पीएम मोदी के सिंगापुर दौरे के पीछे सेमीकंडक्टर, चीन और समुद्री सुरक्षा का क्या है रोल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सिंगापुर के प्रधानमंत्री लॉरेंस वॉन्ग

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    • Author, अदिति शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दक्षिणी-पूर्व एशियाई देशों की अपनी यात्रा के अंतिम चरण में 4 सितंबर को सिंगापुर पहुँचे थे.

उन्होंने इस दौरे पर सिंगापुर के प्रधानमंत्री लॉरेंस वॉन्ग के अलावा सिंगापुर के बड़े व्यापारियों से भी मुलाक़ात की.

इस दौरान भारत और सिंगापुर में कई महत्वपूर्ण समझौते हुए. इसमें सेमीकंडक्टर क्लस्टर के विकास, डिज़ाइन और उत्पादन से जुड़ा समझौता भी शामिल है. लॉरेंस वॉन्ग के प्रधानमंत्री बनने के बाद पीएम मोदी की ये उनसे पहली मुलाक़ात रही.

इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “सिंगापुर हर विकासशील देश के लिए एक प्रेरणा है, हम भी भारत में अनेक सिंगापुर बनाना चाहते हैं.”

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वर्तमान में भारत के सीमावर्ती मुल्कों के साथ संबंध बेहद अच्छे दौर से नहीं गुज़र रहे हैं. वहीं आसियान देशों में चीन अपना प्रभुत्व लगातार बढ़ा रहा है. हिंद महासागर में मालदीव की मुइज़्ज़ू सरकार का भी चीन की ओर झुकाव दिखता है.

दक्षिण पूर्वी एशिया और इंडो पैसिफिक की भू-राजनीति में जिस जगह अभी भारत खड़ा है, ऐसे में ‘ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के मद्देनज़र प्रधानमंत्री मोदी का सिंगापुर दौरा भारत के लिए क्या मायने रखता है.

इसको लेकर बीबीसी ने बात की भारत के पूर्व राजनयिक और दक्षिणी पूर्व एशियाई देशों के मामलों के जानकार सुरेश कुमार गोयल और बैंकॉक की थम्मासाट यूनिवर्सिटी में (जर्मन-साउथ ईस्ट एशियन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर पब्लिक पॉलिसी एंड गुड गवर्नेंस में) सीनियर रिसर्च फेलो राहुल मिश्रा से.

भारत के लिए क्यों ज़रूरी है सिंगापुर ?

भारत को आसियान देशों से जोड़ता है सिंगापुर

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इमेज कैप्शन, आसियान देशों में सिंगापुर भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है

सुरेश कुमार गोयल कहते हैं, “डिजिटाइज़ेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में भारत एक ऐसा साथी चाहता है जो तकनीक और निवेश दोनों ला सके. इसके लिए सिंगापुर से व्यापारिक सम्बन्ध बहुत अहम हैं. सिंगापुर आसियान की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, आसियान का इंट्रा ट्रेड इसी देश के ज़रिये होता है.”

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आसियान देशों में सिंगापुर भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. वहीं वैश्विक स्तर पर भारत का छठा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है. निवेश की दृष्टि से भी सिंगापुर बेहद महत्वपूर्ण है. 2023 में एफडीआई (फ़ॉरेन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट) में सिंगापुर भारत का सबसे बड़ा स्रोत था और साल 2000 से अभी तक सिंगापुर भारत में कुल 160 बिलियन डॉलर निवेश कर चुका है.

भारत की लुक ईस्ट और ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी में सिंगापुर के रोल पर राहुल मिश्रा कहते हैं, "1992 से हमने लुक ईस्ट पॉलिसी शुरू की. सिंगापुर से पार्टनरशिप भारत के लिए इस पॉलिसी के केंद्र में रही है. सिंगापुर ने भारत को लेकर हमेशा से ही दूरगामी नीति रखी है. बीच में कभी जब भारत सिंगापुर की उम्मीदों पर खरा नहीं भी उतरा है, उसके बावजूद सिंगापुर ने भारत के साथ आपसी रिश्तों में कभी खटास नहीं आने दी. जब 1992 में नरसिम्हा राव ने लुक ईस्ट पॉलिसी की शुरुआत की, तब सिंगापुर ने 'इंडिया फीवर' के नाम से एक कैम्पेन तक शुरू कर दिया जिसने भारत की इस नीति को काफी विस्तार भी दिया."

