों से बेहतर परिणाम देखने को मिलता, उनका इलाज नई तकनीक से किया जा सकता है हालांकि अभी उसका परीक्षण नहीं हुआ है. इसमें ज़ोखिम की संभावना बहुत कम है. मायचलिस्का का मानना है कि विस्तारित विधि 22-23 सप्ताह की गर्भावधि उम्र वाले समय से बहुत पहले जन्मे शिशुओं के लिए फायदेमंद साबित होगी. ये शिशु उच्च मृत्यु दर और रुग्णता से ग्रस्त होते हैं.
चूंकि यह गर्भनाल धमनी के बजाय गले की नस से रक्त खींचता है, इसलिए डॉक्टरों के पास मायचलिस्का के कृत्रिम गर्भनाल पर शिशुओं को रखने के लिए ज्यादा वक़्त होता है. यह चिकित्सकों को जन्म के बाद शिशुओं को "जोखिम का स्तर" तय करने में सहायता देता है.
इस उद्देश्य से केवल सबसे बीमार शिशुओं को ही परीक्षण की उपचार शाखा में स्थानांतरित किया जाता है.
शिशुओं का पहले पारंपरिक चिकित्सा का उपयोग करके संभावित रूप से इलाज किया जा सकता है, अगर वे ठीक नहीं हो रहे हैं तो बाद में कृत्रिम गर्भनाल में स्थानांतरित किया जा सकता है. अन्य दो तकनीकों से हटकर, मांएं अपने शिशुओं को योनि से भी जन्म दे सकती हैं.
जो भी तकनीक पहले परीक्षण तक पहुंचे लेकिन परीक्षण में पहले प्रतिभागी शायद 24 सप्ताह पूर्व पैदा हुए बच्चे होंगे. ऐसे बच्चे जिन्हें पारंपरिक उपचार से भले ही अच्छे नतीजे मिले हों लेकिन फिर भी उनके जीवित रहने की संभावना बहुत कम होगी.
मायचलिस्का का कहना है, "मुझे लगता है कि यह तकनीक समयपूर्व जन्म के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाएगी तथा कृत्रिम गर्भनाल और विस्तारित पद्धतियां इसके निदान के अभ्यास की दिशा में सहायक साबित होंगी."
"लेकिन इसमें ज़ोखिम की भी संभावना हैं, जिनका सुरक्षा के प्रारंभिक परीक्षण में आकलन किया जाना चाहिए. मेरा मानना है कि इस तकनीक का सबसे पहले प्रयोग उन शिशुओं पर होना चाहिए जिनके बचने की संभावना कम है. और जब हम इस तकनीक के ज़ोखिम और यह कितनी प्रभावकारी है उसका पता लगा लें, तब उसे समय से पहले जन्मे शिशुओं पर भी लागू किया जाना चाहिए."
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