पीथमपुर में भोपाल गैस त्रासदी के कचरे को लेकर बवाल, आत्मदाह की कोशिश

प्रदर्शन
इमेज कैप्शन, पीथमपुर में यूनियन कार्बाइड फ़ैक्ट्री का ज़हरीला कचरा भेजे जाने का व्यापक विरोध हुआ है
    • Author, विष्णुकांत तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, भोपाल

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 250 किलोमीटर दूर पीथमपुर में गैस त्रासदी से जुड़े कचरे को जलाने का व्यापक विरोध शुरू हो गया है.

शुक्रवार की सुबह सैकड़ों प्रदर्शनकारी इसके विरोध में सड़कों पर उतरे.

दावा किया जा रहा है कि इस विरोध में दो लोगों ने आत्मदाह करने की भी कोशिश की.

ये लोग दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदियों में से एक भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े कचरे को पीथमपुर भेजे जाने से नाराज़ हैं.

इस विरोध में सैकड़ों युवा भी शामिल हैं.

लाल लकीर

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लाल लकीर

धार के ज़िलाधिकारी प्रियांक मिश्रा ने पत्रकारों से बातचीत में आग्रह किया कि जनता को विश्वास में लिए बिना कुछ भी नहीं किया जाएगा.

उन्होंने कहा, "हम वैज्ञानिक उपायों को ध्यान में रखे बिना आगे नहीं बढ़ रहे हैं. हम सभी शंकाओं को दूर करेंगे, छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है. सभी से आग्रह है कि वे किसी भी क़ीमत पर क़ानून को अपने हाथ में न लें."

कचरे को लेकर इतना विरोध क्यों?

विरोध
इमेज कैप्शन, स्थानीय लोगों को डर है कि पीथमपुर में ज़हरीले कचरे को जलाने से उनके लिए समस्या खड़ी हो सकती है
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मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में तीन दिसंबर 1984 को हुई गैस त्रासदी के ज़ख़्म अब भी हरे हैं. इसी त्रासदी के 40 साल बाद, इस साल एक जनवरी को 350 मीट्रिक टन ज़हरीला कचरा भोपाल की यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी से उठाकर पीथमपुर स्थित प्लांट ले जाया गया है.

4 दिसंबर 2024 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाते हुए चार सप्ताह के अंदर कचरे को भेजने का आदेश दिया था.

इसके बाद क़वायद तेज़ करते हुए सरकार ने कचरे को पीथमपुर पहुँचाने की प्रक्रिया 29 दिसंबर को शुरू की. चार दिन तक चली इकठ्ठा करने की प्रक्रिया में कचरे को बैग्स में भरा गया.

मंगलवार, 31 दिसंबर की रात से कचरे के इन बैग्स को कंटेनर्स में लोड करना शुरू किया गया और बुधवार दोपहर तक पूरा कचरा भरे जाने के बाद रात में ही इसे पुलिस की भारी मौजूदगी में पीथमपुर रवाना किया गया.

स्थानीय लोगों का विरोध है कि इस कचरे को पीथमपुर में जलाने से उनके लिए समस्याएँ खड़ी होंगी.

विरोध प्रदर्शन में शामिल 26 साल के रजत रघुवंशी ने कहा, "इस कचरे को भोपाल से पीथमपुर लाकर जलाने की योजना का हम विरोध कर रहे हैं. हमें इसके असर के बारे में कुछ नहीं बताया गया है."

"अगर इसको जलाने से या डिस्पोज करने से कोई समस्या नहीं होगी तो फिर भोपाल में ही इसको डिस्पोज क्यों नहीं किया गया? हम किसी के ख़िलाफ़ नहीं हैं बस ये कचरा यहाँ डिस्पोज न किया जाए. जो भोपाल के लोग झेल रहे हैं, वही समस्याएँ पीथमपुर में क्यों खड़ी की जा रही हैं?"

प्रदर्शन में शामिल एक महिला कहती हैं, "हमें मरना नहीं, जीना है. जहाँ कचरा जला रहे हैं और जहाँ इसकी राख दबाई जाएगी वहीं जाकर हमें मज़दूरी करनी है और पेट पालना है. 100-200 रुपए कमाकर पेट पालते हैं और यहाँ नेता लोग जनता को मार रहे हैं."

'ज़हरीले कचरे छोटा सा हिस्सा'

विरोध
इमेज कैप्शन, पीथमपुर में हो रहा विरोध प्रदर्शन

इन सबके बीच भोपाल में मध्य प्रदेश गैस राहत एवं पुनर्वास विभाग के संचालक स्वतंत्र कुमार सिंह ने बीबीसी को बताया, "पूरे ज़हरीले कचरे का डिस्पोजल उच्चतम वैज्ञानिक मानकों और प्रक्रियाओं के अनुसार किया जाना है. पीथमपुर का प्लांट अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है."

"मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के केमिकल कारखानों से निकलने वाले विषाक्त कचरे को यहीं जलाया जाता है, जो यूनियन कार्बाइड से एकत्रित कचरे से अधिक विषाक्त होते हैं. इसलिए लोगों को डरने की ज़रूरत नहीं है. माननीय न्यायालय के आदेशानुसार और सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की देखरेख में यह किया जा रहा है."

भोपाल गैस त्रासदी के राहत बचाव कार्यों से जुड़ी रचना ढींगरा कहती हैं कि पीथमपुर पहुँचाया गया कचरा पूरे 11 लाख मीट्रिक टन विषाक्त कचरे का सिर्फ़ एक छोटा सा हिस्सा है और ये एक 'दिखावटी क़दम' है.

रचना ढींगरा बताती हैं, "साल 2010 में हाई कोर्ट के निर्देश पर मध्य प्रदेश सरकार ने नागपुर स्थित नेशनल एन्वायरनमेंटल इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट (नीरी) और हैदराबाद स्थित नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनजीआरआई) से ज़हरीले कचरे और उससे हुए प्रदूषण की जाँच कराई थी."

बीबीसी के पास इस रिपोर्ट की एक प्रति है. नीरी की रिपोर्ट में बताया गया कि वहाँ की मिट्टी में एल्डीकार्ब, कार्बेरिल, ए-नेफ्थॉल, डाइक्लोरोबेंजीन और पारे जैसे ख़तरनाक रसायन पाए गए हैं.

इसके अलावा इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दूषित मिट्टी की कुल मात्रा क़रीब 11 लाख मीट्रिक टन है. इतने सालों तक यह ज़हरीला कचरा वहीं पड़ा रहा, जिससे स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ा है.

रचना ढींगरा कहती हैं, "सरकार ने जितना कचरा भोपाल से पीथमपुर पहुँचाया है, वो पूरे दूषित कचरे का एक प्रतिशत भी नहीं है. नीरी की रिपोर्ट के अलावा भी यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी के बाहर कई डम्पिंग और लैंडफिल स्थल हैं, जिनमें फ़ैक्टरी के कचरे को ग़ैर ज़िम्मेदाराना तरीके़ से डम्प किया गया था."

"इन रासायनिक और ज़हरीले कचरे से भरे तालाबों से बहुत सारे ख़तरनाक तत्व धरती में रिसकर आसपास के पानी के स्रोत और मिट्टी को बर्बाद कर चुके है. सरकार को इस कचरे पर भी ध्यान देना चाहिए वरना इसका कोई असर नहीं होगा और लोग परेशान होते रहेंगे."

सरकार पर दिखावे का आरोप

यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, भोपाल की यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी में हुई त्रासदी के 40 साल पूरे हो गए हैं

इस मामले पर जब हमने स्वतंत्र कुमार सिंह से पूछा तो उन्होंने बताया कि हाई कोर्ट में विचाराधीन मामले में साल 1984 की घटना के बाद के कुछ दिनों में जो कचरा इकट्ठा करके फ़ैक्टरी के एक हिस्से में रखा गया था, उस पर ही आदेश दिया गया था और सिर्फ़ उसी कचरे को जलाने के लिए पीथमपुर भेजा गया है.

उन्होंने बताया, "पीथमपुर भेजे गए कचरे में 60% धूल है जो कि टॉक्सिक वेस्ट से लैस थी और 40% फ़ैक्टरी से निकला रासायनिक कचरा है. ये जो 337 मीट्रिक टन का कचरा था, ये पूरी फ़ैक्टरी से नहीं इकट्ठा किया गया है. घटना के बाद ही जो भी केमिकल्स थे, उनको इकट्ठा करके फ़ैक्टरी के अंदर ही एक शेड में रखा गया था."

गैस पीड़ितों के साथ काम कर रही भोपाल गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति के सह संयोजक एनडी जयप्रकाश ने सरकार पर दिखावे का आरोप लगाया है.

उनका कहना है, "जो कचरा एक शेड में रखा था, उसको डिस्पोज करने के बाद अपनी वाहवाही नहीं करनी चाहिए, बल्कि पूरा ध्यान जो कचरा खुले में पड़ा है, जो ज़मीन के नीचे दबा हुआ है और जो आसपास के हज़ारों परिवारों का जीवन तबाह कर चुका है, उस पर ध्यान देना चाहिए."

उन्होंने कहा कि सरकार ख़ुद कह रही है कि पीथमपुर भेजे गए कचरे में 60% धूल है, तो जो धूल यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी के इलाक़े में है, उसके निपटारे की ओर ध्यान क्यों नहीं है?

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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