"सामरिक मामलों में या रक्षा के मामले में भारत की हमेशा से ये नीति रही है कि वो अपने डिफेन्स बेस किसी और को उपयोग नहीं करने देगा. लेकिन सिंगापुर इसमें अपवाद है. भारत और सिंगापुर के व्यावसायिक और रणनीतिक सम्बन्ध हमेशा से ही प्रगाढ़ रहे हैं."

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भारत को आसियान देशों से जोड़ता सिंगापुर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सिंगापुर के प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग

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इमेज कैप्शन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिंगापुर के प्रधानमंत्री लॉरेंस वॉन्ग से मिले, दोनों देशों में कई महत्वपूर्ण समझौते हुए

आसियान (असोसिएशन ऑफ़ साउथ ईस्ट एशियन नेशन्स) 10 दक्षिणी पूर्वी एशियाई देशों का एक गुट है.

आसियान के मामले में भारत-सिंगापुर संबंधों पर सुरेश कुमार गोयल कहते हैं, "सिंगापुर जानता है कि एशिया पैसिफिक में, आसियान देशों के मामले में अगर कोई चीन को बैलेंस कर सकता है तो वो भारत है. सिंगापुर चाहता है कि इस क्षेत्र में भारत अपनी सक्रियता बढ़ाए ताकि चीन पर से उनकी निर्भरता कम हो सके. वहीं उन्हीं के प्रयासों से भारत आसियान की स्पेशल समिट का सदस्य बना. एशिया पैसिफिक में चीन का प्रभाव बहुत ज़्यादा है, उस लिहाज़ से भारत के लिए भी सिंगापुर का साथ काफ़ी अहम है."

सुरेश कुमार गोयल मानते हैं कि व्यापार, समुद्री सुरक्षा और कनेक्टिविटी के लिहाज़ से सिंगापुर भारत के लिए आसियान में एक प्रमुख व्यापारिक और रणनीतिक द्वार है.

बीजिंग ने आसियान देशों में बहुत निवेश किया हुआ है. चीन और आसियान देशों के बीच 722 बिलियन डॉलर का मर्चेंडाइज़ व्यापार होता है. वहीं भारत इसमें बहुत पीछे है. आसियान देशों के साथ भारत का कुल व्यापार केवल 131 बिलियन डॉलर का है जो भारत की बड़ी चिंता है.

इस पर राहुल कहते हैं, "दरअसल दिक्कत ये है कि 2008-09 में जब इंडिया-आसियान ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत चल रही थी तब हमने केवल गुड्स (सामान) पर फोकस किया. सर्विस सेक्टर को हमने छोड़ दिया. जबकि ये हमारी विशिष्ट क्षमता रही है. सर्विस सैक्टर पर हमें फोकस करने की ज़रूरत है ताकि ये ट्रेड गैप भर पाए. हालांकि भारत-आसियान के व्यापारिक संबंधों के मामले में एक रिव्यू कमिटी बनाई जा चुकी है. अगले साल तक इस पर रिपोर्ट भी आ जाएगी.”

राहुल आगे कहते हैं, “रही बात चीन की, वो ज़्यादा से ज़्यादा देशों में अपना माल डम्प करना चाहते हैं. भारत समेत कई अन्य देश इससे परेशान भी हैं. हमें अंतरराष्ट्रीय निर्यात के जो पैमाने हैं, क्वालिटी स्टैण्डर्ड हैं उस हिसाब से अपनी क्षमता बढ़ाने पर फोकस करना होगा."

साउथ चाइना सी, समुद्री सुरक्षा और सिंगापुर

साउथ चाइना सी

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इमेज कैप्शन, भारत के कुल व्यापार का कम से कम 55% माल साउथ चाइना सी से गुज़रता है

सिंगापुर ईस्ट-वेस्ट ट्रेड रूट्स के बिल्कुल मध्य में स्थित है, जो भारत की समुद्री सुरक्षा नीति के तहत बहुत अहम है. भारत के कुल व्यापार का कम से कम 55% माल साउथ चाइना सी से गुज़रता है. वहीं भारतीय महासागर में ‘स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स’ की नीति के तहत, चीन अपनी नौसैनिक उपस्थिति लगातार बढ़ा रहा है.

साउथ चाइना सी में भारत के बढ़ते रुझान पर राहुल कहते हैं, "भारत का करीब-करीब दो तिहाई व्यापार साउथ चाइना सी से होकर आता है. समुद्री सुरक्षा से लेकर मानव तस्करी तक, समुद्री सीमा के रणनीतिक मुद्दों के लिहाज़ से भारत साउथ चाइना सी और मलक्का स्ट्रेट में अपनी नौसेना की उपस्थिति बहुत अहम मानता है."

चीन की दख़ल अंदाज़ी से स्वतंत्र समुद्री रास्ते भारत के लिए ज़रूरी हैं. इस पर राहुल कहते हैं, "फिलहाल चीन 'ए2-एडी' (ऐंटी ऐक्सिस एरिया डिनायल) की पॉलिसी पर चल रहा है. साउथ चाइना सी के रास्ते से भी कोई गुज़रेगा तो उस पर चीन को आपत्ति हो रही है. इसलिए भारत और तमाम देश ‘फ्रीडम ऑफ नैविगेशन’ की बात करते आए हैं. बीते कुछ समय में साउथ चाइना सी को लेकर सिंगापुर का रवैया काफी मुखर रहा है. वो इस बात से खुश नहीं हैं कि चीन इस क्षेत्र में पड़ोसी देशों के लिए या आसियान के लिए दिक्कतें पैदा कर रहा है. सिंगापुर चाहता है कि भारत की यहां उपस्थिति रहे. लेकिन साथ ही वो किसी भी प्रकार की घेराबंदी या युद्ध की स्थिति नहीं चाहता है."

साउथ चाइना सी में भारत-सिंगापुर संबंध के महत्व पर सुरेश कुमार गोयल कहते हैं, "हम क्वॉड के सदस्य हैं. क्वाड समूह इंडो-पैसिफिक में फ्रीडम ऑफ नैविगेशन (समुद्री रास्तों की स्वतंत्रता) चाहता है. वो इसलिए कि हमारा ज़्यादातर व्यापार इंडो-पैसिफिक के ज़रिये है. व्यापारिक और ऊर्जा सुरक्षा को देखते हुए, इस क्षेत्र की सुरक्षा और स्वतंत्रता हमारे लिए बहुत ज़रूरी हो जाती है. साउथ चाइना सी में जो भी होता है, उसका सीधा असर इस क्षेत्र पर और हम पर पड़ता है. इसलिए इंडो पैसिफिक में भारत को अपना रोल अदा करना पड़ेगा. और इसमें उसे सिंगापुर के साथ की ज़रूरत है."

क्यों सेमीकंडक्टर पर नज़र बनाए है भारत?

प्रधानमंत्री सिंगापुर के टॉप बिज़नेस लीडर्स से मिले.

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इमेज कैप्शन, प्रधानमंत्री मोदी सिंगापुर के टॉप बिज़नेस लीडर्स से मिले और उन्हें भारत की सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में निवेश करने का न्योता दिया

भारत में सेमीकंडक्टर्स की डिमांड तेज़ी से बढ़ रही है. हर नई तकनीक में इसका बहुत अहम रोल है. आपका मोबाइल फोन हो या फिर अंतरिक्ष में जाते यान, कीबोर्ड हो या कोई भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सब में ये सेमीकंडक्टर चिप्स इस्तेमाल की जाती हैं.

इस क्षेत्र में कुछ प्रमुख देशों पर ही दुनिया भर की निर्भरता रही है, जिसके कारण कोविड काल में इसके सप्लाय चेन में आई रुकावट के कारण नुक़सान भी झेलना पड़ा था. फिलहाल अपनी सेमीकंडक्टर ज़रूरतों की आपूर्ति के लिए भारत बहुत हद तक आयात पर निर्भर है.

राहुल मानते हैं कि सिंगापुर से अच्छे संबंध इस मामले में भारत के लिए मददगार साबित होंगे. वो कहते हैं, "अभी भारत बहुत तेज़ी से कोशिश कर रहा है कि आने वाले समय में हम सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में एक बड़ी शक्ति बनकर उभरें. इस बारे में मलेशिया समेत अन्य देशों से भी बातचीत चल रही है. लेकिन सिंगापुर जाकर उस समझौते पर हस्ताक्षर हो गए. भविष्य में इसके बहुत मायने हैं. आप अगर भारत और सिंगापुर के पिछले 20 साल के ज्वाइंट स्टेटमेंट्स भी देखें तो समसामयिक मामलों के साथ-साथ ही दूरगामी लक्ष्यों पर दोनों देशों की सहमति साफ़ देखी जा सकती है.”

गुरुवार 5 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी सिंगापुर के टॉप बिज़नेस लीडर्स से मिले और उन्हें भारत की सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में निवेश करने का न्योता दिया. मोदी ने कहा, “हम सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं. हम इस सेक्टर में पूरा इकोसिस्टम बनाएंगे. भारत के टायर 2, टायर 3 शहरों में भी अब स्टार्ट-अप्स बढ़ रहे हैं.”

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सेमीकंडक्टर पावरहाउस बनने की संभावनाएं तलाशता भारत

फिलहाल अपनी सेमीकंडक्टर ज़रूरतों की आपूर्ति के लिए भारत बहुत हद तक आयात पर निर्भर है

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इमेज कैप्शन, भारत में सेमीकंडक्टर्स की डिमांड तेज़ी से बढ़ रही है

वैश्विक सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में फिलहाल कई प्रमुख खिलाड़ी हैं. अमेरिका, चीन जैसे देशों का प्रभुत्व है. पर सप्लाय चेन में चीन पर निर्भरता कई देशों के लिए चिंता का कारण बनी हुई है.

‘चाइना +1’ की नीति के तहत, ऐसे में एक वैकल्पिक खिलाड़ी की भूमिका अहम हो जाती है. भारत उसी के लिए अपनी मज़बूत दावेदारी रखना चाहता है. इसी साल, 15 अगस्त पर लालकिले से प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि भारत सेमीकंडक्टर उत्पादन में ग्लोबल हब बनने का लक्ष्य रखता है.

भारत लगातार सेमीकंडक्टर्स के क्षेत्र में अपनी आयात निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है. और ऐसे में सिंगापुर भारत के लिए संभावनाओं से भरा हुआ है.

राहुल कहते हैं, "देखिये सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के लिए तीन चीज़ें बहुत ज़रूरी हैं- तकनीकी ईकोसिस्टम व एक्सपर्ट्स, रेयर अर्थ मिनिरल्स और लेबर फ़ोर्स. भारत और चीन ही ऐसे दो देश हैं जो यदि चाहें तो बहुत बड़े पैमाने पर सेमीकंडक्टर चिप्स का उत्पादन कर सकते हैं. हमारे पास लेबर फ़ोर्स है, रेयर अर्थ मिनिरल्स के लिए हमें दूसरे देशों की मदद लेनी पड़ सकती है, और तकनीक में सिंगापुर हमारा बहुत बड़ा सहारा बन सकता है."

भारत क्यों चाहता है सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में सिंगापुर का साथ?

सेमीकंडक्टर सेक्टर सिंगापुर की अर्थव्यवस्था का काफी प्रमुख हिस्सा है. सिंगापुर देश की जीडीपी में सेमीकंडक्टर सेक्टर का जहाँ 8% योगदान है, वहीं सिंगापुर के इकोनॉमिक डेवलपमेंट बोर्ड के मुताबिक़ वैश्विक स्तर पर सिंगापुर का सेमीकंडक्टर आउटपुट में 10% और सेमीकंडक्टर उपकरण के उत्पादन में 20% योगदान है.

सिंगापुर का सेमीकंडक्टर सेक्टर बहुत एडवांस है. सिंगापुर की मदद से भारत नई तकनीक के सहारे अपनी मैनुफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाना चाहता है. टेक्नोलॉजी के सहयोग से भारत एक ऐसा मैनुफैक्चरिंग ईकोसिस्टम बनाना चाहता है, जो वैश्विक मार्केट में उसे आगे ले जाए.

हालांकि सिंगापुर के सामने भी कुछ चुनौतियां हैं. सिंगापुर बहुत छोटा देश है, भौगोलिक क्षेत्रफल भी कम है और जनसंख्या भी. यहाँ प्रोडक्शन कॉस्ट (उत्पादन की कीमत) ज़्यादा है, जिसके कारण कई कंपनी मलेशिया और थाइलैंड का रुख़ करने लगी हैं.

राहुल कहते हैं, "सिंगापुर सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में वैश्विक लीडर तो बनना चाहता है, लेकिन उसके पास ये संसाधन नहीं हैं. सिंगापुर ‘डीकप्लिंग’ के सिद्धांत पर चलना चाहेगा. वो चीन के साथ अच्छे सम्बन्ध तो रखना चाहता है, लेकिन साथ ही वो अपनी व्यापारिक ज़रूरतों की आपूर्ति के लिए अलग पार्टनर्स भी चाहता है. ताकि चीन पर से उसकी निर्भरता थोड़ी काम हो पाए. वो वैकल्पिक मेकेनिज़्म ढूंढ रहा है."

"सिंगापुर के लिए भारत एक भरोसेमंद साथी रहा है, और सिंगापुर को पता है कि भारत उसकी मदद करने की क्षमता रखता है. वैश्विक सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में भारत और सिंगापुर दोनों ही अपनी पैठ बनाना चाहते हैं और दोनों देशों के लक्ष्य एक दूसरे के पूरक भी हैं. अब सवाल ये है कि भारत इसमें कितनी तेज़ी और शिद्दत से काम करेगा."

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